दिल्ली की सड़कों पर ठंडी सुबह है। हाथों में तख्तियां हैं, नारों की आवाज़ गूंज रही है, और चेहरों पर गुस्सा नहीं बल्कि डर साफ दिखता है। डर इस बात का कि कहीं शिक्षा का सिस्टम, जो सपनों को उड़ान देने के लिए होता है, वही किसी की पहचान पर शक करने न लग जाए।
सवाल उठता है—क्या सच में कुछ ऐसा हो गया है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर आए हैं? या फिर ये सिर्फ गलतफहमी है, जिसे राजनीति और सोशल मीडिया ने आग में घी डालकर भड़का दिया है? यही डर और यही जिज्ञासा हमें ले जाती है UGC के नए नियमों की उस कहानी तक, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी है।
जनवरी 2026। University Grants Commission यानी UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए रेगुलेशंस जारी किए। नाम सुनने में बेहद पॉजिटिव—“Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026”। यानी शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के नियम। कागज़ पर पढ़ें तो सब कुछ बहुत सुंदर लगता है।
बराबरी, निष्पक्षता, भेदभाव के खिलाफ सख्ती। लेकिन जैसे ही ये नियम ज़मीन पर आए, तस्वीर बदल गई। दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक, सामान्य वर्ग के छात्र और संगठन सड़कों पर उतर आए। सोशल मीडिया पर एक ही सवाल ट्रेंड करने लगा—“क्या अब जनरल कैटेगरी ही सबसे कमजोर बन गई है?”
असल में UGC का दावा है कि ये नियम किसी के खिलाफ नहीं हैं। इनका मकसद सिर्फ इतना है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस में किसी भी छात्र के साथ जाति, धर्म, लिंग या किसी भी पहचान के आधार पर भेदभाव न हो। भारत जैसे देश में, जहां सामाजिक असमानता की जड़ें बहुत गहरी हैं, ये मकसद अपने आप में गलत नहीं लगता। लेकिन सवाल intent का नहीं, implementation का है। और यहीं से विवाद शुरू होता है।
नए नियमों के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में Equal Opportunity Centre यानी EOC बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। ये सेंटर खासतौर पर वंचित और पिछड़े वर्गों के छात्रों की मदद के लिए होगा। पढ़ाई में दिक्कत हो, फीस की समस्या हो या भेदभाव की शिकायत—EOC हर मामले में मार्गदर्शन देगा। सुनने में ये एक supportive सिस्टम लगता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये सेंटर सिर्फ “कुछ वर्गों” के लिए ही क्यों? क्या बराबरी का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि हर छात्र के लिए एक जैसा सिस्टम हो?
इसके साथ ही हर संस्थान में Equality Committee का गठन अनिवार्य किया गया है। इस कमेटी की अध्यक्षता कॉलेज के प्रिंसिपल या यूनिवर्सिटी के कुलपति करेंगे। कमेटी में SC, ST, OBC वर्ग के प्रतिनिधि, महिलाएं और दिव्यांग सदस्य शामिल होंगे। UGC का तर्क है कि इससे हर वर्ग की आवाज़ सुनी जाएगी। लेकिन यहीं पर सामान्य वर्ग के छात्रों को आपत्ति है। उनका कहना है कि अगर किसी कमेटी में कुछ वर्गों को अनिवार्य प्रतिनिधित्व दिया जाता है, तो क्या वो कमेटी शुरू से ही neutral रह पाएगी?
सबसे ज्यादा विवाद पैदा हुआ Equality Squad को लेकर। ये एक तरह की निगरानी टीम होगी, जो कैंपस में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखेगी। मकसद ये सुनिश्चित करना है कि कहीं किसी तरह का भेदभाव न हो। लेकिन आलोचक इसे “campus surveillance” की तरह देख रहे हैं। उनका डर है कि पढ़ाई का माहौल, जो आज़ादी और खुले विचारों पर टिका होता है, कहीं शिकायतों और जांच के डर में न बदल जाए।
फिर आता है शिकायत निवारण का सबसे संवेदनशील हिस्सा। नए नियमों के अनुसार, अगर किसी छात्र ने भेदभाव की शिकायत की, तो 24 घंटे के भीतर कमेटी की बैठक बुलाना अनिवार्य होगा। जांच के बाद 15 दिनों के अंदर रिपोर्ट कॉलेज प्रमुख को देनी होगी और 7 दिनों में कार्रवाई शुरू करनी होगी। एक तरफ देखें तो ये fast-track justice है। लेकिन दूसरी तरफ सवाल उठता है—क्या इतनी जल्दी में निष्पक्ष जांच संभव है? क्या हर शिकायत genuine होगी? और अगर नहीं, तो उसका नुकसान किसे उठाना पड़ेगा?
यहीं पर विवाद का सबसे बड़ा बिंदु सामने आता है। ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायत करने पर सजा का प्रावधान था। जुर्माना, निलंबन जैसी बातें शामिल थीं। लेकिन फाइनल नियमों में ये प्रावधान हटा दिया गया। यानी अगर कोई शिकायत झूठी भी निकले, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई स्पष्ट दंड नहीं है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि यही बात उन्हें सबसे ज्यादा डराती है। उनका तर्क है कि बिना सजा के प्रावधान के, शिकायतों का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
UGC का कहना है कि झूठी शिकायत का डर दिखाकर असली पीड़ितों को चुप नहीं कराया जा सकता। उनका तर्क है कि भारत में आज भी कई छात्र भेदभाव की शिकायत दर्ज कराने से डरते हैं। अगर सजा का प्रावधान रहेगा, तो वो और पीछे हट जाएंगे। ये एक policy dilemma है—एक तरफ misuse का खतरा, दूसरी तरफ under-reporting का डर।
इस पूरे विवाद ने तब और बड़ा रूप ले लिया, जब मामला Supreme Court of India तक पहुंच गया। नए नियमों के Rule 3(c) को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करता है। यानी समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। आरोप ये है कि समानता के नाम पर कुछ वर्गों को अलग तरह से ट्रीट किया जा रहा है, जो खुद में असमानता पैदा करता है।
याचिका में ये भी कहा गया है कि ये नियम University Grants Commission Act के मूल उद्देश्य के खिलाफ हैं। UGC का काम उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना है, न कि किसी एक वर्ग को default suspect बना देना। अदालत ने फिलहाल मामले पर सुनवाई स्वीकार कर ली है, और अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है।
इधर सरकार का पक्ष अलग है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस मुद्दे को बेवजह राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। सरकार का दावा है कि नए नियम किसी भी वर्ग के खिलाफ नहीं हैं। उनका मकसद सिर्फ इतना है कि कैंपस में जवाबदेही तय हो और भेदभाव की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए। सरकार ये भी कह रही है कि बजट सत्र से पहले इस मुद्दे को हवा देकर छात्रों को गुमराह किया जा रहा है।
इस बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi और राष्ट्रपति Droupadi Murmu को भी पत्र भेजे गए हैं। पत्रों में आरोप लगाया गया है कि ये नियम जाति-आधारित विभाजन को और गहरा करेंगे। कई संगठनों का दावा है कि ऊंची जातियों के छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें “potential offender” की तरह देखा जा रहा है।
लेकिन अगर हम एक कदम पीछे हटकर देखें, तो सवाल थोड़ा बड़ा है। क्या भारत के कैंपस वाकई भेदभाव से मुक्त हैं? पिछले कुछ वर्षों में IITs, central universities और दूसरे संस्थानों से जातिगत भेदभाव की कई खबरें सामने आई हैं। कई मामलों में छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली। इन घटनाओं ने सरकार और UGC पर दबाव बनाया कि वो कुछ ठोस करें। नए नियम उसी दबाव का नतीजा भी माने जा सकते हैं।
दूसरी तरफ, ये भी सच है कि higher education पहले ही reservation, cut-offs और limited seats की वजह से तनाव में रहता है। सामान्य वर्ग के छात्रों को डर है कि ये नए नियम उनके लिए एक और layer of uncertainty जोड़ देंगे। पढ़ाई के साथ-साथ अब उन्हें ये भी सोचना पड़ेगा कि कहीं कोई शिकायत उनके करियर पर सवाल न खड़ा कर दे।
असल चुनौती balance की है। Equity और Equality के बीच का फर्क समझने की। Equity का मतलब है कि जिन्हें ज्यादा मदद की जरूरत है, उन्हें ज्यादा support मिले। Equality का मतलब है कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार हो। UGC के नए नियम equity पर ज्यादा जोर देते हैं। लेकिन critics का कहना है कि equity के नाम पर equality को कुर्बान नहीं किया जा सकता।
EOC का काम सिर्फ शिकायत सुनना नहीं होगा। उसे वंचित वर्गों के लिए योजनाओं की निगरानी करनी होगी, academic और financial सलाह देनी होगी, diversity को promote करना होगा और online complaint portal बनाना होगा। अगर सही तरीके से implement हुआ, तो ये सिस्टम कैंपस को ज्यादा inclusive बना सकता है। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल सिर्फ policing के लिए हुआ, तो माहौल बिगड़ने का खतरा भी है।
यही वजह है कि कई लोग कह रहे हैं कि सरकार और UGC को बीच का रास्ता निकालना चाहिए। झूठी शिकायत पर सजा का कोई balanced प्रावधान। जांच के लिए independent members। और सबसे जरूरी—students के बीच भरोसा। क्योंकि education trust पर चलती है, fear पर नहीं। आज की तारीख में देश दो हिस्सों में बंटा दिख रहा है। एक तरफ वो लोग हैं, जो इन नियमों को social justice की दिशा में बड़ा कदम मानते हैं। दूसरी तरफ वो हैं, जो इसे general category के खिलाफ साजिश मान रहे हैं। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
Conclusion
सोचिए… पढ़ाई का माहौल, जहां डर नहीं बल्कि भरोसा होना चाहिए, वहीं अचानक सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो जाए। डर ये कि कहीं शिकायत के नाम पर पढ़ाई ही मुश्किल न हो जाए? और जिज्ञासा ये कि आखिर UGC के नए नियमों में ऐसा क्या बदला कि दिल्ली से बिहार तक बवाल मच गया? जनवरी 2026 में UGC ने कैंपस में भेदभाव रोकने के लिए नए रेगुलेशन लागू किए।
हर कॉलेज में Equal Opportunity Center, Equality Committee, 24 घंटे में शिकायत पर सुनवाई और सख्त निगरानी—सब अनिवार्य हुआ। मकसद था SC, ST, OBC और वंचित छात्रों को सुरक्षा देना। लेकिन सबसे विवादित बदलाव ये रहा कि झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान हटा दिया गया। यहीं से जनरल कैटेगरी में डर फैल गया—गलत इस्तेमाल, तनाव और कैंपस अराजकता का खतरा। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। अब नजर सरकार और अदालत पर है—क्या नियम बदले जाएंगे या यही नया सिस्टम बनेगा?
अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
GRT Business विभिन्न समाचार एजेंसियों, जनमत और सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी लेकर आपके लिए सटीक और सत्यापित कंटेंट प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हालांकि, किसी भी त्रुटि या विवाद के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। हमारा उद्देश्य आपके ज्ञान को बढ़ाना और आपको सही तथ्यों से अवगत कराना है।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारे GRT Business Youtube चैनल पर भी विजिट कर सकते हैं। धन्यवाद!”





