सोचिए, रात के दो बजे हैं, दुनिया सो रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में एक अजीब-सी हलचल शुरू हो जाती है। स्क्रीन पर चमकती लाल और हरी लाइनों के बीच एक ऐसा पैटर्न उभरता है, जिसे आम लोग शायद कभी नोटिस नहीं करते। लेकिन कुछ लोग होते हैं… जिनकी नज़र इस मामूली दिखने वाले बदलाव पर भी टिक जाती है। उन्हें पता होता है कि आँकड़ों का ये खेल आने वाले महीनों में करोड़ों लोगों की किस्मत बदल सकता है।
बिल्कुल ऐसा ही कुछ हुआ जब एक भारतीय अर्थशास्त्री ने रात के इन शांत घंटों में दुनिया की अर्थव्यवस्था को देखने के लिए स्क्रीन खोली — और जो उन्होंने देखा, उसने उन्हें डरा दिया। उन्होंने फोन उठाया, एक गहरी सांस ली और कहा — “भारत के सामने एक ऐसा खतरा खड़ा हो रहा है, जिसकी आहट हम सुन नहीं पा रहे… लेकिन China सुन रहा है। और सिर्फ सुन नहीं रहा, बल्कि उस पर काम भी कर रहा है।” सन्नाटा छा गया। यह वह पल था जब साजिद चिनॉय की चेतावनी भारत के लिए सिर्फ एक आर्थिक सुझाव नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अलार्म की तरह थी।
आपको बता दें कि दुनिया धीरे-धीरे globalisation से दूर जा रही है। जो दुनिया कभी एक-दूसरे के माल खरीदने पर चलती थी, अब barriers खड़े कर रही है। Developed economies, जो कभी खुले व्यापार के सबसे बड़े समर्थक थे, अब खुद ही इस चक्र से पीछे हट रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ आर्थिक नीति नहीं है — यह दुनिया के power balance को बदलने वाला मोड़ है। और इस बदलती दुनिया में भारत जैसे देशों को सबसे कठिन रास्ता तय करना पड़ेगा।
क्योंकि भारत की economy सिर्फ domestic consumption पर नहीं चलती, बल्कि export-led growth पर भी बहुत निर्भर है। और अब वही export model खतरे में है। लेकिन यह खतरा सिर्फ एक तरफ से नहीं आ रहा… यह दो तरफ से India को घेर रहा है। एक तरफ चीन का Export बाढ़ की तरह फैल रहा है, और दूसरी तरफ AI और automation की लहर नौकरियों को खा रही है। यह दोहरा खतरा ऐसा है जिसे समझना आसान नहीं, और इससे बाहर निकलना उससे भी मुश्किल।
चीन पिछले कई दशकों से manufacturing का बादशाह रहा है। लेकिन जब अमेरिका ने उस बादशाह के रास्ते में ऊंचे tariffs का एक विशाल बांध खड़ा कर दिया, तो साजिद चिनॉय कहते हैं कि चीनी Export का पानी एक दिशा से रुककर कई और दिशाओं में फैल गया। दुनिया के हर देश में, खासकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में चीनी माल ऐसे फैलने लगा जैसे नदी एक बांध से टकराकर आसपास के गांवों को डुबो दे। यह बाढ़ सिर्फ माल की बाढ़ नहीं थी, बल्कि एक economic tsunami थी।
और इस tsunami की सबसे मजबूत लहर भारत की तरफ बढ़ रही है। भारत की दुकानों, बाजारों, warehouses में अचानक चीनी सामान बढ़ने लगा — सस्ता, खूबसूरत और तगड़ी क्वालिटी वाला। भारत का local manufacturer उस जबरदस्त कीमत के दबाव को झेल नहीं पा रहा। India को एक ही समय में अपनी domestic industry को भी बचाना है और global trade slowdown में अपने exports को भी बढ़ाना है। समस्या दो तरफ से है, और दोनों तरफ China अपनी चालें खेल रहा है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दुनिया सिर्फ de-globalization की ओर नहीं बढ़ रही, बल्कि automation और AI की ओर भाग रही है। पहले चीन का low-cost manufacturing भारत के लिए चुनौती था। अब चीन की high-tech manufacturing, robots, automation और AI-driven production भारत की नौकरियों की जमीन हिला रहा है। manufacturing में पहले factories हजारों लोगों को रोजगार देती थीं।
आज मशीनें दीवारों के पीछे चुपचाप खड़ी रहती हैं और वही काम मिनटों में कर देती हैं। जहां पहले 100 लोग मशीन चलाते थे, अब वही मशीनें सिर्फ 4 से 5 इंजीनियरों की निगरानी में production पूरा कर रही हैं। दुनिया की यह नई निर्माण शैली capital-intensive है — यानी पैसे की ताकत चाहिए, manpower की नहीं। और भारत जैसे देश, जहां हर साल लाखों युवा नौकरी खोजते हैं, ऐसे मॉडल में टिकना और भी मुश्किल हो जाता है।
साजिद चिनॉय कहते हैं कि ताइवान इस मॉडल का सबसे बड़ा उदाहरण है। ताइवान ने AI revolution को अपनाया नहीं — उसने इसे बनाया। अमेरिका, यूरोप और दुनिया के tech giants जिन GPUs, servers और AI chips पर चलते हैं, उनका उत्पादन ताइवान की कंपनियां करती हैं। ताइवान का export 33% बढ़ गया है। लेकिन उसके देश के लोग खुश नहीं हुए। क्योंकि यह growth लोगों के जेब में नहीं गई। Private consumption 1% से भी कम बढ़ी। GDP बढ़ा, लेकिन लोगों की जिंदगी वैसी ही रही।
सरकार को लोगों में cash transfer करना पड़ा ताकि वे economy में शामिल रह सकें। यह एक frightening example है। क्योंकि अगर भारत AI बनाने या इस्तेमाल करने की दौड़ में शामिल होता है, तो दुनिया कहती है “great growth”… लेकिन सवाल ये है—इस growth का फायदा किसे मिलेगा? मशीनों को, robots को, या भारत के 1.4 billion लोगों को?
चीन अपने surplus production को dump करके दुनिया भर के markets को अपनी तरफ खींच रहा है। भारत में मौजूदा स्थिति यह है कि चीन की factories cheap goods बना रही हैं। AI और automation से उनका cost और भी कम होता जा रहा है।
वहीं भारत अपने young population को नौकरियां देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन global बाजार हमें वो space नहीं दे रहा। हम एक ऐसी economic battlefield में खड़े हैं जहां एक तरफ skill दीवार है, एक तरफ tech tsunami, और पीछे से आ रहा है चीन का price attack। यह वही moment है जब या तो भारत अपनी industrial policies aggressively बदल देगा… या भारत आने वाले दशक में एक silent crisis में फंस सकता है।
चिनॉय कहते हैं कि India अगले 15 साल दुनिया के सबसे young nations में से एक रहेगा। यह हमारा सबसे बड़ा advantage है। लेकिन यही advantage सबसे बड़ा pressure भी है। अगर लाखों youth को रोजगार नहीं मिला, तो growth narrative टूट जाएगा। Jobs सिर्फ services से नहीं मिलेंगी, उन्हें manufacturing और tech से भी आना होगा। पर manufacturing अब labour-intensive नहीं रही — यह machine-intensive हो चुकी है। दुनिया robotic arms से mobile phones बना रही है, AI से chips design कर रही है, और automated plants से cars assemble कर रही है। ऐसे में भारत को एक नए model की जरूरत है — एक ऐसा model जो traditional jobs और advanced jobs दोनों को साथ लेकर चले।
भारत के पास दो चीजें हैं — बड़ी market और बड़ी population। अगर India domestic manufacturing को सही तरीके से shield करे, quality बढ़ाए, और global supply chains में एक strong alternative बने, तो यह लहर भारत को नीचे नहीं खींचेगी। लेकिन अगर हमने इसे lightly लिया, तो China का export India के कई industries को खा जाएगा — textile, electronics, steel, chemicals, toys और machinery जैसी categories पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। भारत को ऐसे समय में defensive और offensive दोनों खेलना होगा। एक तरफ tariffs और safeguard measures से industries को बचाना, और दूसरी तरफ high-technology investments से future jobs create करना।
पूरी दुनिया AI से excited है — startups उठा रही है, silicon valley future बना रही है, investors करोड़ों डॉलर लगा रहे हैं। लेकिन साजिद चिनॉय कहते हैं कि developing countries के लिए यही excitement सबसे बड़ा डर है। क्योंकि AI jobs create नहीं करता — AI jobs replace करता है। Developed nations के लिए यह great है, क्योंकि उनकी population aging है, workers कम हो रहे हैं। उन्हें machines चाहिए। लेकिन भारत जैसे देशों के लिए, जहां हर साल नए 1.5 करोड़ युवा workforce में जुड़ते हैं, यह trend खतरनाक हो सकता है।
इसीलिए भारत के सामने दोहरा खतरा है। पहला, China की export बिजली की तरह फैल रही है और हमारी industries को शॉक दे रही है। दूसरा, AI और automation global factories को manpower-free बना रहे हैं। यह दोहरी मार भारत को ऐसे time पर लग रही है जब हमें सबसे ज्यादा growth की जरूरत है।
Conclusion
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