Hidden Agenda: Pakistan-Bangladesh Deal कमजोर इकॉनमी को सहारा या भारत को घेरने की नई चाल? 2025

ज़रा सोचिए… एक ऐसा पड़ोस जहाँ दो घर हमेशा एक-दूसरे से कटे रहे हों, अतीत की कड़वी यादें, जंग और विश्वासघात उनकी दीवारों पर लिखे हों। लेकिन अचानक एक दिन वही दोनों पड़ोसी गले मिलते नज़र आएँ, हाथ मिलाएँ और नए रिश्ते की शपथ लें। अब ज़रा कल्पना कीजिए उस तीसरे पड़ोसी की, जिसने हमेशा खुद को इस गली का सबसे बड़ा और असरदार किरदार माना था।

क्या उसके दिल में हलचल नहीं होगी? क्या वह सोचेगा कि ये नई नज़दीकियाँ कहीं उसके खिलाफ़ तो नहीं? यही कहानी है आज Pakistan-Bangladesh की—दो ऐसे मुल्क, जिनकी तकरार इतिहास में दर्ज है, अब अचानक साथ आते नज़र आ रहे हैं। और सवाल ये उठ रहा है कि ये समझौते उनके लिए नई शुरुआत हैं या भारत को घेरने की कोई बड़ी साज़िश? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि ढाका की सड़कों पर उस दिन का नज़ारा बदला हुआ था। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मुहम्मद इशाक डार 13 साल बाद बांग्लादेश पहुँचे थे। यह दौरा अपने आप में ऐतिहासिक था क्योंकि दशकों की दूरी और कड़वाहट के बाद दोनों देशों ने हाथ मिलाने का फ़ैसला किया। छह अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए—व्यापार से लेकर शिक्षा तक, मीडिया से लेकर संस्कृति तक। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा को “नई सुबह” बताया। पर सवाल यह है कि यह सुबह किसके लिए है? Pakistan-Bangladesh की जनता के लिए, या भारत के खिलाफ़ खींची जा रही एक नई रणनीतिक लकीर के लिए?

इन समझौतों में जो बातें शामिल की गईं, वे सतही तौर पर सामान्य लगती हैं। राजनयिक और सरकारी पासपोर्ट धारकों के लिए वीज़ा खत्म करना, व्यापार पर संयुक्त कार्य समूह बनाना, दोनों देशों की विदेश सेवा अकादमियों में साझेदारी, समाचार एजेंसियों के बीच सहयोग, थिंक टैंकों के बीच समझौता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान। सुनने में यह सब “सॉफ्ट पावर” बढ़ाने जैसा लगता है। लेकिन इतिहास और भू-राजनीति का खेल इतना सरल नहीं है। जब पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दो देश, जिनकी अर्थव्यवस्था हांफ रही है, इस तरह के कदम उठाते हैं, तो उनके पीछे सिर्फ़ विकास का तर्क नहीं होता, बल्कि कोई बड़ा रणनीतिक मकसद छिपा होता है।

बांग्लादेश के लिए यह कदम आर्थिक विकल्प तलाशने की कोशिश हो सकता है। उसकी अर्थव्यवस्था लगातार संकट में है—foreign currency reserves घट रहा है, कपड़ा उद्योग दबाव में है, और अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता कड़े शर्तों के साथ मदद कर रहे हैं। ऐसे में अगर पाकिस्तान हाथ बढ़ाता है, तो ढाका के लिए यह राहत की तरह है। पाकिस्तान ने बांग्लादेशी छात्रों के लिए 500 स्कॉलरशिप का एलान भी किया है, ताकि शिक्षा और युवाओं के जरिए अपनी पकड़ बनाई जा सके। यह कदम न केवल सॉफ्ट पावर बढ़ाने का तरीका है बल्कि भविष्य के लिए Investment भी है—कल के बांग्लादेशी नेता और अधिकारी अगर पाकिस्तान से पढ़कर आएंगे, तो उनकी झुकाव किस ओर होगा?

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। उसकी अर्थव्यवस्था कंगाल हो चुकी है, IMF के दरवाज़े पर बार-बार जाना पड़ता है, और राजनीतिक अस्थिरता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। ऐसे में बांग्लादेश से नज़दीकी दिखाकर पाकिस्तान दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह क्षेत्रीय राजनीति में अब भी Relevant है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इन समझौतों से पाकिस्तान की टूटी-फूटी अर्थव्यवस्था में जान आ पाएगी, या यह सिर्फ़ भारत को संदेश देने का तरीका है?

भारत के नज़रिये से यह सब बेहद अहम है। बांग्लादेश भारत का पड़ोसी और कई मायनों में साझेदार रहा है। चाहे व्यापार हो, ऊर्जा हो या सुरक्षा, भारत ने हमेशा बांग्लादेश को अपनी “नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी” में रखा है। अगर बांग्लादेश पाकिस्तान की ओर झुकता है, तो यह भारत के लिए एक कूटनीतिक झटका होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरी चाल चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति का हिस्सा हो सकती है। चीन पहले ही श्रीलंका, मालदीव और पाकिस्तान में गहरी घुसपैठ कर चुका है। अब अगर बांग्लादेश भी उस घेरे में आता है, तो भारत लगभग हर तरफ से घिर जाएगा। पाकिस्तान और बांग्लादेश की नज़दीकी चीन के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि वह दोनों को साथ लेकर भारत के सामने एक मजबूत गुट खड़ा कर सकता है।

बांग्लादेश का पाकिस्तान के साथ व्यापारिक समझौता भारत के लिए सीधी चुनौती है। भारत और बांग्लादेश का आपसी व्यापार 18 अरब डॉलर के आसपास है। अगर ढाका को विकल्प मिलते हैं, तो भारतीय exporters पर असर पड़ेगा। यह केवल आर्थिक झटका नहीं होगा, बल्कि भारत के प्रभाव को भी कमजोर करेगा। पाकिस्तान “नॉलेज कॉरिडोर” और स्कॉलरशिप जैसे कार्यक्रमों से बांग्लादेश में अपनी सॉफ्ट पावर बढ़ाना चाहता है। यह रणनीति धीरे-धीरे भारत के Cultural और Educational प्रभाव को चुनौती दे सकती है।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे रोचक पहलू है—अतीत। बांग्लादेश की आज़ादी पाकिस्तान से अलग होकर हुई थी। 1971 का युद्ध और उसके घाव आज भी बांग्लादेश की राजनीति और समाज में ज़िंदा हैं। लाखों लोगों की शहादत, शरणार्थियों की पीड़ा और पाकिस्तानी सेना की क्रूरता को भुलाना आसान नहीं। फिर ऐसा क्या हुआ कि बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाने को तैयार हो गया? क्या यह सिर्फ़ आर्थिक मजबूरी है या भारत से बढ़ती दूरी?

भारत ने हाल के वर्षों में बांग्लादेश के साथ कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए। बिजली ग्रिड कनेक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग, सीमा प्रबंधन। लेकिन जब भारत वैश्विक राजनीति में अमेरिका से दूरी बनाकर रूस और चीन की ओर झुक रहा है, तो शायद ढाका को लग रहा है कि उसका संतुलन बिगड़ रहा है। और यही मौका पाकिस्तान ने पकड़ लिया।

ढाका में हुए इन समझौतों को सिर्फ़ “कागज़ी सहयोग” मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ये छोटे-छोटे कदम आने वाले वर्षों में बड़े बदलाव ला सकते हैं। पाकिस्तान शिक्षा, मीडिया और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाकर बांग्लादेश की नई पीढ़ी के दिमाग़ और दिल पर कब्ज़ा करना चाहता है। यह “सॉफ्ट पावर” का वही खेल है जिसे चीन लंबे समय से खेल रहा है।

भारत के लिए यह एक चेतावनी है। क्योंकि अगर बांग्लादेश पाकिस्तान के करीब गया, तो पूर्वी सीमा पर भारत की रणनीतिक स्थिति बदल जाएगी। अभी तक भारत को सिर्फ़ पश्चिम से खतरा था, लेकिन अगर पूर्व से भी दबाव आने लगे तो हालात कहीं ज्यादा पेचीदा होंगे।

सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश की यह नज़दीकी सिर्फ़ आर्थिक मजबूरी है या फिर भारत को घेरने की बड़ी तैयारी? जवाब आसान नहीं है। लेकिन इतना साफ़ है कि भारत को अब और सजग रहना होगा। सिर्फ़ व्यापारिक साझेदारी नहीं, बल्कि Cultural और Educational level पर भी बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी।

आज की इस नई जुगलबंदी ने यह दिखा दिया है कि क्षेत्रीय राजनीति में सबकुछ बदल सकता है। दुश्मन दोस्त बन सकते हैं और दोस्त कभी भी दूर जा सकते हैं। भारत को यह मान लेना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते—सिर्फ़ स्थायी हित होते हैं। और अगर भारत अपने हितों की रक्षा करना चाहता है, तो उसे अपने पड़ोस में और ज्यादा सक्रिय होना होगा।

यह कहानी सिर्फ़ पाकिस्तान और बांग्लादेश की नहीं है। यह कहानी उस भारत की भी है, जिसे यह तय करना है कि वह इस बदलते भू-राजनीतिक खेल में दर्शक बना रहेगा या निर्णायक खिलाड़ी।

Conclusion

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