Chabahar Port Deal पर अमेरिका की नई चाल — भारत के लिए सुनहरा अवसर या चुनौती? 2025

ज़रा सोचिए… अगर कोई ऐसा फैसला आए, जो देखने में तो एक सामान्य “foreign policy move” लगे, लेकिन असल में उसके पीछे छिपी हो दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक चाल — तो क्या आप उसे पहचान पाएंगे? हाल ही में अमेरिका ने ऐसा ही कुछ किया है।

उसने भारत को ईरान के Chabahar पोर्ट पर अपने काम को जारी रखने के लिए 6 महीने की सैंक्शन छूट दे दी है। सुनने में यह खबर सिर्फ़ एक लाइन की लगती है, लेकिन इसके पीछे की कहानी और मकसद उतने ही गहरे हैं जितना अरब सागर का पानी। क्योंकि यह सिर्फ़ एक बंदरगाह की बात नहीं है — यह उस भू-राजनीतिक “Golden Gate” की बात है जो आने वाले वर्षों में एशिया की शक्ति-संतुलन को बदल सकता है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को “relief” बताया, लेकिन अगर इसे ध्यान से समझा जाए, तो यह राहत से कहीं ज़्यादा एक संकेत है — एक ऐसा संकेत जो बताता है कि अमेरिका अब भारत को सिर्फ़ एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक धुरी के रूप में देख रहा है। ये वही अमेरिका है जिसने कुछ साल पहले ईरान से किसी भी तरह के संपर्क पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, और अब वही भारत को उन प्रतिबंधों से छूट दे रहा है ताकि वह Chabahar पोर्ट पर अपना ऑपरेशन जारी रख सके। सवाल उठता है — आखिर क्यों?

दरअसल, Chabahar पोर्ट कोई साधारण बंदरगाह नहीं है। यह भारत की “strategic autonomy” का जीता-जागता प्रतीक है। यह वो दरवाज़ा है जिसके ज़रिए भारत पाकिस्तान को बाईपास करके सीधे अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि इसे “Golden Gate of Central Asia” कहा जाता है। इस पोर्ट का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है।

1970 के दशक से ही यह भारत के भू-राजनीतिक सपनों का हिस्सा रहा है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय 2001 में इस प्रोजेक्ट पर पहली बार काम शुरू हुआ, लेकिन ईरान पर अमेरिकी पाबंदियों और पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे दोबारा ज़िंदा किया। और अब, 2024 में भारत और ईरान के बीच 10 साल का करार हुआ — जिसमें इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) को पोर्ट संचालन का अधिकार मिला।

इस बीच, दुनिया का राजनीतिक तापमान भी तेजी से बदल रहा है। चीन अपनी Belt and Road Initiative (BRI) के ज़रिए ग्वादर पोर्ट से लेकर अफ्रीका तक प्रभाव बढ़ा रहा है। पाकिस्तान उस BRI का अहम हिस्सा है, और यही वह बिंदु है जहाँ भारत के लिए Chabahar “counterbalance” का काम करता है। यह पोर्ट न केवल चीन-पाकिस्तान एक्सिस को जवाब देता है, बल्कि भारत को एक वैकल्पिक मार्ग भी देता है — एक ऐसा व्यापारिक कॉरिडोर जो न तो बीजिंग के प्रभाव में है और न ही वॉशिंगटन के नियंत्रण में।

अमेरिका का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय आया है जब वॉशिंगटन और नई दिल्ली एक नए “Trade Deal” के करीब हैं। व्हाइट हाउस के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि भारत के साथ नया टैरिफ फ्रेमवर्क बनाया जाए जो दोनों देशों को आर्थिक रूप से और मज़बूत करे। इस पूरी पॉलिटिकल टाइमिंग से यह साफ है कि Chabahar पर छूट सिर्फ़ एक “temporary waiver” नहीं, बल्कि एक “strategic gesture” है। अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि वह भारत की “Regional Connectivity Vision” का समर्थन कर रहा है — क्योंकि अब उसे खुद भी समझ आ गया है कि चीन का बढ़ता प्रभुत्व रोकने के लिए भारत जैसी शक्ति की ज़रूरत है।

दरअसल, इस waiver की समयसीमा 28 अक्टूबर को खत्म होने वाली थी, लेकिन भारत के आग्रह पर इसे 6 महीने के लिए और बढ़ा दिया गया। भारत ने स्पष्ट कहा कि अगर यह पोर्ट रुकता है, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया से उसका व्यापारिक संपर्क टूट जाएगा — और यह न सिर्फ भारत बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए नुकसानदायक होगा। अमेरिका ने इस तर्क को स्वीकार किया, और यही वह पल था जब भू-राजनीतिक शतरंज पर भारत ने एक चाल से पूरा बोर्ड पलट दिया। क्योंकि Chabahar सिर्फ़ बंदरगाह नहीं — यह “INSTC” यानी इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का अहम हिस्सा है, जो भारत को रूस, यूरोप और सेंट्रल एशिया से जोड़ता है।

अब सवाल उठता है — अमेरिका को इससे क्या फायदा? जवाब है “Strategic Balance.” आज अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती है चीन का बढ़ता प्रभाव — खासकर उस क्षेत्र में जिसे वो कभी “Energy Crossroads” कहा करता था। चीन अपने बेल्ट एंड रोड के ज़रिए ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की तक निवेश कर रहा है। ऐसे में अमेरिका यह नहीं चाहता कि पूरा वेस्ट एशिया चीन के प्रभाव में आ जाए। इसलिए उसने भारत को एक “Geopolitical Bridge” की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया है — ताकि भारत की मौजूदगी उस क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करे, लेकिन सीधे वॉशिंगटन के झंडे तले नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र भागीदार के रूप में।

इसका दूसरा पहलू और भी दिलचस्प है। अमेरिका जानता है कि भारत के पास चीन जैसी “Military Expansion” नहीं है, लेकिन भारत के पास “Soft Power” है — लोकतंत्र, भरोसा, और आर्थिक विकास का मॉडल। यही वजह है कि अब अमेरिकी रणनीति भारत को “trusted operator” की भूमिका में देख रही है। अमेरिका खुद ईरान से टकराव नहीं चाहता, लेकिन उसे यह भी समझ है कि अगर भारत Chabahar में सक्रिय रहेगा, तो वो क्षेत्र चीन के पूर्ण नियंत्रण में नहीं जा पाएगा।

एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया में APEC सम्मेलन के दौरान कहा — “मैं जल्द ही भारत के साथ बड़ा व्यापार समझौता करूंगा, और प्रधानमंत्री मोदी के साथ मेरा व्यक्तिगत सम्मान और रिश्ता बहुत मजबूत है।” ये बयान सुनने में एक diplomatic courtesy लग सकता है, लेकिन इस बयान के अंदर छिपा संदेश बहुत बड़ा है — ट्रंप भारत को अब सिर्फ़ एशिया के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि एशिया के “Gateway Partner” के रूप में देख रहे हैं।

भारत के लिए इसका मतलब ये है कि आने वाले वर्षों में उसे एक संतुलन साधना होगा — एक तरफ ईरान और रूस जैसे पुराने साझेदार हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप जैसे नए सहयोगी। और यही संतुलन भारत को एक “multi-aligned power” बनाता है। यही “Golden Gate” रणनीति की असली ताकत है — सबके साथ चलना, लेकिन किसी के अधीन नहीं होना।

Chabahar पोर्ट का आर्थिक महत्व भी अब तेज़ी से बढ़ रहा है। भारतीय जहाज अब यहां से सीधे अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को सामान भेज रहे हैं। अनुमान है कि आने वाले 5 सालों में इस पोर्ट से भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापार 10 गुना तक बढ़ सकता है। साथ ही, रूस भी इस पोर्ट को अपने वैकल्पिक व्यापार मार्ग के रूप में देख रहा है — खासकर तब जब पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर भारी प्रतिबंध लगाए हैं। इस लिहाज से देखें तो अमेरिका का भारत को waiver देना न केवल भारत के लिए फायदेमंद है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से रूस और ईरान के लिए भी breathing space देता है।

यह वही “multi-layered diplomacy” है, जिसमें हर देश अपने हित साध रहा है, लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के। भारत ने इस खेल को चुपचाप खेला — उसने अमेरिका को यह विश्वास दिलाया कि उसका मकसद सिर्फ़ व्यापारिक है, जबकि असल में यह भारत के “Strategic Depth” को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

लेकिन इस कहानी का एक और पहलू है — भारत के भीतर। Chabahar पोर्ट से जुड़े प्रोजेक्ट्स में अब भारतीय कंपनियाँ भी तेजी से निवेश कर रही हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों के पोर्ट अब सीधे Chabahar से जुड़ेंगे। इससे भारत का coastal trade network और मजबूत होगा, और यह “Make in India” मिशन के लिए भी बड़ा बूस्टर बनेगा।

इसके साथ-साथ अमेरिका और भारत के बीच टेक्नोलॉजी, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग भी बढ़ रहा है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह waiver केवल “पोर्ट डिप्लोमेसी” का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़े समझौते की तैयारी है — जिसमें अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक में “Strategic Counterweight” के रूप में स्थापित करना चाहता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि अब भारत “Reactive” नहीं, बल्कि “Proactive Diplomacy” की राह पर है। पहले भारत अपने हितों की रक्षा करता था, अब वह अपने हितों का विस्तार कर रहा है — और यह बदलाव अमेरिका जैसे देश भी महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि Chabahar का यह waiver “Golden Gate Strategy” के नाम से जाना जाने लगा है — क्योंकि यह सिर्फ़ व्यापार का रास्ता नहीं खोलता, बल्कि भू-राजनीति का नया दरवाज़ा खोलता है।

Conclusion

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