Exclusive: America वैश्विक दबाव के बीच कैसे अपना मजबूत रास्ता बना रहा है भारत? 2025

ज़रा सोचिए… रात के तीन बजे हैं। दिल्ली के साउथ ब्लॉक में अंदर की रोशनी अब भी जल रही है। बाहर ठंडी हवा बह रही है, लेकिन अंदर उस कमरे में हवा का तापमान कुछ और ही है—तनाव से भरा हुआ, भारी, ऐसा कि सांस लेना मुश्किल लगे। बड़े-बड़े फाइलों से भरा एक लंबा टेबल, चारों तरफ बैठें कुछ अधिकारी, intelligence reports की मोटी किताबें, satellite images, trade warnings, oil price fluctuations, defense cables—सब कुछ जैसे एक अनसुलझा puzzle बनकर सामने पड़ा है।

और उस कमरे के केंद्र में बैठा भारतीय अधिकारी अपने सामने दो फाइलें देख रहा है—एक फाइल पर लिखा है “USA—Strategic Expectations”, और दूसरी पर लिखा है “China—Immediate Threats”. उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं।

दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा है—अगर हम इस तरफ जाते हैं तो दुनिया का सबसे ताकतवर देश नाराज़ होगा और अगर दूसरी तरफ जाते हैं तो दुनिया का सबसे खतरनाक पड़ोसी ताकत दिखाएगा। कमरे में खामोशी है लेकिन खामोशी के भीतर एक तूफ़ान जन्म ले चुका है। यह वही तूफ़ान है जिसमें आज भारत फंस चुका है—दो महाशक्तियों के दवाब, धमकियों और उम्मीदों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता हुआ एक विशाल, महत्वाकांक्षी, उभरता हुआ भारत।

आपको बता दें कि दुनिया अब सीधी नहीं रही। कोई पक्का दोस्त नहीं, कोई पक्का दुश्मन नहीं। हर राष्ट्र सिर्फ़ अपने हित में सोच रहा है और अपने फ़ायदे के लिए दूसरों का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन भारत की हालत सबसे अलग है—क्योंकि भारत अब observer नहीं रहा, वो खिलाड़ी बन चुका है। ऐसा खिलाड़ी जिसकी हर चाल पर दुनिया की सांसें अटक जाती हैं। वह उभरता हुआ global leader है और इसी वजह से उस पर दुनिया का दबाव भी दोगुना है।

एक तरफ America—जिसने पिछले सौ वर्षों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सेना को अपनी शर्तों पर चलाया। दूसरी तरफ China—जो पिछले बीस वर्षों में दुनिया के हर कोने में अपनी पकड़ इतनी तेज़ी से बढ़ा चुका है कि पश्चिमी देश डर गए हैं। ये दोनों शक्तियां सिर्फ़ एक-दूसरे को हराना नहीं चाहतीं, बल्कि यह भी चाहती हैं कि भारत उनके साथ खड़ा हो। पर भारत?

भारत एक ऐसी स्थिति में खड़ा है जहां हर कदम सोचना पड़ता है। भारत अगर America के साथ जाता है, तो चीन सीमा पर अपनी ताकत और बढ़ा देगा। भारत अगर चीन को संतुलित करने की कोशिश करता है, तो America व्यापार, तकनीक और कूटनीति में मुश्किलें खड़ी कर देगा। इस पूरे खेल का केंद्र भारत बन चुका है—चाहे वह चाहे या न चाहे।

ग्लोबलाइजेशन का सपना, जो 90 के दशक में दुनिया को एक परिवार बनाने निकला था, आज टुकड़ों में बिखर चुका है। उस समय कहा गया था कि सभी देश एक-दूसरे के करीब आएंगे, व्यापार खुलेगा, गरीबी घटेगी, नौकरियां बढ़ेंगी, और दुनिया में स्थिरता आएगी। लेकिन असली फायदा किसे हुआ? वो तो कुछ ही देशों को मिला, खासकर America को। Multinational कंपनियों ने दुनिया भर से सस्ता श्रम लिया, manufacturing को बाहर शिफ्ट किया, और अरबों डॉलर कमाए।

लेकिन गरीब देशों की आम जनता वहीं की वहीं रह गई। नौकरियां गईं, मजदूर कमजोर हुए, और धीरे-धीरे आम नागरिकों को लगने लगा कि globalisation ने उनका नहीं, सिर्फ़ elites का फायदा किया। यही कारण है कि आज दुनिया में एक नया दौर शुरू हो चुका है—एक ऐसा दौर जहां हर देश सिर्फ़ अपने हित देख रहा है। America चाहता है कि supply chains वापस उसकी जमीन पर आएं। चीन चाहता है कि उसकी factory दुनिया की factory बनी रहे। और भारत चाहता है कि वह इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए खुद को manufacturing और diplomacy का केंद्र बना ले।

जब अमेरिका में ट्रंप सत्ता में आए थे, उन्होंने दुनिया को साफ़ बता दिया था—अब “free trade” सिर्फ़ किताबों तक रहेगा। उन्होंने tariff बढ़ाए, कई देशों को चेतावनी दी, NATO, WHO, WTO जैसे global institutions को कमजोर किया, और कहा—“हमारी शर्तों पर आओ, वरना हम अलग रास्ता चुनेंगे।” ये दिखावा नहीं था—ये Atlantic Ocean के उस पार शुरू हो रहा नया इतिहास था। यह इतिहास दुनिया को दो टुकड़ों में बांट रहा था—एक तरफ America और उसके союз, दूसरी तरफ चीन और उसके समर्थक।

पर समस्या यह थी कि इन दो टुकड़ों के बीच भारत जैसा देश कहीं भी neatly फिट नहीं बैठता। भारत की foreign policy दुनिया की सबसे मुश्किल foreign policies में से एक है क्योंकि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था भी बचानी है, अपनी सेना भी मजबूत रखनी है, अपने पड़ोसियों से भी लड़ना है, और अपनी autonomy भी बनाए रखनी है।

और हर तरफ से दबाव—America कहता है, “रूस से तेल मत खरीदो।” चीन कहता है, “हिंद महासागर में ज्‍यादा सक्रिय मत हो।” America कहता है, “चीन के खिलाफ हमसे मिलो।” चीन कहता है, “Taiwan पर मत बोलो।” यह खेल ऐसा नहीं जिसमें भारत आसानी से जीत सके—यह संतुलन का खेल है, और एक गलत कदम भारी पड़ सकता है।

कई लोगों को लगता है कि America और China सिर्फ़ व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी हैं लेकिन यह rivalry सिर्फ़ आर्थिक नहीं—यह राजनीतिक, तकनीकी, सैन्य और सामरिक rivalry है। अमेरिका को डर है कि अगर चीन नंबर एक superpower बन गया तो उसकी decades-long global dominance खत्म हो जाएगी। वहीं चीन का मानना है कि 2049 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी economy और सबसे शक्तिशाली देश बन चुका होगा। America चीन को रोकने में लगा है, और चीन अमेरिका को कमजोर दिखाने में।

और दोनों की रणनीति में भारत की भूमिका crucial है। America चाहता है कि भारत Quad को मजबूत करे, Indo-Pacific की सुरक्षा संभाले, चीन के expansion को रोके और America strategic interests को support करे। दूसरी तरफ चीन चाहता है कि भारत neutral रहे, border मुद्दों पर शांत रहे, trade relations को प्राथमिकता दे और अमेरिका के हाथों में एक pawn न बने। इस बीच भारत न तो openly अमेरिका के camp में जा सकता है और न ही चीन की aggression को नजरअंदाज कर सकता है। यह एक razor-thin diplomatic line है—जिस पर भारत रोज़ चल रहा है।

अब सोचिए—भारत की अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा चीन से जुड़ा है। Mobile components, electronics, APIs, chemicals, solar equipment—यह सब चीन से आता है। अगर भारत चीन से दूरी बनाएगा, तो कीमतें बढ़ेंगी, उद्योगों का दबाव बढ़ेगा, supply chains टूट जाएंगी। दूसरी तरफ अगर भारत चीन के ज्यादा करीब जाता है, तो अमेरिका का tech access, defence cooperation और economic benefits खतरे में पड़ सकते हैं।

America H-1B visas, defence deals, semiconductor partnerships और critical technologies पर भारत को leverage देता है—लेकिन वह सब तभी तक जब तक भारत America narrative को openly challenge न करे। मतलब भारत एक ऐसी situation में है जहां neutrality दिखाना उसकी necessity है, और autonomy बनाए रखना उसकी survival strategy।

अब सोचिए—भारत की अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा चीन से जुड़ा है। Mobile components, electronics, APIs, chemicals, solar equipment—यह सब चीन से आता है। अगर भारत चीन से दूरी बनाएगा, तो कीमतें बढ़ेंगी, उद्योगों का दबाव बढ़ेगा, supply chains टूट जाएंगी।

दूसरी तरफ अगर भारत चीन के ज्यादा करीब जाता है, तो America का tech access, defence cooperation और economic benefits खतरे में पड़ सकते हैं। अमेरिका H-1B visas, defence deals, semiconductor partnerships और critical technologies पर भारत को leverage देता है—लेकिन वह सब तभी तक जब तक भारत America narrative को openly challenge न करे। मतलब भारत एक ऐसी situation में है जहां neutrality दिखाना उसकी necessity है, और autonomy बनाए रखना उसकी survival strategy।

दुनिया अब multipolar बन रही है। न America अकेला राजा है, न चीन अकेला competitor। भारत आज दुनिया के सबसे बड़े power-centers में से एक है। उसकी standalone influence बढ़ रही है। Middle-East में उसकी बात सुनी जाती है। Africa में वह trusted partner है।

Indo-Pacific में वह balancing power है। Russia उसे decades से partner मानता है। यूरोप उसे emerging giant कहता है। लेकिन global relevance जितनी बढ़ती है, दबाव भी उतना ही बढ़ता है। America कहेगा—“democracy के नाम पर हमारा साथ दो।” चीन कहेगा—“एशिया में एशियाई देशों को एकजुट होना चाहिए।” और भारत? वह इन सबके बीच अपनी राह बनाएगा। क्योंकि यह दुनिया का नया truth है—देश दोस्त नहीं, हितों का साथ निभाते हैं।

इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी बड़ी शक्तियों के बीच rivalry बढ़ती है, दुनिया बदलती है। और हर बार जो देश संतुलन बुद्धि दिखाते हैं, वही अंत में विजेता बनते हैं। भारत के पास अब वही मौका है। उसे किसी भी superpower का follower नहीं बनना है। भारत को अपनी policy खुद तय करनी होगी, अपनी ताकत खुद बनानी होगी, अपने decisions खुद लेने होंगे। यह राह मुश्किल है, जोखिम भरी है, लेकिन यही राह भारत को superpower बनने की तरफ ले जाएगी।

Conclusion

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