भाग 1: एक ऐप, लाखों लोग… और फिर भी इतनी बेचैनी क्यों?

रात के करीब साढ़े दस बजे हैं। शहर की सड़कें अभी भी जगी हुई हैं। किसी गली में एक delivery bike तेजी से मुड़ती है, कहीं lift के सामने एक rider थका हुआ खड़ा है, कहीं कोई customer app पर बार-बार order tracking देख रहा है, Zomato और कहीं एक phone screen पर सिर्फ एक line चमक रही है—“Order delivered.” लेकिन कई बार असली कहानी उस line के बाद शुरू होती है। क्योंकि जिस दुनिया को हम app पर सिर्फ 20 मिनट, 30 मिनट, या “arriving soon” के रूप में देखते हैं, उसके पीछे हर महीने लाखों लोगों की entry और exit चल रही होती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि Zomato जैसे बड़े platform पर हर महीने करीब 1.5 लाख से 2 लाख लोग आते भी हैं, और लगभग इतने ही लोग खुद ही यह काम छोड़ भी देते हैं। ऊपर से company करीब 5,000 delivery partners को हर महीने fraud या policy violation जैसे कारणों से हटाती भी है। सवाल यह है कि आखिर यह नौकरी इतनी बड़ी भी है, और इतनी अस्थिर भी क्यों है? Deepinder Goyal ने Raj Shamani के podcast में जो बातें कहीं, उन्होंने gig economy की चमक के पीछे छिपी हकीकत को अचानक सामने ला दिया। Zomato उन्होंने माना कि Zomato हर महीने लगभग 5,000 gig workers को हटाती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि करीब 1.5 लाख से 2 लाख delivery partners हर महीने अपने-आप platform छोड़ देते हैं, और लगभग उतने ही नए लोग platform पर जुड़ते भी हैं। पहली नज़र में यह आंकड़ा अजीब लगता है, लेकिन यही gig economy का सच है। यहाँ नौकरी पारंपरिक office job की तरह नहीं चलती, जहाँ कोई सालों तक एक ही desk पर बैठा रहे। यहाँ लोगों का आना-जाना business model का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि delivery job को समझने के लिए सिर्फ “job” शब्द काफी नहीं है। यह कई लोगों के लिए नौकरी नहीं, बल्कि एक temporary सहारा है। कोई student extra income के लिए आता है, कोई बेरोजगारी के gap को भरने आता है, कोई गांव से शहर आया होता है और तुरंत cash flow चाहता है, कोई किसी दूसरी नौकरी की तलाश के बीच यह काम पकड़ लेता है, और कोई घर के खर्च, EMI, medical emergency या family pressure के कारण app-based delivery को तुरंत कमाई का रास्ता मान लेता है। यही इस मॉडल की पहली सच्चाई है—यह लाखों लोगों को मौका देता है, लेकिन वही मौका बहुत कम लोगों के लिए स्थायी रास्ता बन पाता है। Zomato
भाग 2: यह नौकरी नहीं, कई लोगों के लिए बस दो पड़ावों के बीच की सड़क है

Deepinder Goyal ने खुद कहा कि बहुत से लोग इस काम को “purely gig” और “transitional job” की तरह देखते हैं। यानी यह उनके लिए मंज़िल नहीं, बस दो पड़ावों के बीच की सड़क है। अगर आप इस model को गहराई से देखें, तो पता चलता है कि इसकी सबसे बड़ी ताकत ही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। ताकत यह कि entry barrier कम है, joining relatively तेज़ है, और कमाई शुरू करने में traditional hiring जितना समय नहीं लगता। लेकिन कमजोरी यह कि इसी flexibility की वजह से loyalty कम हो जाती है। जब कोई job “जब चाहो करो, जब चाहो छोड़ो” वाली मानसिकता में शुरू होती है, तो उसे लंबे समय तक पकड़े रखना आसान नहीं होता। यही कारण है कि platform economy में churn बहुत ऊँचा रहता है। NITI Aayog ने 2022 की अपनी report में कहा था कि भारत में gig और platform workers की संख्या 2021 में 77 लाख थी, जो 2030 तक बढ़कर 2 करोड़ तक पहुँच सकती है। मतलब यह sector तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ instability भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रही है। मगर कहानी सिर्फ flexibility की नहीं है। असली दबाव काम की प्रकृति में छिपा है। बाहर से यह job सीधी लगती है—order उठाओ, address पर जाओ, खाना पहुँचा दो। मगर ground reality कहीं ज्यादा कठिन है। हर दिन traffic, heat, rain, pollution, customer calls, restaurant delays, location confusion, gate-entry issues, cash handling, order cancellations, rating pressure और time targets—ये सब मिलकर इस काम को physically और mentally exhausting बना देते हैं। Delivery partner का चेहरा app पर नहीं दिखता Zomato, लेकिन platform की पूरी promise उसी के कंधे पर टिकी होती है। Zomato अगर order late हो जाए, खाना गिर जाए, address गलत निकले, restaurant delay कर दे, customer phone न उठाए, फिर भी गुस्सा सबसे पहले rider पर निकलता है। यही invisible pressure बहुतों को कुछ हफ्तों या कुछ महीनों में थका देता है। Zomato कई workers यह job इसलिए भी छोड़ते हैं, क्योंकि उनकी expectation और reality के बीच बहुत बड़ा gap होता है। शुरू में उन्हें लगता है कि ज्यादा घंटों काम करके वे जल्दी अच्छा पैसा बना लेंगे। कुछ लोग short-term financial target लेकर आते हैं—जैसे किराया भरना है, किसी loan की किस्त निकालनी है, घर पैसे भेजने हैं, या कुछ समय तक survival income चाहिए। मगर जब उन्हें पता चलता है कि earnings पूरी तरह straightforward नहीं हैं, incentives बदल सकते हैं, fuel cost, maintenance, peak-hour dependence, city-specific demand और personal stamina भी equation का हिस्सा हैं, तब job उतनी आसान नहीं लगती जितनी joining के समय दिखती थी। Zomato
भाग 3: लोग खुद क्यों छोड़ते हैं—कमाई है, लेकिन certainty नहीं है

यही वजह है कि बहुत से लोग उतना पैसा कमा लेने के बाद, जितनी उन्हें तत्काल जरूरत थी, platform छोड़ देते हैं। यहाँ सबसे बड़ी बात यह समझनी होगी कि gig job का मतलब fixed salary नहीं है। इसका मतलब है variable earning। अगर order ज्यादा आएँ, peak hour मिले, location अच्छा हो, fuel prices manageable हों और शरीर साथ दे, तो कमाई ठीक लगती है। लेकिन अगर demand patchy हो जाए, restaurant delays बढ़ जाएँ, weather खराब हो, bike maintenance बढ़ जाए या health जवाब देने लगे, तो वही काम अचानक बोझ लगने लगता है। बहुत से delivery partners शुरुआत में platform को opportunity समझते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद उन्हें यह महसूस होने लगता है कि यह काम survival तो दे सकता है, stability नहीं। और यह फर्क बहुत बड़ा है। नौकरी सिर्फ आय नहीं होती, वह predictable rhythm भी देती है। Zomato Gig work में rhythm कम, hustle ज्यादा होता है। इसी वजह से बहुत से लोग इस काम को permanent career नहीं मानते। कई families भी इसे “अस्थायी सहारा” की तरह देखती हैं। घरवाले कहते हैं—कुछ दिन कर लो, फिर कोई पक्की नौकरी देखो। जब worker, उसका परिवार और खुद company भी इस बात को indirectly मानती हो कि यह role लंबे समय का final destination नहीं है, तो churn बढ़ना लगभग तय हो जाता है। इसके साथ social respect का angle भी जुड़ा है। बहुत से riders को लगता है कि वे शहर की economy को चलाने वाला critical काम कर रहे हैं, Zomato लेकिन ground पर उन्हें वही सम्मान नहीं मिलता। customer के लिए अक्सर वे सिर्फ app का moving icon बनकर रह जाते हैं। यही disconnect भी धीरे-धीरे burnout पैदा करता है। ऊपर से quick commerce और fast delivery culture ने pressure और बढ़ा दिया है। पहले 35 से 40 मिनट की delivery कभी-कभी acceptable थी, अब 10-minute, 15-minute, 20-minute culture ने पूरी consumer psychology बदल दी है। app पर “fast” एक feature लगता है, पर सड़क पर वही feature किसी worker की सांस, थकान, risk और लगातार alert रहने की मजबूरी बन जाता है। यही वजह है कि इस job में attrition सिर्फ पैसे की वजह से नहीं होता। lifestyle भी लंबे समय तक टिकाऊ नहीं लगता। सुबह से रात तक city routes पर घूमना, weather की मार झेलना, social respect की कमी महसूस करना, हर order के साथ performance pressure उठाना—ये बातें धीरे-धीरे असर डालती हैं। कुछ लोग इसलिए छोड़ते हैं क्योंकि उन्हें बेहतर job मिल जाती है। कुछ इसलिए छोड़ते हैं क्योंकि शरीर जवाब देने लगता है। कुछ इसलिए क्योंकि उन्होंने जितना emergency cash चाहिए था, उतना कमा लिया। और कुछ इसलिए क्योंकि उन्हें समझ आ जाता है कि यह काम entry आसान है, लेकिन टिके रहना आसान नहीं। Zomato
भाग 4: जो लोग हटाए जाते हैं, उनकी कहानी अलग है—fraud, trust और platform का संकट

और फिर आता है वह हिस्सा जिसके बारे में कम लोग खुलकर बात करते हैं—fraud। Deepinder Goyal ने podcast में साफ कहा कि हर महीने जो लगभग 5,000 लोग हटाए जाते हैं, उनमें से बड़ी संख्या recurring fraud cases से जुड़ी होती है। उदाहरण के तौर पर, कुछ delivery partners order को delivered mark कर देते हैं जबकि customer तक order पहुँचा ही नहीं होता। कुछ मामलों में cash-on-delivery order पर balance return करने का वादा किया जाता है, मगर पैसे लौटाए नहीं जाते। Zomato company के लिए यह सिर्फ एक individual incident नहीं होता; यह trust model पर सीधा हमला होता है। क्योंकि food delivery business technology से चलता जरूर है, लेकिन टिकता भरोसे पर ही है। एक बार customer को लगे कि system unsafe है, तो पूरी brand value हिल जाती है। मगर कहानी एकतरफा भी नहीं है। Deepinder Goyal ने यह भी कहा कि fraud सिर्फ riders की तरफ से नहीं होता, customers भी platform को चकमा देने की कोशिश करते हैं। उन्होंने ऐसे cases का जिक्र किया जहाँ लोग खाने में अपने बाल डालकर refund मांगते हैं, damage की fake photos भेजते हैं, और अब तो AI-generated images तक इस्तेमाल होने लगी हैं। Zomato Moneycontrol की January 2026 report के मुताबिक, Goyal ने बताया कि लोग AI की मदद से fake insects, fake damage, यहाँ तक कि cakes के साथ छेड़छाड़ वाली तस्वीरें बनाकर refund claim करने लगे हैं। सोचिए, एक तरफ company rider fraud से जूझ रही है, दूसरी तरफ customer fraud से, और बीच में restaurant भी है। ऐसे में हर dispute में सच क्या है, यह पता लगाना कई बार impossible जैसा हो जाता है। यहीं पर company का “karma score” जैसा internal system काम में आता है। Goyal ने बताया कि customer karma score और rider karma score जैसे tools, past behaviour के आधार पर platform को संकेत देते हैं कि किस पर कितना भरोसा किया जाए। यानी यह system किसी court की तरह absolute truth नहीं बताता, बल्कि probability बताता है। अगर किसी customer का पुराना record अच्छा है, तो उसकी complaint ज्यादा credible मानी जा सकती है। अगर किसी rider का history साफ है, तो उसके पक्ष को भी weight दिया जा सकता है। लेकिन Goyal ने यह भी माना कि company कभी पूरी तरह सही नहीं हो सकती, और कई बार 50% से 70% तक cases में खुद नुकसान उठाना पड़ता है। यानी platform की दुनिया में हर dispute का perfect न्याय संभव नहीं, सिर्फ risk management संभव है। यही कारण है कि 5,000 monthly removals सिर्फ HR number नहीं हैं, वे उस invisible war का हिस्सा हैं जहाँ trust, fraud, refund abuse और platform economics हर दिन टकराते हैं। Zomato
भाग 5: Zomato अब सिर्फ food delivery नहीं रहा—model बदल गया, pressure भी बदल गया

अब जरा business की बड़ी तस्वीर देखिए। कभी Zomato का food delivery arm company का सबसे बड़ा business माना जाता था, लेकिन 2025 में Blinkit ने net order value के स्तर पर Zomato food delivery business को पीछे छोड़ दिया। Moneycontrol और Economic Times की reports के मुताबिक, 2026 की पहली तिमाही वह पहला quarter थी जब Blinkit का net order value Zomato food delivery से ऊपर चला गया। इसी बीच company ने अपने parent entity का नाम बदलकर Eternal कर दिया, जिसके तहत Zomato, Blinkit, District और Hyperpure चार बड़े business units हैं। इसका मतलब यह है कि delivery worker की दुनिया अब सिर्फ restaurant-to-home model तक सीमित नहीं रही; quick commerce, dark stores, grocery flow, B2B supply और local logistics की पूरी नई दुनिया बन चुकी है। यह बदलाव delivery partners के लिए मौका भी है और दबाव भी। मौका इसलिए कि ज्यादा business verticals का मतलब ज्यादा demand, ज्यादा orders, ज्यादा earning windows हो सकती हैं। दबाव इसलिए कि quick commerce ने customer expectation को और कठोर बना दिया है। Zomato पहले food delivery में 35 से 40 minutes का delay कभी-कभी manageable माना जाता था, लेकिन अब 10-minute, 15-minute, 20-minute culture ने पूरी consumer psychology बदल दी है। अब customer सिर्फ delivery नहीं चाहता, वह speed चाहता है—और speed के पीछे human body लगी हुई है। Zomato यही gig economy का सबसे बड़ा paradox है। technology जितनी smooth दिखती है, उसके पीछे labour उतनी ही hard होती जाती है। Company delivery partner experience और flexible earning opportunities की बात जरूर करती है, लेकिन practical challenge यह है कि platform को growth, speed, customer satisfaction, fraud control और partner retention—इन सबको एक साथ balance करना पड़ता है। अगर incentives बढ़ाओ तो margin दबता है, fraud control सख्त करो तो genuine worker भी friction महसूस कर सकता है, customer refund आसान रखो तो abuse बढ़ता है, और refund कठिन करो तो genuine customer नाराज़ हो सकता है। यही balancing act इस business को बाहर से आसान और भीतर से बेहद जटिल बनाता है। और यही complexity worker churn को भी fuel करती है। Zomato
भाग 6: असली सच—यह सिर्फ Zomato की कहानी नहीं, नए भारत की labour story है

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि लाखों लोग फिर भी हर महीने इस sector में आ रहे हैं। इसका मतलब साफ है—India की economy में ऐसे काम की मांग बहुत बड़ी है जहाँ entry जल्दी हो, cash flow जल्दी बने, formal degree सबसे बड़ी शर्त न हो, और व्यक्ति अपनी जरूरत के हिसाब से काम शुरू कर सके। यही वजह है कि exit के बावजूद entry लगातार बनी रहती है। एक तरह से gig economy revolving door जैसी बन गई है—एक दरवाज़े से लोग अंदर आते हैं, दूसरे से बाहर चले जाते हैं, और system फिर भी चलता रहता है। सवाल यह नहीं कि लोग क्यों जा रहे हैं; बड़ा सवाल यह है कि इतने जाने के बावजूद इतने लोग आ क्यों रहे हैं। जवाब है—रोज़गार की जरूरत, flexible earning की तलाश, और formal job market की सीमाएँ। तो आखिर Zomato हर महीने इतने लोगों को काम भी क्यों देती है और इतने लोग छोड़ भी क्यों देते हैं? क्योंकि यह sector अवसर और अस्थिरता का अनोखा मिश्रण है। यह उन लोगों के लिए lifeline है जिन्हें तुरंत कमाई चाहिए, लेकिन यह हमेशा long-term career नहीं बन पाता। यह freedom देता है, लेकिन certainty नहीं। यह कमाई देता है, लेकिन आराम नहीं। यह entry आसान करता है, Zomato लेकिन टिके रहना कठिन बना देता है। और fraud, performance pressure, customer behaviour, business transformation और social security की कमी मिलकर इस churn को और बढ़ा देते हैं। भारत सरकार ने 2026 के Budget में gig workers के लिए कुछ welfare measures की बात की, और platform workers के social security framework पर भी दिशा दिखाई गई। NITI Aayog ने पहले ही संकेत दे दिया था कि आने वाले वर्षों में gig workforce करोड़ों में पहुँच सकती है। यानी यह अब fringe sector नहीं, labour market का core हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन अगर इतने बड़े workforce के लिए insurance, grievance redressal, earning stability, portability और protection की ठोस व्यवस्था नहीं होगी, तो high churn एक permanent feature बन सकता है। और यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच है—food delivery app पर जो “delivered” दिखाई देता है, उसके पीछे सिर्फ खाना नहीं पहुँचता, उसके पीछे एक पूरा economic model दौड़ रहा होता है। उस model में कुछ लोग कुछ दिनों के लिए आते हैं, कुछ महीनों के लिए टिकते हैं, कुछ नियम तोड़कर बाहर कर दिए जाते हैं, कुछ थककर खुद छोड़ देते हैं, और कुछ इसी hustle में अपना अगला रास्ता खोज लेते हैं। इसलिए Zomato की यह कहानी सिर्फ एक company की नहीं, बल्कि नए भारत की labour story है—जहाँ रोज़गार का दरवाज़ा खुला तो है, लेकिन उसके भीतर स्थिरता अब भी अधूरी है। Zomato
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