Dollar की गिरती बादशाहत! भारत-चीन की ताकत से बढ़ रहा है अमेरिका का डर I 2025

सोचिए… वो हरी-हरी नोटों की चादर, जिस पर दुनिया ने दशकों तक भरोसा किया, जिसकी चमक ने देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मोहित किया, आज उसके रंग फीके पड़ने लगे हैं। वो मुद्रा, जिसे कभी ताकत का प्रतीक माना जाता था, आज अपने ही घर में सवालों के घेरे में है। अमेरिकी Dollar, जिसे लोग ‘ग्लोबल करंसी किंग’ कहते थे, अब अपने सिंहासन पर असहज बैठा है।

जैसे कोई बूढ़ा बादशाह, जो जानता है कि उसकी ताकत का समय खत्म हो रहा है, और एक नया युग दस्तक दे रहा है। ये सिर्फ अर्थशास्त्र की कहानी नहीं, ये उस सत्ता-संघर्ष की गाथा है, जिसमें भारत और चीन जैसे नए दावेदार मैदान में उतर चुके हैं—और इस बार उनका इरादा सिर्फ हिस्सेदारी का नहीं, बल्कि पूरे खेल के नियम बदलने का है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि अमेरिकी अर्थशास्त्री जेराल्ड सेलेन्ते की आवाज़ इस बदलते दौर की गूंज को और तेज़ कर देती है। एक इंटरव्यू में उन्होंने सीधे शब्दों में कहा—”Dollar का दबदबा खत्म हो रहा है।” उनकी आंखों में वो यकीन था, जो आंकड़ों और अनुभव से आता है।

उनका मानना है कि भारत और चीन जैसे देश अब आर्थिक रूप से पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं, और इस ताकत के पीछे सिर्फ उत्पादन या Export नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की ठोस रणनीति है। उन्होंने साफ कहा—”ब्रिक्स देश अमेरिकी विदेश नीति का विरोध कर रहे हैं और ये एक ऐतिहासिक मोड़ है।” ब्रिक्स—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—आज वो पांच नाम हैं, जिनके पास दुनिया की 40% आबादी और वैश्विक उत्पादन का बड़ा हिस्सा हैI

यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका अपने पुराने तरीकों—टैरिफ, प्रतिबंध और आर्थिक दबाव—का इस्तेमाल करके अपने विरोधियों को रोकने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगा दिया। वजह? भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था।

ये कदम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा; ब्राजील को भी इसी तरह की सजा दी गई। एक पल के लिए सोचिए—जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपने पुराने व्यापारिक साझेदारों पर आर्थिक हथियार तान दे, तो वो किस डर को महसूस कर रही होती है? जवाब छिपा है उस बदलते संतुलन में, जहां अब अमेरिका का ‘मैं कहूं और तुम मानो’ वाला दौर खत्म हो रहा है।

क्यूबा-अमेरिकी पत्रकार रिक सांचेज ने एक पॉडकास्ट में सेलेन्ते से वही सवाल पूछा, जो हर किसी के मन में था—भारत अमेरिकी दबाव के बावजूद रूसी तेल क्यों खरीद रहा है? सेलेन्ते मुस्कुराए और बोले—”क्योंकि उनके जीडीपी का केवल 2% ही अमेरिका के साथ व्यापार से आता है, बस इतना ही।”

उन्होंने अपनी बात को और गहराई में ले जाते हुए कहा—”भारत अब ज्यादा आत्मनिर्भर हो रहा है। वो अपने उत्पाद खुद बना रहा है और अपने ही बाजार में बेच रहा है।” ये सुनते ही मन में एक ऐतिहासिक तस्वीर उभरती है—20वीं सदी का अमेरिका, जब वो भी आत्मनिर्भर था, जब उसके किसान और फैक्ट्रियां अपने देश की जरूरतें खुद पूरी करती थीं, और विदेशी दबाव का सवाल ही नहीं उठता था। आज वही मॉडल भारत में लौट रहा है, और यही अमेरिका के लिए चिंता का कारण है।

भारत की यह आत्मनिर्भरता महज एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक मानसिकता का परिवर्तन है। दशकों तक भारत को एक ‘डेवलपिंग नेशन’ कहकर उसके फैसलों को निर्देशित करने की कोशिश की गई। लेकिन अब 140 करोड़ लोगों का यह देश अपनी शर्तों पर व्यापार करता है, चाहे वो तेल हो, तकनीक हो या रक्षा सौदे। और यही अमेरिका को चुभ रहा है—क्योंकि इसका मतलब है कि डॉलर और अमेरिकी बाजार की ‘लत’ अब भारत छोड़ रहा है।

सेलेन्ते का विश्लेषण यहीं नहीं रुकता। वे चीन की तरफ इशारा करते हैं और याद दिलाते हैं कि एक समय था जब चीन के पास न भारी उद्योग था, न उच्च तकनीक की क्षमता। लेकिन पश्चिमी कंपनियों के वहां जाने के बाद, चीन ने न सिर्फ सीखा, बल्कि दुनिया में कई क्षेत्रों में नेतृत्व हासिल कर लिया। इलेक्ट्रिक व्हीकल का उदाहरण लें—आज चीन इस सेक्टर में सबसे आगे है। सेलेन्ते कहते हैं—”चीन अब आत्मनिर्भर है, और यही चीज उसे अजेय बना रही है।” यहां असली खतरा ये है कि अगर भारत और चीन दोनों आत्मनिर्भर हो गए, तो दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और उत्पादन केंद्र अमेरिका के नियंत्रण से बाहर हो जाएगा।

फिर सवाल उठता है—अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो दूसरे देशों के आर्थिक फैसलों में दखल दे? सेलेन्ते का जवाब सीधा था—”कोई अधिकार नहीं।” उनकी आवाज में निराशा भी थी और गुस्सा भी। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका का ये रवैया अब पुराना हो चुका है और दुनिया इससे तंग आ चुकी है। एक समय था जब अमेरिकी शक्ति को सम्मान के साथ देखा जाता था, लेकिन अब कई देशों के लिए यह बोझ बन चुकी है।

ब्रिक्स देशों का रुख इस नाराजगी को और मजबूत करता है। 40% से ज्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह समूह अब अमेरिकी नीतियों को चुनौती दे रहा है। सेलेन्ते के शब्दों में—”दुनिया ऊब चुकी है।” फिर उन्होंने आंकड़े गिनाए—”भारत में 140 करोड़ लोग, चीन में भी 140 करोड़। अमेरिका में सिर्फ 34.70 करोड़।” यह तुलना अपने आप में बताती है कि जनसंख्या, उत्पादन क्षमता और बाजार के मामले में भारत और चीन कितने विशाल हैं।

और अब सबसे अहम सवाल—डॉलर का क्या होगा? सेलेन्ते का दावा है—”डॉलर की मौत शुरू हो चुकी है।” उन्होंने अमेरिकी मौद्रिक नीतियों, खासकर 2018 में ट्रंप के ब्याज दरों को घटाने के फैसले को इस पतन का एक बड़ा कारण बताया। उनके मुताबिक, “अमेरिकी अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है, और डॉलर के लिए यह एक धीमा लेकिन तयशुदा अंत है।” यह अंत कैसा होगा, यह शायद अभी कोई नहीं जानता, लेकिन इतना तय है कि जो भरोसा कभी डॉलर पर था, वो अब दरकने लगा है।

ब्रिक्स का एजेंडा भी यही दिखाता है—वे अपने व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए काम कर रहे हैं। यह केवल आर्थिक कदम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है—”हम अपने पैसों से, अपनी शर्तों पर व्यापार करेंगे।” इस बदलाव का असर इतना बड़ा हो सकता है कि आने वाले दशक में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का चेहरा ही बदल जाए।

इसके साथ ही, ब्रिक्स देशों की रणनीति पश्चिमी संस्थानों—जैसे IMF और वर्ल्ड बैंक—से दूरी बनाने की है। दशकों से इन संस्थानों के जरिए अमेरिका ने नीतियां तय करवाईं, शर्तें थोपीं और देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला। लेकिन अब खेल बदल रहा है। भारत, चीन और रूस जैसे देश नए वित्तीय ढांचे और पेमेंट सिस्टम बना रहे हैं, जिनमें डॉलर की जरूरत नहीं होगी।

ये पूरी कहानी एक ऐसे मोड़ पर है, जहां अमेरिका को तय करना होगा कि वो अपने पुराने अहंकार के साथ आगे बढ़ेगा या बदलते युग के साथ खुद को ढालेगा। क्योंकि अगर उसने बदलाव नहीं किया, तो इतिहास में उसका नाम उसी तरह दर्ज होगा जैसे कभी ब्रिटिश पाउंड के पतन के साथ हुआ था—एक ऐसे साम्राज्य की कहानी, जो समय के साथ नहीं चला और ढह गया।

Conclusion

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