ज़रा उस पल को महसूस कीजिए, जब महीने के आख़िर में फोन पर बैंक का मैसेज आता है और बैलेंस आपकी उम्मीद से कहीं कम दिखता है। दिमाग़ में एक के बाद एक खर्च घूमने लगते हैं। घर की EMI, बच्चों की स्कूल फीस, मेडिकल खर्च, रोज़मर्रा का राशन, बिजली का बिल और फिर अचानक याद आता है कि इस महीने LIC का प्रीमियम भी कटना है।
उसी पल मन में एक सवाल उठता है कि क्या अब इस पॉलिसी को बीच में बंद कर देना चाहिए। यह सवाल बहुत साधारण लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपा खतरा बहुत बड़ा है। क्योंकि यह सिर्फ़ पैसों का फैसला नहीं है, यह उस सुरक्षा कवच को तोड़ने का फैसला है, जिसे आपने अपने परिवार के लिए सालों पहले चुना था। अक्सर लोग इस फैसले को जल्दबाज़ी में ले लेते हैं और बाद में जब हालात संभलते हैं, तब उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी।
भारत में जीवन बीमा को केवल एक फाइनेंशियल प्रोडक्ट की तरह नहीं देखा जाता। यह एक भरोसे का रिश्ता होता है, जो इंसान अपने भविष्य और अपने परिवार की सुरक्षा के साथ बनाता है। खासकर जब पॉलिसी Life Insurance Corporation of India की हो, तो लोगों को लगता है कि यह सबसे सुरक्षित विकल्प है।
पीढ़ियों से लोगों ने LIC पर भरोसा किया है, क्योंकि यह सिर्फ़ मुनाफ़े की नहीं, सुरक्षा की बात करती है। लेकिन ज़िंदगी में हालात कभी एक जैसे नहीं रहते। कभी नौकरी चली जाती है, कभी बिज़नेस में नुकसान हो जाता है, कभी अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी सामने आ जाती है। ऐसे समय में लंबी अवधि की पॉलिसी का प्रीमियम एक भारी बोझ जैसा लगने लगता है, और तभी दिमाग़ में यह ख्याल आता है कि क्यों न पॉलिसी ही बंद कर दी जाए।
यहां सबसे बड़ी गलतफहमी यही होती है कि लोग मान लेते हैं कि उन्होंने अब तक जितना प्रीमियम भरा है, वह सारा पैसा उन्हें वापस मिल जाएगा। उन्हें लगता है कि आखिर यह उनका ही पैसा है, कंपनी क्यों काटेगी। लेकिन इंश्योरेंस की दुनिया भावनाओं से नहीं, गणित और नियमों से चलती है। और यही गणित पॉलिसी सरेंडर के समय लोगों को सबसे बड़ा झटका देता है। जो रकम आपको वापस मिलती है, वह अक्सर आपकी उम्मीद से बहुत कम होती है।
जब आप अपनी पॉलिसी को उसकी तय अवधि पूरी होने से पहले ही बंद कर देते हैं और बीमा कंपनी से पैसा वापस मांगते हैं, तो इस प्रक्रिया को पॉलिसी सरेंडर कहा जाता है। इस स्थिति में कंपनी आपको जो रकम देती है, उसे सरेंडर वैल्यू कहते हैं। यह सरेंडर वैल्यू आमतौर पर आपके द्वारा भरे गए कुल प्रीमियम से काफी कम होती है। कई मामलों में लोग यह देखकर चौंक जाते हैं कि उन्होंने सालों तक पैसा भरा, लेकिन बदले में उन्हें उसका आधा या उससे भी कम हिस्सा मिला। खासकर अगर पॉलिसी शुरुआती वर्षों में सरेंडर की जाती है, तो नुकसान बहुत ज़्यादा हो सकता है।
इसके पीछे की वजह समझना ज़रूरी है। पॉलिसी के शुरुआती कुछ सालों में जो प्रीमियम आप भरते हैं, उसका बड़ा हिस्सा आपकी सेविंग के रूप में जमा नहीं होता। वह पैसा एजेंट के कमीशन, पॉलिसी जारी करने की लागत, मेडिकल जांच, अंडरराइटिंग और अन्य प्रशासनिक खर्चों में चला जाता है। यानी काग़ज़ पर भले ही आपने प्रीमियम भरा हो, लेकिन वह पैसा आपके लिए सेव नहीं हुआ। यही कारण है कि पहले दो से चार सालों के भीतर पॉलिसी बंद करना लगभग हमेशा घाटे का सौदा साबित होता है। लोग इसे तब समझते हैं, जब नुकसान हो चुका होता है।
लेकिन पॉलिसी सरेंडर करने का नुकसान सिर्फ़ पैसों तक सीमित नहीं रहता। असली और सबसे बड़ा नुकसान उस सुरक्षा का होता है, जिसके लिए आपने यह पॉलिसी खरीदी थी। जैसे ही आप पॉलिसी सरेंडर करते हैं, आपका जीवन बीमा कवरेज उसी दिन खत्म हो जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर भविष्य में आपके साथ कोई अनहोनी हो जाती है, तो आपके परिवार को कोई भी डेथ बेनिफिट नहीं मिलेगा। जिस मकसद से आपने यह पॉलिसी ली थी, वह मकसद वहीं अधूरा रह जाता है। कई लोग इस पहलू को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही वह बिंदु है, जो इस फैसले को सबसे खतरनाक बना देता है।
टर्म इंश्योरेंस के मामले में स्थिति और भी सख्त होती है। टर्म पॉलिसी में कोई सेविंग या निवेश नहीं होता। यह सिर्फ़ सुरक्षा देती है। अगर आप टर्म पॉलिसी को बीच में बंद कर देते हैं, तो न तो कवरेज बचता है और न ही एक रुपया वापस मिलता है। यानी अब तक दिया गया पूरा प्रीमियम खत्म। बहुत से लोग यह सच्चाई तब समझते हैं, जब वे किसी मुश्किल दौर में होते हैं और उन्हें एहसास होता है कि सुरक्षा का कोई सहारा अब उनके पास नहीं है।
पारंपरिक LIC पॉलिसियों जैसे एंडोमेंट या मनी-बैक प्लान में लोग बोनस और लॉयल्टी एडिशन की उम्मीद करते हैं। उन्हें लगता है कि भले ही पॉलिसी बंद करनी पड़े, लेकिन बोनस तो मिल ही जाएगा। लेकिन जैसे ही पॉलिसी सरेंडर की जाती है, ज़्यादातर मामलों में बोनस और लॉयल्टी एडिशन खत्म हो जाते हैं। वह फायदा, जो लंबे समय तक पॉलिसी चलाने से मिल सकता था, एक झटके में गायब हो जाता है। यही वजह है कि ऐसी पॉलिसियां बीच में तोड़ने पर सबसे ज़्यादा नुकसान देती हैं।
यहां एक और मानसिक जाल काम करता है। जब इंसान आर्थिक तंगी में होता है, तो उसे तुरंत कैश चाहिए होता है। सरेंडर वैल्यू उसे एक आसान समाधान जैसा दिखती है। उस वक्त वह यह नहीं सोचता कि यह समाधान कितनी बड़ी कीमत पर मिल रहा है। मान लीजिए आपने दस साल तक नियमित प्रीमियम भरा और फिर अचानक पॉलिसी बंद कर दी। उस समय आपको जो रकम मिलेगी, वह आपको थोड़ी राहत दे सकती है, लेकिन लंबे समय में यही फैसला आपको कई गुना नुकसान पहुंचा सकता है।
यहीं पर यह सवाल उठता है कि अगर प्रीमियम भरना मुश्किल हो गया है, तो क्या पॉलिसी बंद करना ही एकमात्र रास्ता है। सच्चाई यह है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। बहुत से लोग यह नहीं जानते कि पॉलिसी को बंद किए बिना भी बोझ कम किया जा सकता है। एक बेहतर विकल्प होता है पॉलिसी को पेड-अप कराना। पेड-अप का मतलब यह होता है कि आप आगे का प्रीमियम देना बंद कर देते हैं, लेकिन पॉलिसी खत्म नहीं होती। बीमा राशि कम हो जाती है, बोनस सीमित हो सकता है, लेकिन पॉलिसी मैच्योरिटी तक चलती रहती है। सबसे अहम बात यह है कि आपका कवरेज पूरी तरह खत्म नहीं होता।
कुछ LIC पॉलिसियों में लोन की सुविधा भी मिलती है। अगर आपको अचानक पैसों की ज़रूरत है, तो आप पॉलिसी सरेंडर करने के बजाय उस पर लोन ले सकते हैं। इससे आपको तुरंत कैश मिल जाता है और पॉलिसी भी चालू रहती है। भले ही लोन पर ब्याज देना पड़े, लेकिन यह नुकसान सरेंडर करने से कहीं कम होता है। यह विकल्प खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी होता है, जिनकी परेशानी अस्थायी होती है।
हाल के वर्षों में बीमा नियमों में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिससे कुछ पॉलिसियों में सरेंडर वैल्यू पहले से थोड़ी बेहतर हो गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पॉलिसी सरेंडर करना अब फायदेमंद हो गया है। यह सिर्फ़ नुकसान को थोड़ा कम करता है, खत्म नहीं करता। इसलिए किसी भी अंतिम फैसले से पहले अपनी बीमा कंपनी से सरेंडर वैल्यू, पेड-अप वैल्यू और लोन विकल्प—तीनों का पूरा हिसाब ज़रूर लेना चाहिए।
अक्सर देखा गया है कि लोग भावनाओं में या जल्दबाज़ी में पॉलिसी सरेंडर कर देते हैं और कुछ साल बाद पछताते हैं। तब उन्हें एहसास होता है कि जिस वक्त थोड़े पैसों के लिए उन्होंने पॉलिसी तोड़ी थी, उसी फैसले ने उनके परिवार की सुरक्षा को कमजोर कर दिया। उस समय दोबारा बीमा लेना भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उम्र बढ़ चुकी होती है और प्रीमियम कहीं ज़्यादा महंगा पड़ता है।
LIC जैसी पॉलिसी कोई short-term investment नहीं होती। यह एक long-term commitment होती है। इसका असली फायदा समय के साथ दिखता है। बीच में तोड़ने पर यह लगभग हमेशा नुकसान देती है। हां, कुछ मजबूरी वाले हालात हो सकते हैं, जहां सरेंडर आख़िरी विकल्प बन जाए। लेकिन इसे कभी पहला विकल्प नहीं बनाना चाहिए।
इसलिए अगली बार जब प्रीमियम का मैसेज आए और मन में पॉलिसी बंद करने का ख्याल आए, तो एक पल रुकिए। खुद से यह सवाल पूछिए कि यह फैसला सिर्फ़ आज की परेशानी के लिए है या कल की सुरक्षा के लिए। क्योंकि जीवन बीमा का असली मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि उस दिन आपके परिवार को संभालना होता है, जब आप खुद उनके साथ नहीं होंगे। याद रखिए, पॉलिसी सरेंडर करना आसान है, लेकिन उसका नुकसान धीरे-धीरे और लंबे समय तक महसूस होता है। सही फैसला वही है, जो आज की मजबूरी और आने वाले कल की सुरक्षा—दोनों के बीच संतुलन बनाकर लिया जाए।
Conclusion
सोचिए… सालों तक प्रीमियम भरते रहे, भरोसा था कि बुरे वक्त में सहारा मिलेगा। डर ये कि अचानक पॉलिसी बंद करनी पड़े तो पैसा भी डूबे और सुरक्षा भी जाए। और जिज्ञासा ये कि आखिर नुकसान कितना होगा? LIC पॉलिसी को मैच्योरिटी से पहले बंद करने को सरेंडर कहते हैं।
इसमें आपको पूरा जमा पैसा नहीं, बल्कि सिर्फ “सरेंडर वैल्यू” मिलती है, जो अक्सर उम्मीद से काफी कम होती है। शुरुआती 2 से 4 साल में पॉलिसी बंद करने पर एजेंट कमीशन और खर्चों के कारण सबसे ज्यादा कटौती होती है। इतना ही नहीं, पॉलिसी सरेंडर करते ही आपका लाइफ कवर खत्म हो जाता है—यानि परिवार की सुरक्षा भी चली जाती है। टर्म प्लान में तो पैसा वापस मिलता ही नहीं।
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