ज़रा सोचिए… वो देश जिसने दुनिया को सपनों की सबसे बड़ी परिभाषा दी — “अमेरिकन ड्रीम” — आज वही अपने ही दरवाज़ों पर ताले जड़ रहा है। वो सड़कें जो कभी अनगिनत अवसरों का प्रतीक थीं, आज सन्नाटे में डूबी हैं। दुकानों के बोर्ड उतर रहे हैं, और दुनिया की सबसे ताक़तवर अर्थव्यवस्था अब अपनी ही कमर टूटने का डर महसूस कर रही है। लेकिन सवाल है — आखिर इस गिरावट की शुरुआत कहाँ से हुई? क्या ये महज़ एक “शटडाउन” है या फिर Dollar के साम्राज्य के ढहने की दस्तक? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
अमेरिका आज एक ऐसी परिस्थिति में फँसा है, जहाँ “शटडाउन” सिर्फ़ सरकारी दफ़्तरों तक सीमित नहीं रहा। यह अब उस मानसिकता का प्रतीक बन चुका है जो कभी दुनिया को बदलने का दावा करती थी। व्हाइट हाउस से लेकर वॉल स्ट्रीट तक, हर ओर असमंजस, आरोप और डर का माहौल है। डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं, और इस राजनीतिक टकराव ने अमेरिकी जनता को आर्थिक अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, सोना पहली बार 4,000 Dollar प्रति औंस के पार चला गया — एक ऐसा संकेत जो बताता है कि लोग अब Dollar नहीं, बल्कि सुरक्षा में विश्वास ढूंढ रहे हैं।
शटडाउन का मतलब समझना जितना आसान लगता है, असलियत में उतना ही डरावना है। अमेरिका में जब सरकार का बजट पास नहीं हो पाता, तो सरकारी सेवाएं बंद हो जाती हैं — इसे ही “सरकारी शटडाउन” कहा जाता है। ये स्थिति तब आती है जब सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में सहमति नहीं बनती। नतीजा? सरकारी दफ्तरों में ताले लग जाते हैं, लाखों कर्मचारी सैलरी के बिना छुट्टी पर भेजे जाते हैं, और जो सेवाएं “गैर-आवश्यक” मानी जाती हैं, वे रुक जाती हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। करीब 7.5 लाख केंद्रीय कर्मचारी बेरोज़गारी के डर में हैं, और अर्थव्यवस्था पर इसका असर सीधा दिखने लगा है।
ये पहली बार नहीं है। अमेरिका के इतिहास में 16 बार ऐसा शटडाउन हो चुका है। पहली बार ये संकट नवंबर 1981 में आया था, लेकिन तब Dollar इतना मज़बूत था कि दुनिया ने इसे संकट नहीं, “राजनीतिक खेल” मान लिया। मगर आज मामला अलग है। आज Dollar के तिलिस्म पर ही सवाल उठ रहे हैं। जिस डॉलर पर पूरी दुनिया भरोसा करती थी, वही अब अपनी पकड़ खोता जा रहा है। अमेरिका की दुकानें तो बंद हो ही रही हैं, लेकिन सबसे बड़ा “क्लोज़ साइन” शायद Dollar के साम्राज्य पर टंगा दिख रहा है।
OECD यानी Organization for Economic Cooperation and Development ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी है — अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ढह रही है। रिपोर्ट कहती है कि 2024 में जहाँ अमेरिका की विकास दर 2.8 प्रतिशत थी, वहीं 2025 में ये घटकर 1.8 प्रतिशत और 2026 में सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत रह जाएगी। इसका मतलब साफ़ है — दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपने ही बनाए बोझ तले दब रही है। ये आंकड़े केवल अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि आने वाले वैश्विक संकट की आहट हैं।
इस बीच, ब्रिक्स देशों का उभार अमेरिका की मुसीबत और बढ़ा रहा है। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का यह गठबंधन अब खुलकर डॉलर की बादशाहत को चुनौती दे रहा है। दशकों से अमेरिकी Dollar वैश्विक व्यापार, आरक्षित निधि और सीमा-पार समझौतों का मानक बना रहा था। लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। भारत ने हाल ही में ब्रिक्स देशों को रुपये में कारोबार करने की अनुमति दी है। रूस और चीन पहले से अपनी मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं। इंडोनेशिया और चीन ने तो “लोकल करेंसी सेटलमेंट फ्रेमवर्क” लागू कर दिया है — यानी Dollar की ज़रूरत धीरे-धीरे ख़त्म की जा रही है।
ब्लूमबर्ग की ही एक रिपोर्ट कहती है कि Forex market में Dollar की मौजूदगी अब भी 88 प्रतिशत है, लेकिन यह आंकड़ा पहले 96 प्रतिशत हुआ करता था। यानी धीरे-धीरे डॉलर की पकड़ ढीली पड़ रही है। केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद foreign currency reserves का करीब 59 प्रतिशत हिस्सा Dollar में है, मगर अब कई देश इस पर पुनर्विचार कर रहे हैं। अमेरिका की “डॉलर डिपेंडेंसी” अब दूसरों के लिए खतरे का संकेत बन गई है। और जब दुनिया किसी मुद्रा को हथियार की तरह इस्तेमाल होते देखती है, तो स्वाभाविक है कि वो उससे दूरी बनाने लगती है।
वाशिंगटन की गलियों में आज एक अजीब सी बेचैनी है। सरकारी कर्मचारी सड़कों पर हैं, बैंकर्स मीटिंग्स में हैं, और आम जनता एटीएम की कतारों में है। लेकिन असली डर है – भरोसे के टूटने का। Dollar का भरोसा, जो कभी Gold Standard से भी ऊपर माना जाता था, अब धुंधला हो रहा है। और इसकी गूंज अब एशिया से अफ्रीका तक सुनाई देने लगी है। जब लोग अमेरिका के सोने के भाव देखकर घबरा रहे हैं, तो असल में वे Dollar की गिरती विश्वसनीयता को महसूस कर रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के दौर में शुरू हुई टैरिफ नीतियां इस गिरावट की एक बड़ी वजह मानी जा रही हैं। ट्रंप ने “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर दुनिया के साथ एक आर्थिक युद्ध छेड़ दिया था। उन्होंने चीन, यूरोप, भारत — सभी पर भारी टैरिफ लगाए। शुरू में ये कदम “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर लिया गया, मगर इसका असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ा। अमेरिका के खुद के उद्योग भी महंगे कच्चे माल के कारण संकट में आ गए। और अब जब 2025 में इन संरक्षणवादी उपायों के पूर्ण प्रभाव दिख रहे हैं, तो OECD ने भी मान लिया है कि ये नीति अमेरिका को ही चोट पहुँचा रही है।
सीएनबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल AI और चीन के प्रोत्साहन पैकेज ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को थोड़ी राहत दी है। भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों में Investment बढ़ रहा है। लेकिन यह राहत अस्थायी है। असली चुनौती अमेरिका की Fiscal Policy है। वाशिंगटन का बढ़ता घाटा अब नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। अमेरिकी सरकार हर साल जितना कमाती है, उससे कहीं ज़्यादा खर्च करती है — और इस घाटे को पाटने के लिए वही Dollar छापा जा रहा है जो अब अपनी विश्वसनीयता खो रहा है।
अब ज़रा सोचिए — जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था अपनी मुद्रा की कीमत बचाने के लिए लगातार नोट छाप रही हो, तो बाकी देश क्या करेंगे? जवाब साफ है — वो अपने विकल्प ढूंढेंगे। यही वजह है कि रूस, चीन और भारत जैसे देश अब “डी-डॉलरीकरण” की राह पर हैं। ब्रिक्स का मकसद अब सिर्फ़ आर्थिक सहयोग नहीं रहा, बल्कि एक वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था तैयार करना है। और यही वो खतरा है जो अमेरिकी नीति-निर्माताओं की नींद उड़ाए हुए है।
वॉल स्ट्रीट के गलियारों में आज जिस शब्द की गूंज है, वह है — “पैनिक”। Investors सोने की ओर भाग रहे हैं, Dollar से दूर जा रहे हैं। 4,000 Dollar प्रति औंस का आंकड़ा इसलिए नहीं चौंकाता कि सोना महंगा हुआ है, बल्कि इसलिए कि भरोसा सस्ता पड़ गया है। लोग अब Dollar में नहीं, धातु में भरोसा देख रहे हैं। यह उस मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत है, जो किसी भी साम्राज्य के पतन से पहले आता है — जब जनता अपने प्रतीक पर भरोसा खो देती है।
सरकारी शटडाउन का असर अब न सिर्फ़ कर्मचारियों की जेब पर बल्कि अमेरिकी मनोबल पर भी पड़ा है। “अमेरिकन ड्रीम” का विचार अब बेरोज़गारी के डर, बढ़ती कीमतों और घटते अवसरों के बीच डगमगाने लगा है। रेस्तरां बंद हैं, ट्रकिंग कंपनियाँ घाटे में हैं, और ऑनलाइन रिटेलर्स के ऑर्डर घट रहे हैं। जिन सड़कों पर कभी 24 घंटे रोशनी रहती थी, वहाँ अब बोर्ड लटक रहे हैं — “For Lease,” “Store Closed,” “Out of Business.” यह नज़ारा सिर्फ़ दुकानों का नहीं, बल्कि अमेरिका की आत्मा का है।
ट्रंप की टैरिफ नीतियों और अब बाइडेन प्रशासन की अनिश्चित नीतियों ने मिलकर अमेरिका की आर्थिक दिशा को और जटिल बना दिया है। नीतिगत अस्थिरता ने Investors का भरोसा हिला दिया है। विदेशी कंपनियाँ अब अमेरिका की बजाय भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों की ओर रुख कर रही हैं। जहाँ कभी “मेड इन यूएसए” ब्रांड गर्व का प्रतीक था, अब “मेड इन एशिया” नई पहचान बन रही है।
और इस पूरी कहानी के बीच, अमेरिका के भीतर एक और मौन संघर्ष चल रहा है — सत्ता का संघर्ष। व्हाइट हाउस में बैठे लोग बजट पर सहमत नहीं हो पा रहे, और इस असहमति का बोझ अब आम नागरिक झेल रहा है। एक तरफ़ बेरोज़गार सरकारी कर्मचारी हैं, दूसरी तरफ़ बढ़ती महंगाई से जूझते आम लोग। डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन की राजनीतिक जिद अब जनता के पेट पर चोट कर रही है।
इस सबके बीच दुनिया देख रही है — क्या अमेरिका अपने ही बनाए आर्थिक मॉडल में फँस गया है? क्या वो वही गलती कर रहा है जो कभी ब्रिटेन ने की थी, जब उसने अपने “पाउंड साम्राज्य” को अंधे अहंकार में खो दिया था? इतिहास कहता है, कोई भी मुद्रा सदा के लिए सर्वोच्च नहीं रहती। हर साम्राज्य का एक “गोल्डन एज” होता है, और फिर एक “डिक्लाइन कर्व” आता है। शायद अमेरिका अब उसी कर्व पर है।
Dollar की पकड़ कमजोर पड़ने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए समीकरण बन रहे हैं। ब्रिक्स देशों के अलावा अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य एशिया के कई देश भी अब वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ विकसित कर रहे हैं। रूस ने पहले ही “मिर पेमेंट सिस्टम” शुरू किया, चीन ने “डिजिटल युआन” लॉन्च किया, और भारत UPI को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पेश कर रहा है। यह सिर्फ़ तकनीकी बदलाव नहीं — बल्कि शक्ति के केंद्र का परिवर्तन है।
अब सवाल उठता है — क्या डॉलर सच में ढह रहा है, या यह केवल एक अस्थायी संकट है? विशेषज्ञों का कहना है, अभी डॉलर पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसकी “सर्वोच्चता” ज़रूर समाप्त हो रही है। जैसे ब्रिटिश पाउंड कभी विश्व की मुद्रा था और फिर धीरे-धीरे उसकी जगह डॉलर ने ली, वैसे ही अब नई मुद्राएँ — युआन, रुपया, रूबल — अपनी जगह बना रही हैं। और अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशक में डॉलर सिर्फ़ “एक और मुद्रा” बन सकता है, न कि “विश्व मुद्रा।”
अमेरिका के लिए असली चुनौती अब बाहर नहीं, भीतर है — राजनीतिक विभाजन, बढ़ता कर्ज़, महंगाई और भरोसे का संकट। जब किसी राष्ट्र की ताकत उसके नागरिकों के भरोसे से तय होती है, और वो भरोसा टूटने लगे, तो बाहरी दुश्मनों की ज़रूरत नहीं रहती। आज अमेरिका उसी मोड़ पर खड़ा है — जहाँ उसे अपने ही बनाए आर्थिक और राजनीतिक जाल से निकलना है।
शायद यही वजह है कि दुनिया अब उस “अमेरिकन ड्रीम” पर सवाल उठाने लगी है, जिसने कभी करोड़ों लोगों को प्रेरित किया था। अब वो सपना धुंधला हो रहा है — उसकी जगह एक नया युग उभर रहा है, जहाँ शक्ति का केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ रहा है। और इस परिवर्तन की गवाही दे रहा है — हर वो “क्लोज़्ड” बोर्ड जो अमेरिकी दुकानों के बाहर लटक रहा है।
Conclusion
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