Jaypee Group की सच्चाई — 12,000 करोड़ का घोटाला, भागता MD और 20,000 सपनों का संघर्ष।

ज़रा सोचिए कि आपके हाथ में एक नई चाबी हो। वो चाबी जिसे लेने के लिए आपने सालों की बचत लगा दी। घर के बाहर खड़े होकर आप मुस्कुरा रहे हों, पीछे परिवार खड़ा हो, पत्नी ने पहले से फैसला कर रखा हो कि मंडे से बालकनी में पौधे लगेंगे, बच्चे अपने कमरे में पोस्टर्स लगाने की योजना बना रहे हों, और आपकी आँखों में वो चमक हो जो सिर्फ़ अपना घर लेने वालों की आँखों में होती है।

लेकिन अचानक एक कॉल आता है—“सर प्रोजेक्ट बंद हो गया है… बिल्डर गायब है… आपका पैसा फंस गया है…” और इतनी जल्दी सब खत्म हो जाता है कि आपको समझ भी नहीं आता कि आखिर क्या हुआ। आपका सपना एक सेकंड में बिखर जाता है। और सोचिए, अगर आप अकेले ना हों—बल्कि ऐसे 20,000 लोग हों, जिनका सपना एक ही कंपनी ने छीन लिया हो। ये वही कहानी है—Jaypee Group और मनोज गौर की। एक ऐसी कहानी, जिसमें बड़े-बड़े वादे, चमकदार इमारतें, सुंदर ब्रोशर और लालच की चमक के पीछे छुपा हुआ एक ऐसा अंधेरा है, जिसका खामियाज़ा आज भी हजारों परिवार भुगत रहे हैं।

दिल्ली-एनसीआर में प्रवेश करते ही अगर कोई नाम सबसे पहले नज़र आता है, तो वो Jaypee Group का है। विशाल टाउनशिप, चौड़ी सड़कें, दुबई जैसी इमारतों का वादा, यमुना एक्सप्रेसवे की चमचमाती पट्टी—सतह पर सब कुछ भव्य, विकसित और भरोसेमंद दिखता था। लेकिन इस चमकती सतह के नीचे क्या चल रहा था, यह कोई नहीं जानता था।

ये कहानी सिर्फ एक बिल्डर की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक 8 साल लंबे चूहे-बिल्ली के खेल की कहानी है जिसमें हर बार कानून ने शिकंजा कसा और हर बार मनोज गौर किसी न किसी बहाने, किसी न किसी loophole के सहारे निकल गया। लेकिन 13 नवंबर 2025 की सुबह सब बदल गया—ईडी की टीम दरवाजा तोड़कर अंदर घुसी और इस खेल का एक और अध्याय शुरू हुआ।

सुबह का समय था, जब ईडी ने जेपी इंफ्राटेक और जेपी एसोसिएट्स के करीब 15 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे। हर जगह अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग दरवाजे बंद करते भाग रहे थे, कुछ कंप्यूटर बंद कर रहे थे, कुछ डिजिटल फाइलें डिलीट कर रहे थे—लेकिन आज सिस्टम उनकी एक भी चाल नहीं छोड़ने वाला था।

टीमों को बैग में 1.7 करोड़ रुपये नकद मिले, कई प्रॉपर्टीज़ के कागज़ मिले, विदेशों में भेजे गए पैसों की ट्रेल मिली, लैपटॉप और हार्डडिस्क मिली—और वही मिला जिसने इस केस में उलटफेर कर दिया। और इसी सब के बीच, मनोज गौर दोबारा गिरफ्तार किए गए। यह गिरफ्तारी नई नहीं थी, पर इस बार की गंभीरता अलग थी। क्योंकि इस बार होमबायर्स ने भी सबूत दे दिए थे, पुलिस ने भी केस मज़बूत कर दिया था, और ईडी ने भी अपनी जांच में साफ कर दिया था कि फंड का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हुआ है।

लेकिन कहानी यहाँ से शुरू नहीं हुई। यह कहानी शुरू होती है 2008 और 2010 की उस रियल एस्टेट बूम के दौरान, जब दिल्ली-एनसीआर के हर कोने में नए-नए प्रोजेक्ट लॉन्च हो रहे थे। जहां लोग किराये से छुटकारा पाने के लिए तरसते थे और बिल्डर कहते थे—“तीन साल में घर दे देंगे।” फायदा उठाया Jaypee Group ने।

उन्होंने जेपी विशटाउन, जेपी ग्रीन्स और जेपी विलेज जैसे प्रोजेक्ट लॉन्च किए। ब्रोशर में सुंदर झीलें दिखाईं, long scenic roads दिखाईं, बच्चों के पार्क दिखाए, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स दिखाई, और कहा—“ये आपकी सपना नगरी है… इसे बस तीन साल में आपके हवाले कर देंगे।” विज्ञापन इतने खूबसूरत थे कि आम आदमी को लगा—“बस यही चाहिए… यही तो जिंदगी है।” और इसी तरह एक-एक परिवार जमा होता गया।

लोगों ने अपनी जिंदगी की बचत निकाली। किसी ने PF तोड़ा, किसी ने शादी का पैसा निकाला, किसी ने FD भुनाई, किसी ने बैंक से लोन ले लिया। और धीरे-धीरे बुकिंग अमाउंट 12,000 करोड़ तक पहुँच गया। यह रकम इतनी बड़ी थी कि किसी छोटे देश का सालभर का बजट निकल जाए। शायद Jaypee Group को भी यही लगने लगा था कि वे इतने बड़े हैं कि कोई उन्हें छू भी नहीं सकता। लेकिन घर खरीदारों को उस वक्त कहाँ पता था कि यह पैसा असल में उनके घर में नहीं, बल्कि किसी और प्रोजेक्ट में लगेगा।

धीरे-धीरे असली खेल सामने आने लगा। काम रुकना शुरू हो गया। साइट पर मजदूर कम हो गए। क्रेन महीनों तक एक ही जगह खड़ी रही। कंक्रीट ट्रक गायब हो गए। और जो थोड़ा-बहुत निर्माण हुआ भी था, वो सिर्फ दिखावे के लिए था। लोगों ने पूछना शुरू किया—“कब मिलेगा?” और जवाब मिलता—“बस अगले महीने…” लेकिन वो अगला महीना कभी आया ही नहीं। साल बीतते गए। EMI बढ़ती गई। किराया बढ़ता गया। और घर? वो सिर्फ एक कंकाल बनकर रह गया।

जैसे-जैसे होमबायर्स निराश होते गए, वैसे-वैसे सच्चाई सामने आने लगी। ईडी की जांच में खुलासा हुआ कि फंड को diverted किया गया था। यानी घरों के लिए दिया गया पैसा असल में यमुना एक्सप्रेसवे और अन्य प्रोजेक्ट्स पर लगा दिया गया था। कंपनी ने एक प्रोजेक्ट से पैसा उठाकर दूसरे में लगा दिया, फिर तीसरे में, और यह जाल इतना बड़ा हो गया कि आखिरकार सबकुछ ढहने लगा। ईडी को रिकॉर्ड्स में पता चला कि पैसा न सिर्फ अन्य प्रोजेक्ट्स में लगाया गया, बल्कि कुछ पैसा थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में भी भेजा गया। कहने को इसे business transaction कहा गया, लेकिन असल में यह पैसा luxury trips और personal usage पर भी खर्च हुआ।

इतना ही नहीं, approvals के नकली दस्तावेज़ बनाए गए। buyers को दिखाया गया कि प्रोजेक्ट legal है, maps पास हैं, बैंक loans मिले हैं। जबकि असल में कई approvals फर्जी थे और कई दस्तावेज़ incomplete थे। कंपनी ने buyers को फंसाने के लिए हर वह तरीका अपनाया जिसे एक आम आदमी पकड़ नहीं सकता। यह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं थी—यह एक व्यवस्थित criminal conspiracy थी, जिसमें कई कंपनियाँ शामिल थीं। ईडी ने इस network को trace किया—गौर संस, महागुन, गुलशन होम्‍स जैसी कई कंपनियों में फंड ट्रांसफर हुआ। और हर transaction इतना layered था कि कोई आसानी से पकड़ न सके।

लोग तब टूट गए जब उन्हें पता चला कि 10 से 15 साल बीत जाने के बाद भी सिर्फ 20 से 30% काम हुआ है। और company कहती रही कि “पैसा नहीं है।” आखिरकार बात NCLT तक पहुंची। कंपनी को दिवालिया घोषित करने की कार्यवाही शुरू हुई। कई कंपनियों ने इसे खरीदने की इच्छा जताई, लेकिन प्रोजेक्ट्स की हालत इतनी खराब थी कि कोई भी risk लेने को तैयार नहीं। इसी हालत में 20,000 परिवार आज भी इंतजार कर रहे हैं कि शायद किसी दिन उनका घर पूरा हो जाए।

20,000 परिवार — ये सिर्फ संख्या नहीं है। हर एक परिवार के पीछे एक कहानी है। एक माँ है जिसने सोचा था कि बेटा शादी से पहले घर ले लेगा। एक पिता है जिसने सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद अपने घर में आराम करेगा। एक नौजवान है जिसने करियर की शुरुआत में यह सोचकर निवेश किया था कि आगे की जिंदगी सुरक्षित हो जाएगी। एक दंपति है जिसने EMI और किराया दोनों भरते-भरते ज़िंदगी की बचत खत्म कर दी। रात में सोने से पहले हर दिन ये सवाल उठता है—“क्या मेरा घर कभी मिलेगा?”

यह सिर्फ Jaypee Group का scam नहीं, बल्कि भारत की रियल एस्टेट की सबसे काली कहानियों में से एक है। यह दिखाता है कि कैसे लालच और भ्रष्टाचार एक सफल दिखने वाली कंपनी को राक्षस में बदल सकते हैं। यह कहानी बताती है कि कैसे कानून की धीमी चाल, कमजोर नियमन और loopholes एक आदमी को 12,000 करोड़ रुपये लेकर भी आज़ादी से घूमने देती हैं। और यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सपने खरीदना आसान है… लेकिन उन्हें पूरा करवाना, इस देश में — बहुत मुश्किल।

मनोज गौर आज गिरफ्तार है, लेकिन क्या यह अंत है? शायद नहीं। आगे ईडी उसे कोर्ट में पेश करेगी। हफ्तों तक पूछताछ चलेगी। चार्जशीट दायर होगी। ट्रायल चलेगा। और वर्षों बाद शायद फैसला आएगा। लेकिन उन 20,000 परिवारों का क्या, जिनका समय, पैसा और सपने—सब इस scam ने निगल लिए? अधूरे टावर आज भी खड़े हैं। उनमें हवा की आवाज़ गूंजती है। जैसे वो हवा कह रही हो—“कभी यहाँ जिंदगी बसनी थी… लेकिन इंसानी लालच ने इसे खंडहर बना दिया।

Conclusion

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