ज़रा एक पल के लिए ठहरिए… टीवी स्क्रीन पर तेज़ म्यूज़िक के साथ दौड़ते ग्राफ़, सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते हैशटैग, मंचों से गूंजते भाषण और हर तरफ एक ही दावा—“India is already a global superpower.” यह सुनकर अच्छा लगता है। गर्व होता है। लगता है जैसे हम इतिहास के किसी स्वर्णिम मोड़ पर खड़े हैं। लेकिन इसी शोर के बीच एक शांत, ठहरी हुई आवाज़ आती है, जो तालियां नहीं मांगती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। यह आवाज़ है रघुराम राजन की। और वह सवाल पूछते हैं—क्या हम सच में वहां पहुंच गए हैं, या हम सिर्फ वहां पहुंचने की कल्पना में जी रहे हैं?
रघुराम राजन की बातों की सबसे खास बात यह है कि वह न तो जोश में बहते हैं और न ही निराशा फैलाते हैं। उनकी बात किसी राजनीतिक भाषण जैसी नहीं, बल्कि एक अनुभवी शिक्षक की तरह होती है, जो क्लास में बच्चों को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर बनाने के लिए सच बोलता है। वह साफ कहते हैं कि ambition होना ज़रूरी है, सपने देखना ज़रूरी है, लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब हम सपनों और हकीकत के बीच की रेखा मिटा देते हैं। जब हम यह मान लेते हैं कि हम बन चुके हैं, जबकि असल में हम अभी बन रहे हैं।
भारत को जल्दबाज़ी में महाशक्ति घोषित करना, उनके मुताबिक, सिर्फ एक शब्दों की गलती नहीं है, यह सोच की गलती है। क्योंकि जब कोई देश खुद को पहले से विजेता मान लेता है, तो वह खुद से कठिन सवाल पूछना बंद कर देता है। वह अपनी कमजोरियों पर परदा डालने लगता है। उसे लगता है कि अब सुधार की ज़रूरत नहीं, अब बस celebration का समय है। लेकिन इतिहास बताता है कि यही वह मोड़ होता है, जहां गिरावट की नींव पड़ती है।
राजन बहुत साफ शब्दों में कहते हैं—“We are not a superpower. We can become one.” इस एक वाक्य में पूरी बहस का सार छुपा है। “We are” और “We can become” के बीच सिर्फ grammar का फर्क नहीं है, बल्कि दशकों की मेहनत, discipline और धैर्य का फर्क है। Superpower कोई badge नहीं है, जो सीने पर लगा लिया जाए।
यह रोज़ के छोटे-छोटे फैसलों से बनती है, जो सालों तक दोहराए जाते हैं। आज भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी बताई जाती है। Demographic dividend—यह शब्द बहुत popular है। लेकिन राजन याद दिलाते हैं कि यही youth अगर skills के बिना, jobs के बिना, और सही education के बिना रह गई, तो यही demographic dividend एक demographic disaster भी बन सकता है। सवाल यह नहीं है कि हमारे पास कितने युवा हैं। सवाल यह है कि हम उन्हें क्या बना रहे हैं।
राजन बहुत साफ शब्दों में कहते हैं—“We are not a superpower. We can become one.” इस एक वाक्य में पूरी बहस का सार छुपा है। “We are” और “We can become” के बीच सिर्फ grammar का फर्क नहीं है, बल्कि दशकों की मेहनत, discipline और धैर्य का फर्क है। Superpower कोई badge नहीं है, जो सीने पर लगा लिया जाए।
यह रोज़ के छोटे-छोटे फैसलों से बनती है, जो सालों तक दोहराए जाते हैं। आज भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी बताई जाती है। Demographic dividend—यह शब्द बहुत popular है। लेकिन राजन याद दिलाते हैं कि यही youth अगर skills के बिना, jobs के बिना, और सही education के बिना रह गई, तो यही demographic dividend एक demographic disaster भी बन सकता है। सवाल यह नहीं है कि हमारे पास कितने युवा हैं। सवाल यह है कि हम उन्हें क्या बना रहे हैं।
राजन यह भी स्वीकार करते हैं कि भारत ने कई मोर्चों पर प्रगति की है। Economic stability बेहतर हुई है। Infrastructure पर निवेश बढ़ा है। Inflation को काबू में रखने की कोशिशें हुई हैं। यह सब achievements हैं और इन्हें नकारा नहीं जा सकता। लेकिन वह साफ कहते हैं कि इनसे संतुष्ट हो जाना खतरनाक है। क्योंकि असली चुनौती अभी बाकी है। असल चुनौती वहां है, जहां कैमरे कम जाते हैं। Classroom के अंदर, जहां teacher के पास resources कम हैं। Factory floor पर, जहां productivity global standards से पीछे है। District hospital में, जहां doctors की कमी है। Local courts में, जहां justice में सालों लग जाते हैं। Nation-building यहीं होती है, न कि सिर्फ बड़े-बड़े सम्मेलनों में।
राजन के मुताबिक, GDP growth numbers headline बन सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में power नहीं होते। Real power तब आती है, जब growth inclusive हो, sustainable हो और लोगों की जिंदगी में quality लाए। अगर growth के साथ jobs नहीं बन रहीं, productivity नहीं बढ़ रही, और skills upgrade नहीं हो रहे, तो वह growth hollow है। वह ambition और self-congratulation के बीच एक बहुत अहम फर्क बताते हैं। Ambition आपको आगे बढ़ने के लिए बेचैन रखती है। Self-congratulation आपको वहीं रोक देती है। Ambition कहती है—“अभी और बेहतर होना है।” Self-congratulation कहती है—“हम सबसे आगे हैं, अब क्या जरूरत है?” और यही सोच धीरे-धीरे complacency को जन्म देती है।
रघुराम राजन का कहना है कि एक सच्ची superpower बनने का कोई fixed deadline नहीं होता। यह कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है कि किसी calendar पर तारीख घेर दी जाए—2047 या 2050—and declare victory. Superpower बनना एक continuous process है। यह रोज़ के काम से तय होता है। उनके शब्दों में, भारत का निर्माण एक collective effort है, जो हर नागरिक को करना होगा। Soldier border पर जो करता है, teacher class में जो करता है, doctor patient के साथ जो honesty दिखाता है, bureaucrat file निपटाते समय जो integrity दिखाता है, entrepreneur innovation करते समय जो risk लेता है—यह सब nation-building का हिस्सा है। कोई shortcut नहीं है।
राजन कहते हैं कि हमें अगले 30 साल तक रोज़ मेहनत करनी होगी, तब जाकर शायद हम यह कह सकें कि अब थोड़ा आराम करने का समय है। यह बात सुनने में भारी लगती है, क्योंकि इसमें कोई instant reward नहीं है। लेकिन शायद यही सबसे ईमानदार roadmap है। आज दुनिया की नजर भारत पर है। Global supply chains बदल रही हैं। Geopolitics नई दिशा ले रही है। यह भारत के लिए एक बड़ा मौका है। लेकिन opportunity अपने आप convert नहीं होती। इसके लिए institutions को मजबूत करना पड़ता है, rule of law को भरोसेमंद बनाना पड़ता है, contracts को enforce करना पड़ता है, और businesses के लिए predictability बनानी पड़ती है।
राजन का सबसे बड़ा डर यह है कि हम global praise को अपनी असली ताकत समझ बैठें। Headlines बदलती रहती हैं। Attention आज है, कल कहीं और होगा। लेकिन अगर foundation मजबूत नहीं हुई, तो हम उसी जगह खड़े रह जाएंगे। इसलिए वह कहते हैं कि जल्दी जीत का ऐलान करने के temptation से बचना होगा। वह बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि human capital में investment सबसे जरूरी है। Schools, colleges, vocational training, healthcare—यह सब boring लग सकता है, glamorous नहीं है, लेकिन यही असली power बनाता है। Superpower का मतलब सिर्फ missiles और markets नहीं होता, superpower का मतलब strong people और strong institutions होता है।
उनकी बातों में कोई anti-national भावना नहीं है। उल्टा, यह सबसे गहरी patriotism है। क्योंकि देश से प्यार करने का मतलब सिर्फ तालियां बजाना नहीं, बल्कि उसकी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें ठीक करने की कोशिश करना भी है। सच बोलना आसान नहीं होता, खासकर तब जब माहौल celebration का हो। लेकिन progress के लिए यही जरूरी है।
भारत के पास potential है, इसमें कोई शक नहीं। Market बड़ा है, talent मौजूद है, energy और ambition की कमी नहीं है। लेकिन potential और power में फर्क होता है। Potential promise है, power performance है। और performance consistency से आती है, slogans से नहीं।
इसलिए अगली बार जब आप सुनें—“India is already a superpower”—तो एक पल रुकिए। और खुद से पूछिए—क्या हम रोज़ उस दिशा में काम कर रहे हैं, या सिर्फ उस मंज़िल की बातें कर रहे हैं? क्या हम uncomfortable सवालों से भाग रहे हैं, या उनका सामना कर रहे हैं? रघुराम राजन की खरी-खरी बातें इसलिए चुभती हैं, क्योंकि वे illusion तोड़ती हैं। लेकिन illusion टूटना जरूरी है, ताकि असली निर्माण शुरू हो सके। सपने देखिए, बड़े सपने। दुनिया के बारे में सोचिए। लेकिन आंखें खुली रखिए, ज़मीन पर पैर टिकाए रखिए। क्योंकि भारत का सफर अभी लंबा है… और शायद यही बात उम्मीद भी देती है।
Conclusion
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