रात के करीब ढाई बजे थे। बनारस की गलियों में हल्की-हल्की ठंड घुल चुकी थी, लेकिन घाटों की तरफ से आती हवा से ज्यादा ठंडी एक और चीज़ थी—डर। शहर के बाहरी हिस्से में, एक सुनसान-सी सड़क पर, एक मिनी ट्रक बिना नंबर प्लेट के धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। ट्रक की पिछली तरफ कुछ ऐसे कार्टन रखे थे जिन्हें बाहर से देखने पर कोई नहीं पहचान सकता था—बस साधारण दवाई के बॉक्स। लेकिन उन कार्टनों के अंदर भरा था वो “सोना” जिसने सिर्फ तीन साल में एक साधारण से लड़के को 150 करोड़ तक पहुंचा दिया।
ड्राइवर के पास बैठे युवक के हाथ में महंगी घड़ी चमक रही थी, गले में मोटी चेन, और मोबाइल में लगातार व्हाट्सऐप नोटिफिकेशन आ रहे थे: “भेज दिया ना?”, “कस्टम के पास सब सेट है न?”, “इस बार 1200 नहीं, सीधे 1500 में बेचना है।” वो युवक कोई बड़ा ड्रग माफिया या फिल्मी विलेन नहीं था I
वो बनारस का ही एक लड़का था—Shubham Jaiswal। न उसने कभी खुद दवाई बनाई, न वो किसी मेडिकल दुकान पर बैठकर सिरप बेचता था… फिर भी उसकी जेब में दौड़ रहे थे करोड़ों। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि उसने ये सब कैसे किया, असली सवाल ये है—एक आम लड़का, जो कभी बाइक पर घूमता था, कैसे तीन साल में कोडीन किंग बन गया?
वाराणसी, जिसे लोग बनारस, काशी, शिव की नगरी कहते हैं—वहीं की गलियों से निकली ये कहानी उतनी ही चौंकाने वाली है जितनी खतरनाक। एक तरफ मंदिरों की घंटियाँ, गंगा आरती, भजन… और दूसरी तरफ उन्हीं गलियों में लगी hoardings पर एक युवा चेहरा, जिस पर लिखा होता—“आपका अपना Shubham Jaiswal।”
दिवाली पर मिठाई के डिब्बों पर उसकी फोटो, मेडिकल होलसेलरों को बड़े-बड़े गिफ्ट, लग्जरी गाड़ियों की लंबी कतारें… और पीछे की तरफ एक ऐसा अंधेरा धंधा, जिसका अंदाज़ा आम लोगों को तो क्या, कई साल तक सिस्टम को भी नहीं हुआ। Shubham कोई बड़ा फार्मा मालिक नहीं था, न उसके पास कोई giant factory थी, न ही वह pharma scientist था। वो सिर्फ एक चीज़ में एक्सपर्ट था—कागज पर सब साफ दिखाकर, जमीन पर सब उल्टा कर देने की कला में।
Shubham की कहानी फिल्मी नहीं, असली है—लेकिन उतनी ही cinematic। 2019 20 के आसपास, वाराणसी के हरिश्चंद्र कॉलेज में पढ़ने वाला एक साधारण लड़का। दोस्तों की नजर में हंसमुख, थोड़ा ambitious, और अंदर से ऐसा जिसकी एक ख्वाहिश कॉलेज के दिनों से ही थी—नेता बनना है।
पोस्टर पर फोटो, गाड़ियों का काफिला, लोगों की भीड़, “Shubham भैया जिंदाबाद” के नारे… पर समस्या थी पैसे की। घर की आर्थिक स्थिति बहुत शानदार नहीं थी, और राजनीति में एंट्री बिना पैसा, बिना नेटवर्क, लगभग नामुमकिन। ऐसे में उसके सामने दो रास्ते थे—या तो धीरे-धीरे मेहनत करके legit तरीके से आगे बढ़े, या shortcut ढूंढे। उसने दूसरा रास्ता चुना।
यहीं से उसकी जिंदगी में एंट्री हुई मेडिकल होलसेलर के ऑफिस की। कोरोना के समय जब दवा का कारोबार बढ़ा, तो उसे वहां हिसाब-किताब, बिलिंग और पेपरवर्क संभालने की नौकरी मिल गई। यह नौकरी उसके लिए सिर्फ salary का source नहीं थी, बल्कि knowledge का दरवाजा थी। कागजों, बिलों और स्टॉक के बीच काम करते-करते उसने एक बात नोटिस की—कुछ कफ सिरप की demand हमेशा अलग रहती है। खासकर वो सिरप जिनमें एक खास ingredient होता है—कोडीन। और यहाँ से उसने सिर्फ नंबर नहीं, pattern पढ़ना शुरू कर दिया।
कोडीन, एक narcotic analgesic—मूल रूप से हल्के दर्द और खांसी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा। मेडिकल भाषा में कहें तो यह दिमाग पर असर डालकर pain signals और cough reflex को control करती है। लेकिन जब इसी कोडीन को ज़रूरत से ज्यादा, या गलत तरीके से consume किया जाए, तो यह सिर्फ medicine नहीं रहती, नशा बन जाती है।
इसलिए कोडीन युक्त कफ सिरप को prescription drug माना जाता है, और इनके लिए कड़ी निगरानी, NDPS जैसी सख्त कानून व्यवस्था जुड़ी होती है। भारत में इसे controlled तरीके से बनाया और बेचा जाता है, लेकिन अगर कोई इस control को कागजों पर ही hack कर दे? वहीं से crime की entry होती है।
इसी बीच, Shubham को एक और चीज़ पता चली—भारत से सटे हुए देश बांग्लादेश में इस तरह के कोडीन वाले कफ सिरप की demand बहुत ज्यादा है। वजह? बांग्लादेश में शराब पर कड़े नियम। मुस्लिम majority देश होने के कारण वहां alcohol openly आसानी से उपलब्ध नहीं, लाइसेंस, परमिट, strict tracking… आम लोगों के लिए शराब reachable नहीं है।
ऐसे में बहुत से लोग नशे के alternative की तलाश में इस कोडीन सिरप की तरफ मुड़ गए। ये सस्ती बोतल—जो इंडिया में करीब 120 रुपये की, वहां जाकर 1200 से 1800 रुपये तक में बिकने लगी। एक बोतल पर 1000 से 1500 रुपये का साफ मुनाफा। अब imagine कीजिए, अगर ऐसी लाखों बोतलें cross border जाएँ तो profit कितना होगा।
Shubham के दिमाग में यहीं से एक dangerous equation बनना शुरू हुई—“कम कीमत वाली दवा, high demand वाला पड़ोसी देश, कमजोर monitoring, कागजों में हेरफेर और करोड़ों का धंधा।” लेकिन equation से reality तक पहुँचने के लिए उसे network चाहिए था।
मेडिकल होलसेलर की नौकरी ने उसे दवा कंपनियों के distribution pattern से परिचित कराया, लेकिन direct access अभी भी नहीं था। इस वक्त उसकी कहानी में entry होती है Ranchi की एक फर्म की—शैली ट्रेडर्स। दावा किया जाता है कि इस फर्म का संबंध सीधे Shubham के घर से है, प्रोप्राइटर के तौर पर उनके पिता भोला प्रसाद का नाम सामने आता है। यानी family level पर भी एक ऐसा channel तैयार था, जिसके सहारे सीधा कंपनी से माल उठाया जा सके।
Shubham ने इसी existing नेटवर्क को अपने दिमाग के साथ mix कर दिया। उसने समझ लिया कि अगर वो कागजों पर इस सिरप की sale India के अलग-अलग medical stores के नाम पर दिखा दे, और practically माल को border की तरफ divert कर दे, तो system को लगेगा सब normal है।
records साफ, bills ठीक, GST paid, stock movement documented—surface पर everything legal। लेकिन ground पर वही सिरप तस्करी के रास्ते से त्रिपुरा और बाकी border areas के जरिए बांग्लादेश पहुंचने लगी। इस खेल की खूबी यही थी कि यह “कानूनी” और “गैरकानूनी” दोनों के बीच की grey line पर चल रहा था—कागज legal, इरादे illegal।
कहानी में सबसे बड़ा twist तब आया जब Abbott कंपनी के कोडीन युक्त कफ सिरप की लगभग 89 लाख बोतलें “गायब” होने की बात सामने आई। किसी भी फार्मा कंपनी के लिए इतना बड़ा gap मज़ाक नहीं, red alert है। जैसे-जैसे जांच शुरू हुई, धागे एक-एक कर के खुलते गए और ये बात सामने आई कि अकेले वाराणसी में ही करीब 50 लाख बोतलों की खपत का दावा किया गया है। सोचिए, एक शहर में लाखों बोतलें सिरप की खपत—ये data अपने आप में suspicious था।
ड्रग इंस्पेक्टर ने रिकार्ड्स खंगाले, addresses verify किए, और वहीं सारा खेल खुलने लगा। जिन 28 मेडिकल स्टोर्स के नाम पर इन बोतलों की सप्लाई दिख रही थी, जमीन पर जाकर देखा तो उनमें से कई दुकानें थीं ही नहीं। कुछ पते खाली पड़े, कुछ पर कोई छोटा-मोटा दूसरा कारोबार, कहीं बंद दरवाज़े… और जहां godown दिखाया गया था, वहां कोई stock ही नहीं। यानी कागजों पर बिका माल, ज़मीन पर गायब। और वही गायब stock, सीमाओं के उस पार नशे का alternative बन चुका था।
यहीं से Shubham का नाम सामने आया। ड्रग इंस्पेक्टर जुनाब अली ने Shubham, उसके पिता भोला प्रसाद और अन्य कई दवा कारोबारियों के खिलाफ NDPS एक्ट, मनी लॉन्ड्रिंग और क्रिमिनल कॉन्स्पिरेसी जैसे गंभीर sections में केस दर्ज करवा दिया। NDPS Act को हल्के में लेना आसान नहीं, यह उन्हीं के लिए बना है जो drugs को सिर्फ पैसों की नजर से देख लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि इनके पीछे कितनी ज़िंदगियां बर्बाद होती हैं। मनी लॉन्ड्रिंग के केस का मतलब, सिर्फ दवा नहीं—पैसे की काली धारा को सफेद दिखाने का पूरा सिस्टम भी जांच के घेरे में आ गया।
जैसे-जैसे investigation आगे बढ़ी, बनारस के साथ-साथ गाज़ियाबाद, मेरठ जैसे शहरों के नाम भी सामने आने लगे। कई fake medical stores, kachchi दुकाने, godowns के नाम, जिनका असल में ground पर कोई अस्तित्व नहीं था, लेकिन कागजों में वे बड़े खिलाड़ियों की तरह दिखते थे।
गाज़ियाबाद में 1.57 लाख से ज्यादा कफ सिरप की बोतलें पकड़ी गईं, और ऐसा बताया गया कि यह खेप मेरठ के आसिफ नाम के व्यक्ति के network के जरिए देश से बाहर भेजी जानी थी। यानी यह सिर्फ एक शहर या एक लड़के की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरी chain की कहानी थी—जहां हर कड़ी किसी न किसी greed से जुड़ी हुई थी।
लेकिन कहानी सिर्फ illegal route, तस्करी और कागज़ी खेल तक सीमित नहीं। इसके साथ ही एक parallel narrative चल रहा था—एक लड़के की lifestyle का अचानक बदल जाना। जो शख्स कभी बाइक पर घूमता था, वो कुछ ही सालों में Defender जैसी लग्जरी SUV में घूमने लगा।
वाराणसी की गलियों में जहां पहले राजनीतिक पार्टियों के पोस्टर दिखते थे, अब वहाँ Shubham के hoardings दिखाई देते थे—किसी festival की शुभकामना, किसी medical community से जुड़ा event, या मिठाई के डिब्बों पर छपी उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर। दिवाली पर पूरे बनारस में जिस तरह से उसने मिठाई के boxes भेजे, वे सिर्फ sweets नहीं, power के message थे—“देखो, अब मैं इस बाजार में बड़ा खिलाड़ी हूँ।”
यहीं पर लोग दबी जुबान में यह भी कहने लगे कि Shubham की गाड़ी सिर्फ उसके दिमाग से नहीं, कुछ सफेदपोशों की support से भी चली। कोई भी इतनी बड़ी scale पर “missing bottles” का खेल अकेले नहीं खेल सकता। राजनीति के सपने, पैसे की भूख और गलत रास्ते पर चलते हुए मिलने वाला समाज का “सम्मान”—ये सब मिलकर उसे ऐसा illusion देने लगे कि वो खुद को untouchable समझने लगा होगा। जमीन पर खड़े-खड़े उसका सिर आसमान में घूम रहा था, और इसी ऊंचाई ने उसे असली ground reality से disconnect कर दिया।
एक तरफ बांग्लादेश में सख्त शराब कानून, दूसरी तरफ वहां की युवा पीढ़ी जो नशे का कोई भी रास्ता ढूंढ लेना चाहती है। इनके बीच खड़े ऐसे नेटवर्क, जो भारत से कफ सिरप तस्करी करके वहां भेजते हैं। बांग्लादेश ने कोडीन युक्त खांसी के सिरप पर अपने कानून के तहत कड़े प्रतिबंध लगाए, फिर भी ये माफिया loopholes ढूंढ लेते हैं।
वहां codeine की limit इतनी low रखी गई कि नशे के लिए इस्तेमाल मुश्किल हो, लेकिन भारत में बनी सिरप में कोडीन की मात्रा comparatively ज्यादा होती है, जिससे वो नशे के लिए attractive बन जाती है। यही difference तस्करों के लिए opportunity बन गया। उनके लिए ये सिर्फ “product differentiation” था, लेकिन असल में यह दोनों देशों की law enforcement और public health के लिए challenge बन रहा था।
भारत से यह सिरप border तक पहुंचाने के लिए सिर्फ एक truck और driver नहीं काफी। इसमें carrier, storage, middlemen, fake documents, और ऊपर से “सब सेट है” बोलने वाले लोग भी शामिल होते हैं। लेकिन इस पूरी machinery में सबसे कमजोर कड़ी थी—paper trail। जैसे ही किसी कंपनी के stock में बड़ा gap दिखता है, investigations शुरू हो जाती हैं। यही हुआ 89 लाख बोतलों के मामले में। और जब U.P. के अंदर ही 50 लाख bottles के consumption का आंकड़ा सामने आया, तो सवाल उठना स्वाभाविक था—क्या बनारस और आस-पास के शहर सोते नहीं, सिर्फ खांसते रहते हैं?
कहानी यहीं से एक crime thriller से courtroom drama की तरफ मुड़ती है। police, SIT, ED, Income Tax—यह सारे departments इस puzzle के अलग-अलग pieces को जोड़ने लगे। SIT यानी Special Investigation Team का मतलब ही यह है कि यह कोई मामूली केस नहीं।
जब वाराणसी के पुलिस कमिश्नर ने SIT बनाई, तो यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ missing bottles या कुछ fake दुकानों तक सीमित नहीं, बल्कि एक organized racket की जांच है, जिसमें NDPS के साथ-साथ मनी लॉन्ड्रिंग की भी परतें हैं।
अगर आप गौर से सोचें, तो Shubham की कहानी एक बड़े सवाल के केंद्र में खड़ी है—जब एक आम युवा के पास talent है, समझ है, ambition है, तो वह दो रास्तों में से गलत रास्ता क्यों चुनता है? राजनीति में प्रवेश के सपने को वह social service या नीति-आधारित leadership की तरफ मोड़ने के बजाय क्यों crime के आसान shortcut पर चल देता है? जवाब कई layers में छिपा है—system की खामियाँ, society का glamour के प्रति झुकाव, fast success की भूख, और उस culture का प्रभाव जहां “करोड़पति” tag ही ultimate respect का symbol बना दिया गया है।
इस पूरी कहानी का सबसे dark हिस्सा यह है कि यह सिर्फ पैसे की बात नहीं, नशे की भी बात है। वह सिरप जो किसी बच्चे की रात भर की खांसी को शांत कर सकती थी, वही सिरप किसी और के लिए addiction का दरवाजा खोल रही थी।
बांग्लादेश में इसे शराब के alternative के रूप में इस्तेमाल करने वाले लोग शायद यह नहीं जानते कि यह धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को किस तरह से जकड़ लेती है। और भारत में जो network इसे “product” की तरह देख रहा था, उसके लिए यह सिर्फ “margin” था, “demand-supply graph” था। इस सब के बीच इंसान गायब है—उसकी health, उसकी जिंदगी, उसके भविष्य का कोई price tag नहीं लगता।
Shubham की कहानी यहां खत्म नहीं होती, लेकिन एक मोड़ पर जरूर आकर ठहर जाती है—जब वह खुद फरार हो जाता है और उसके पीछे कानून का पूरा पहिया घूमना शुरू हो जाता है। उसके खिलाफ दर्ज मुकदमे, उसके नेटवर्क की जांच, उसके bank accounts, properties, लग्जरी cars—सब एक-एक कर के scrutiny में आते हैं।
जो दुनिया पहले उसे hero की तरह देख रही थी, वही अब उससे distance बनाने लगती है। यही crime की असली सच्चाई है—जब तक पैसा बह रहा होता है, लोग तालियां बजाते हैं; जैसे ही law की नजर पड़ती है, सब किनारा कर लेते हैं।
यह कहानी सिर्फ Shubham की नहीं, हर उस youth की है जो ये सोचता है कि “shortcut से आगे निकल जाऊँगा।” शायद कुछ कदम तक वो सच भी लगे, लेकिन long run में law, system और reality हमेशा जीतते हैं। shortcut कभी भी sustainable success नहीं बनता, वो सिर्फ illusion होता है। तीन साल में 150 करोड़ कमाने वाला बनारस का ये लड़का इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि गलत पैसे की रफ्तार जितनी तेज होती है, crash उतना ही जोरदार होता है।
वीडियो के इस आखिरी पल में, एक सवाल आपके लिए भी है—अगर आप Shubham की जगह होते, और आपके सामने भी ऐसा network, ऐसा profit, ऐसे temptations रखे जाते… तो क्या आप “न” कह पाते? अगर जवाब हाँ है, तो आप समझिए कि आपने अपने अंदर की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली। और अगर जवाब “शायद” है, तो यह कहानी आपके लिए warning है—पैसा कमाना गलत नहीं, लेकिन किस रास्ते से आता है, यह सबसे ज्यादा matter करता है।
यह काली कहानी हमें एक lesson देती है—किसी भी शहर की रोशनी के पीछे छिपा अंधेरा हमेशा उतना दूर नहीं होता जितना दिखता है। कुछ गलियों के मोड़ पर, कुछ कार्टन के अंदर, कुछ कागजों के पीछे… वही लोग बैठे होते हैं जो law और greed के बीच एक खतरनाक खेल खेल रहे होते हैं। और अगर system सो जाए, society चुप रहे, तो ऐसे Shubham कल को और भी पैदा होंगे। लेकिन हर बार एक बात याद रखिए—कानून की नजर देर से सही, पर पड़ती जरूर है। और जब पड़ती है, तो किसी की luxury car, मिठाई के डिब्बे या होर्डिंग्स उसे बचा नहीं पाते।
Conclusion
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