सोचिए… ठंडी सुबह है, प्लेटफॉर्म पर सैकड़ों लोग खड़े हैं, किसी के हाथ में चाय है, किसी के चेहरे पर गुस्सा, किसी की आंखों में चिंता। अनाउंसमेंट होती है—“आपकी ट्रेन देरी से चल रही है।” लेकिन देरी कितनी? दस मिनट, एक घंटा, या पूरी रात? कोई जवाब नहीं। भीड़ में खड़ा एक लड़का बार-बार मोबाइल देखता है, लेकिन नेटवर्क है… फिर भी जानकारी नहीं है। उसी पल उसके दिमाग में एक सवाल गूंजता है—जब टैक्सी की लाइव लोकेशन दिख सकती है, तो Train की क्यों नहीं? और यहीं, इसी प्लेटफॉर्म पर, देरी से चलती एक ट्रेन ने एक ऐसा आइडिया जन्म दिया, जिसने करोड़ों भारतीयों की यात्रा हमेशा के लिए बदल दी।
भारत एक ट्रेन वाला देश है। यहां सड़कें नहीं, रेलवे लाइनें लोगों की किस्मत जोड़ती हैं। रोज़ करोड़ों लोग Train से सफर करते हैं—कोई नौकरी के लिए, कोई परीक्षा देने, कोई शादी में, कोई घर लौटने। लेकिन ट्रेन के साथ एक समस्या हमेशा से जुड़ी रही—अनिश्चितता। Train लेट है… पर कितनी लेट है, ये कोई नहीं जानता।
स्टेशन मास्टर से पूछो तो जवाब गोल-मोल। टीटी से पूछो तो वो भी बेबस। और यात्री? बस इंतज़ार। आज हमें लगता है कि मोबाइल खोलो, ऐप देखो, और सब पता चल जाता है। लेकिन आज से दस-बारह साल पहले ये सपना जैसा था। न स्मार्टफोन हर हाथ में था, न इंटरनेट हर जगह। ट्रेन की लाइव लोकेशन जानना? ये तो कल्पना से भी आगे की बात थी।
इसी दुनिया में सफर कर रहा था एक आम-सा लड़का। नाम—अहमद निजाम। कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं, कोई बड़ी विरासत नहीं। बस एक इंजीनियरिंग माइंड और आम भारतीय जैसी परेशानियां। 2015 का साल था। अहमद ट्रेन से कहीं जा रहे थे। Train घंटों लेट हो गई। प्लेटफॉर्म पर बैठे-बैठे वो परेशान हो गए। आसपास लोग गाली दे रहे थे, कोई घर फोन कर रहा था, कोई ऑफिस को मैसेज।
लेकिन सवाल वही—Train आखिर है कहां? उसी समय उनके दिमाग में एक कनेक्शन बना। उस दौर में Uber और Ola भारत में छा चुके थे। ऐप खोलो और देखो—ड्राइवर कहां है, कितनी देर में पहुंचेगा, कौन-सा रास्ता ले रहा है। अहमद ने सोचा—जब एक कार की लाइव लोकेशन दिख सकती है, तो एक ट्रेन की क्यों नहीं? आखिर ट्रेन भी तो चल रही है, किसी न किसी जगह पर है।
यहीं से एक आइडिया पैदा हुआ। छोटा सा, लेकिन खतरनाक। क्योंकि भारत में Train ट्रैक करना आसान नहीं था। न रेलवे का डेटा खुला था, न GPS हर डिब्बे में था, और न ही इंटरनेट भरोसेमंद। लेकिन अहमद ने हार नहीं मानी। उनके पास पहले से एक टेक कंपनी थी—Sigmoid Labs। डेटा, मशीन लर्निंग, और इंजीनियरिंग उनका खेल था।
उन्होंने अपनी टीम के साथ सोचना शुरू किया—अगर सिस्टम नहीं है, तो क्या हम जुगाड़ से सिस्टम बना सकते हैं? अगले कुछ महीने ट्रायल और एरर में निकल गए। एक नहीं, दो नहीं—20 से ज्यादा प्रोटोटाइप फेल हुए। कभी डेटा गलत, कभी लोकेशन गायब, कभी बैटरी ड्रेन। कई बार लगा—ये इंडिया है, यहां ये सब काम नहीं करेगा। लेकिन अहमद ने एक बात पकड़ी—मोबाइल टावर।
भारत में इंटरनेट कमजोर हो सकता है, लेकिन मोबाइल नेटवर्क लगभग हर जगह है। हर फोन हर समय किसी न किसी सेल टावर से जुड़ा होता है। अहमद को आइडिया आया—अगर ट्रेन में बैठे यात्रियों के फोन, सेल टावर से कनेक्ट हो रहे हैं, तो क्या उन सिग्नल्स से Train की मूवमेंट ट्रैक नहीं की जा सकती? ये सोच आसान थी, लेकिन इसे कोड में बदलना बेहद मुश्किल।
एक साल तक टीम ने दिन-रात काम किया। एल्गोरिदम बदले, डेटा पैटर्न समझे, हजारों ट्रेनों के रूट मैप किए। और फिर… एक दिन, सिस्टम ने सही जगह पर Train दिखा दी। बिना GPS के, बिना इंटरनेट के। बस सेल टावर डेटा से। यही था Where Is My Train का जन्म। ये ऐप किसी चमकदार लॉन्च के साथ नहीं आया।
न टीवी एड, न बड़े बिलबोर्ड। बस धीरे-धीरे, यात्रियों के बीच फैलता गया। किसी ने स्टेशन पर बताया, किसी ने व्हाट्सएप पर लिंक भेजा। लोग हैरान थे—“अरे, ये तो सच में बता रहा है Train कहां है!” खास बात ये थी कि ऐप ऑफलाइन भी काम करता था। गरीब यात्री, फीचर फोन से स्मार्टफोन पर आया नया यूजर—सबके लिए ये किसी जादू से कम नहीं था।
धीरे-धीरे ऐप में नए फीचर्स जुड़े। लाइव Train स्टेटस, प्लेटफॉर्म नंबर, कोच पोजिशन, PNR स्टेटस, सीट अवेलेबिलिटी, और सबसे कमाल—डेस्टिनेशन अलार्म। अब लोग चैन से सो सकते थे, क्योंकि फोन उन्हें जगा देता था—“आपका स्टेशन आने वाला है।” धीरे-धीरे ऐप में नए फीचर्स जुड़े। लाइव Train स्टेटस, प्लेटफॉर्म नंबर, कोच पोजिशन, PNR स्टेटस, सीट अवेलेबिलिटी, और सबसे कमाल—डेस्टिनेशन अलार्म। अब लोग चैन से सो सकते थे, क्योंकि फोन उन्हें जगा देता था—“आपका स्टेशन आने वाला है।”
यही वो मुकाम था, जहां दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों की नजर इस ऐप पर पड़ी। Google को ये आइडिया खास लगा। वजह साफ थी—ये ऐप इंटरनेट पर निर्भर नहीं था। उभरते बाजारों के लिए, जहां नेटवर्क कमजोर है, ये सोने जैसा टेक्नोलॉजी थी। 2018 में Google ने Where Is My Train बनाने वाली कंपनी को खरीद लिया। रकम? करीब 280 करोड़ रुपये। ऑफिशियल नंबर कभी घोषित नहीं हुए, लेकिन डील ने साफ कर दिया—एक प्लेटफॉर्म पर लेट हुई Train से निकला आइडिया, अब ग्लोबल स्टेज पर पहुंच चुका था।
ये सिर्फ एक अधिग्रहण नहीं था। ये एक संदेश था—अगर आप भारत की समस्या को भारत के तरीके से हल करते हैं, तो दुनिया आपको सुनेगी। Google ने इस ऐप को अपने इकोसिस्टम में शामिल किया। आज भी करोड़ों लोग इसे इस्तेमाल करते हैं, कई तो बिना ये जाने कि इसके पीछे एक देसी जुगाड़ और सालों की मेहनत छुपी है।
आज Where Is My Train के 100 मिलियन से ज्यादा डाउनलोड हैं। यानी करीब 10 करोड़ लोग। हर दिन लाखों लोग ऐप खोलते हैं, Train चेक करते हैं, और अपने सफर की अनिश्चितता को कंट्रोल में लाते हैं। ये ऐप सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं है—ये भरोसा है। अहमद निजाम ने Google में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर करीब चार साल काम किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2022 में उन्होंने Google छोड़ दिया। क्यों? क्योंकि उनके अंदर का बिल्डर अभी जिंदा था। 2023 में उन्होंने एक नया स्टार्टअप लॉन्च किया—Regain App।
इस बार समस्या अलग थी। Train नहीं, इंसान। खासकर मोबाइल की लत। Reels, Shorts, Notifications—सब मिलकर हमारे फोकस को खा रहे हैं। अहमद ने देखा कि जिस टेक्नोलॉजी ने लोगों को जोड़ा, वही उन्हें डिस्ट्रैक्ट भी कर रही है। Regain App का मकसद था—फोन का इस्तेमाल कंट्रोल करना। ऐप्स ब्लॉक करना, स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करना, और गेमिफिकेशन के जरिए फोकस बढ़ाना। आज Regain App के भी 10 लाख से ज्यादा यूजर हैं। यानी अहमद फिर से वही कर रहे हैं, जो उन्हें आता है—रियल प्रॉब्लम को पहचानना, और उसके लिए सिंपल लेकिन पावरफुल सॉल्यूशन बनाना।
Where Is My Train की कहानी हमें एक बड़ी बात सिखाती है। स्टार्टअप आइडिया अक्सर AC ऑफिस में नहीं जन्म लेते। वो प्लेटफॉर्म पर, भीड़ में, परेशानी के बीच पैदा होते हैं। फर्क बस इतना है—कुछ लोग शिकायत करते हैं, और कुछ लोग सवाल पूछते हैं—“क्यों नहीं?” अगर अहमद उस दिन Train लेट होने पर सिर्फ गुस्सा करते, तो शायद आज ये ऐप नहीं होता। लेकिन उन्होंने उस गुस्से को जिज्ञासा में बदला। और जिज्ञासा को कोड में।
जब आप अगली बार Train में बैठे हों, और फोन खोलकर लाइव स्टेटस देखें, तो एक पल के लिए सोचिए—ये सुविधा किसी लैब से नहीं, एक लेट Train से आई थी। और शायद आपकी जिंदगी का अगला बड़ा आइडिया भी, किसी छोटी-सी परेशानी के पीछे छुपा बैठा है। सवाल सिर्फ इतना है—जब आपकी “ट्रेन लेट” होगी, तो आप क्या करेंगे? इंतज़ार… या इनोवेशन?
Conclusion
सोचिए… प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, ट्रेन घंटों लेट है, कोई अनाउंसमेंट नहीं—और दिमाग में बस एक सवाल घूम रहा है, “मेरी ट्रेन आखिर है कहां?” यही झुंझलाहट एक आम यात्री अहमद निज़ाम की जिंदगी बदल देती है। 2015 में ट्रेन लेट होने के दौरान उन्होंने सोचा—जब Uber-Ola कैब को लाइव ट्रैक कर सकते हैं, तो ट्रेन क्यों नहीं? बिना भारी फंडिंग, बिना GPS, उन्होंने मोबाइल टावर डेटा का जुगाड़ लगाया और सालों की मेहनत, 20 से ज्यादा असफल प्रोटोटाइप्स के बाद बना Where is My Train App।
यह ऐप इंटरनेट के बिना भी ट्रेन की लाइव लोकेशन बताने लगा—और करोड़ों भारतीयों का भरोसेमंद साथी बन गया। 2018 में Google ने इस देसी इनोवेशन को करीब 280 करोड़ में खरीद लिया। आज इसके 100 मिलियन डाउनलोड हैं। एक लेट ट्रेन… और पैदा हो गया इंडिया का सबसे काम का ट्रैवल ऐप। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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