सोचिए… एक ऐसा समय जब देश की economy तेजी से बढ़ रही हो, stock market record तोड़ रहा हो, highways बन रहे हों, startups दुनिया भर में नाम कमा रहे हों… और उसी समय देश के सबसे अमीर लोग quietly अपने bags पैक करके विदेश जा रहे हों। घर बेच रहे हैं, citizenship बदल रहे हैं, नई ज़मीन, नया घर, नई पहचान… और पीछे छोड़ रहे हैं वही देश जिसने उन्हें पहचान दी, ताकत दी, wealth दी। सवाल उठता है—आखिर क्यों?
सिर्फ हवा साफ नहीं है? सिर्फ pollution की बात नहीं है? या फिर story इससे कहीं गहरी, कहीं ज्यादा जटिल है? यहीं पर आते हैं देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और thinker Sanjeev Sanyal… और वो कहते हैं—ये सिर्फ “quality of life” की कहानी नहीं है। ये उस दर्द की कहानी है जो भारत के एक खास कारोबारी वर्ग के डीएनए में छुपा है… और जिसे हम बहुत देर से समझ रहे हैं।
Sanjeev Sanyal साफ कहते हैं—जब देश के rich लोग बाहर जा रहे हैं, तो इसे सिर्फ यह कहकर simplify नहीं किया जा सकता कि “उन्हें साफ हवा चाहिए थी”, “उन्हें बेहतर life चाहिए थी”, “उन्हें luxury चाहिए थी”। ये बातों का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन पूरी कहानी नहीं। असली कहानी उस कारोबारी ecosystem में है, जो कई जगहों पर आज भी पुरानी सोच, पुराने mindset और risk से डरने वाली psychology में फंसा हुआ है। जब generations एक ही business को संभालती रहती हैं, जब leadership वही चेहरे, वही परिवार, वही सोच के आस-पास घूमती रहती है, तो शुरुआत में वो stability लगती है… लेकिन कुछ समय बाद वहीं stability सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।
क्योंकि stability का दूसरा नाम होता है—comfort zone। और comfort zone का दूसरा नाम होता है—innovation का अंत। जब decades तक एक ही कारोबारी परिवार हर decision लेता है, तो नई सोच entry नहीं कर पाती। New blood, new talent, new risk takers को जगह नहीं मिलती। Business challenge का सामना करने के बजाय safety ढूंढता है।
Global competition का सामना करने के बजाय “Protection” मांगता है। Monopoly चाहती है, risk नहीं। और तभी Sanjeev Sanyal कहते हैं—यहीं problem गहरी है। क्योंकि जब कोई class लगातार यही सोचने लगे कि “हमें risk क्यों लेना, हमें सरकार से protection मिल जाए, हमें competition से बचा लिया जाए,” तो देश की economy आगे नहीं बढ़ती… रुक जाती है।
वो कहते हैं कि असली development वहां होती है जहां fresh लोग आने देते हैं, नए दिमाग entry कर पाते हैं, नए ideas breathe कर पाते हैं। लेकिन जब पुरानी विरासत दीवार बन जाए, gatekeeper बन जाए, और नए talent को अंदर आने ही न दे… तो growth का oxygen खत्म हो जाता है। और तब वही होता है जो आज आप देखते हैं—कई पुराने businesses थक जाते हैं, outdated हो जाते हैं, upgrade नहीं कर पाते और finally collapse के edge पर पहुंच जाते हैं। लेकिन वो गिरना नहीं चाहते। वो टूटना नहीं चाहते। वो चाहते हैं कोई उन्हें बचा ले। System उन्हें protect कर ले। और वहीं से economy slow down होती है।
इसके ठीक उलट तस्वीर देखने के लिए बस एक जगह का नाम काफी है—Bengaluru। Sanjeev Sanyal कहते हैं कि ये शहर perfect नहीं है। Water issues हैं, traffic problem है, infrastructure stress है। लेकिन फिर भी ये शहर जिंदा है, energetic है, creative है। क्योंकि यहाँ youth ideas पर काम कर रहा है। Garage में बैठकर coding हो रही है।
छोटे rooms में बड़े सपने जन्म ले रहे हैं। risk है। failure का डर नहीं। वहां कोई पुरानी विरासत उन्हें रोकने नहीं बैठी। वहां कोई कहने वाला नहीं—“हमेशा से ऐसा ही होता आया है, आगे भी ऐसा ही होगा।” वहां सिर्फ एक बात clear है—जो सोचता है, वो करता है। जो कोशिश करता है, वही आगे जाता है। इसी वजह से इंडिया का startup ecosystem आज दुनिया के सबसे बड़े ecosystems में आता है।
लेकिन फिर सवाल उठता है—अगर India इतना dynamic है, startup ecosystem इतना strong है, तो फिर rich लोग क्यों जा रहे हैं? Sanjeev Sanyal इसका जवाब भी देते हैं। वो कहते हैं—कई बड़े कारोबारी वर्गों ने सालों तक R&D यानी Research and Development को एक खर्च समझा, investment नहीं।
कई companies ने नए products बनाने के बजाय पुरानी products को ही stretch किया। उन्होंने innovation culture नहीं develop किया। उन्होंने अपने industry को technological revolution के साथ pace पर नहीं रखा। और जब दुनिया बदल गई… जब global competition तेज़ हो गया… जब नए players आए… तब उन्हें लगा कि race उनसे छूट गई। और जब race छूटती है, तो दो options होते हैं—या तो दौड़ तेज़ कर दो, या मैदान ही छोड़ दो। और बहुतों ने दूसरा रास्ता चुना।
Sanjeev Sanyal कहते हैं—कई businesses अपने occasional CSR work को ऐसे showcase करते हैं जैसे उन्होंने बहुत बड़ा काम कर दिया। किसी school को furniture दे देना, कहीं healthcare van भेज देना, कहीं donation दे देना—ये सब अच्छे काम हैं, लेकिन ये business transformation का alternative नहीं हो सकते। असली काम lab में होता है। असली काम workshop में होता है। असली काम तब होता है जब owner खुद factory floor पर उतरकर system समझे, technology upgrade करे, risk ले, नए products create करे। लेकिन जब CSR replacement बन जाए, और hard work optional बन जाए… तो decline शुरू हो जाता है।
और फिर आता है उनका सबसे bold और powerful statement—economy को strong बनाने के लिए failure जरूरी है। हाँ, आपने सही सुना—failure जरूरी है। वो कहते हैं—एक healthy economy वो नहीं है जहां हर company जिंदा रहे, चाहे वो कितनी भी कमजोर, outdated या गलत तरीके से चल रही हो।
एक healthy economy वो है जहां continuously renewal होता रहे। जहाँ नई कंपनी पैदा होती रहे और पुरानी जो अब चलने लायक नहीं, वो गिर भी सके। यही reason है कि वो insolvency और bankruptcy system का strongly support करते हैं। वो कहते हैं—अगर कोई company कमजोर है, inefficient है, incapable है… तो उसे बचाने के लिए पूरा देश sacrifice क्यों करे? क्यों taxpayers का पैसा उसकी artificial life support पर खर्च हो? क्यों सिर्फ इस डर से कि “बड़ी कंपनी है,” उसे हमेशा बचाया जाए?
2017 के banking crisis को याद कीजिए। तब कई बड़ी कंपनियाँ collapse के edge पर थीं। Old belief ये था कि बड़ी कंपनियों को बचाना जरूरी है, नहीं तो economy गिर जाएगी। लेकिन हुआ उलटा। India ने कई बड़ी companies को fall होने दिया। Market clean हुआ। Resources re-allocate हुए। Competition बढ़ा। Strong कंपनियाँ और strong बनकर निकलीं। Weak players के निकलने से market efficient हुआ। और आज India का corporate sector पहले से कहीं ज्यादा मजबूत खड़ा है।
वो aviation sector का example देते हैं। Jet Airways… कभी sky का king, top luxury airline। लेकिन जब management decisions weak हो गए, debts बढ़े, system कमजोर हुआ, brand decision fail होने लगे—तो उसे artificially जिंदा रखने का क्या फायदा? उसे गिरने दिया गया। दर्द हुआ, emotional था, लेकिन result? Market space खुला। नई airlines उठीं। Competition बढ़ा। Industry clean हुई। Economy healthy हुई। यही economic evolution है।
Sanjeev Sanyal कहते हैं—हमें एक बात स्वीकार करनी होगी। बड़ी कंपनियों का मरना भी कभी-कभी देश के लिए बेहतर होता है। क्योंकि जो survive करते हैं, वो ही असली strong होते हैं। और जो गिरते हैं, वो आगे आने वाली generations के लिए warning बनते हैं—कि comfort zone में मत रहो, risk लो, innovate करो, evolve करो।
अब इसे जोड़िए rich Indians leaving India debate से। जब system open होगा, जब accountability बढ़ेगी, जब competition strong होगा, जब क्रोनी कारोबारी culture खत्म होगा—तो naturally उन लोगों को डर होगा जो सिर्फ protection पर depend रहते आए थे। और उनमें से कुछ leaving options choose करेंगे। लेकिन इससे देश कमजोर नहीं होगा। इससे system honest होगा। इससे नए लोग जगह लेंगे। इससे fresh energy आएगी। इससे economy dynamic बनेगी।
और इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा truth यही है—India आज transition zone में है। एक तरफ पुरानी economy जो protection चाहती है। दूसरी तरफ नई economy जो risk चाहती है। एक तरफ legacy businesses जो status quo चाहते हैं। दूसरी तरफ young innovators जो revolution चाहते हैं। और इस बीच में खड़े हैं policy makers जैसे Sanjeev Sanyal, जो कहते हैं—economy तब strong होती है जब उसमें गिरने और उठने दोनों की आजादी हो। जब उसमें freedom हो कोशिश करने की… और responsibility हो consequence झेलने की। जब growth forced नहीं, natural हो। जब protection policy नहीं, exception हो।
हमें समझना होगा कि दुनिया के सबसे successful देशों में failures celebrate किए जाते हैं, सिर झुकाकर छुपाए नहीं जाते। Silicon Valley का culture इसी पर खड़ा है—Try, fail, learn, grow, repeat. India अगर इसी रास्ते पर चलता रहा, startups को breathing space मिलती रही, innovation को respect मिलता रहा, और inefficient giants को artificial oxygen मिलना बंद हुआ—तो future सिर्फ bright नहीं, blazing होगा।
Conclusion
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