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Tariff से बदलेगा Game! 30 लाख नौकरियां खतरे में? Trump Tariff, तमिलनाडु की चेतावनी और भारत की Economy I

Tariff

सोचिए… सुबह फैक्ट्री का गेट खुलता है, मशीनें चालू होती हैं, सायरन बजता है, और हजारों मजदूर रोज़ की तरह काम पर लग जाते हैं। लेकिन अचानक, बिना किसी आग या बाढ़ के, बिना किसी दंगे या महामारी के, वही फैक्ट्री एक दिन चुप हो जाती है। मशीनें बंद, गेट पर ताला, और बाहर खड़े लोग बस एक-दूसरे का चेहरा देखते रह जाते हैं। वजह कोई लोकल संकट नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर लिया गया एक फैसला—America का tariff decision। यही डर आज तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक गूंज रहा है। सवाल सिर्फ export का नहीं है, सवाल है 30 लाख लोगों की रोज़ी-रोटी का, सवाल है उन परिवारों का जिनका भविष्य इन कारखानों से जुड़ा हुआ है।

पिछले कुछ दिनों में तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार को एक बेहद कड़ी और सीधी चेतावनी दी है। राज्य का कहना है कि अगर अमेरिका के टैरिफ से जुड़ी मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो तमिलनाडु में करीब 30 लाख नौकरियां तुरंत खतरे में आ सकती हैं। यह कोई हवा में उछाला गया आंकड़ा नहीं है। यह चेतावनी उस राज्य से आई है, जिसे भारत की manufacturing powerhouse कहा जाता है, जहां textile से लेकर electronics, auto components से लेकर leather goods तक, export-driven industries की रीढ़ बसती है। यहां अगर एक झटका लगता है, तो उसका असर सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में ripple पैदा करता है।

यह मुद्दा सीधे उस बैठक में उठा, जिसकी अध्यक्षता खुद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कर रही थीं। राज्यों के साथ बजट-पूर्व परामर्श की इस बैठक में तमिलनाडु के वित्त मंत्री थंगम देनारसु ने, बेहद साफ शब्दों में कहा कि global trade disruptions और खासकर अमेरिका की tariff policy ने, राज्य की export-based economy को सीधा निशाना बनाया है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के कुल माल Export का करीब 31 प्रतिशत अमेरिका के बाजार में जाता है। यानी अगर US market में demand गिरी या tariffs बढ़े, तो उसका सबसे पहला और सबसे गहरा असर तमिलनाडु पर पड़ेगा।

थंगम देनारसु की चिंता सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं थी। उनके शब्दों में वह डर झलक रहा था, जो factories के floor पर काम करने वाले मजदूरों के चेहरों पर साफ दिख सकता है। उन्होंने बताया कि textile sector, जो तमिलनाडु की पहचान भी है और ताकत भी, सबसे ज्यादा दबाव में है। तमिलनाडु अकेले भारत के textile exports का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। इस सेक्टर से 75 लाख से ज्यादा लोग सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं—कोई करघे पर काम करता है, कोई dyeing unit में, कोई packing में, और कोई logistics में। अगर exports रुके, तो यह chain reaction की तरह पूरी supply chain को तोड़ देता है।

मंत्री ने साफ कहा कि अगर मौजूदा हालात नहीं बदले, तो करीब 30 लाख नौकरियों पर तत्काल खतरा है। इसमें सबसे ज्यादा मार MSME यानी छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ेगी। बड़ी कंपनियां शायद कुछ समय तक झेल सकें, लेकिन छोटे exporters, जिनके पास न तो बड़ा cash buffer होता है और न ही alternative markets तक आसान पहुंच, उनके लिए यह almost death blow जैसा होगा। कई MSME units पहले ही closure के कगार पर खड़ी हैं, और अगर स्थिति और बिगड़ी, तो shutter गिरने में देर नहीं लगेगी।

यहां समझना जरूरी है कि tariff सिर्फ एक percentage number नहीं होता। जब अमेरिका किसी product पर भारी tariff लगाता है, तो भारतीय exporter की कीमत अचानक global market में non-competitive हो जाती है। जो product पहले affordable था, वही overnight महंगा हो जाता है। US buyer फिर Vietnam, Bangladesh या किसी और देश की तरफ देखने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि order cancel होते हैं, production cut होता है, और आखिर में jobs चली जाती हैं। यह पूरा process धीरे नहीं, बल्कि shock की तरह होता है।

लेकिन तमिलनाडु की चिंता सिर्फ global trade तक सीमित नहीं रही। देनारसु ने केंद्र और राज्यों के बीच accounting से जुड़े unresolved issues पर भी उंगली रखी। उन्होंने कहा कि GST के बाद revenue में जो कमी आई है, और projects के लिए funds release में जो delays हो रहे हैं, उन्होंने राज्य की financial health को कमजोर कर दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच accounting के कुछ technical लेकिन गंभीर मुद्दे हैं, जो तमिलनाडु के financial indicators को बिगाड़ रहे हैं। इसका सीधा असर राज्य की borrowing capacity पर पड़ रहा है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए Chennai Metro Rail Phase-II project का जिक्र किया। यह project अक्टूबर 2024 में approve हुआ था, लेकिन डेढ़ साल बाद भी राज्य को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया है। तमिलनाडु पहले ही इस project में केंद्र सरकार के हिस्से के तौर पर करीब 9,500 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। लेकिन accounting treatment में गड़बड़ी के कारण यह खर्च सही तरीके से reflect नहीं हो रहा। नतीजा यह है कि राज्य का debt-to-GSDP ratio artificially खराब दिख रहा है, जिससे उसकी borrowing limit कम हो जाती है।

देनारसु ने केंद्र से आग्रह किया कि cabinet approval के अनुसार accounting entries को ठीक किया जाए, ताकि खर्च दोनों budgets में सही तरीके से दिखे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो राज्यों की fiscal autonomy सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने Madurai और Coimbatore के लिए प्रस्तावित metro rail projects का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि इन proposals को reject करने के कारण उन शहरों के साथ न्यायसंगत नहीं लगते, खासकर जब दूसरे शहरों को इसी तरह की मंजूरी दी गई है।

लेकिन जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा attention खींचा, वह था America के tariff से जुड़ा डर। देनारसु ने कहा कि global trade disruptions के प्रति तमिलनाडु की sensitivity बहुत ज्यादा है, क्योंकि इसकी economy deeply export-linked है। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका की हालिया tariff hikes का असर तमिलनाडु पर बाकी राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर है। 31 प्रतिशत exports अगर एक ही market पर depend हों, तो risk भी उतना ही concentrated हो जाता है।

उन्होंने textile sector को national concern बताते हुए कहा कि यह सिर्फ तमिलनाडु की समस्या नहीं है। अगर भारत के textile exports का 28 प्रतिशत हिस्सा दबाव में आता है, तो इसका असर पूरे देश के trade balance, forex earnings और employment numbers पर पड़ेगा। उन्होंने केंद्र से targeted intervention की मांग की। इसमें textile sector के लिए dedicated support package, interest subvention, targeted subsidies, export incentives और appropriate tax relief जैसे उपाय शामिल हों।

यहां एक बड़ा सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ एक राज्य का pressure tactic है, या वाकई खतरा इतना बड़ा है? अगर हम global context देखें, तो यह डर बिल्कुल real लगता है। Trump administration की tariff-first approach पहले भी global supply chains को हिला चुकी है। Steel, aluminium, electronics, और अब energy-linked trade—हर जगह tariffs को political weapon की तरह इस्तेमाल किया गया है। अगर यही model आगे भी चलता है, तो export-driven economies को alternative strategies ढूंढनी ही होंगी।

GST का मुद्दा भी इस पूरी बहस में एक गहरी परत जोड़ता है। देनारसु ने याद दिलाया कि GST को cooperative federalism की भावना के साथ पेश किया गया था। राज्यों ने अपनी tax autonomy छोड़ी, इस भरोसे पर कि उनके revenue की सुरक्षा की जाएगी। लेकिन compensation mechanism खत्म होने के बाद से राज्यों की चिंता लगातार बढ़ती गई है। तमिलनाडु के लिए ही current fiscal year में अनुमानित revenue loss करीब 10,000 करोड़ रुपये बताया गया है। यह कोई छोटी रकम नहीं है, खासकर तब जब राज्य पर welfare schemes, infrastructure और employment generation का दबाव लगातार बढ़ रहा हो।

उन्होंने केंद्र से compensation mechanism को फिर से बहाल करने की अपील की, ताकि लगातार हो रही revenue shortfall को address किया जा सके। साथ ही उन्होंने tax और cess पर केंद्र की बढ़ती निर्भरता की भी आलोचना की। राज्यों का तर्क है कि cess divisible pool का हिस्सा नहीं होता, जिससे उन्हें उनका fair share नहीं मिल पाता। नतीजा यह होता है कि राज्यों की fiscal space सिकुड़ती जाती है, जबकि जिम्मेदारियां बढ़ती जाती हैं।

केंद्र प्रायोजित योजनाओं को लेकर भी विवाद सामने आया। ‘Viksit Bharat–Rozgar aur Aajeevika Mission’ का जिक्र करते हुए देनारसु ने कहा कि revised funding pattern ने राज्यों पर भारी बोझ डाल दिया है। तमिलनाडु के लिए इस अतिरिक्त बोझ का अनुमान करीब 5,000 करोड़ रुपये है। उन्होंने यह भी कहा कि कई major welfare schemes के तहत funds अटके हुए हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने Jal Jeevan Mission का जिक्र किया, जिसके तहत सितंबर 2024 के बाद से कोई भी fund release नहीं हुआ है। उन्होंने तत्काल 3,112 करोड़ रुपये जारी करने की मांग की।

Conclusion

सोचिए… अगर एक झटके में लाखों लोगों की नौकरी खतरे में पड़ जाए, फैक्ट्रियों की चिमनियां बुझने लगें—तो क्या होगा? यही डर तमिलनाडु ने केंद्र सरकार के सामने रखा है। राज्य ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के ट्रंप टैरिफ अगर ऐसे ही बने रहे, तो करीब 30 लाख नौकरियां खतरे में आ सकती हैं। वित्त मंत्री थंगम देनारसु ने बताया कि तमिलनाडु का 31% Export अमेरिका जाता है, इसलिए टैरिफ का असर यहां सबसे ज्यादा पड़ रहा है। खासकर कपड़ा सेक्टर, जो देश के 28% टेक्सटाइल एक्सपोर्ट और 75 लाख रोजगार संभालता है, गंभीर दबाव में है।

मंत्री ने कहा कि कई MSME फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर हैं। ऊपर से जीएसटी के बाद करीब 10,000 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान और केंद्र से फंड रिलीज में देरी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। राज्य ने तुरंत राहत पैकेज, सब्सिडी और टैक्स सपोर्ट की मांग की है—वरना यह संकट राष्ट्रीय चिंता बन सकता है। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।

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