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Under construction property का सुनहरा मौका — जानिए अधूरी इमारतों में छिपा निवेश का फायदा 2025

Under construction property

ज़रा सोचिए… आपने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़रीददारी की योजना बनाई है — एक घर। सपनों का घर। वो जगह, जहां दीवारें आपकी मेहनत की गवाही देती हैं, और हर कोना आपकी उम्मीदों से सजा होता है। लेकिन अब आपके सामने दो रास्ते हैं I

एक वो घर जो पहले से बना हुआ है, जहाँ आप कल ही जाकर रह सकते हैं… और दूसरा वो घर जो अभी अधूरा है, बस नक्शे में या कुछ खंभों तक सिमटा हुआ है, लेकिन सस्ता है, नया है, और आपको वो उम्मीद देता है कि कल यही आपकी पहचान बनेगा। अब सवाल ये है — क्या ये अधूरी इमारत सच में सुनहरा मौका है, या एक ऐसा जोखिम जो आपकी नींद, आपकी जेब और आपके सपनों तीनों को हिला सकता है?

भारत में हर साल लाखों लोग घर खरीदने की योजना बनाते हैं। और उनमें से एक बड़ा हिस्सा “Under Construction Property” की ओर आकर्षित होता है। वजह भी साफ है — कीमत कम होती है, डाउन पेमेंट कम देना पड़ता है, और EMI भी manageable लगती है। लेकिन हर फायदेमंद लगने वाली चीज़ के साथ एक “fine print” होती है, और रियल एस्टेट की इस fine print में छिपे होते हैं वो खतरे, जिनकी कीमत कई बार करोड़ों में चुकानी पड़ती है।

घर खरीदना केवल एक Investment नहीं होता — ये एक भावना होती है। कई लोग इसके लिए अपनी सारी savings लगा देते हैं, कुछ लोग होम लोन लेकर 20 से 25 साल तक EMI भरने का वादा करते हैं। लेकिन क्या ये वादा उस बिल्डर पर भरोसा करके करना सही है, जिसकी प्रोजेक्ट साइट पर सिर्फ़ धूल और अधूरे ढांचे खड़े हों?

अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी का सबसे बड़ा आकर्षण होता है इसकी कीमत। रेडी-टू-मूव घर की तुलना में इसकी लागत लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। यानी अगर रेडी फ्लैट की कीमत 1 करोड़ है, तो वही अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में आपको 70 से 80 लाख में मिल सकता है। सुनने में लुभावना है — लेकिन सस्ता हमेशा बेहतर नहीं होता।

क्योंकि रियल एस्टेट में “समय ही पैसा” होता है। और अगर प्रोजेक्ट देर से पूरा हुआ, तो वही सस्ता घर आपको सबसे महंगा पड़ सकता है। भारत में पिछले एक दशक में ऐसे हजारों प्रोजेक्ट हैं जो वक़्त पर पूरे नहीं हुए। कई बिल्डर दिवालिया हो गए, कई ने फंडिंग रोक दी, और कई जगह तो सरकारी मंज़ूरियों में ही प्रोजेक्ट अटक गए। ऐसे में खरीदार फँस जाता है — घर नहीं मिलता, EMI चलती रहती है, और ऊपर से किराया भी देना पड़ता है।

ज़रा सोचिए — आपने 50 लाख का लोन लिया, EMI 40,000 है, और घर अभी तैयार नहीं है। आप किराए पर रह रहे हैं — वहाँ भी 20,000 किराया। मतलब हर महीने 60,000 जेब से जा रहा है, और बदले में न घर है, न राहत। यही वो जाल है जिसमें हर साल हज़ारों मिडिल-क्लास परिवार फँसते हैं।

वहीं अगर बात रेडी-टू-मूव-इन घर की करें, तो उसमें यह खतरा नहीं होता। घर तैयार है, आप देख सकते हैं, उसमें रह सकते हैं। EMI देते हैं तो कम से कम छत तो आपकी होती है। कोई अनिश्चितता नहीं कि “अगले साल मिलेगा” या “construction delay चल रहा है।”

लेकिन फिर सवाल ये उठता है कि अगर रेडी घर इतने सुरक्षित हैं, तो लोग अंडर कंस्ट्रक्शन क्यों चुनते हैं? इसका जवाब है “बजट और लचीलापन।” रेडी घर में एकमुश्त बड़ी रकम चाहिए — डाउन पेमेंट, रजिस्ट्रेशन, टैक्स, इंटीरियर — सबकुछ एक साथ। जबकि अंडर कंस्ट्रक्शन में पेमेंट चरणों में होती है। मतलब आपको एकदम से पूरा पैसा नहीं देना पड़ता, जैसे-जैसे निर्माण बढ़ता है, वैसे-वैसे भुगतान करना होता है।

इसके अलावा, अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में आपको डिज़ाइन और लेआउट कस्टमाइज करने का मौका मिलता है। आप फर्श से लेकर दीवारों के रंग तक अपनी पसंद से तय कर सकते हैं। वहीं रेडी घर में आप केवल “जो है” वही स्वीकार करते हैं। लेकिन यह आज़ादी भी तभी तक अच्छी है, जब तक प्रोजेक्ट पूरा हो।

अब ज़रा टैक्स बेनिफिट की बात करें — जो अक्सर लोग overlook कर देते हैं। Income Tax Act के तहत, होम लोन पर ब्याज की छूट तभी मिलती है जब निर्माण पूरा हो जाता है और कब्जा मिल जाता है। अगर बिल्डर ने देरी कर दी और पाँच साल से ज़्यादा लग गए, तो ब्याज पर मिलने वाली टैक्स छूट 2 लाख से घटकर सिर्फ़ 30,000 रह जाती है।

यानी जो फायदा आप सोच रहे थे, वो आधे से भी कम रह जाता है। और यही नहीं — अगर आपने घर बीच में ही बेचने का फैसला किया, जबकि कब्जा मिला ही नहीं था, तो प्री-EMI पर मिला टैक्स बेनिफिट भी वापस लेना पड़ता है। यानी आर्थिक तौर पर यह डबल झटका है।

लेकिन अब दूसरी तरफ़ भी देखें — अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में शुरुआती लाभ भी हैं। जैसे — आप comparatively कम पैसे में बड़ी लोकेशन पा सकते हैं। कई बार बिल्डर pre-launch ऑफर में आकर्षक छूट देते हैं।

साथ ही, नए प्रोजेक्ट्स में मॉडर्न सुविधाएँ — जैसे जिम, स्विमिंग पूल, क्लबहाउस, और स्मार्ट सिक्योरिटी सिस्टम — भी शामिल होते हैं, जो पुराने रेडी घरों में नहीं मिलते। तो सवाल ये नहीं कि अंडर कंस्ट्रक्शन बुरा है या रेडी घर बेहतर। असली सवाल ये है — क्या आप रिस्क उठा सकते हैं?

अगर आप एक first-time buyer हैं, और आपकी पूरी savings इसी घर में जा रही है, तो अधूरी इमारत से दूर रहना ही बेहतर है। क्योंकि आपके पास समय, अनुभव और फाइनेंशियल कुशन — तीनों की कमी होगी। लेकिन अगर आप एक seasoned investor हैं, जिसके पास पहले से घर है, और आप long-term capital gain के लिए Investment करना चाहते हैं, तो अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी सही विकल्प हो सकती है।

भारत में अब RERA (Real Estate Regulation Act) के बाद हालात पहले से बेहतर हुए हैं। अब हर प्रोजेक्ट को रजिस्ट्रेशन नंबर, मंज़ूरी, टाइमलाइन और अपडेट देना अनिवार्य है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं। कई बार बिल्डर RERA में पंजीकृत होते हुए भी डेडलाइन आगे बढ़ा देते हैं, और खरीदारों के पास अदालत का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।

इसलिए, अगर आप अंडर कंस्ट्रक्शन घर खरीदने जा रहे हैं, तो तीन चीज़ें ज़रूर जांचें — पहला, बिल्डर की साख — उसने पहले कौन से प्रोजेक्ट पूरे किए, क्या समय पर कब्जा दिया? दूसरा, बैंक टाई-अप — क्या प्रोजेक्ट किसी राष्ट्रीयकृत बैंक से अप्रूव्ड है? अगर है, तो इसका मतलब फंडिंग विश्वसनीय है। तीसरा, कानूनी दस्तावेज़ — RERA सर्टिफिकेट, एनओसी, और भूमि स्वामित्व की जानकारी ज़रूर देखें।

कई बार लोग सिर्फ़ “मॉडल फ्लैट” देखकर फँस जाते हैं — जो असली निर्माण से बिल्कुल अलग होता है। चमचमाती दीवारें, पॉलिश्ड फर्श, और खूबसूरत लाइटिंग आपको सपना दिखाती हैं, लेकिन असलियत में वही घर अधूरा, सीलन भरा या छोटा निकल सकता है।

अब बात करें मनोवैज्ञानिक पहलू की। रेडी-टू-मूव घर में आपको instant satisfaction मिलती है — एक पूरा घर, रहने की जगह, एक उपलब्धि का अहसास। वहीं अंडर कंस्ट्रक्शन घर में इंतज़ार, अनिश्चितता और चिंता होती है। हर महीने EMI देने के बावजूद, आप सोचते हैं — “पता नहीं कब मिलेगा घर।” यह स्ट्रेस न सिर्फ़ आर्थिक, बल्कि मानसिक बोझ भी बन जाता है।

फिर भी, कुछ लोगों के लिए ये “अधूरी इमारत” सुनहरा मौका साबित होती है। अगर सही बिल्डर चुना जाए, सही लोकेशन मिले, और टाइमलाइन पर कब्जा मिले, तो ऐसी प्रॉपर्टीज़ का वैल्यूएशन कुछ सालों में दोगुना भी हो सकता है। मसलन, गुरुग्राम, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों में जो प्रोजेक्ट 2018 में लॉन्च हुए थे, उनकी आज कीमतें 60 से 80% तक बढ़ चुकी हैं।

यानी रिस्क है, लेकिन reward भी है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि आप तैयारी से चलते हैं या अंधविश्वास से। कई बार लोग कहते हैं — “भाई, नया प्रोजेक्ट है, कीमत कम है, जल्दी बुक कर लो।” लेकिन वे यह नहीं सोचते कि बिल्डर के पास फंडिंग है या नहीं, उसकी मंज़ूरी किस स्तर पर है, और सबसे ज़रूरी — क्या उसके पिछले प्रोजेक्ट्स वक़्त पर पूरे हुए थे। रियल एस्टेट में भरोसा, अनुबंध से ज़्यादा मायने रखता है।

अब एक और पहलू समझिए — location dynamics। रेडी घर आम तौर पर developed एरिया में होते हैं, जहाँ सब कुछ मौजूद है — स्कूल, अस्पताल, मॉल, मेट्रो। जबकि अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी अक्सर developing लोकेशन में होती है, जहाँ भविष्य में development की संभावना होती है। यानी रेडी घर “present convenience” देता है, जबकि अधूरा घर “future potential।”

तो आप किसे चुनते हैं — आज की सुविधा या कल का मौका? अगर आपका लक्ष्य “रहना” है, तो रेडी घर सही है। अगर आपका लक्ष्य “investment” है, तो अंडर कंस्ट्रक्शन सोच-समझकर चुन सकते हैं। लेकिन याद रखिए, हर सस्ता सौदा असल में सस्ता नहीं होता।

आज भारत के शहरों में हजारों खरीदार ऐसे हैं जो अपने सपनों के घर की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ का इंतज़ार पाँच साल से चल रहा है, कुछ का दस साल से। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने सपनों को concrete के ढेर में फँसते देखा। कुछ बिल्डर गायब हो गए, कुछ कंपनियाँ दिवालिया घोषित हो गईं, और खरीदार कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं।

Conclusion

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