Inspiring: Balaji Wafers की स्वाद भरी क्रांति — साइकिल वाले लड़के से 5000 करोड़ तक का असली सफर I

राजकोट की एक गर्म दोपहर थी। बाजार में इतनी हलचल थी कि आवाज़ें आपस में टकराकर गूंज बन रही थीं। दुकानें खचाखच भरी थीं, लोग इधर-उधर भाग रहे थे, बच्चों की चिल्लाहट कहीं दूर से आ रही थी। इसी हलचल के बीच एक दुबला-पतला लड़का धीरे-धीरे अपनी पुरानी साइकिल से उतरता है। उसके चेहरे पर तेज धूप की वजह से पसीने की बूंदें चमक रही हैं, पर उसकी आंखों में उम्मीद की थोड़ी-सी रोशनी भी है। वह अपनी साइकिल की टोकरी में रखे नमकीन के छोटे-छोटे पैकेट उठाता है और पहली दुकान पर रुकता है।

दुकानदार उसे ऊपर से नीचे तक देखता है, तिरछी नज़र डालकर कहता है—“अरे भाई, ये सब मत लाया कर… हमारे पास बड़े ब्रांड के चिप्स हैं। तू यहाँ वक्त बर्बाद मत कर।” लड़का कुछ नहीं कहता। बस हल्की-सी मुस्कान के साथ पैकेट वापस टोकरी में रखता है और अगली दुकान की ओर बढ़ जाता है।

शायद उस क्षण उसे भी एहसास नहीं था कि एक दिन यही लड़का भारत का वेफर किंग कहलाएगा, और जिन दुकानदारों ने कभी उसे भगा दिया था, वही दुकानदार एक दिन उसकी कंपनी का माल पहले रखने के लिए लाइन लगाएंगे। यह कहानी है चंदुभाई विरानी की—एक ऐसे भारतीय उद्यमी की, जिसने सिर्फ मेहनत, समझदारी और relentless passion के दम पर उस इंडस्ट्री को हिला दिया जिसे बड़े-बड़े विदेशी ब्रांड अपना गढ़ मानते थे।

1957 में गुजरात के धुंधोराजी जैसे छोटे गांव में जन्मे चंदुभाई को बचपन से ही संघर्षों ने घेरा हुआ था। गांव में बिजली नहीं थी, न अच्छी सड़कें, न बड़े मौके। गांव के लोग खेती पर निर्भर थे, और खेती भी हर साल भरोसेमंद नहीं होती थी। 1972 जब भारत के लिए सूखे का सबसे बुरा साल साबित हुआ, तब धुंधोराजी गांव भी उससे बच नहीं पाया।

खेतों में बोई गई फसलें बर्बाद हो गईं। पानी नहीं, अनाज नहीं, और कमाई का रास्ता भी बंद। मजबूरी में चंदुभाई के पिता ने पैतृक जमीन सिर्फ 20,000 रुपए में बेच दी। पीढ़ियों की पहचान… उस दिन एक संकट में बदल गई। और वही बीस हजार रुपए तीन बेटों में बांटे गए—चंदुभाई को मिले मात्र छह हजार रुपए। यही शुरुआत थी उस सफर की जो बाद में भारत की snack industry का चेहरा बदलने वाला था।

सिर्फ 17 साल की उम्र में चंदुभाई अपने दो भाइयों के साथ राजकोट आ गए। जेब में पैसे कम थे, पर इरादे कड़े थे। उन्होंने छोटे स्तर पर फर्टिलाइज़र का कारोबार शुरू किया। उस समय उन्हें लगा था कि अब हालात सुधर जाएंगे। लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी राह नहीं देती। सप्लायर ने उन्हें नकली माल पकड़ा दिया। दुकानदारों ने वापस लेने से इनकार कर दिया। पूरा निवेश डूब गया। तीनों भाई आर्थिक रूप से टूट चुके थे। खाने तक के पैसे नहीं बचे थे। लेकिन चंदुभाई ने एक बात अपने भीतर जला कर रखी—“वापस गांव जाकर हार नहीं माननी।”

कई दिनों की तलाश के बाद उन्हें एस्ट्रॉन सिनेमा में 90 रुपए महीने की नौकरी मिली। यह रकम आज के हिसाब से नगण्य लग सकती है, लेकिन तब यही उनके लिए उम्मीद का पहला दरवाज़ा था। वह पोस्टर चिपकाते, टिकट चेक करते, सफाई करते और यहां तक कि torn seats को खुद सिलते थे। उनके काम को देखकर सिनेमा के मालिक इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि कैंटीन भी संभाल लो। 1000 रुपए महीने का किराया दो, और बाकी मुनाफा तुम्हारा। यही वह पल था जिसने चंदुभाई की जिंदगी का रास्ता हमेशा के लिए बदल दिया।

कैंटीन में सैंडविच और कोल्ड ड्रिंक बिकते थे, लेकिन एक चीज़ सबसे ज्यादा बिकती थी—आलू चिप्स। इंटरवल के सिर्फ 10 से 15 मिनट में लोग इतने चिप्स खरीद लेते थे कि काउंटर को संभालना मुश्किल हो जाता था। चंदुभाई ने देखा कि कैंटीन की करीब 80% कमाई सिर्फ चिप्स से हो रही है।

लेकिन आसपास के सप्लायर इतनी अनियमित सप्लाई देते थे कि इंटरवल के समय chhod-chod कर हाथ खाली रह जाता था। कभी कम quantity, कभी late delivery और कई बार तो stale chips भी पकड़ाए जाते थे। छह साल तक यह समस्या चलती रही, और हर बार चंदुभाई को लगता था कि अगर सप्लाई time पर हो जाती, तो वो दुगनी कमाई कर सकते थे।

1982 में उन्होंने वह फैसला लिया जिसने भारत की snacks industry को बदल दिया। उन्होंने सोचा—अगर सप्लायर भरोसेमंद नहीं हैं, तो चिप्स खुद बनाए जाएंगे। उन्होंने घर के आंगन में छोटा सा शेड बना लिया। मशीन नई खरीदने लायक पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने सिर्फ 5000 रुपए में खुद parts जोड़कर मशीन तैयार कर ली। दिन में कैंटीन का काम, रात में पूरा परिवार मिलकर चिप्स बनाता। आलू छीलने से लेकर पैकिंग तक—हर काम हाथ से होता था। कई रातें ऐसी थीं जब उंगलियों में छाले पड़ जाते थे, लेकिन उनके अंदर का fire उन्हें आगे बढ़ाता रहता था।

फिर आया वह पल, जब उन्होंने अपने ब्रांड का नाम चुना—Balaji Wafers। नाम उन्होंने हनुमान जी से प्रेरित होकर रखा था, ताकि शुरुआत भी शुभ हो और सफर भी मजबूत हो। शुरुआत में उन्होंने सिर्फ अपने सिनेमा की कैंटीन में बालाजी के पैकेट बेचे। लेकिन जल्द ही उन्होंने राजकोट की छोटी-छोटी दुकानों में भी चिप्स रखना शुरू किया। साइकिल लेकर दुकानदारों तक जाते। कई दुकानदार कहते—“अरे भाई, तू कल भी आया था। तेरा माल नहीं चलता, आगे बढ़।” लेकिन चंदुभाई सिर्फ मुस्कुराकर अगले दिन फिर पहुंच जाते। शायद उन्हें पता था कि consistency ही destiny बदलती है।

उनकी एक बड़ी observation ने खेल पूरी तरह बदल दिया। उस समय बड़े ब्रांड्स पैकेट में कम quantity देते थे और हवा ज्यादा। चंदुभाई ने पैकेट में 25 से 30% ज्यादा quantity देनी शुरू कर दी। लोग instantly खुश हो जाते। साथ ही taste ऐसा बनाया कि Gujarati palate को perfectly suit करे—हल्का, crisp और balanced masala। देखते-देखते स्कूल कैंटीन, ऑफिस कैफेटेरिया और शहर की दर्जनों दुकानों में बालाजी चलने लगा। लोग कहते—“यार, ये local है, पर taste जबरदस्त है।” और यह बात आग की तरह फैल गई।

जैसे-जैसे demand बढ़ी, chandu bhai ने फैसला लिया कि फैक्ट्री लगानी पड़ेगी। उन्होंने 50 लाख रुपए का कर्ज लिया और semi-automatic प्लांट लगवाने का काम शुरू कराया। लेकिन किस्मत उस समय फिर उनकी परीक्षा लेने तैयार थी। Plant बनाने वाली कंपनी बीच में ही बंद हो गई।

मशीनें अधूरी थीं, factory setup रुक गया, और पूरा 50 लाख दांव पर था। कोई और होता तो इस झटके से हार मान लेता। लेकिन चंदुभाई और उनके भाइयों ने मशीनों को खुद खोलकर समझना शुरू किया। हर part को खुद assemble किया, खुद ठीक किया और अंत में वह factory चालू हो गई। उस दिन उनकी आँखों में खुशी नहीं, आग दिखाई देती थी—वो आग जो entrepreneur के दिल में ही होती है।

1995 में उन्होंने दूसरी फैक्ट्री स्थापित की। और 2002 तक Balaji पूरी तरह automated plant बन चुका था। अब मशीनें nonstop चिप्स बना रही थीं, और पूरे गुजरात में बालाजी का बोलबाला था। 2006 तक बालाजी गुजरात की वेफर्स बिक्री का लगभग 90% बाजार पकड़ चुका था। यह वही समय था जब PepsiCo की Lays और Kurkure जैसी दिग्गज कंपनियों ने पहली बार महसूस किया—“Local brand हमें मात दे रहा है।”

PepsiCo के पास करोड़ों का marketing budget था, nationwide distribution था, global R&D था—लेकिन Balaji के पास flavours की ऐसी पकड़ थी जो दिल जीत ले। Gujarati taste, affordable price और ज्यादा quantity—यह combination इतना strong था कि हर घर में बालाजी का नाम चलने लगा। यह सिर्फ product नहीं था, यह emotional trust भी बन गया था।

धीरे-धीरे Balaji ने अपना product range बढ़ाया। चाट चस्का, खाखरा, banana chips, ratlami sev, Punjabi tadka, nachoz, wheelos—हर age group के लिए कुछ खास था। बच्चों के लिए fun shapes, युवाओं के लिए spicy flavours और परिवारों के लिए पारंपरिक नमकीन। एक-एक flavour market में आते ही hit होने लगा।

और फिर वह incident हुआ जिसने business दुनिया को चौंका दिया—PepsiCo ने 2023 में Balaji को खरीदने के लिए करीब 4000 करोड़ का offer दिया। Industry में हलचल मच गई—इतना बड़ा offer, किसी भी local brand के लिए dream deal थी। लेकिन चंदुभाई ने मुस्कुराकर कहा—“हमारी company बिकने के लिए नहीं बनी… यह हमारी पहचान है।” उस एक वाक्य ने पूरे देश को proud feel कराया।

आज Balaji Wafers का टर्नओवर 5000 करोड़ से भी ज्यादा है। उसकी फैक्ट्रियाँ दुनिया के सबसे advanced plants में गिनी जाती हैं। हर दिन लाखों पैकेट बनाए जाते हैं, लाखों दुकानों में पहुंचते हैं, 25 देशों में export होते हैं। और सबसे खूबसूरत बात—उन दुकानदारों के पास भी पहुंचते हैं जिन्होंने कभी चंदुभाई को दुकान के बाहर से भगा दिया था।

Conclusion

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