सोचिए… एक दिन आप सोकर उठें और पता चले कि आपका पूरा साम्राज्य, आपकी मेहनत, आपका नाम—सब एक फैसले, एक गलत कदम, एक गलत भरोसे की वजह से खत्म हो चुका है। कल तक दुनिया आपको अरबपति कहती थी, और आज अखबारों में आपका नाम “दिवालिया बिजनेसमैन” के रूप में छप रहा है।
कल तक आप मल्टी-मिलियन डॉलर बोर्डरूम मीटिंग में बैठे थे, और आज आप जेल की दीवारों के पीछे वही गलती गिन रहे हैं जिसने सब कुछ छीन लिया। यही कहानी है भारत के कभी सबसे चमकते, सबसे शक्तिशाली और सबसे असरदार दो भाइयों Singh Brothers—मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह की। दो भाई, जिन्हें लोग “फार्मा प्रिंस”, “हॉस्पिटल किंग्स” और “कॉरपोरेट वंडर-बॉयज़” कहा करते थे। लेकिन 10 साल के भीतर—इनके नाम के साथ सिर्फ दो शब्द बच गए: कर्ज और बरबादी।
कहानी यहीं से रोमांचक और डरावनी दोनों हो जाती है—क्योंकि यह कहानी सिर्फ इन दो भाइयों की नहीं है। यह कहानी इस बात की भी है कि कैसे भारत के सबसे धनी परिवारों में से एक, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के बराबर साम्राज्य बनाया था, वह एक झटके में धराशायी हो गया। कैसे एक गलत डील, एक गलत भरोसा, एक गलत व्यक्ति—पूरे राजवंश को तबाह कर सकता है। और कैसे एक परिवार जिसने कभी Forbes की अरबपतियों की लिस्ट में जगह बनाई थी, वह आज दिवालिया, कर्ज़दार और कोर्ट के चक्कर काटने वाला परिवार बन चुका है।
इस कहानी की शुरुआत पाकिस्तान के रावलपिंडी से होती है, जहाँ से भाई मोहन सिंह का परिवार भारत आया था। भारत आते ही उन्होंने एक कर्ज में डूबी फर्म को खरीदकर रैनबैक्सी नाम की दवा कंपनी खड़ी की—एक ऐसी कंपनी जिसने आने वाले 60 से 70 वर्षों में भारत की सबसे बड़ी फार्मा ब्रांड्स में जगह बनाई, लाखों को नौकरियाँ दीं, और भारतीय दवा उद्योग को दुनिया के सामने नई पहचान दिलाई। जब मोहन सिंह की विरासत उनके पोतों—मलविंदर और शिविंदर—तक पहुँची, तब दोनों के पास रैनबैक्सी में 33.5% की हिस्सेदारी थी। दोनों जवान थे, पढ़े-लिखे थे, और कॉरपोरेट इंडिया के नए सितारे माने जाते थे।
रैनबैक्सी की सफलता ऐसी थी कि दुनिया की दिग्गज कंपनियाँ भारत आने लगीं। और 2008—भारत की आर्थिक इतिहास का वह साल—जब Singh Brothers ने अपने दादाजी की बनाई विरासत को जापानी कंपनी Daiichi Sankyo को बेच दिया। यह डील इतनी विशाल थी कि पूरे देश में चर्चा होने लगी। लगभग 9,576 करोड़ रुपये का लाभ—एक झटके में Singh Brothers के खाते में आ गया। दुनिया ने कहा—“क्या दिमाग है!”, “क्या बिजनेस समझ है!”, “क्या चाल चली है इन भाइयों ने!” लेकिन आज पीछे मुड़कर देखने पर समझ आता है—यहीं से विनाश की शुरुआत हो गई थी।
रैनबैक्सी बेचने के तुरंत बाद, दोनों भाइयों ने पैसा खर्च करना शुरू कर दिया। 2000 करोड़ कर्ज वापस करने में चले गए। 1700 करोड़ रुपये रेलिगेयर—एक NBFC कंपनी—में डाल दिए गए। और लगभग 2200 करोड़ रुपये Fortis Hospitals में Investment कर दिए। देखा जाए तो ये समझदारी भरे कदम लगते थे—हेल्थकेयर, फाइनेंस और फार्मा—तीनों ही booming sectors थे। लेकिन दुनिया का नियम यही है—अगर आपकी नींव में दरार हो, तो सबसे बड़ी इमारत भी गिर जाती है।
समस्या तब शुरू हुई जब दुनिया में मंदी आई। 2010 से 2014 के बीच रेगुलेटरी बदलाव, बाजार में अस्थिरता, global slowdown—इन सबने Religare और Fortis के बिजनेस मॉडल को हिला दिया। भारी कर्ज चढ़ता गया। लेकिन असली तूफ़ान अभी बाकी था।
2012—साल जिसने इन दोनों भाइयों की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। जापानी कंपनी Daiichi Sankyo ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन, सिंगापुर में केस दायर किया। उनका आरोप था कि रैनबैक्सी बेचते समय Singh Brothers ने कंपनी की condition को सही तरह से disclose नहीं किया। और कुछ ही समय बाद जब अमेरिका ने रैनबैक्सी की दवाइयों पर import ban लगाया—तो Daiichi साफ समझ गया कि उन्हें जानबूझकर गलत जानकारी दी गई थी।
कोर्ट ने फैसला सुनाया—और Singh Brothers को 50 करोड़ डॉलर का भारी-भरकम हर्जाना भरने का आदेश दिया गया। और यहीं, इन दोनों भाइयों का साम्राज्य जर्जर होने लगा। पहले से बढ़ता कर्ज, अब एक अंतरराष्ट्रीय हर्जाना—कुल देनदारी बढ़कर लगभग 13,000 करोड़ रुपये हो चुकी थी। इसका मतलब था—इनकी लगभग सारी संपत्तियाँ बिकने वाली थीं।
Fortis में अपनी हिस्सेदारी बेचनी पड़ी। Religare का control खोना पड़ा। कई Investment डूब गए। कोर्ट के आदेश, Investors के दावे, कर्ज चुकाने का दबाव, बिजनेस विफलताएँ—इन सबने सिर्फ 10 साल में Singh Brothers का 22,000 करोड़ रुपये का साम्राज्य खा लिया।
यह वही परिवार था जिसका नाम दुनिया की richest lists में था। लेकिन सब खत्म नहीं हुआ था। आगे जो हुआ, उसने इस कहानी को और भी दर्दनाक बना दिया। कर्ज की आग में जलता यह परिवार एक और बुरे दौर में फँस गया—जब पारिवारिक झगड़े सामने आने लगे। खबरें फैलीं कि भाइयों के बीच संबंध खराब हो चुके थे। आरोप, प्रत्यारोप, गलत फैसले, गलत सलाह, और गलत investment decisions—इन सबने स्थिति को और बदतर कर दिया। बिजनेस पार्टनर नाराज़, बैंक नाराज़, shareholders नाराज़—हर तरफ से दबाव।
फिर एक दिन—दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट में धोखाधड़ी, financial mismanagement, fund diversion, money siphoning जैसे गंभीर आरोप लगे। कभी सबसे बड़ी दवा कंपनी चलाने वाले ये दो भाई आज अदालतों में जमानत की याचिकाएँ देते दिखाई दिए। और यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती—
2024 में Shivinder Mohan Singh ने आधिकारिक रूप से दिवालिया घोषित होने के लिए NCLT में आवेदन भी कर दिया। यह वही Shivinder हैं, जिनकी एक समय में हजारों करोड़ की personal wealth थी। अब सवाल यह उठता है—आखिर कहां गलती हुई? क्या वह रैनबैक्सी बेचने का फैसला था? क्या यह गलत investment choices थीं? क्या यह पारिवारिक विवाद था? या यह corporate greed?
कहानी बताती है कि गलती सिर्फ एक नहीं थी। यह कई गलतियों का एक ऐसा जाल था जिसमें दोनों भाई धीरे-धीरे फँसते गए—और जब संभलना चाहा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सबसे बड़ी गलती थी—अपने सबसे मजबूत asset को बेच देना, यानी रैनबैक्सी। इसके बाद investment diversification के नाम पर risk बढ़ते चले गए। Fortis और Religare की तेज़ी से expansion strategy ने उन्हें और कमजोर कर दिया। साथ ही governance और compliance की कमी ने investor confidence तोड़ दिया। और फिर Daiichi Sankyo वाला केस—जिसने आखिरी कील ठोक दी।
लेकिन इस कहानी की एक खास बात है—यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे भारत में अचानक success मिलने पर कई families अपनी pace से ज्यादा तेजी दिखा देती हैं। उनकी growth strategy sustainable नहीं रहती। wealth अचानक आई, तो wealth अचानक चली भी जाती है। Corporate world में जो सबसे ज़रूरी है—discipline, compliance, risk management—इनकी कमी Singh Brothers को ले डूबी।
पर इस पूरी tragedy का सबसे भावनात्मक हिस्सा यह है कि यह downfall सिर्फ brothers का नहीं था—उनके employees, stakeholders, investors, और सबसे बढ़कर उनके परिवार भी इस गिरावट का बोझ उठाते रहे। कभी lavish boardrooms में बैठने वाले ये लोग आज judicial benches के सामने खड़े होकर अपने decisions की सफाई दे रहे हैं। कभी जिनकी signatures करोड़ों की deals finalize करती थीं, आज वही signatures insolvency papers पर लग रही हैं। कभी जिनकी companies ने भारत में healthcare और pharma को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया, आज वही companies ownership बदलकर नई दिशा में जा रही हैं।
यह कहानी आपको डराती भी है और सिखाती भी—कि चाहे business कितना भी बड़ा हो, चाहे पैसे कितने भी हों, चाहे आपकी पहुंच कितनी भी ऊँची हो—एक गलत फैसला आपकी पूरी legacy को मिटा सकता है। यह कहानी बताती है कि greed और overconfidence किसी भी empire को गिरा सकते हैं। यह कहानी बताती है कि transparency और compliance एक कंपनी की नींव हैं। और सबसे बड़ा सबक यह है—कभी अपना strongest asset न बेचें, सिर्फ इसलिए कि आपको अचानक बड़ा पैसा मिल रहा है। क्योंकि empire बनाना आसान नहीं होता—लेकिन empire खोना बहुत आसान होता है।
तो सवाल यह है—क्या Singh Brothers इस नुकसान से कभी वापस उठ पाएँगे? शायद नहीं। लेकिन यह कहानी भारत के हर entrepreneur के लिए एक चेतावनी है—कि business सिर्फ पैसा नहीं, दिमाग, अनुशासन और सही फैसलों पर चलता है।
Conclusion
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