ज़रा सोचिए… वो शख्स जिसने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नारा दिया था — “America First”, वही अब अमेरिका के ही बिज़नेस जगत के निशाने पर है। वॉशिंगटन डीसी की ठंडी सुबह है, बाहर मीडिया की भीड़ है, कैमरे चमक रहे हैं, और अदालत के अंदर एक ऐसा केस दायर हो चुका है जो न सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को चुनौती देता है, बल्कि उनके “राष्ट्रवाद” की परिभाषा को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। यह कोई विरोधी देश नहीं, बल्कि खुद अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स है — वो संस्था जो ट्रंप के समर्थकों का गढ़ मानी जाती थी। लेकिन अब वही संस्था उनके खिलाफ कोर्ट में उतर आई है। मुद्दा है — H-1B वीज़ा फीस बढ़ाने का फैसला।
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में घोषणा की थी कि H-1B वीज़ा की फीस को लगभग 1,00,000 डॉलर तक बढ़ाया जाएगा। सरकार का तर्क था कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करेगा, विदेशी सस्ते श्रमिकों पर निर्भरता घटाएगा, और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देगा। लेकिन हकीकत कुछ और थी — टेक इंडस्ट्री, स्टार्टअप्स, और ग्लोबल कंपनियों के लिए यह एक झटका था। क्योंकि उनकी पूरी ग्रोथ मशीनरी, उन्हीं विदेशी दिमागों पर टिकी है, जिन्हें अब अमेरिका में काम करने की कीमत चुकानी पड़ेगी — वो भी भारी रकम के साथ।
कहानी अब केवल एक वीज़ा की नहीं रही थी, बल्कि यह अमेरिका की Innovation capability, competitive edge, और ग्लोबल ब्रेन ड्रेन के भविष्य की जंग बन चुकी थी। कोर्ट रूम में चैंबर ऑफ कॉमर्स के वकील खड़े थे, और उनके शब्दों में केवल कानूनी दलील नहीं, बल्कि अमेरिकी उद्योग की व्यथा थी — “Mr. President, आप कानून तोड़ रहे हैं, और साथ ही अपने ही देश के भविष्य को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।”
दरअसल, H-1B वीज़ा सिर्फ एक इमिग्रेशन प्रोग्राम नहीं है। यह अमेरिका के सपनों की बुनियाद रहा है। Microsoft, Google, Apple, Amazon जैसी कंपनियों में हजारों ऐसे भारतीय, चीनी, और वैश्विक प्रोफेशनल्स हैं जिन्होंने अमेरिका के टेक्नोलॉजी युग को दिशा दी। 1990 के दशक से लेकर आज तक, हर बड़े इनोवेशन के पीछे कोई न कोई H-1B धारक इंजीनियर, वैज्ञानिक या डेवलपर रहा है। इस वीज़ा के तहत हर साल करीब 85,000 Skilled professionals को अमेरिका में काम करने का मौका मिलता है — जिनमें से लगभग 71% भारतीय होते हैं।
लेकिन ट्रंप के दौर में कहानी बदल गई। उनके शासन का नारा था — “Hire American, Buy American.” 2020 में जब महामारी की आंधी आई, और बेरोज़गारी आसमान छूने लगी, तब ट्रंप प्रशासन ने H-1B को ‘आर्थिक खतरे’ के रूप में पेश करना शुरू किया। उनका कहना था कि विदेशी वर्कर्स अमेरिकी नौकरियों को छीन रहे हैं। लेकिन आंकड़े कहते हैं — अमेरिका की सबसे तेज़ी से बढ़ती कंपनियों ने अपनी ग्रोथ उन्हीं विदेशी टैलेंट के दम पर की है।
H-1B फीस बढ़ाने का असर सबसे पहले सिलिकॉन वैली में महसूस हुआ। Google और Meta जैसी कंपनियों ने तुरंत अपनी नाराज़गी जताई। कुछ ने कहा कि इससे अमेरिका का “टैलेंट पावर” कमजोर हो जाएगा, और इनोवेशन रुक जाएगा। वहीं छोटे स्टार्टअप्स, जो पहले से आर्थिक दबाव में थे, उन्होंने कहा — “अगर हम 83 लाख रुपए सिर्फ वीज़ा फीस में देंगे, तो कर्मचारी की सैलरी कैसे देंगे?”
दूसरी तरफ, चैंबर ऑफ कॉमर्स ने अपने मुकदमे में एक अहम बिंदु उठाया — कि अमेरिकी इमीग्रेशन कानून के मुताबिक, वीज़ा फीस “प्रोसेसिंग कॉस्ट” पर आधारित होती है, न कि किसी राजनीतिक एजेंडा पर। यानी सरकार वीज़ा को टैक्स की तरह नहीं वसूल सकती। अदालत में दायर केस में साफ लिखा गया — “ट्रंप प्रशासन ने न केवल कानून का उल्लंघन किया है, बल्कि यह फैसला अमेरिकी कंपनियों की ग्लोबल प्रतिस्पर्धा को भी कमजोर करेगा।”
लेकिन इस विवाद की जड़ें सिर्फ कानून या अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं हैं — यह राजनीति का भी खेल है। ट्रंप का वोट बैंक मुख्यतः उन मिड-वेस्ट अमेरिकन राज्यों में था जहाँ फैक्टरियां बंद हो चुकी थीं, नौकरियाँ चीन और भारत चली गई थीं, और लोग गुस्से में थे। H-1B का मुद्दा ट्रंप के लिए सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि एक चुनावी हथियार था। उन्होंने इसे “American Workers First” के बैनर तले पेश किया, ताकि वे दिखा सकें कि वो अपने देश के नागरिकों के लिए लड़ रहे हैं।
लेकिन विरोध करने वालों की बात भी वाजिब थी। उदाहरण के लिए, अगर Google का कोई प्रोजेक्ट अगले साल लॉन्च नहीं हो पाता क्योंकि उसके डेवलपर्स भारत से अमेरिका नहीं पहुंच पाए — तो इसका नुकसान सिर्फ Google का नहीं, बल्कि अमेरिका की GDP का होता। सिलिकॉन वैली का हर प्रोडक्ट, हर कोड, हर इनोवेशन — कहीं न कहीं किसी विदेशी दिमाग से जुड़ा हुआ है।
भारत में भी इस फैसले का बड़ा असर हुआ। हर साल लाखों युवा H-1B वीज़ा के लिए आवेदन करते हैं। भारत के कई टॉप कॉलेजों — IIT, BITS, और NIT के स्टूडेंट्स का सपना होता है कि वो एक दिन अमेरिका की किसी टेक कंपनी में काम करें। लेकिन जब यह खबर आई कि वीज़ा फीस अब 83 लाख रुपए होगी, तो सपनों की यह कीमत हर किसी के बस की नहीं रही।
अमेरिका में बसे भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए यह खबर एक झटका थी। Silicon Valley में काम करने वाले एक भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने कहा — “हम वो लोग हैं जिन्होंने अमेरिका की ग्रोथ में योगदान दिया। लेकिन अब हमें ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे हम बोझ हैं।”
ट्रंप प्रशासन की दलील थी कि ये फैसला विदेशी कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर है जो ‘cheap labor’ का फायदा उठाती हैं। उनका कहना था — “अमेरिकी कंपनियों को अमेरिकी लोगों को काम देना चाहिए, न कि विदेशों से सस्ते इंजीनियर बुलाने चाहिए।” लेकिन सवाल यह था — क्या अमेरिका के पास उतने स्किल्ड वर्कर्स हैं जो Google या Amazon के global-standard प्रोजेक्ट्स संभाल सकें? जवाब था — नहीं।
इसलिए कई अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी कि अगर H-1B पर यह नीतिगत दबाव जारी रहा, तो कंपनियाँ अपने ऑफिस अमेरिका से बाहर ले जाने पर मजबूर होंगी। भारत, सिंगापुर और दुबई जैसे देश पहले से ही नए “टेक हब” के रूप में उभर रहे हैं। यानी यह नीति “Make America Great Again” की जगह “Move America Out” बन सकती है।
अमेरिका की राजनीतिक गलियों में इस विवाद ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ पैदा कीं। डेमोक्रेट्स ने कहा — “ट्रंप प्रशासन विदेशी वर्कर्स को निशाना बनाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुँचा रहा है।” वहीं रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेता भी अब इस फैसले से असहमत दिखे। क्योंकि उनके राज्य की कंपनियाँ भी विदेशी इंजीनियरों पर निर्भर थीं।
इस पूरे मामले ने अमेरिका में एक गहरी बहस छेड़ दी — “क्या वाकई विदेशी प्रतिभा अमेरिकी नौकरियों के लिए खतरा है, या वही अमेरिका की ताकत है?”
अगर इतिहास पर नज़र डालें, तो अमेरिका हमेशा से प्रवासियों का देश रहा है। सिलिकॉन वैली के टॉप CEOs — सुंदर पिचाई (Google), सत्य नडेला (Microsoft), अरविंद कृष्णा (IBM), पाराग अग्रवाल (Twitter) — सभी H-1B धारक रहे हैं। यह दिखाता है कि अमेरिका की ग्लोबल ताकत उन्हीं लोगों ने बनाई, जिन्हें कभी ‘outsider’ कहा गया।
लेकिन अब वही सिस्टम ट्रंप के “नेशनलिज़्म” की दीवार में फँस चुका है। अदालत का यह मुकदमा सिर्फ फीस का नहीं, बल्कि “फिलॉसफी” का केस है — कि क्या अमेरिका अपनी सीमाओं को बंद करके महान बनेगा या अपनी खुली सोच से?
दूसरी ओर, भारत सरकार ने भी इस पर नज़र रखी। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह फैसला भारतीय Professionals को प्रभावित करेगा और इससे दोनों देशों के बीच टैलेंट-फ्लो पर असर पड़ेगा। अमेरिकी टेक सेक्टर में भारतीयों की बड़ी भूमिका है — और अगर ये वीज़ा रुकते हैं, तो अमेरिकी कंपनियों को अपने प्रोजेक्ट्स स्लो करने पड़ेंगे।
कोर्ट में चैंबर ऑफ कॉमर्स ने अपनी दलील में कहा — “सरकार को अधिकार है इमीग्रेशन पॉलिसी तय करने का, लेकिन वो कानून से ऊपर नहीं है।” उन्होंने जज के सामने आर्थिक डेटा रखा कि H-1B वर्कर्स अमेरिका की अर्थव्यवस्था में हर साल अरबों डॉलर का योगदान करते हैं, टैक्स भरते हैं, प्रॉपर्टी खरीदते हैं, और रोजगार भी पैदा करते हैं।
वहीं ट्रंप प्रशासन ने अपनी रक्षा में कहा — “यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।” उनका कहना था कि महामारी के बाद अमेरिकी लोगों के लिए नौकरियाँ प्राथमिकता पर हैं। लेकिन इस तर्क के पीछे राजनीति की गंध साफ़ झलकती थी। चुनावों से पहले “विदेशी टैलेंट” के खिलाफ रुख अपनाना, ट्रंप को उनके समर्थकों के बीच और लोकप्रिय बना सकता था।
लेकिन सवाल उठता है — क्या यह नीति लंबे समय में अमेरिका के हित में है? एक्सपर्ट्स का कहना है — नहीं। क्योंकि H-1B सिर्फ वर्क वीज़ा नहीं, बल्कि Innovation का Passport है। जब कोई भारतीय इंजीनियर अमेरिका में काम करता है, तो वो वहां के इनोवेशन इकोसिस्टम में नया योगदान देता है। उसकी कमाई वहीं टैक्स के रूप में जाती है, और उसका ज्ञान नए उत्पादों में बदलता है।
H-1B धारकों की वजह से ही अमेरिकी टेक सेक्टर ने 1990 से अब तक लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर की वैल्यू बनाई है। यानी जो लोग ट्रंप उन्हें “जॉब-चोर” कह रहे हैं, वही असल में अमेरिका की GDP बढ़ा रहे हैं।
कोर्ट केस अभी चल रहा है। लेकिन इसका असर पूरे ग्लोबल टैलेंट नेटवर्क पर पड़ रहा है। भारत, चीन, फिलीपींस जैसे देशों के हजारों युवा अब कनाडा, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की ओर रुख कर रहे हैं — जहाँ नीतियाँ स्थिर हैं, और स्वागतभाव है। कनाडा ने तो हाल ही में एक नया प्रोग्राम शुरू किया है — जिसमें H-1B धारकों को बिना किसी वीज़ा इंटरव्यू के काम करने की अनुमति दी जाती है। यानी अमेरिका से निकल रहा टैलेंट, अब उसके पड़ोसी देश के लिए संपत्ति बन रहा है।
कुछ अमेरिकी इंडस्ट्री लीडर्स ने यहां तक कहा — “अगर हम विदेशी टैलेंट को रोकेंगे, तो अमेरिका की ‘सिलिकॉन वैली’ एक दिन ‘घोस्ट वैली’ बन जाएगी।” ट्रंप के फैसले ने अमेरिकी ड्रीम की जड़ों को झकझोर दिया है। क्योंकि यही H-1B सिस्टम था जिसने उस “ड्रीम” को जिंदा रखा था — कि मेहनत और स्किल से कोई भी व्यक्ति अमेरिका में सफल हो सकता है, चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने से आया हो।
आज अदालत में इस केस की सुनवाई चल रही है। बाहर प्रदर्शनकारी हैं — कुछ ट्रंप के समर्थन में, कुछ विरोध में। एक बैनर पर लिखा है — “H-1B is not a threat, it’s a strength.” और शायद यही लाइन इस पूरी कहानी का सार है।
डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह मामला सिर्फ एक पॉलिसी नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक लड़ाई है — उनकी विचारधारा “America First” और दुनिया की नई सोच “World Together” के बीच। अब सवाल यह है — क्या अदालत ट्रंप की नीतियों को रोक पाएगी? क्या अमेरिका अपने ही innovation के इंजन को ठंडा होने देगा? या क्या यह देश फिर से वही रास्ता चुनेगा जिसने उसे सुपरपावर बनाया था — यानी खुलापन, अवसर, और विविधता का स्वागत?
Conclusion
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