ज़रा सोचिए… आधी रात का वक़्त है। आप अपने कमरे में अकेले बैठे हैं। बाहर सन्नाटा है, लेकिन आपकी स्क्रीन पर चमक रहा है वही गेम जिसने आपको कई बार रोमांचित किया है—कभी छोटी रकम जीती, कभी दोस्तों के बीच शेखी बघारी, और कभी हारा तो भी यही सोचकर खेलते रहे कि अगली बार किस्मत बदल जाएगी। अचानक एक नोटिफिकेशन आता है—“सभी मनी गेम्स तुरंत प्रभाव से बंद किए जाते हैं।
कानून का उल्लंघन करने पर जेल और भारी जुर्माना।” आप घबराकर दोबारा पढ़ते हैं। हाथ काँपते हैं। दिमाग़ में बस एक ही सवाल घूम रहा है—क्या वाकई अब गेम खेलने से जेल हो जाएगी? टीवी ऑन करते हैं, तो न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग चल रही है—“Online gaming प्रमोशन एंड रेगुलेशन बिल 2025 को राष्ट्रपति की मंजूरी।” आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
भारत का Online gaming सेक्टर पिछले पाँच सालों में ऐसे उभरा था जैसे सूखे रेगिस्तान में अचानक झरना फूट पड़ा हो। एक समय था जब लूडो, साँप-सीढ़ी या कैरम घरों में खेलने का शौक भर थे। लेकिन मोबाइल और इंटरनेट की सस्ती पहुँच ने इन्हें अरबों का उद्योग बना दिया। क्रिकेट के फैंटेसी लीग्स ने लोगों को यह भरोसा दिलाया कि अगर आप खिलाड़ी चुनने में समझदार हैं तो लाखों कमा सकते हैं। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक, हर किसी के पास एक ऐसा दोस्त था जो कहता था—“भाई, मैंने Dream11 से इस महीने दस हज़ार निकाले।” यह सुनकर बाकी लोग भी ऐप डाउनलोड करते और खेल शुरू कर देते।
लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक अंधेरा सच भी था। जिन लोगों ने सोचा कि वे रोज़ाना थोड़े पैसे लगाकर कमाई करेंगे, वही लोग धीरे-धीरे इस जाल में फँसने लगे। किसी ने पढ़ाई की फीस गँवाई, किसी ने इलाज के पैसे, किसी ने शादी के लिए जोड़ा हुआ गहना बेचकर गेमिंग वॉलेट भरा। हालत इतनी बिगड़ी कि कई परिवार बर्बादी की कगार पर पहुँच गए। यही वह बिंदु था जब समाज में सवाल उठने लगे—क्या ये गेमिंग नहीं बल्कि जुए का नया रूप है?
इसी माहौल में संसद तक गूँज पहुँची। और दुर्लभ रूप से राजनीति में मतभेद भुला दिए गए। राज्यसभा ने महज़ 26 मिनट में और लोकसभा ने केवल 7 मिनट में यह बिल पास कर दिया। सोचिए, जहाँ सामान्य बिलों पर घंटों बहस होती है, वहाँ पूरे देश के प्रतिनिधियों ने मिलकर तय किया कि इस “डिजिटल जुए” को तुरंत रोका जाए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलते ही यह कानून ज़मीन पर उतर गया।
अब हालात बिल्कुल साफ़ हैं। अगर कोई कंपनी पैसे वाले ऑनलाइन गेम चलाएगी तो उसे तीन साल तक की जेल और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना भुगतना होगा। और अगर कोई इसका विज्ञापन करेगा—तो वह भी नहीं बच पाएगा। विज्ञापन या प्रचार करने पर दो साल की जेल और 50 लाख रुपये का जुर्माना। और अगर अपराध दोहराया तो सज़ा और जुर्माना दोनों दुगुना हो सकते हैं। यानी पहली बार चेतावनी नहीं मिलेगी, सीधा सज़ा मिलेगी।
केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में कहा—“समय-समय पर समाज को बुराइयाँ घेरती हैं। कभी शराब, कभी तंबाकू, कभी सट्टा। आज ऑनलाइन मनी गेमिंग ने वही रूप ले लिया है। लोगों की ज़िंदगी की जमा पूँजी लुट रही है। ऐसे में संसद और सरकार का कर्तव्य है कि इस पर अंकुश लगाए।” उनके शब्द गूँजते रहे और उस दिन हर सांसद ने ताली बजाकर समर्थन दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बिल को सिर्फ़ कानून नहीं बल्कि सामाजिक क्रांति बताया। उन्होंने कहा—“यह क़दम भारत में ई-स्पोर्ट्स को प्रोत्साहन देगा। लेकिन उन गेम्स पर रोक लगाएगा जिनसे लोगों की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।” प्रधानमंत्री का संकेत साफ़ था—भारत गेमिंग का केंद्र बनेगा, लेकिन गलत रास्ते से नहीं।
इस कानून का असर तुरंत दिखा। Dream11, WinZO, MPL, Zupee जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स ने घोषणा कर दी कि वे भारत में अपने मनी गेम्स बंद कर रहे हैं। जिन यूज़र्स ने लाखों रुपये इन ऐप्स में डाले थे, वे घबराकर अपने अकाउंट बैलेंस चेक करने लगे। किसी ने तुरंत विदड्रॉल लगाया, किसी ने कस्टमर सपोर्ट पर फोन किया। सोशल मीडिया पर शिकायतों की बाढ़ आ गई—“मेरा पैसा कब मिलेगा?”, “क्या अब बैलेंस फँस गया है?”, “अगर कंपनी भाग गई तो हम कहाँ जाएँगे?”
लेकिन यह सिर्फ़ यूज़र्स की नहीं, कंपनियों की भी त्रासदी थी। भारत का गेमिंग सेक्टर 31,000 करोड़ रुपये सालाना का कारोबार कर रहा था। सरकार को टैक्स के रूप में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक मिल रहे थे। Foreign investors इस सेक्टर में 25,000 करोड़ रुपये लगा चुके थे। अब अचानक सब बंद। इंडस्ट्री बॉडीज़ ने चेतावनी दी—“400 से ज्यादा कंपनियाँ बंद हो सकती हैं और करीब 2 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो सकती हैं।”
यह सच है कि कई युवाओं ने इन कंपनियों में करियर बनाया था। टेक डेवलपर्स, डिज़ाइनर्स, मार्केटिंग प्रोफेशनल्स—सभी को अब डर सता रहा है। किसी ने EMI पर घर खरीदा है, किसी ने कार ली है, किसी ने शादी की जिम्मेदारी उठाई है। अब अगर कंपनी ही बंद हो जाए तो इनकी ज़िंदगी पर भी ताला लग जाएगा।
लेकिन सरकार ने यह क़दम सिर्फ़ नुक़सान देखने के लिए नहीं उठाया। उसका कहना है कि यह कानून समाज को राहत देगा। लाखों परिवार जो इन गेम्स की वजह से आर्थिक और मानसिक तनाव झेल रहे थे, उन्हें अब चैन मिलेगा। अब किसी माँ को बेटे की पढ़ाई के पैसे गंवाने का डर नहीं होगा। किसी पिता को इलाज के लिए पैसे जुटाने के बाद ऐप पर हार जाने का पछतावा नहीं होगा।
सवाल उठता है कि अब आगे क्या? सरकार ने कहा है कि भारत में अब ई-स्पोर्ट्स को वैध खेल का दर्जा दिया जाएगा। BGMI, Free Fire, PUBG जैसे गेम्स को टूर्नामेंट्स के ज़रिए प्रोत्साहित किया जाएगा। सरकार ट्रेनिंग अकादमियाँ बनाएगी, बच्चों और युवाओं को रिसर्च और अभ्यास का मौका देगी। यानी अब गेमिंग सिर्फ़ समय बिताने या पैसे हारने का जरिया नहीं रहेगा, बल्कि करियर बनाने का भी अवसर होगा।
इसके लिए सरकार ने “Online gaming अथॉरिटी” बनाने का ऐलान किया है। यह निकाय यह तय करेगा कि कौन सा गेम सुरक्षित है और कौन सा मनी गेम। यह शिकायतों का निपटारा करेगा और नियम लागू करवाएगा। शुरुआती खर्च 50 करोड़ और हर साल 20 करोड़ रुपये इस पर आएंगे। यह रकम भारत की Accumulated fund से दी जाएगी।
लेकिन आलोचक कहते हैं कि इतने कड़े कानून से लोग अवैध विदेशी प्लेटफॉर्म्स की ओर भाग सकते हैं। वे डर जताते हैं कि लोग VPN का इस्तेमाल करेंगे और बाहर के सर्वर से गेम खेलेंगे। इससे सरकार का नियंत्रण कमज़ोर होगा और माफिया जैसी ताक़तें सक्रिय हो जाएँगी।
सच यही है कि यह लड़ाई आसान नहीं है। एक तरफ़ सरकार है, जो समाज को बुराई से बचाना चाहती है। दूसरी तरफ़ उद्योग है, जो कहता है कि रोज़गार और निवेश बर्बाद हो रहे हैं। और बीच में है आम आदमी, जो सोच रहा है कि उसकी मेहनत का पैसा कहीं इस शोर में गुम न हो जाए।
भारत के सामने आज दो रास्ते हैं। पहला—अवैध गेमिंग पर सख़्ती से नकेल कसना और लोगों को सिर्फ़ सुरक्षित और सकारात्मक गेमिंग की ओर ले जाना। दूसरा—नियमों में संतुलन लाना ताकि उद्योग भी बचे और समाज भी। शायद आने वाले महीनों में सरकार इस संतुलन पर विचार करेगी।
लेकिन आज की हकीकत यही है—अगर आपने ऑनलाइन गेमिंग से पैसे कमाने का सपना देखा है, तो वह सपना अब आपको जेल और जुर्माने के साये में जीना पड़ेगा। यह कानून सिर्फ़ स्क्रीन पर गेम नहीं रोक रहा, यह समाज के ताने-बाने को बचाने की कोशिश भी कर रहा है।
Conclusion
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