सोचिए… एक दिन आप मोबाइल स्क्रॉल कर रहे हैं, और अचानक एक छोटी-सी खबर आपकी आंखों में अटक जाती है— “Pakistan International Airlines PIA बिक गई।” एक पल के लिए दिमाग सुन्न हो जाता है। एक देश की national airline, वो एयरलाइन जिसका नाम कभी London, New York और Paris जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर इज़्ज़त से लिया जाता था, आज बिक चुकी है।
और सबसे हैरान करने वाली बात ये कि खरीदार कोई विदेशी कंपनी नहीं, कोई अरब शेख नहीं, बल्कि पाकिस्तान का ही एक बिजनेसमैन है—आरिफ हबीब। यहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जो सिर्फ एक आदमी की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की economy, उसकी नीतियों, उसकी मजबूरियों और उसके भविष्य का आईना भी है।
Pakistan International Airlines, यानी PIA। आज इसे लेकर jokes बनते हैं, memes वायरल होते हैं, late flights और cancelled routes की कहानियां सुनाई जाती हैं। लेकिन कभी यही PIA दुनिया की सबसे बेहतरीन airlines में गिनी जाती थी। 1960 के दशक में PIA इतनी advanced मानी जाती थी कि Emirates जैसी airline ने भी अपने शुरुआती दौर में PIA से training ली थी। उस दौर में PIA के pilots, engineers और cabin crew को दुनिया भर में respect की नजर से देखा जाता था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन यही airline अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करेगी।
समय बदला, लेकिन management नहीं बदला। Government interference बढ़ता गया, political appointments होने लगीं, loss-making routes सिर्फ vote bank के लिए चलाए गए। Overstaffing इतनी बढ़ गई कि एक airline के लिए ज़रूरी कर्मचारियों से कई गुना ज़्यादा लोग payroll पर आ गए। ऊपर से corruption और inefficiency ने इस पूरे सिस्टम को अंदर से खोखला कर दिया। हर साल bailout package आता रहा, taxpayer का पैसा झोंका जाता रहा, लेकिन हालात सुधरने की बजाय और बिगड़ते चले गए।
पाकिस्तान की economy पहले से ही IMF loans के सहारे चल रही थी और PIA उस economy पर सबसे भारी बोझ बन चुकी थी। कई बार privatization की कोशिश हुई। International investors आए, numbers देखे, debt का size समझा और फिर quietly पीछे हट गए। क्योंकि airline सिर्फ airplanes का business नहीं होती, airline अपने साथ unions, politics, international regulations और reputational risk का पूरा पैकेज लेकर चलती है।
फिर आता है वो दिन, जब Islamabad में bidding ceremony होती है। माहौल tense होता है। सबको लगता है शायद इस बार भी privatization fail हो जाएगा। लेकिन तभी एक consortium सामने आता है—Arif Habib Consortium। बोली लगती है 135 billion Pakistani rupees की। Deal के तहत 75% stake खरीदी जाती है और अगले पांच सालों में 80 billion rupees investment का commitment दिया जाता है। और यहीं से सवाल उठने लगते हैं—आख़िर कौन हैं ये आरिफ हबीब? और जिस aviation sector में उनका कोई direct experience नहीं, वहां वो इतना बड़ा risk क्यों ले रहे हैं?
आरिफ हबीब की कहानी किसी corporate boardroom से शुरू नहीं होती। उनकी कहानी glamour से दूर, partition की तकलीफ और गरीबी की सच्चाई से जन्म लेती है। 1947 का बंटवारा, जब लाखों लोग अपने घर-बार छोड़ने को मजबूर हुए। आरिफ हबीब के माता-पिता उस समय भारत के गुजरात में रहते थे और चाय का छोटा-सा कारोबार करते थे। 1948 में उनका परिवार नए बने पाकिस्तान चला गया। नया देश था, नई उम्मीदें थीं, लेकिन ज़िंदगी पहले से भी ज़्यादा कठिन हो गई।
कराची में आरिफ हबीब का जन्म हुआ। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। पढ़ाई ज़रूरी थी, लेकिन पेट भरना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी था। 10वीं तक पढ़ने के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर काम शुरू करना पड़ा। आज के दौर में जहां Ivy League degree और MBA को success की सीढ़ी माना जाता है, वहां एक 10वीं पास लड़के के लिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद कठिन था।
1970 का दशक था। Karachi Stock Exchange आज जितना organized नहीं था। Information asymmetry, panic selling और manipulation आम बात थी। आरिफ हबीब के बड़े भाई ने stock exchange में trading license खरीदा और 17 साल की उम्र में आरिफ हबीब उनके साथ brokerage business में जुड़ गए। यहीं से उनकी सबसे बड़ी खासियत सामने आई—contrarian thinking। जब market डरती थी, आरिफ हबीब खरीदते थे। जब सब बेच रहे होते थे, वो balance sheet पढ़ते थे। उनका मानना था कि अगर asset खराब नहीं है और सिर्फ management गलत है, तो turnaround संभव है।
धीरे-धीरे local brokerage firm पर भरोसा बढ़ता गया। Clients बढ़े, capital बढ़ा और अनुभव बढ़ा। समय के साथ यही brokerage firm एक multi-billion dollar business group की foundation बन गई। आज जिसे हम Arif Habib Corporation Limited के नाम से जानते हैं, वो सिर्फ finance तक सीमित नहीं है। Financial services से लेकर cement, steel, fertilizer, real estate और energy तक, लगभग हर sector में उनका footprint है।
आरिफ हबीब सिर्फ पैसा कमाने वाले businessman नहीं रहे। उन्होंने institutions बनाए। Karachi Stock Exchange के chairman बने, Central Depository Company के founders में शामिल रहे और Pakistan के capital market infrastructure को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। यही वजह है कि उनका नाम Pakistan की richest list में शामिल रहता है, और उनकी estimated net worth करीब 500 million dollars मानी जाती है।
लेकिन आरिफ हबीब की असली पहचान उनकी crisis investing strategy है। जहां दूसरे investors risk देखते हैं, वहां आरिफ हबीब opportunity देखते हैं। जहां government failures होते हैं, वहां वो private efficiency लाने की कोशिश करते हैं। PIA की कहानी में भी यही pattern दिखता है। PIA financially almost dead थी, लेकिन उसके पास आज भी valuable assets थे—international routes, landing rights, airport slots और trained manpower। Brand image जरूर खराब हो चुकी थी, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।
एक angle business का है, जहां PIA को revive कर cargo operations, diaspora traffic और Middle East connectivity से फायदा कमाया जा सकता है। दूसरा angle strategic है, क्योंकि Pakistan की geography aviation के लिहाज से आज भी important है। तीसरा angle emotional भी हो सकता है—एक ऐसा इंसान, जिसने खुद government systems की inefficiency देखी हो, शायद वो ये साबित करना चाहता हो कि state failures को private discipline से सुधारा जा सकता है।
लेकिन ये mission आसान नहीं है। PIA को profitable बनाना सिर्फ नए planes खरीदने से नहीं होगा। Unions से निपटना होगा, political pressure झेलना होगा, unviable routes बंद करने होंगे और overstaffing को कम करना होगा। सबसे बड़ी चुनौती trust rebuild करना होगी—international passengers का trust, regulators का trust और Pakistani public का trust।
Consortium ने वादा किया है कि fleet modernize होगी, I T systems upgrade होंगे और customer experience बेहतर किया जाएगा। लेकिन history गवाह है कि Pakistan में state-owned enterprises की privatization हमेशा smooth नहीं रही। Politics अक्सर economics पर भारी पड़ी है। यही वजह है कि कई लोग इस deal को लेकर skeptical हैं।
PIA की sale सिर्फ एक airline की sale नहीं है। ये Pakistan की economy की हालत का symbol है। जब कोई सरकार अपनी national airline बेचने को मजबूर हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि fiscal stress किस level पर पहुंच चुका है। IMF loans, shrinking foreign reserves, inflation और currency depreciation—इन सबके बीच ये deal हुई है।
Conclusion
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