PART 1 — युद्ध और खेत का अदृश्य संबंध

कल्पना कीजिए… दुनिया के किसी खेत में एक किसान अपनी नई फसल की तैयारी कर रहा है। वह बीज खरीद चुका है, ट्रैक्टर तैयार है, बारिश का इंतजार भी है। लेकिन ठीक उसी समय हजारों किलोमीटर दूर मिडिल ईस्ट में मिसाइलें दागी जा रही हैं, ड्रोन उड़ रहे हैं और युद्ध की आग फैल रही है। पहली नजर में इन दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध नहीं लगता। लेकिन सच यह है कि अगर यह युद्ध लंबा चलता है, तो उस किसान के खेत में उगने वाली फसल भी खतरे में पड़ सकती है। और अगर खेत में फसल कम उगेगी, तो दुनिया की थाली भी खाली हो सकती है। सवाल यह है कि आखिर ईरान-इजरायल युद्ध का असर खेतों और खाने की थाली तक कैसे पहुंच सकता है?
PART 2 — तेल से बड़ा खतरा: Fertilizer Supply

जब भी मिडिल ईस्ट में युद्ध की खबरें आती हैं, तो सबसे पहले चर्चा होती है तेल और गैस की कीमतों की। क्योंकि यह क्षेत्र दुनिया की Energy supply का बड़ा केंद्र है। लेकिन इस बार विशेषज्ञ एक और खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं, जो शायद तेल से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है। वह खतरा है Fertilizer Supply यानी खाद की उपलब्धता का संकट। यह एक ऐसा संकट है जो धीरे-धीरे सामने आता है, लेकिन जब असर दिखाता है, तो पूरी दुनिया में खाद्य महंगाई और खाद्य संकट पैदा कर सकता है। मिडिल ईस्ट के मौजूदा संघर्ष ने दुनिया को एक बार फिर यह याद दिलाया है कि, Global Economy कितनी आपस में जुड़ी हुई है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने, Strait of Hormuz जैसे समुद्री रास्तों को अस्थिर बना दिया है। यह वही जलडमरूमध्य है, जिसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा लाइनों में से एक माना जाता है। यहां से हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी क्षेत्र से दुनिया की बड़ी मात्रा में Fertilizer Raw Material भी सप्लाई होता है।
PART 3 — खाड़ी देशों का Fertilizer नेटवर्क

वेस्ट एशिया यानी खाड़ी क्षेत्र सिर्फ तेल का भंडार नहीं है। यह Fertilizer Industry का भी एक बड़ा केंद्र है। सऊदी अरब, कतर, ओमान और यूएई जैसे देश यूरिया, अमोनिया और सल्फर के बड़े Exporter हैं। इन सभी रसायनों का इस्तेमाल खेती में होने वाले Fertilizers बनाने के लिए किया जाता है। खासकर Nitrogen based Fertilizer, जो दुनिया की लगभग आधी कृषि उत्पादन प्रणाली का आधार माने जाते हैं। ईरान खुद अमोनिया उत्पादन में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। अमोनिया वह रसायन है, जिससे Nitrogen Fertilizer बनते हैं। यह पौधों की वृद्धि के लिए जरूरी nutrients का आधार होता है। जब किसान खेत में यूरिया या अन्य खाद डालता है, तो वह दरअसल Nitrogen की Supply कर रहा होता है, जो फसल की तेजी से बढ़त में मदद करता है। अब समस्या यह है कि अगर युद्ध के कारण इस क्षेत्र में उत्पादन या शिपिंग प्रभावित होती है, तो Fertilizer Supply Chain टूट सकती है। और यह असर तुरंत नहीं, बल्कि कुछ महीनों बाद दिखाई देता है।
PART 4 — कम खाद, कम फसल, महंगी थाली

क्योंकि खेती का चक्र मौसम के हिसाब से चलता है। अगर किसान को समय पर खाद नहीं मिलेगी, तो वह या तो कम खाद इस्तेमाल करेगा या फिर कम उत्पादन वाली फसल बोएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले महीनों में खेतों से कम अनाज निकलेगा। और जब बाजार में अनाज कम होगा, तो कीमतें बढ़ना तय है। हाल के महीनों में Fertilizer Market में हलचल साफ दिखाई देने लगी है। मिडिल ईस्ट में यूरिया की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यूरोप में अमोनिया की कीमत लगभग 725 डॉलर प्रति टन तक पहुंच चुकी है। कई उत्पादन संयंत्रों में उत्पादन घट गया है और शिपिंग रूट अस्थिर हो गए हैं। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दुनिया की कृषि प्रणाली आज Fertilizers पर बहुत ज्यादा निर्भर हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, Global food उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा Nitrogen आधारित Fertilizers पर निर्भर करता है।
PART 5 — भारत पर पड़ने वाला संभावित असर

अब सवाल यह है कि इस पूरी स्थिति का असर भारत पर कितना पड़ सकता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में से एक है, लेकिन Fertilizer Production के मामले में वह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। भारत हर महीने लगभग 20 लाख टन Fertilizer Import करता है। कुछ महत्वपूर्ण Fertilizers के मामले में भारत की निर्भरता और भी ज्यादा है। उदाहरण के लिए M O P यानी Muriate of Potash के लिए भारत लगभग 100 प्रतिशत Import पर निर्भर है। D A P यानी Di-Ammonium Phosphate के लिए भारत लगभग 60 प्रतिशत Import करता है। इसका मतलब यह है कि अगर वैश्विक Fertilizer Market में संकट आता है, तो भारत भी उससे पूरी तरह बच नहीं सकता। भारत सरकार हर साल किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी देती है। 2025 में Fertilizer Subsidy पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। यह दुनिया की सबसे बड़ी कृषि सब्सिडी योजनाओं में से एक है। अगर वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो सरकार के लिए इस सब्सिडी को बनाए रखना और महंगा हो जाएगा। दूसरी ओर अगर सब्सिडी कम की जाती है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है।
PART 6 — वैश्विक संकट और आने वाला खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो यूरिया की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ेगा। भारत में खेती पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही है—जैसे मौसम की अनिश्चितता, पानी की कमी और बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव। अगर Fertilizer की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो किसानों के लिए खेती और महंगी हो सकती है। यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया के कई विकासशील देश Fertilizer Import पर निर्भर हैं। खासकर अफ्रीका और एशिया के कई देश, जहां कृषि उत्पादन पहले से ही सीमित संसाधनों पर आधारित है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी दुनिया ने ऐसा ही एक संकट देखा था। उस समय गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं। Fertilizer Market भी प्रभावित हुआ था, क्योंकि रूस और बेलारूस Potash Fertilizer के बड़े Exporter हैं। उस संकट के दौरान कई देशों में खाद्य महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। कई गरीब देशों में खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई थीं। मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट भी उसी तरह का खतरा पैदा कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार समस्या Fertilizer Supply से शुरू हो सकती है। भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी FACT यानी, Fertilizers and Chemicals Travancore भी इस स्थिति पर नजर रखे हुए है। यह कंपनी Rock Phosphate और Phosphoric Acid जैसे कच्चे माल के लिए पश्चिम एशिया के कई देशों पर निर्भर है। FACT के प्रबंध निदेशक एस शक्तिमणि के अनुसार, फिलहाल भारत के पास खरीफ फसल के लिए पर्याप्त यूरिया उपलब्ध है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि अगर युद्ध कई महीनों तक जारी रहता है, तो भविष्य में समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारत में खेती मुख्य रूप से दो मौसमों में होती है—खरीफ और रबी। खरीफ की फसलें जून-जुलाई में बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में कटाई होती हैं। वहीं रबी की फसलें अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती हैं और अप्रैल-मई में कटती हैं। अगर Fertilizer Supply इन मौसमों के बीच प्रभावित होती है, तो किसानों को समय पर खाद नहीं मिल पाएगी। इसका असर सीधे फसल उत्पादन पर पड़ेगा। इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि, दुनिया का Food System कितना जटिल और आपस में जुड़ा हुआ है। एक जगह होने वाला युद्ध, हजारों किलोमीटर दूर खेतों की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। आज की दुनिया में कृषि सिर्फ खेत और किसान की कहानी नहीं रह गई है। यह Global Supply Chain, Energy Market, Shipping Routes और Geopolitics से जुड़ी हुई है। मिडिल ईस्ट का यह संकट हमें यह भी याद दिलाता है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा कितनी नाजुक है। अगर Fertilizer Supply में लंबा व्यवधान आता है, तो उसका असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया की थाली तक पहुंच सकता है। और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा डर है… कि युद्ध का असली असर हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देता। कभी-कभी वह महीनों बाद सामने आता है—जब खेतों में कम फसल उगती है, जब बाजार में अनाज महंगा हो जाता है, और जब आम लोगों की थाली में खाने की कीमत बढ़ जाती है। यानी मिडिल ईस्ट की मिसाइलें सिर्फ सीमाओं को नहीं हिला रहीं… वे शायद आने वाले समय में दुनिया की खाद्य सुरक्षा को भी चुनौती दे रही हैं।
कल्पना कीजिए… खेत में खड़ा एक किसान, हाथ में बीज है, बारिश का इंतज़ार है… लेकिन सबसे जरूरी चीज़—खाद—उसके पास नहीं पहुँच पाती। डर यहीं से शुरू होता है। क्योंकि जब खेत में खाद नहीं पड़ेगी, तो कुछ महीनों बाद थाली में अनाज भी कम हो सकता है। और जिज्ञासा यह कि आखिर मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध भारत की रसोई तक कैसे पहुँच सकता है? ईरान-इजरायल संघर्ष ने सिर्फ तेल की कीमतों को ही नहीं हिलाया, बल्कि एक और बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है—फर्टिलाइजर सप्लाई का संकट। खाड़ी के देश जैसे सऊदी अरब, कतर, ओमान और यूएई दुनिया को यूरिया, अमोनिया और सल्फर की बड़ी मात्रा देते हैं। वहीं ईरान खुद अमोनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। अगर युद्ध लंबा चला और शिपिंग रूट प्रभावित रहे, तो फर्टिलाइजर की सप्लाई घट सकती है। भारत जैसे देश, जो हर महीने करीब 20 लाख टन खाद Import करते हैं, सीधे दबाव में आ सकते हैं… और यही स्थिति आने वाले महीनों में खेती, उत्पादन और खाने की कीमतों को किस दिशा में ले जाएगी…
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