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Venezuela की ऊर्जा ताकत — तेल पर Trump की नज़र: 100 अरब डॉलर का सपना, लेकिन अमेरिका अपने ही साथ क्यों नहीं दे रहा?

Venezuela

आपको बता दें कि उस रात व्हाइट हाउस की लाइट्स देर तक जलती रहीं। बाहर सब कुछ शांत था, लेकिन अंदर एक ऐसा फैसला पक रहा था, जो पूरी दुनिया के एनर्जी मार्केट को हिला सकता था। बंद कमरे में बैठे थे दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों के CEO — Exxon, Chevron, ConocoPhillips जैसे नाम, और सामने थे अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump। एजेंडा सिर्फ एक था — Venezuela

वही Venezuela, जहां कुछ ही दिन पहले एक रात के ऑपरेशन में राष्ट्रपति Nicolas Maduro को हिरासत में लिया गया था। वही देश, जिसके नीचे दुनिया का सबसे बड़ा तेल खजाना दबा है। और वही देश, जिसे Trump अब सिर्फ एक failed state नहीं, बल्कि एक golden opportunity के रूप में देख रहे थे। लेकिन इस कमरे में एक अजीब तनाव था। क्योंकि Trump बोल रहे थे सपनों की भाषा में, और कंपनियां जवाब दे रही थीं डर की भाषा में।

Trump का मानना था कि इतिहास उनके सामने झुका हुआ है। उनके हिसाब से ये वो moment था, जब America न सिर्फ geopolitics में जीत सकता था, बल्कि energy market में भी absolute control हासिल कर सकता था। उन्होंने साफ कहा — Venezuela का oil infrastructure सड़ चुका है, बर्बाद हो चुका है, और सिर्फ American companies ही उसे फिर से खड़ा कर सकती हैं। उनका दावा था कि अगर ये कंपनियां वहां 100 अरब डॉलर का Investment करें, तो तेल उत्पादन ऐसे स्तर पर पहुंचेगा, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा। Trump की आवाज़ में confidence था, लेकिन उस confidence के सामने बैठे CEO के चेहरों पर hesitation साफ दिख रही थी।

Trump का गणित बेहद simple था। Venezuela से सस्ता crude निकलेगा, America पहुंचेगा, US में fuel prices नीचे आएंगे, voters खुश होंगे, और America फिर से energy king बन जाएगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि interim Venezuelan leadership के साथ, 5 करोड़ बैरल crude oil का deal पहले ही फाइनल हो चुका है, और अगर सब कुछ plan के मुताबिक चला, तो ये supply लगातार चलती रहेगी। Trump को लग रहा था कि CEO ताली बजाएंगे, हाथ मिलाएंगे और अगले ही हफ्ते rigs Venezuela भेज दिए जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

सबसे पहले चुप्पी तोड़ी Exxon Mobil के CEO Darren Woods ने। और उनके शब्द Trump के लिए किसी ठंडे पानी के छींटे से कम नहीं थे। उन्होंने सीधे कहा — Venezuela इस वक्त “uninvestable” है। एक ऐसा देश, जहां पैसा डालना मतलब खुद को आग में झोंकना। Woods ने कोई राजनीतिक भाषण नहीं दिया। उन्होंने business की भाषा में बात की। उन्होंने याद दिलाया कि Exxon की संपत्तियां Venezuela में दो बार जब्त की जा चुकी हैं। दो बार। और अब तीसरी बार वही गलती करने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति का भरोसा काफी नहीं है।

उनकी बात सुनते ही कमरे का माहौल बदल गया। Woods ने कहा कि जब तक Venezuela में governance, law और political stability में बड़े और ठोस बदलाव नहीं आते, तब तक वहां investment करना एक gamble है, business decision नहीं। यही नहीं, ConocoPhillips और Exxon दोनों ही करीब 20 साल पहले Venezuela से निकल चुके थे, जब सरकार ने उनके assets का nationalization कर दिया था। उनके लिए ये कोई नई कहानी नहीं थी। ये एक पुराना जख्म था, जो अब भी भरा नहीं था।

Chevron इस कहानी का अकेला अलग किरदार है। वो एकमात्र बड़ी American company है, जो आज भी Venezuela में किसी तरह काम कर रही है। लेकिन Chevron भी बड़े Investment को लेकर बेहद cautious है। कंपनी जानती है कि जमीन के नीचे तेल जितना भी बड़ा खजाना क्यों न हो, जमीन के ऊपर अगर chaos है, तो मुनाफा सिर्फ कागजों में ही रहता है। CEOs को डर था कि political instability, sanctions, armed groups और massive costs के चलते उनका पैसा कभी वापस ही न आए।

Trump इस resistance के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें उम्मीद थी कि सत्ता का weight और White House की ताकत CEOs को झुका देगी। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो उन्होंने अपना दूसरा पत्ता खेला। उन्होंने कंपनियों को security की guarantee देने की पेशकश की। शारीरिक सुरक्षा भी, और financial सुरक्षा भी। Trump ने कहा कि America वहां Investment करने वाली कंपनियों की पूरी हिफाजत करेगा। सेना से लेकर सिस्टम तक, सब उनके साथ होगा।

यहीं Trump ने अपना ‘unique profit formula’ सामने रखा। उन्होंने कहा — आप Investment कीजिए, जितनी जल्दी हो सके अपना पैसा निकाल लीजिए, और उसके बाद जो मुनाफा होगा, उसे Venezuela, America और कंपनियों के बीच बांट लिया जाएगा। Trump के लिए ये win-win था। कंपनियों के लिए quick recovery, America के लिए control, और Venezuela के लिए supposedly development। लेकिन आलोचकों ने इसे development नहीं, बल्कि extortion कहा।

Democratic सांसदों और policy experts का कहना था कि, America जिस तरह से Venezuelan oil tankers को समुद्र में रोक रहा है, revenues पर कब्जा जमा रहा है, और अब कंपनियों को pressure में Investment के लिए कह रहा है, वो किसी partnership जैसा नहीं, बल्कि वसूली जैसा लगता है। Energy politics अब diplomacy नहीं रही। ये direct power play बन चुकी थी।

इस पूरी कहानी के पीछे असली वजह है Venezuela की हालत। एक ऐसा देश, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा proven oil reserve है, लेकिन फिर भी उसकी हालत किसी failed economy जैसी है। 1970 के दशक में Venezuela रोज़ाना करीब 35 लाख बैरल तेल निकालता था। उस दौर में उसका oil industry दुनिया के best managed systems में गिना जाता था। लेकिन आज स्थिति ये है कि वो इसका एक तिहाई भी मुश्किल से निकाल पा रहा है। Global oil supply में उसकी हिस्सेदारी गिरकर सिर्फ 1 प्रतिशत रह गई है।

दशकों की खराब नीतियां, corruption, political interference और investment की कमी ने, इस industry को अंदर से खोखला कर दिया। Refineries जंग खा चुकी हैं। Pipelines leak करते हैं। Skilled workers या तो देश छोड़ चुके हैं या सिस्टम से बाहर हो चुके हैं। Trump administration का मानना है कि, अगर America Venezuela के oil revenue पर control नहीं करेगा, तो वही पैसा corruption, black market और anti-American activities में जाएगा।

लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ control से system ठीक हो सकता है। क्या history को ignore करके future बनाया जा सकता है। CEOs को डर है कि आज Maduro नहीं है, लेकिन कल कोई और आएगा। और अगर उसने फिर से nationalization का रास्ता चुना, तो America की सारी guarantees भी बेकार हो जाएंगी।

इस पूरी कहानी में एक और layer है — global oil market। आज दुनिया energy transition की बात कर रही है। Electric vehicles, renewables, net zero targets। ऐसे वक्त में Venezuela जैसे heavy crude producer में 100 अरब डॉलर डालना क्या सच में समझदारी है। CEOs यही सवाल पूछ रहे हैं। Trump अभी भी fossil fuel dominance में यकीन करते हैं, लेकिन corporate boards अब सिर्फ politics नहीं, balance sheets देखते हैं।

और यहीं Trump की frustration बढ़ जाती है। उनके लिए Venezuela सिर्फ तेल नहीं है। ये एक geopolitical trophy है। एक ऐसा message कि America अब backseat पर नहीं बैठेगा। लेकिन irony ये है कि जिस America First के नारे पर Trump चलते हैं, उसी America की कंपनियां फिलहाल उनका साथ देने को तैयार नहीं हैं।

इस पूरे ड्रामे का सबसे दुखद पहलू ये है कि Venezuela की जनता फिर एक बार spectator बनकर रह गई है। उनके लिए सत्ता बदली, flags बदले, players बदले। लेकिन bread की लाइन वही है। Hospitals की हालत वही है। सवाल ये है कि अगर कल American companies सच में वहां पहुंच भी गईं, तो क्या आम Venezuelan की जिंदगी बदलेगी। या फिर तेल एक बार फिर curse बनकर ही रहेगा।

Conclusion

एक रात का ऑपरेशन… बंद कमरे की मीटिंग… और दुनिया के सबसे बड़े तेल खजाने पर नजर। कहानी सुनने में फिल्मी लगती है, लेकिन यह हकीकत है। व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया की दिग्गज तेल कंपनियों को बुलाया और सीधा एजेंडा रखा—वेनेजुएला। मादुरो हिरासत में हैं, अब अमेरिकी कंपनियां वहां जाकर तेल निकालें और 100 अरब डॉलर का मेगा दांव खेलें। ट्रंप का सपना साफ है—सस्ता वेनेजुएलन ऑयल, अमेरिका की एनर्जी कीमतें नीचे, और ग्लोबल कंट्रोल मजबूत। लेकिन यहीं कहानी में ट्विस्ट है। एक्सॉन मोबिल के सीईओ ने साफ कह दिया—वेनेजुएला “Uninvestable” है।

दो बार संपत्ति जब्त हो चुकी है, तीसरी बार जोखिम नहीं। शेवरॉन भी डरी हुई है। राजनीतिक अस्थिरता, भारी लागत और डूबते Investment का डर कंपनियों को पीछे खींच रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार आज बर्बादी के कगार पर खड़ा है—और ट्रंप का प्लान, अपने ही खिलाड़ियों से साथ नहीं पा रहा।

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