ज़रा सोचिए… वॉल स्ट्रीट के चमकते टावरों के बीच एक भारतीय सीईओ बैठा है, हर मीटिंग में आत्मविश्वास से बातें करता है, हर कॉन्ट्रैक्ट में करोड़ों डॉलर के सौदे करता है, और अमेरिका की सबसे बड़ी इन्वेस्टमेंट फर्म्स उसे भरोसे के साथ लोन देती हैं। हर कोई उसे “India’s Telecom Visionary” कहता है। लेकिन एक दिन अचानक सब कुछ बदल जाता है — फोन कॉल्स बंद हो जाती हैं, ऑफिस खाली मिलता है, ईमेल्स नकली निकलते हैं, और जब जांच शुरू होती है तो सामने आता है अब तक का सबसे ‘breath-taking fraud’ — एक ऐसा स्कैम जिसने BlackRock जैसी दिग्गज अमेरिकी इन्वेस्टमेंट फर्म को भी हिला दिया।
यह कहानी है Bankim Brahmbhatt की — भारतीय मूल के उस उद्यमी की, जिसने टेलीकॉम बिज़नेस के नाम पर इतना बड़ा वित्तीय जाल बुना कि अमेरिका के कर्जदाताओं को सैंकड़ों मिलियन डॉलर का नुकसान हो गया। और जब ये सारा खेल उजागर हुआ, तो बंकिम ने खुद Bankruptcy की अर्जी देकर गायब होने का रास्ता चुन लिया।
लेकिन आखिर ये शख्स कौन था? किस तरह उसने ब्लैक रॉक, बीएनपी पारिबा और दुनिया के टॉप बैंकों को मूर्ख बना दिया? और क्या यह कोई एक आदमी का खेल था, या इसके पीछे कोई बड़ा इंटरनेशनल नेटवर्क छिपा है? आइए, इस कहानी को परत दर परत समझते हैं — क्योंकि यह सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की कहानी है जो पैसे की ताकत पर आंखें बंद कर देता है।
बंकिम ब्रह्मभट्ट — यह नाम अमेरिका के वित्तीय जगत में कभी “इनोवेशन” और “ग्रोथ” का प्रतीक माना जाता था। भारत के गुजराती मूल के बंकिम ने न्यूयॉर्क में Bankai Group नाम की एक टेलीकॉम कंपनी शुरू की। उनके पास 30 साल से अधिक का अनुभव बताया गया — वो कहते थे, “हम टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर बनाते हैं, हम दुनियाभर की कंपनियों को कनेक्ट करते हैं।”
उनकी कंपनी का परिचय इतना प्रभावशाली था कि बड़े-बड़े बैंक और इन्वेस्टमेंट फर्म्स उन्हें एक “visionary entrepreneur” मानते थे। उनकी दो बड़ी कंपनियाँ थीं — Broadband Telecom और Bridgevoice Inc. ये दोनों कंपनियाँ अमेरिका, यूरोप और एशिया के टेलीकॉम ऑपरेटर्स को सेवा देने का दावा करती थीं। उनके क्लाइंट्स की लिस्ट में बड़े नाम थे — और यही बंकिम की सबसे बड़ी पूँजी थी।
लेकिन जैसा कहा जाता है, “जहाँ सबसे ज़्यादा चमक होती है, वहाँ सबसे गहरी परछाईं भी होती है।” 2020 में, जब पूरी दुनिया कोविड से जूझ रही थी और आर्थिक गतिविधियाँ ठप थीं, तभी बंकिम ने अपने बिज़नेस एक्सपैंशन के लिए नए कर्ज लेने शुरू किए। उन्होंने BlackRock की HPS Investment Partners, BNP Paribas, और कुछ अन्य अमेरिकी लेंडर्स से कहा कि उनकी कंपनियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं और उन्हें नेटवर्क अपग्रेड और इंटरनेशनल ऑपरेशन के लिए फाइनेंसिंग चाहिए।
दस्तावेज़ पर सब कुछ परफेक्ट था — बैलेंस शीट में मुनाफ़ा दिखाया गया, क्लाइंट्स की लिस्ट लंबी थी, और हर डील “secured assets” के नाम पर गारंटी के साथ थी। ब्लैक रॉक और बाकी लेंडर्स ने पहले राउंड में 38 करोड़ डॉलर का लोन मंजूर किया। फिर 2021 की शुरुआत में यह बढ़कर करीब 3,200 करोड़ रुपये हो गया। सबकुछ smooth चल रहा था — या कम से कम ऐसा दिखाया जा रहा था। लेकिन हर झूठ की तरह, इस झूठ की भी एक एक्सपायरी डेट थी।
2024 के मध्य में, HPS Investment Partners के एक कर्मचारी को कुछ ईमेल्स संदिग्ध लगे। ये ईमेल्स Bridgevoice के क्लाइंट्स की तरफ से आए लग रहे थे — लेकिन ध्यान से देखने पर पाया गया कि जिन डोमेन से ईमेल्स आए थे, वो असली नहीं थे, बल्कि कॉपी किए गए थे।
असली कंपनी की वेबसाइट थी “bridgevoice.com” लेकिन ये ईमेल्स “bridge-voice.net” जैसे फेक डोमेन से भेजे गए थे। जब लोन डॉक्युमेंट्स और क्लाइंट्स की पुष्टि शुरू हुई, तो खुलासा हुआ कि जिन ग्राहकों के नाम पर इनवॉइस जारी किए गए थे, वो या तो अस्तित्व में ही नहीं थे, या उन्होंने कभी ब्रॉडबैंड टेलीकॉम से कोई काम नहीं किया था। और यहीं से शुरू हुआ ‘अमेरिका का बंकिम ब्रह्मभट्ट स्कैंडल’।
HPS ने जब यह बात BNP Paribas और अन्य बैंकों को बताई, तो जांच गहरी हुई। पता चला कि कई “secured accounts” — यानी वो खाते जिन्हें लोन के बदले गिरवी रखा गया था — असल में सिर्फ़ कागज़ों में मौजूद थे। कंपनी की संपत्तियाँ, टॉवर्स, और इंफ्रास्ट्रक्चर — जिनका दावा किया गया था — या तो ओवरवैल्यू किए गए थे, या फिर कभी थे ही नहीं। दस्तावेज़ों में दर्ज “assets” एक लंबी बैलेंस शीट में थे — जो देखने में विस्तृत लगती थी, लेकिन वास्तव में वह एक “fictional spreadsheet” थी। एक जांचकर्ता ने बयान दिया — “यह एक ऐसा केस है, जहाँ फाइलें असली थीं, लेकिन डेटा नकली।” यह सुनकर हर बैंक हैरान रह गया।
BlackRock जैसी दिग्गज फर्म के लिए यह घटना किसी झटके से कम नहीं थी। उन्होंने तुरंत मुकदमा दायर किया — कहा गया कि बंकिम ब्रह्मभट्ट ने करीब 4,438 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है। आरोप यह था कि बंकिम ने झूठी संपत्तियाँ और गढ़े हुए क्लाइंट्स के नाम दिखाकर कर्ज हासिल किया, और फिर धीरे-धीरे यह पैसा भारत और मॉरीशस के ऑफशोर अकाउंट्स में ट्रांसफर कर दिया। यानी वह रकम जिसे गिरवी रखा गया था, उसे ही भारत भेज दिया गया।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, बंकिम का व्यवहार बदलने लगा। उन्होंने कई कॉल्स का जवाब देना बंद कर दिया, ईमेल्स का रिस्पॉन्स कम होता गया। और फिर अगस्त 2025 में, जब दबाव बढ़ा, तो उन्होंने Chapter 11 Bankruptcy के तहत दिवालियापन की अर्जी दे दी। Chapter 11 का मतलब होता है — “पुनर्गठन” यानी restructuring। कंपनी या व्यक्ति कहता है कि वो फिलहाल भुगतान करने में असमर्थ है, लेकिन आने वाले समय में पुनर्गठन के बाद चुका देगा।
लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल था — क्या यह दिवालियापन सच में आर्थिक तंगी की वजह से था, या यह “legal shield” था ताकि वे जांच से बच सकें? अदालत में दाखिल कागज़ों के अनुसार, बंकिम की कंपनियाँ — Broadband Telecom, Bridgevoice, और Bankai Group — सभी ने एक साथ bankruptcy फाइल की। न्यूयॉर्क के Garden City में उनका ऑफिस बंद पाया गया। दरवाजे पर लगा नेमप्लेट तक हटा दिया गया था। आसपास के किरायेदारों ने कहा कि पिछले कुछ हफ्तों से वहाँ कोई नहीं दिखा। यहाँ तक कि उनके घर पर भी कोई दरवाज़ा खोलने नहीं आया।
रिपोर्ट्स कहती हैं कि उसी वक्त बंकिम का LinkedIn और सोशल मीडिया अकाउंट डिलीट कर दिया गया। हर डिजिटल निशान मिटा दिया गया — मानो कोई था ही नहीं। अब अमेरिका के कानून के अनुसार, किसी भी बड़े फाइनेंशियल फ्रॉड में आरोपी को कोर्ट में उपस्थित होना होता है। लेकिन जब कोर्ट ने नोटिस भेजा, तो बंकिम “unavailable” पाए गए। कुछ रिपोर्ट्स का कहना है कि वे भारत लौट आए हैं — और अब अमेरिकी अधिकारी उनकी तलाश में हैं।
HPS और BlackRock ने अमेरिका की अदालत में कहा कि यह केस “modern corporate fraud” का सबसे जटिल उदाहरण है। क्योंकि इसमें किसी “fake product” का नहीं, बल्कि fake data economy का इस्तेमाल हुआ — नकली ईमेल्स, फर्जी बैलेंस शीट, और गढ़े हुए ग्राहक। हर लाइन में सब कुछ सही दिखता था, लेकिन हकीकत में कुछ भी नहीं था।
उनकी कंपनी की वेबसाइट अब भी एक्टिव है, लेकिन वहाँ किसी भी संपर्क नंबर का जवाब नहीं मिलता। भारत में Bankai Group के कुछ कर्मचारियों ने कहा कि “हमने बंकिम सर को महीनों से नहीं देखा।” अब सवाल उठता है — क्या यह किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा था? क्योंकि इतने बड़े पैमाने की फर्जीवाड़ा किसी अकेले व्यक्ति से मुमकिन नहीं। इसमें बैंकिंग सिस्टम, फाइनेंस ऑडिटर्स, और टेक्नोलॉजी वेरिफिकेशन के कई loopholes का इस्तेमाल हुआ।
फाइनेंस एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह केस आने वाले वर्षों तक एक “MBA-level Case Study” रहेगा — क्योंकि यह दिखाता है कि कैसे आज की डिजिटल इकोनॉमी में भी सबसे परिष्कृत सिस्टम को धोखा दिया जा सकता है।
एक रिपोर्ट में कहा गया कि बंकिम ने अपने कर्मचारियों को “संपर्क करने से मना” कर दिया था। वो कहते थे — “सभी क्लाइंट्स हमारे पार्टनर्स हैं, आप सवाल मत कीजिए।” यानी अंदर भी रहस्य का पर्दा था। अमेरिका में यह केस अब “Cross-Border Fraud Investigation” बन चुका है। भारत में भी एजेंसियाँ इसे देख रही हैं क्योंकि फंड्स का कुछ हिस्सा भारतीय बैंकों और अकाउंट्स में ट्रेस किया गया है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह “सदी के सबसे चतुर कॉर्पोरेट धोखों में से एक” है — क्योंकि इसमें ना तो हिंसा थी, ना हथियार, लेकिन चोरी हुई अरबों डॉलर की।
वॉल स्ट्रीट के लिए यह एक गहरा झटका है। ब्लैक रॉक जैसे दिग्गज जो दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन माने जाते हैं, वो भी ऐसे स्कैम का शिकार बने। और बंकिम ब्रह्मभट्ट? वो अब भी रहस्य बने हुए हैं। कुछ लोग कहते हैं — वह भारत लौटकर अपने पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में हैं। कुछ कहते हैं — उन्होंने मॉरीशस में नया ठिकाना बना लिया है। और कुछ कहते हैं — वो शायद अब कभी सामने नहीं आएंगे।
लेकिन जो भी हो, इस केस ने एक बात साबित कर दी — “हर बड़ा धोखा एक बड़े भरोसे से शुरू होता है।” बंकिम ब्रह्मभट्ट ने सिस्टम को उसी की भाषा में हराया — डेटा, डॉक्युमेंट्स और डिजिटल भरोसा। आज जब निवेशक किसी कंपनी में पैसा लगाते हैं, तो वो पूछते हैं — “क्या इस कंपनी की ऑडिटेड रिपोर्ट है?” और जवाब आता है — “हां, बिल्कुल है।” लेकिन इस केस ने दिखा दिया कि कभी-कभी रिपोर्ट असली होती है, बस कहानी झूठी होती है।
Conclusion
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