Foreign Investors अब भी भारत की ताक़त पर भरोसा करते हैं! फिर रॉकेट स्पीड सुधारों के बावजूद पैसा क्यों निकल रहा है — मिसकैलकुलेशन या कोई बड़ा खेल? 2025

दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ती बड़ी अर्थव्यवस्था, चारों तरफ़ इंफ्रास्ट्रक्चर का शोर, हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट, डिजिटल पेमेंट्स, स्टार्टअप्स, और हर मंच से यह दावा कि भारत आने वाले दशक का सुपरस्टार है। लेकिन इसी चमकती तस्वीर के पीछे एक अजीब सा सन्नाटा है। शेयर बाज़ार के आंकड़ों में, foreign investment के डेटा में, एक सवाल बार-बार सिर उठाता है—अगर सब कुछ इतना सही है, तो Foreign investors भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं? क्या उन्हें कुछ ऐसा दिख रहा है जो हमें नहीं दिख रहा? या फिर यह इतिहास की सबसे बड़ी मिसकैलकुलेशन बनने जा रही है?

आपको बता दें कि भारत की कहानी इस वक्त किसी रॉकेट लॉन्च जैसी है। जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सुस्ती, मंदी और राजनीतिक अनिश्चितता से जूझ रही हैं, तब भारत 7 से 8 प्रतिशत की ग्रोथ के साथ आगे बढ़ रहा है। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर सर्विस सेक्टर तक, घरेलू खपत से लेकर Government investment तक, हर जगह एक्टिविटी दिखती है। सरकार ने सुधारों का ऐसा पैकेज खोला है, जिसकी मांग दशकों से की जा रही थी—GST, IBC, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, श्रम कानूनों में बदलाव, और पूंजीगत खर्च पर फोकस। आम Investor को यही लगता है कि इससे बेहतर माहौल शायद ही कभी रहा हो।

यही वजह है कि जब Foreign Portfolio Investment यानी FPI के आंकड़े सामने आते हैं, तो हैरानी होती है। पिछले एक साल में Foreign investors लगातार भारतीय शेयर बेचते नज़र आए हैं। कभी अचानक बड़ी बिकवाली, कभी धीमी-धीमी निकासी। इसका असर बाजार की चाल पर भी दिखा। इंडेक्स ऊपर तो रहे, लेकिन उतनी तेज़ी नहीं आई जितनी भारत की ग्रोथ स्टोरी से उम्मीद की जाती थी। यहीं से सवाल पैदा होता है—क्या Foreign investors भारत की कहानी पर भरोसा खो रहे हैं?

कई बड़े वैश्विक एक्सपर्ट्स ने इस ट्रेंड पर हैरानी जताई है। उनका कहना है कि अगर कोई Investor दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था से बाहर निकल रहा है, तो या तो वह बहुत शॉर्ट-टर्म सोच रहा है, या फिर कोई बड़ी चीज़ मिस कर रहा है। क्योंकि आमतौर पर पूंजी वहां जाती है जहां ग्रोथ होती है। और इस कसौटी पर भारत आज भी सबसे ऊपर है।

तो फिर Foreign investors बेच क्यों रहे हैं? इसका पहला और सबसे अहम कारण है—मुनाफावसूली। पिछले कुछ सालों में भारतीय बाजारों ने शानदार रिटर्न दिए हैं। कई विदेशी फंड्स के लिए भारत एक सक्सेस स्टोरी रहा है। ऐसे में जब ग्लोबल लेवल पर अनिश्चितता बढ़ती है—अमेरिका में ब्याज दरें, यूरोप की मंदी, जियो-पॉलिटिकल तनाव—तो फंड मैनेजर्स सबसे पहले वहां से पैसा निकालते हैं जहां उन्हें अच्छा मुनाफा मिला होता है। भारत उस लिस्ट में ऊपर था।

यह बिकवाली भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी मजबूती का उल्टा असर भी हो सकती है। जहां नुकसान होता है, वहां से पैसा निकालना मुश्किल होता है। जहां मुनाफा होता है, वहां से पैसा निकालना आसान। इसलिए कई बार मजबूत बाजार भी बिकवाली का शिकार बनते हैं। यह बात डेटा से ज्यादा मनोविज्ञान से जुड़ी है।

दूसरा बड़ा कारण है—ग्लोबल कैपिटल का व्यवहार। विदेशी पोर्टफोलियो Investment अक्सर “कहानी” के पीछे भागता है। आज अमेरिका में टेक और AI की कहानी चल रही है। कल किसी और देश की होगी। जब विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कोई नया नैरेटिव बनता है, तो वहां कैपिटल खिंच जाती है। भारत की कहानी लॉन्ग-टर्म है—धीमी, स्थिर, लेकिन गहरी। जबकि कई Foreign investors शॉर्ट-टर्म ट्रिगर्स ढूंढते हैं।

तीसरा कारण है वैल्यूएशन का डर। पिछले कुछ सालों में भारत के कई सेक्टर्स में वैल्यूएशन ऊंचे हो गए थे। Foreign investors के बीच यह चर्चा आम रही कि भारत महंगा हो गया है। हालांकि, यह तर्क अपने आप में अधूरा है। क्योंकि वैल्यूएशन सिर्फ आज के प्राइस से नहीं, बल्कि कल की ग्रोथ से तय होती है। अगर ग्रोथ मजबूत है, तो समय के साथ ऊंचे वैल्यूएशन भी “नॉर्मल” हो जाते हैं। लेकिन फिर भी, कई फंड्स ने इसी डर के चलते एक्सपोज़र कम किया।

अब आते हैं उस हिस्से पर, जो सबसे दिलचस्प है—सेंटिमेंट। बाजार सिर्फ आंकड़ों से नहीं चलता, बल्कि भावनाओं से चलता है। जब लगातार यह नैरेटिव बनता है कि विदेशी बेच रहे हैं, तो बाकी विदेशी भी सतर्क हो जाते हैं। यह एक तरह का चेन रिएक्शन होता है। जबकि Domestic investors, SIP और रिटेल मनी के ज़रिए, इस बिकवाली को काफी हद तक सोख लेते हैं। यह अपने आप में भारत की एक नई ताकत है—डोमेस्टिक कैपिटल का बढ़ना।

सरकार और RBI की भूमिका को समझना यहां बेहद ज़रूरी है। monetary policy के मोर्चे पर RBI ने संतुलन दिखाया है। न ज़रूरत से ज्यादा सख्ती, न ज़रूरत से ज्यादा ढील। महंगाई पर कंट्रोल, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, और सिस्टम में लिक्विडिटी—तीनों के बीच बैलेंस रखा गया। दूसरी तरफ सरकार ने Fiscal Policy में साफ संदेश दिया कि फ्रीबीज़ से ज्यादा फोकस इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, डिफेंस, और मैन्युफैक्चरिंग—यही वो जगहें हैं जहां सरकार ने पैसा लगाया।

यही Investment आने वाले सालों में प्राइवेट कैपेक्स को भी ट्रिगर करेगा। इतिहास बताता है कि जब सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर में खर्च करती है, तो निजी क्षेत्र को भी भरोसा मिलता है। और यही भरोसा Employment, income और Consumption को बढ़ाता है। यह एक चेन बनती है, जो धीरे-धीरे लेकिन मज़बूती से अर्थव्यवस्था को आगे ले जाती है।

फिर भी, कुछ असली चुनौतियां हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लालफीताशाही, कंपनी रजिस्ट्रेशन की जटिलताएं, और कुछ सेक्टर्स में नीति की अस्पष्टता—ये वो चीज़ें हैं जो Foreign investors को परेशान करती हैं। भारत को पूर्वी एशिया जैसी एक्सपोर्ट-ड्रिवन रणनीति अपनाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उसका घरेलू बाज़ार खुद बहुत बड़ा है। लेकिन बिजनेस करना जितना आसान होगा, उतना ही विदेशी और Domestic investment टिकेगा।

बाहरी जोखिमों की बात करें, तो भारत-अमेरिका टैरिफ मुद्दा भी एक बड़ा सवाल है। अमेरिका की नीतियां अक्सर अचानक बदलती हैं। टैरिफ लगाए जाते हैं, फिर हटाए जाते हैं। यह अनिश्चितता शॉर्ट-टर्म में बाजार को डराती है। लेकिन लंबे समय में ट्रेड रास्ता ढूंढ ही लेता है। अगर एक रास्ता बंद होता है, तो दूसरा खुलता है। इतिहास यही सिखाता है।

इसके अलावा, कमोडिटी प्राइस का पहलू भी अहम है। तेल की कीमतों में नरमी भारत के लिए वरदान रही है। इससे करंट अकाउंट और महंगाई—दोनों को राहत मिलती है। हालांकि, सोने की बढ़ती कीमतें एक अलग दबाव बनाती हैं। लेकिन कुल मिलाकर कमोडिटी साइकिल फिलहाल भारत के पक्ष में दिखती है।

अब बड़ा सवाल—2026 तक का रास्ता। क्या foreign investment वापस आएगा? जवाब शायद “हां” या “नहीं” में नहीं है। बल्कि यह इस पर निर्भर करता है कि Investor कब यह महसूस करते हैं कि उन्होंने बहुत जल्दी भारत से निकलने का फैसला कर लिया। जब विकसित अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ धीमी पड़ेगी, और भारत अपनी स्थिर रफ्तार बनाए रखेगा, तब कैपिटल का रुख फिर बदलेगा। क्योंकि अंत में पैसा भावनाओं से नहीं, रिटर्न से चलता है।

कई बार बाजार इतिहास की सबसे बड़ी गलतियां ऐसे ही करता है—सबसे अच्छे मौके पर सबसे ज्यादा डरता है। अगर भारत अपनी सुधारों की दिशा पर कायम रहा, अगर ग्रोथ जमीन पर दिखती रही, तो आज की यह विदेशी बिकवाली आने वाले कल में एक बड़ी मिसकैलकुलेशन के रूप में याद की जा सकती है। तो सवाल अब आपसे है—क्या यह Foreign investors की दूरदर्शिता है, या जल्दबाज़ी? क्या भारत की रॉकेट स्पीड उन्हें पीछे छोड़ देगी, या कोई बड़ा मोड़ आने वाला है? जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है—कहानी खत्म नहीं हुई है। असली खेल शायद अब शुरू होगा।

Conclusion

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