ज़रा सोचिए… हम सबने हमेशा यही माना है कि टेक्नोलॉजी की दुनिया की सबसे बड़ी कहानियाँ अमेरिका के सिलिकॉन वैली, बेंगलुरु की आईटी हब, हैदराबाद के साइबर सिटी या फिर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों से निकलती हैं। अगर कोई कहे कि एक छोटे से भारतीय गांव से ऐसी कंपनी खड़ी हुई, जो दुनिया के 180 देशों में इस्तेमाल हो रही है, तो आप शायद पहले हँस देंगे। लेकिन यही हकीकत है।
जिस दौर में युवा अमेरिका जाकर करोड़ों की सैलरी वाली नौकरी का सपना देखते हैं, उसी दौर में एक भारतीय ने अमेरिका की शानदार नौकरी छोड़ दी और अपने गांव में लौट आया। न एयरकंडीशन्ड दफ्तर, न ग्लैमरस ऑफिस टावर—बल्कि मिट्टी की खुशबू, खेतों के बीच और साधारण साइकिल से ऑफिस जाते हुए उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को चुनौती दी।
और जब उनके ऐप Arattai ने अचानक भारत में तहलका मचा दिया, तब पूरी दुनिया को फिर याद आया—ये हैं श्रीधर वेम्बू, Zoho और अराटाई के मालिक, जिनकी दौलत आज 52 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा है, लेकिन जो अब भी गांव में रहना पसंद करते हैं। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
आपको बता दें कि पिछले कुछ दिनों में अराटाई ऐप की लोकप्रियता जिस तेजी से बढ़ी है, उसने सबको चौंका दिया। जहाँ पहले लोग इसे एक छोटे प्रोजेक्ट की तरह देखते थे, वहीं अब इसे सीधे-सीधे व्हाट्सएप का भारतीय विकल्प कहा जा रहा है। सिर्फ तीन दिनों में इसके साइन-अप 3,000 से बढ़कर 3,50,000 प्रतिदिन हो गए। इतना बड़ा उछाल किसी भी नए ऐप के लिए अविश्वसनीय है। यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के सामने अपनी पहचान खड़ी करना चाहता है और लोग इसमें पूरा साथ देने के लिए तैयार हैं। लेकिन असली दिलचस्पी इस ऐप के पीछे खड़े उस इंसान में है, जिसने इसे संभव बनाया—श्रीधर वेम्बू।
श्रीधर वेम्बू का जन्म 1968 में तमिलनाडु के तंजावुर जिले में हुआ था। उनका परिवार मध्यमवर्गीय था, जहाँ संसाधन सीमित थे, लेकिन पढ़ाई-लिखाई का माहौल गहरा था। बचपन से ही वे तेज दिमाग वाले और मेहनती छात्र थे। जब उनके हमउम्र बच्चे खेलों में समय बिताते, वे किताबों और गणित के सवालों में खोए रहते। यही लगन उन्हें IIT मद्रास तक ले गई, जहाँ से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री ली। IIT में उनकी सोच और निखरी और उन्हें एहसास हुआ कि तकनीक सिर्फ नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज बदलने का हथियार भी हो सकती है।
बीटेक के बाद उनका सफर अमेरिका तक पहुँचा। उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से 1994 में पीएचडी की। यह वह दौर था जब भारत से हजारों छात्र अमेरिका जा रहे थे और वहीं बस जाने का सपना देखते थे। प्रिंसटन से निकलने के बाद वेम्बू को क्वालकॉम में शानदार नौकरी मिली। वहाँ उनकी जिम्मेदारी सिस्टम डिज़ाइन और वायरलेस टेक्नोलॉजी थी। सैलरी मोटी थी, जीवन आरामदायक था और करियर का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा था। लेकिन उनके मन में कहीं एक सवाल लगातार उठ रहा था—“क्या मेरी मेहनत सिर्फ अमेरिका की कंपनियों को आगे बढ़ाने के लिए है? क्या मैं भारत के लिए कुछ बड़ा नहीं कर सकता?”
यही सवाल उन्हें भीतर से कचोटता रहा। आखिरकार 1996 में उन्होंने अपने दोस्तों और परिवार के साथ मिलकर एक नया कदम उठाया और बनाई Advent Net—जिसे बाद में पूरी दुनिया Zoho Corporation के नाम से जानने लगी। शुरुआत छोटी थी। वे जापानी हार्डवेयर कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर समाधान बनाते थे। लेकिन उनका सपना बहुत बड़ा था। वे चाहते थे कि भारत भी दुनिया को सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट्स दे, न कि सिर्फ बैक-ऑफिस सपोर्ट।
धीरे-धीरे Advent Net विकसित हुआ और Zoho का रूप ले लिया। आज Zoho एक विशाल साम्राज्य है। CRM, HR, अकाउंटिंग, मार्केटिंग और ऑटोमेशन—ऐसा कोई बिजनेस सेक्टर नहीं है जहाँ Zoho का प्रोडक्ट न हो। 50 से ज़्यादा क्लाउड प्रोडक्ट्स, 180 देशों में ग्राहकों की लंबी सूची और 100 मिलियन से ज़्यादा यूज़र्स—यह सब एक गांव से निकली कंपनी ने कर दिखाया।
लेकिन Zoho को अलग बनाता है उसका बिजनेस मॉडल। जहाँ दुनिया की ज्यादातर टेक कंपनियाँ वेंचर कैपिटल और Investors के पैसों पर खड़ी होती हैं, वहाँ वेम्बू ने कभी फंडिंग नहीं ली। उन्होंने हमेशा कहा—“कंपनी को टिकाना है तो उसे अपने मुनाफे पर टिकना होगा।” यही कारण है कि Zoho एक बूटस्ट्रैप्ड यूनिकॉर्न बना। यह उस दुनिया में अलग चमकता है, जहाँ हर स्टार्टअप यूनिकॉर्न बनने के लिए अरबों की फंडिंग लेता है।
Zoho की यात्रा में एक और बड़ा प्रयोग रहा—Zoho Schools of Learning। 2004 में जब बाकी कंपनियाँ सिर्फ़ IIT और IIM से भर्ती करती थीं, तब वेम्बू ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने छोटे कस्बों और गांवों के युवाओं को चुना, उन्हें सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कोडिंग सिखाई और उन्हें कंपनी का हिस्सा बनाया। आज हजारों कर्मचारी Zoho स्कूल से निकलकर कंपनी में काम कर रहे हैं और दुनिया भर में लाखों लोग उनके बनाए प्रोडक्ट इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कदम साबित करता है कि टैलेंट सिर्फ़ बड़े कॉलेजों में नहीं, बल्कि हर गली-मोहल्ले में छिपा होता है।
इसी सोच ने वेम्बू को और अलग बना दिया। उन्होंने अपना मुख्यालय किसी मेट्रो सिटी में नहीं बनाया। न बेंगलुरु, न हैदराबाद, न दिल्ली—बल्कि तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव में। वहाँ उन्होंने दफ्तर खोला और वहीं से Zoho का संचालन किया। जब लोग हैरान होकर पूछते कि “गांव से कैसे टेक कंपनी चलेगी?” तो वेम्बू मुस्कुराते हुए कहते—“टेक्नोलॉजी के लिए लोकेशन नहीं, दिमाग और नीयत चाहिए।” वे खुद तेनकासी में साइकिल से ऑफिस जाते हैं। उनकी यह सादगी और गांव से जुड़ाव उनकी पहचान बन गई है।
2021 में जब दुनिया वॉट्सऐप और टेलीग्राम में उलझी थी, तब Zoho ने लॉन्च किया Arattai App। अराटाई का अर्थ तमिल में होता है—“इंस्टैंट चैट।” यह ऐप भारत का अपना मैसेजिंग समाधान है। इसमें ग्रुप चैट, वॉइस और वीडियो कॉल, स्टोरीज़, ब्रॉडकास्ट चैनल जैसी सारी सुविधाएँ हैं, जो व्हाट्सएप और टेलीग्राम में मिलती हैं। लेकिन फर्क यह है कि यह पूरी तरह से भारतीय है।
शुरुआत में इसे एक छोटे प्रोजेक्ट के रूप में देखा गया। लेकिन जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे समर्थन दिया और लोगों से कहा कि “स्वदेशी डिजिटल समाधान अपनाइए,” तो अराटाई अचानक सुर्खियों में आ गया। तीन दिनों में ही इसके साइन-अप 100 गुना बढ़ गए। वेम्बू ने एक्स पर लिखा—“हमने 3 दिनों में अराटाई ट्रैफ़िक में 100 गुना वृद्धि देखी है। हम आपातकालीन आधार पर इंफ्रास्ट्रक्चर जोड़ रहे हैं।” यह दिखाता है कि भारत अब अपने ऐप्स को अपनाने के लिए तैयार है।
लेकिन अराटाई सिर्फ एक ऐप नहीं है। यह भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। चीन के पास वीचैट है, अमेरिका के पास वॉट्सऐप और मैसेंजर हैं, और अब भारत के पास अराटाई है। यह हमें बताता है कि हम दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय अपने समाधान बना सकते हैं।
आज Zoho Corporation के पास 100 मिलियन से ज़्यादा यूज़र्स हैं। कंपनी के दफ्तर सिर्फ शहरों में नहीं, बल्कि गांवों और छोटे कस्बों में भी हैं। इससे न सिर्फ़ रोजगार पैदा होता है बल्कि यह मॉडल दिखाता है कि भारत का विकास केवल महानगरों से नहीं बल्कि गांवों से भी संभव है।
श्रीधर वेम्बू आज अरबपति हैं। उनकी संपत्ति 52 हजार करोड़ रुपये से भी ज़्यादा है। लेकिन उनका रहन-सहन अब भी सादा है। वे कहते हैं—“मेरे लिए दौलत का मतलब यह नहीं है कि मैं शहर में गगनचुंबी इमारत बनाऊँ। मेरे लिए दौलत का मतलब है कि मैं अपने गांव के युवाओं को मौका दूँ और उन्हें दुनिया से जोड़ूँ।”
2021 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। फोर्ब्स की लिस्ट में वे लगातार भारत के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि वे गांव में क्यों रहते हैं, तो उनका जवाब होता है—“गांव में रहना मुझे जमीन से जोड़े रखता है। यही असली ताक़त है।”
Conclusion
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