Russian Oil पर मंडराया संकट — ट्रंप का आख़िरी वार बना भारत-चीन की ऊर्जा परीक्षा! 2025

ज़रा सोचिए… अगर अचानक दुनिया का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बंद हो जाए, तो क्या होगा? पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, इंडस्ट्री ठप पड़ जाएगी और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल जाएगी। अब सोचिए कि ये झटका खुद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दें — और उसका निशाना सीधे भारत और चीन हों। हां, इस बार ट्रंप ने सिर्फ रूस को नहीं, बल्कि उन दो देशों की “कमज़ोर नस” को पकड़ लिया है जिनकी ऊर्जा पर पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है — भारत और चीन।

ट्रंप प्रशासन ने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए हैं। ये वही कंपनियां हैं जिनसे भारत और चीन रोज़ाना लाखों बैरल कच्चा तेल खरीदते हैं। यह सिर्फ़ एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि एक रणनीतिक वार है, जिसने दोनों एशियाई दिग्गजों को एक गहरी दुविधा में डाल दिया है। अमेरिका ने 21 नवंबर की अंतिम तारीख तय की है — उसके बाद अगर कोई देश या कंपनी इन रूसी कंपनियों से व्यापार करती पाई गई, तो उसे भी अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेलनी पड़ेगी। यानी खेल अब टैरिफ़ का नहीं, सर्वाइवल का हो गया है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस दुनिया का सबसे ज्यादा प्रतिबंधों वाला देश बन चुका है। लेकिन ट्रंप की यह चाल बाकियों से कहीं ज़्यादा खतरनाक है। यह सिर्फ रूस को नहीं, बल्कि भारत और चीन दोनों की एनर्जी लाइफलाइन को एक साथ निशाना बनाती है। चीन हर दिन लगभग 20 लाख बैरल रूसी तेल खरीदता है, जबकि भारत करीब 16 लाख बैरल। यानी रूस से निकलने वाला हर तीसरा बैरल या तो भारत जा रहा है या चीन। अब जब अमेरिका कह रहा है — “Enough, stop buying,” तो इसका असर सिर्फ मास्को पर नहीं, बल्कि नई दिल्ली और बीजिंग पर भी होगा।

अब सवाल यह है कि ट्रंप ने टैरिफ़ की बजाय प्रतिबंधों का रास्ता क्यों चुना। फर्क बड़ा है। टैरिफ़ किसी देश के उत्पाद को महंगा बनाते हैं — जिससे व्यापार मुश्किल होता है, लेकिन रुकता नहीं। प्रतिबंध व्यापार को नामुमकिन बना देते हैं। टैरिफ़ एक “economic signal” है, जबकि sanction एक financial weapon। टैरिफ़ के बावजूद आप व्यापार जारी रख सकते हैं, लेकिन प्रतिबंधों में बैंकिंग सिस्टम, बीमा, और अंतरराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन तक रोक दिए जाते हैं। यही वजह है कि इस बार भारत और चीन के लिए जोखिम कई गुना बढ़ गया है।

भारत की स्थिति अब बेहद जटिल है। आज भारत की ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 34% हिस्सा रूस से आता है। देश की बड़ी रिफाइनरियां — सरकारी और निजी दोनों — सस्ते रूसी तेल पर निर्भर हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम है Reliance Industries, जो अमेरिका के नियमों का पालन करने की बात कर रही है, और Nayara Energy, जिसमें 50% हिस्सेदारी खुद Rosneft की है। यानी भारत के भीतर ही एक ऐसा खिलाड़ी मौजूद है जो आधा भारतीय और आधा रूसी है। अब सवाल है — नयारा एनर्जी किसकी मानेगी? वॉशिंगटन की या मॉस्को की?

भारत सरकार के सामने यह एक क्लासिक “दो पाटों में फंसे” वाली स्थिति है। एक ओर रूस — जो दशकों से भारत का भरोसेमंद ऊर्जा सहयोगी है। दूसरी ओर अमेरिका — जो आज भारत का रणनीतिक साझेदार और रक्षा सहयोगी है। अगर भारत रूस से तेल खरीदता रहा, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा है। अगर खरीदना बंद किया, तो महंगाई बढ़ेगी, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और पेट्रोल के दाम जनता पर भारी पड़ेंगे। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक जोखिम भी है।

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के मुताबिक, 21 नवंबर तक के अनुबंध ही वैध होंगे। उसके बाद किसी भी तरह की नई डील या सप्लाई को गैरकानूनी माना जाएगा। इसका अर्थ है कि भारत को Alternative supply source खोजने होंगे — जैसे सऊदी अरब, यूएई या अफ्रीका। लेकिन समस्या यह है कि इन बाजारों में पहले से ही यूरोप, जापान और चीन की लाइन लगी है। यानी मांग बढ़ेगी, दाम बढ़ेंगे और हर देश को अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी।

तेल बाजार पहले से ही इस खबर पर प्रतिक्रिया दे चुका है। Brent Crude की कीमतें 66 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं, सिर्फ दो दिनों में 5% की बढ़त के साथ। क्योंकि जब दुनिया को लगता है कि सप्लाई कम होने वाली है, तो कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं। और यहां बात सीधे 3 से 4 मिलियन बैरल प्रति दिन की है — जो Global supply का लगभग 4% हिस्सा है।

भारतीय सरकारी कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation और Bharat Petroleum अब वैकल्पिक रणनीतियों पर विचार कर रही हैं। इंडियन ऑयल के एक अधिकारी ने कहा, “हम वैकल्पिक सप्लाई देख रहे हैं, लेकिन अगर सभी देश एक साथ उन्हीं स्रोतों की ओर भागेंगे, तो प्रीमियम बढ़ेगा और हमारे मुनाफे पर असर पड़ेगा।” यानी अगर रूस का तेल नहीं आया, तो तेल कहीं और से आएगा — मगर महंगा होकर।

भारत के लिए यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनयिक परीक्षा भी है। क्या भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से दूरी बनाएगा? या फिर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बचाए रखेगा? क्योंकि भारत अब ऊर्जा का सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि energy geopolitics का खिलाड़ी बन चुका है। आज अगर भारत झुकता है, तो यह संदेश जाएगा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी दबाव के आगे टिक नहीं सका।

इस साल रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। पहले यह स्थान सऊदी अरब और इराक के पास था। रूस का तेल सस्ता था, और डॉलर के बजाय रुपया-रूबल पेमेंट सिस्टम ने इसे और आसान बना दिया। भारत ने चतुराई से पश्चिमी प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कीं। लेकिन अब अमेरिका ने उसी रास्ते पर दीवार खड़ी कर दी है। क्योंकि प्रतिबंधों में सिर्फ़ तेल व्यापार नहीं रुकता, बल्कि बैंकिंग और बीमा चैनल भी बंद हो जाते हैं। अगर किसी टैंकर ने रूस से तेल उठाया, तो उसका बीमा रद्द हो सकता है और बंदरगाहों में प्रवेश नहीं मिलेगा। यह पूरी सप्लाई चेन को पंगु बना देने वाली चाल है।

ट्रंप की रणनीति केवल रूस पर दबाव डालने की नहीं है, बल्कि भारत और चीन दोनों को कमजोर करने की भी है। वे जानते हैं कि इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था Energy import पर निर्भर है। अगर उनकी सप्लाई चेन हिल जाए, तो उनका विकास भी रुक जाएगा। यही “कमज़ोर नस” है, जिस पर ट्रंप ने वार किया है।

चीन की स्थिति भी अस्थिर होती जा रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की सरकारी तेल कंपनियों — Petro China, Sinopec, CNOOC और Zhenhua Oil — ने रूसी समुद्री तेल की खरीद रोक दी है। उन्हें डर है कि अमेरिकी प्रतिबंधों में फंसने से उनकी अंतरराष्ट्रीय फंडिंग चैनल बंद हो जाएंगे। चीन रोज़ाना 14 लाख बैरल रूसी समुद्री तेल import करता था, जो अब धीरे-धीरे घट रहा है। यानी ट्रंप का यह कदम बीजिंग को भी अस्थिर कर चुका है।

भारत के लिए समस्या और गहरी है क्योंकि यहाँ तेल केवल ईंधन नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता की रीढ़ है। पेट्रोल के दाम बढ़े तो हर चीज़ पर असर पड़ता है — महंगाई, परिवहन, खाद्य पदार्थ, और अंततः जनता का गुस्सा। सरकार अभी दाम स्थिर रखे हुए है क्योंकि सरकारी रिफाइनरियां अतिरिक्त लागत खुद झेल रही हैं। लेकिन अगर रूस की सप्लाई रुक गई, तो यह संतुलन ज़्यादा दिन नहीं टिकेगा।

अब दिल्ली में एक बड़ा सवाल गूंज रहा है — क्या अमेरिका भारत को राहत देगा अगर भारत रूस से दूरी बनाए? या फिर भारत को मजबूरन महंगा तेल खरीदना पड़ेगा और अमेरिकी दबाव झेलना पड़ेगा? दोनों ही स्थितियाँ कठिन हैं। पहले में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता खत्म होती है, और दूसरे में अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का असली लक्ष्य वैश्विक ऊर्जा नियंत्रण हासिल करना है। क्योंकि जो देश दुनिया के तेल प्रवाह को नियंत्रित कर लेता है, वह राजनीति भी नियंत्रित कर लेता है। ट्रंप जानते हैं कि रूस पर सीधा सैन्य दबाव काम नहीं करेगा, लेकिन अगर रूस के सबसे बड़े खरीदार — भारत और चीन — को फंसा दिया जाए, तो मास्को की आमदनी अपने आप घट जाएगी।

भारत की रिफाइनरियां अब नए पेमेंट सिस्टम और वैकल्पिक सोर्स तलाश रही हैं। लेकिन तेल व्यापार सिर्फ़ खरीद-बिक्री नहीं, बल्कि टैंकर, बीमा, भुगतान और राजनैतिक अनुमति का जटिल नेटवर्क है। ज़रा सी चूक और पूरी प्रणाली ठहर सकती है। भारत संकेत दे रहा है कि वह किसी भी तरह स्थिर सप्लाई बनाए रखेगा, लेकिन यह कहना आसान और करना कठिन होगा।

आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि भारत और चीन इस अमेरिकी फंदे से कैसे निकलते हैं। क्या भारत पश्चिमी देशों की लाइन में खड़ा होगा, या फिर अपनी स्वतंत्र ऊर्जा नीति बनाए रखेगा? क्या चीन इस बार खुलकर रूस का समर्थन करेगा, या फिर आर्थिक मजबूरी के चलते पीछे हटेगा? ये सवाल सिर्फ़ कच्चे तेल के नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक शक्ति संतुलन के हैं।

आज रूस प्रतिबंधों में जकड़ा है, चीन अनिश्चितता में है, और भारत दुविधा में। और इस सारे खेल का सूत्रधार है — एक व्यक्ति जो हमेशा सबको चौंकाता है — डोनाल्ड ट्रंप। उन्होंने साबित कर दिया है कि अब युद्ध बंदूकों से नहीं, तेल की नलियों से लड़े जाते हैं। जिसने तेल की दिशा नियंत्रित कर ली, वही तय करेगा कि किसकी अर्थव्यवस्था चलेगी और किसकी रुकेगी।

Conclusion

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