First Budget ने दिखाया भारत का जज्बा – खाली खजाना, टूटी पटरियां और आज़ादी की पहली परीक्षा! 2026

सोचिए… देश आज़ाद हो चुका है, तिरंगा फहर रहा है, लेकिन सत्ता संभालते ही सरकार के सामने एक ऐसा काग़ज़ रखा जाता है, जिसे देखकर किसी के भी हाथ कांप जाएं। खजाना लगभग खाली है, लाखों लोग सड़कों पर हैं, शहर जल चुके हैं, और जिस रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, वही खुद ज़िंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है। डर ये है कि कहीं आज़ादी का सपना आर्थिक अराजकता में न बदल जाए। जिज्ञासा ये कि ऐसे हालात में भारत ने अपना First budget कैसे पेश किया, और सवाल ये कि क्या उस बिखरे हुए देश को संभाल पाना मुमकिन था?

15 अगस्त 1947। भारत आज़ाद हुआ, लेकिन आज़ादी के साथ विरासत में जो मिला, वो सिर्फ जश्न नहीं था। मिला था बंटवारे का दर्द, हिंसा की राख, शरणार्थियों की अंतहीन कतारें और एक ऐसा प्रशासन, जिसे रातों-रात खड़ा करना था। अंग्रेज़ चले गए थे, लेकिन अपने साथ एक ऐसा सिस्टम छोड़ गए थे, जो भारत और पाकिस्तान में बंट चुका था। सरकारी दफ्तर, फाइलें, कर्मचारी, रेलवे, सेना, खजाना—हर चीज़ का बंटवारा होना था।

ऐसे में आज़ाद भारत का First budget कोई आम बजट नहीं था। ये बजट पूरे साल का भी नहीं था। सिर्फ साढ़े सात महीने का। 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक का। लेकिन बोझ ऐसा, मानो कई सालों की समस्याएं एक साथ आ गई हों। ये बजट सिर्फ पैसों का हिसाब नहीं था, बल्कि ये उस संघर्ष की कहानी थी, जिसमें एक नया देश अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था।

सबसे पहले बात करते हैं रेलवे की। आज हमें रेलवे टिकट बुकिंग, देरी या किराए की शिकायत होती है। लेकिन 1947 में रेलवे सिर्फ सफर का साधन नहीं थी। वो देश की धड़कन थी। अनाज, कोयला, फौज, शरणार्थी—सब कुछ रेलवे पर ही निर्भर था। और बंटवारे ने इस जीवनरेखा को लगभग तोड़ दिया था। 1947 का बंटवारा रेलवे के लिए किसी भूकंप से कम नहीं था। कई अहम रेल रूट अचानक सीमा के उस पार चले गए। ट्रेनें, जो कल तक लाहौर या कराची तक जाती थीं, आज अचानक इंटरनेशनल बॉर्डर पर रुकने लगीं। सिग्नल सिस्टम गड़बड़ा गया। शेड्यूल बिखर गए। मालगाड़ियां अटक गईं। और सबसे बड़ी समस्या—कर्मचारियों का पलायन।

रेलवे बजट के दस्तावेज बताते हैं कि करीब 1,26,300 रेलवे कर्मचारियों ने पाकिस्तान से भारत आने का विकल्प चुना। इनमें से लगभग 1,08,400 कर्मचारी भारत पहुंच चुके थे या अपनी आमद की सूचना दे चुके थे। सोचिए, ये सिर्फ संख्या नहीं है। ये 1,08,400 परिवार हैं, जिनको नई जगह बसाना था, नई पोस्टिंग देनी थी, और काम पर लगाना था। और हैरानी की बात ये कि इनमें से करीब 1,04,000 कर्मचारियों को नई पोस्टिंग भी दे दी गई थी। वो भी ऐसे वक्त में, जब दफ्तर, आवास और संसाधन खुद संकट में थे।

दूसरी तरफ, करीब 83,000 कर्मचारी भारत से पाकिस्तान जाने का विकल्प चुन चुके थे। यानी रेलवे का पूरा मानव संसाधन ही उलट-पुलट हो गया था। जिन लोगों ने सालों तक एक ही रूट पर काम किया था, वो अचानक अनजान जगहों पर भेजे जा रहे थे। प्रशासन के लिए ये किसी nightmare से कम नहीं था।

लेकिन इंसानों के साथ-साथ रेलवे की सबसे बड़ी समस्या थी—कोयला। 1946 के दौरान ही कोयले की ढुलाई में तेज गिरावट आ चुकी थी। बंटवारे के बाद हालात और बिगड़ गए। कोयले के बिना ट्रेनें नहीं चल सकतीं। फैक्ट्रियां नहीं चल सकतीं। बिजली उत्पादन ठप पड़ सकता था। रेलवे खुद अपने इंजन चलाने के लिए कोयले को तरस रही थी।

एक और तकनीकी लेकिन बेहद अहम समस्या थी वैगनों का टर्नअराउंड टाइम। जो माल ढोने वाला डिब्बा पहले 9 से 10 दिन में अपना चक्कर पूरा कर लेता था, अब उसे 14 से 15 दिन लगने लगे। इसका मतलब था कि बिना एक भी नया डिब्बा जोड़े, रेलवे की असली क्षमता 40 से 50 फीसदी तक घट गई थी। यानी सिस्टम वही था, लेकिन आउटपुट आधा रह गया था।

इसी बीच रेलवे पर एक और जिम्मेदारी आ पड़ी—शरणार्थियों की। लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आ रहे थे। अपने सिर पर गठरी, हाथ में बच्चों की उंगलियां और आंखों में डर। ट्रेनें राहत और बचाव का साधन बन चुकी थीं। सामान्य यात्री सेवाएं कम करनी पड़ीं, क्योंकि प्राथमिकता इंसानी जान थी। रेलवे घाटे में जा रही थी, लेकिन उसे चलना ही था। क्योंकि अगर ट्रेनें रुक जातीं, तो देश रुक जाता।

अब आते हैं उस वित्तीय विवाद पर, जिसने आज़ाद भारत के First budget को और जटिल बना दिया। बंटवारा सिर्फ जमीन का नहीं था। रेलवे की संपत्तियां, डिब्बे, इंजन, वर्कशॉप, और उससे जुड़ा कर्ज—सब कुछ बांटना था। सवाल था—किस आधार पर? भारत का कहना था कि बंटवारा बुक वैल्यू माइनस डेप्रिसिएशन के आधार पर होना चाहिए। यानी कागजों में जो कीमत है, उसमें से घिसावट घटाकर। पाकिस्तान का तर्क अलग था। उनका कहना था कि बंटवारा रेलवे की कमाई की क्षमता के आधार पर होना चाहिए। यानी कौन सा हिस्सा कितना पैसा कमा सकता है।

फर्क सिर्फ तकनीकी नहीं था, फर्क सैकड़ों करोड़ का था। अगर भारत की बात मानी जाती, तो भारत पर करीब 660 करोड़ रुपये की पूंजी देनदारी आती और पाकिस्तान पर करीब 150 करोड़। लेकिन अगर पाकिस्तान का फॉर्मूला लागू होता, तो भारत का बोझ बढ़कर 757 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता था। उस दौर में ये रकम पहाड़ जैसी थी। मामला इतना उलझा कि इसे आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल तक ले जाना पड़ा।

अब ज़रा उस दौर के खजाने की हालत समझिए। अंग्रेज़ भारत छोड़ते वक्त खजाना भरकर नहीं गए थे। ऊपर से बंटवारे में पाकिस्तान को तय हिस्सा देना था। शरणार्थियों के पुनर्वास पर भारी खर्च हो रहा था। दंगों से तबाह शहरों को फिर से बसाना था। नई सरकार, नए मंत्रालय, नई व्यवस्थाएं—हर चीज़ पर पैसा चाहिए था। लेकिन आमदनी सीमित थी।

ऐसे में आज़ाद भारत का First budget पेश किया गया। First budget पूरे साल का नहीं, सिर्फ साढ़े सात महीने का था। लेकिन इसमें अनिश्चितता इतनी थी कि कई खर्चों का अंदाज़ा तक नहीं लगाया जा सकता था। सरकार जानती थी कि खर्च बढ़ेंगे, लेकिन कितना—ये कोई नहीं जानता था। रेलवे खुद घाटे में थी। इसलिए उससे आम बजट को कोई बड़ी मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी। उल्टा रेलवे पर खर्च बढ़ रहा था। कर्मचारियों की नई सेवा शर्तें, वेतन से जुड़े मसले, कोयले और अनाज की बढ़ती कीमतें—सबने रेलवे की कमर तोड़ दी थी।

सरकार के पास विकल्प बहुत सीमित थे। या तो घाटा बढ़ने दिया जाए, या फिर आम जनता पर बोझ डाला जाए। आखिरकार एक मुश्किल फैसला लिया गया। रेलवे किरायों और माल भाड़े में बढ़ोतरी की गई। खासतौर पर कोयला, लोहा-इस्पात और जरूरी सामान की ढुलाई से ज्यादा Revenue जुटाने की योजना बनी। ये फैसला लोकप्रिय नहीं था, लेकिन हालात ने मजबूर किया।

ये वही दौर था, जब देश सीख रहा था कि आज़ादी का मतलब सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। सरकार जानती थी कि हर फैसला किसी न किसी को चोट पहुंचाएगा। लेकिन अगर रेलवे नहीं बचती, तो देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौट पाती। आज पीछे मुड़कर देखें, तो 1947 से 48 का First budget हमें सिर्फ आंकड़े नहीं देता, बल्कि एक mindset दिखाता है। एक ऐसा mindset, जहां सरकार और सिस्टम ने स्वीकार किया कि हालात खराब हैं, लेकिन हार मानना विकल्प नहीं है। संसाधन कम थे, लेकिन इरादे मजबूत थे।

रेलवे को दोबारा खड़ा करने की कोशिश शुरू हो चुकी थी। कर्मचारियों को समायोजित किया गया। सप्लाई चेन को धीरे-धीरे पटरी पर लाया गया। पाकिस्तान के साथ वित्तीय विवादों को सुलझाने की कोशिशें चलती रहीं। और सबसे बड़ी बात—देश ने रुकना नहीं चुना। इस First budget में कोई बड़े सपने नहीं थे। कोई लोकलुभावन घोषणाएं नहीं थीं। ये बजट ambition का नहीं, survival का बजट था। ये उस दौर की सच्चाई थी, जब सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य था—देश को टूटने से बचाना।

आज जब हम बजट को टैक्स स्लैब, छूट और योजनाओं के नजरिए से देखते हैं, तो 1947 से 48 का बजट हमें याद दिलाता है कि कभी बजट का मतलब सिर्फ एक था—देश को ज़िंदा रखना। बंटवारे का बोझ, रेलवे का संकट और 660 करोड़ रुपये की देनदारी—इन सबके बीच भारत ने अपनी पहली आर्थिक परीक्षा दी।

और शायद यहीं से भारत की आर्थिक यात्रा की असली शुरुआत हुई। एक ऐसी यात्रा, जो खाली खजाने से शुरू होकर आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। इसलिए आज़ाद भारत का First budget सिर्फ इतिहास नहीं है। ये उस जज्बे की कहानी है, जिसने कहा—हालात कितने भी खराब क्यों न हों, देश को आगे बढ़ना ही है।

Conclusion

देश आज़ाद हुआ था, लेकिन खजाना खाली, रेलवे ठप और बंटवारे का दर्द ताज़ा। डर ये था कि क्या नया भारत संभल भी पाएगा? और जिज्ञासा यही कि पहले बजट ने इस संकट से देश को कैसे निकाला? आजादी के तुरंत बाद पेश हुआ भारत का First budget सिर्फ साढ़े सात महीने का था। रेलवे, जो देश की जीवनरेखा थी, बंटवारे से टूट चुकी थी—कर्मचारी पलायन कर रहे थे, कोयले की सप्लाई घटी और माल ढुलाई की क्षमता 40 से 50% तक गिर गई।

ऊपर से पाकिस्तान के साथ रेलवे संपत्तियों और कर्ज का झगड़ा, जिसमें भारत पर 660 करोड़ रुपये का बोझ आया। लाखों शरणार्थियों को ढोती रेलवे खुद घाटे में थी। मजबूरी में सरकार ने किराया और माल भाड़ा बढ़ाया। यह बजट सिर्फ हिसाब-किताब नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी था, जहां कम संसाधनों में बड़े हौसले से नए भारत की नींव रखी गई।

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