सोचिए… एक फोन कॉल, जो हुआ ही नहीं — और पूरी दुनिया में हेडलाइंस बन गईं। कहा गया कि अगर वो कॉल हो जाती, तो भारत-अमेरिका ट्रेड डील फाइनल थी। और क्योंकि कॉल नहीं हुई, अब सब कुछ खतरे में है। सवाल ये नहीं है कि फोन क्यों नहीं हुआ… सवाल ये है कि क्या सच में भारत की किस्मत एक फोन कॉल पर टिकी है, और social media पर एक ही सवाल घूम रहा है—“अगर ये डील नहीं हुई तो क्या भारत की growth रुक जाएगी?”
ऐसा माहौल बन चुका है जैसे भारत की economic destiny किसी एक फोन कॉल, किसी एक समझौते, या किसी एक देश के हाथ में कैद हो। लेकिन इसी शोर के बीच एक शांत, लेकिन बेहद अहम आवाज़ आई—एक ऐसी economist की आवाज़, जिसने policy को सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि decision-making की कुर्सी पर बैठकर देखा है। और उन्होंने एक ऐसी बात कह दी, जिसने इस पूरी बहस का narrative बदल दिया।
भारत-अमेरिका trade deal में देरी को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। आखिर अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी economy है, global finance का केंद्र है, और वहां से investment, technology और demand—तीनों आती हैं। लेकिन RBI की Monetary Policy Committee की पूर्व सदस्य, और जानी-मानी अर्थशास्त्री Ashima Goyal ने इस डर को सीधे-सीधे चुनौती दी है। उन्होंने साफ कहा है कि भारत की आर्थिक तरक्की सिर्फ Washington पर निर्भर नहीं है। और ये बात सिर्फ reassurance नहीं, बल्कि ground reality पर आधारित observation है।
Ashima Goyal का कहना है कि अमेरिका पर जरूरत से ज़्यादा ध्यान देना कोई नई बात नहीं है। जब वह RBI की Monetary Policy Committee में थीं, तब भी उन्होंने ये trend महसूस किया था। जब वह markets से बातचीत करती थीं, तो बार-बार एक ही सवाल सामने आता था—“US Fed क्या करेगा?”
“America की economy कैसी रहेगी?” जैसे भारत की monetary policy का remote control कहीं और रखा हो। लेकिन उनके मुताबिक, ये perception reality से ज़्यादा media exposure और information flow की वजह से बना है। अमेरिका से जुड़ी खबरें ज़्यादा आती हैं, वहां से foreign direct investment भी आता है, इसलिए focus वहीं चला जाता है।
लेकिन असल picture इससे कहीं ज़्यादा nuanced है। Ashima Goyal ने एक बेहद technical लेकिन crucial point उठाया—capital flows और exchange rate independence का। आम तौर पर माना जाता है कि emerging economies, खासकर India जैसी country, interest rates और monetary policy में limited freedom रखती हैं, क्योंकि global capital बहुत sensitive होता है। लेकिन उनके अनुभव के मुताबिक, भारत के पास इस मामले में ज़्यादा autonomy रही है, जितना आम तौर पर समझा जाता है।
उन्होंने समझाया कि India में capital account convertibility एक क्रम में है, पूरा खुला हुआ नहीं। इसका मतलब ये है कि वो “hot money”—जो सिर्फ ब्याज दरों के छोटे से बदलाव पर अंदर-बाहर होता है—India में उतना dominant नहीं है। इसी वजह से RBI कई बार US से अलग रास्ता चुन सका है। यानी जब Fed कुछ और कर रहा हो, तब भी India अपनी domestic जरूरतों के हिसाब से interest rates तय कर पाया है। ये बात इस बड़े डर को कमजोर कर देती है कि “अगर America कुछ और कर दे, तो India helpless हो जाएगा।”
लेकिन trade deal की बहस सिर्फ monetary policy तक सीमित नहीं है। असली सवाल growth और global position का है। Ashima Goyal ने इस बहस में एक और powerful perspective जोड़ा—global growth का बदलता हुआ structure। उनके मुताबिक, आज दुनिया के विकास में emerging markets का योगदान 50% से भी ज़्यादा हो चुका है। यानी global economy अब सिर्फ US और Europe के दम पर नहीं चल रही। Asia, Africa, Latin America—ये सब अब growth engines बन चुके हैं।
इसका मतलब ये हुआ कि अगर America सहयोग करने को तैयार नहीं होता, तो दुनिया वहीं रुक नहीं जाएगी। Countries अपने विकल्प खुद develop करेंगी। Supply chains नए रास्ते खोजेंगी। Trade नए partners ढूंढेगा। Ashima Goyal का कहना है कि भारत को इस reality को समझना चाहिए और उसी हिसाब से अपनी strategy बनानी चाहिए, बजाय इसके कि हर देरी को existential crisis बना दिया जाए।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि America के साथ trade deal को लेकर जरूरत से ज़्यादा panic करने की जरूरत नहीं है। हमें ये देखना चाहिए कि हमारे पास कौन-कौन से alternatives हैं, और वो कितने effective हो सकते हैं। क्योंकि ultimately, negotiation का मतलब ही यही होता है कि दोनों पक्ष अपनी priorities देखते हैं। अगर एक रास्ता temporarily blocked है, तो दूसरा रास्ता तैयार रखना smart strategy होती है।
एक और interesting point जो उन्होंने उठाया, वो India की US market पर dependency को लेकर है। आम धारणा ये है कि India का export largely America पर टिका हुआ है। लेकिन data इस perception को पूरी तरह support नहीं करता। Ashima Goyal के मुताबिक, India की US पर dependency, Japan या South Korea जैसे देशों की तुलना में काफी limited है। India के total exports में America का share इतना बड़ा नहीं है कि एक झटके में economy हिल जाए।
ये एक underrated advantage है। Countries जो heavily US-dependent हैं, उनके पास negotiation में कम leverage होता है। India की relative diversification उसे flexibility देती है। India धीरे-धीरे अपने options develop कर रहा है—चाहे वो Europe हो, Middle East हो, Africa हो, या बाकी emerging markets। यही diversification future shocks को absorb करने की capacity बढ़ाती है।
लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि India America से दूरी बनाना चाहता है। Ashima Goyal ने इस point को भी very clearly address किया। उन्होंने कहा कि India America के साथ engage करना चाहता है। वहां बड़ी Indian diaspora रहती है, technology collaboration है, education और services में deep linkages हैं। America के साथ कई तरह की बातचीत से India को फायदा भी दिखता है। इसलिए engagement जारी रहेगा, negotiations भी चलती रहेंगी।
लेकिन उन्होंने एक clear red line खींच दी—domestic sensitivities। खासकर agriculture और vulnerable sections के मामले में। उनका कहना है कि India किसी भी trade deal के लिए अपने किसानों की कीमत पर compromise नहीं करेगा। ये बात सिर्फ emotional नहीं है, ये political और economic reality भी है।
India के कई free trade agreements इसी principle पर बने हैं—mutual respect of priorities, जिससे win-win outcome निकला है। उनके मुताबिक, अगर trade deal में देरी होती है, लेकिन उसके बदले India को एक better, balanced agreement मिलता है, तो वो उस situation से कहीं बेहतर है, जहां जल्दबाज़ी में ऐसा समझौता कर लिया जाए जो domestic businesses और weaker groups को long-term नुकसान पहुंचाए। Slow deal is better than bad deal—ये उनका clear message था।
इस पूरे debate में एक political twist भी आया, जिसने headlines को और spicy बना दिया। इस हफ्ते की शुरुआत में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री Howard Lutnick ने, एक podcast में दावा किया कि trade deal लगभग final हो चुकी थी, लेकिन ये इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने राष्ट्रपति Donald Trump को personally फोन नहीं किया। Lutnick के मुताबिक, सब कुछ तय था, बस एक call बाकी थी। इस बयान ने Indian media और policy circles में हलचल मचा दी। क्या सच में इतनी बड़ी trade deal एक phone call पर टिकी थी? क्या diplomacy को इतना personal बना दिया गया है? लेकिन India ने इस narrative को तुरंत reject कर दिया।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने साफ कहा कि ये टिप्पणियां “accurate” नहीं हैं। उन्होंने बताया कि India और US ने पिछले साल 13 फरवरी को ही bilateral trade agreement पर बातचीत करने की commitment ली थी। तब से दोनों पक्षों के बीच कई rounds of discussions हो चुके हैं, और कई मौकों पर deal के काफी करीब भी पहुंचे हैं। उन्होंने ये भी clear किया कि Modi और Trump के बीच communication की कमी नहीं रही। पिछले साल दोनों leaders के बीच आठ बार फोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें broader partnership के कई पहलुओं पर चर्चा हुई। यानी phone call वाली कहानी oversimplified और misleading थी।
इसलिए अगर India–US trade deal में देरी हो रही है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि सब कुछ खत्म हो जाएगा। इसका मतलब ये है कि negotiation चल रही है, priorities clash कर रही हैं, और eventually एक ऐसा रास्ता निकलेगा जो दोनों के लिए sustainable हो। And if it takes time, that’s not a failure—that’s strategy.
शायद असली सवाल ये नहीं है कि “Deal कब होगी?” असली सवाल ये है कि “Deal कैसी होगी?” क्योंकि long-term में वही deal काम करती है, जो balance, respect और realism पर बनी हो।
Conclusion
सोचिए… अगर भारत-अमेरिका ट्रेड डील नहीं हुई, तो क्या भारत की तरक्की रुक जाएगी? इस डर पर अर्थशास्त्री आशिमा गोयल ने बड़ा और सुकून देने वाला सच कहा है। उनका साफ मानना है कि भारत की आर्थिक रफ्तार सिर्फ वॉशिंगटन पर निर्भर नहीं है। आज दुनिया के विकास में उभरते बाजारों की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है और भारत के पास विकल्पों की कमी नहीं। गोयल के मुताबिक भारत अमेरिका की तुलना में जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा स्वतंत्र है—चाहे ब्याज दरें हों या कैपिटल फ्लो।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत का कुल निर्यात अमेरिका पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है, जो उसे मजबूती देता है। हां, भारत अमेरिका के साथ डील चाहता है, लेकिन किसानों और घरेलू हितों की कीमत पर नहीं। बेहतर डील के लिए थोड़ी देरी, गलत समझौते से कहीं बेहतर है। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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