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Tariff: चीन-अमेरिका की बड़ी डील — ट्रंप ने घटाया Tariff, अब भारत के लिए सुनहरा मौका! 2025

Tariff

ज़रा सोचिए… एक ऐसा समय जब दुनिया दो आर्थिक दिग्गजों — अमेरिका और चीन — के बीच चल रही ट्रेड वॉर से हिल चुकी थी। महीनों से बाज़ारों में डर का माहौल था, Investor असमंजस में थे, और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था मानो सांस रोककर देख रही थी कि आखिर आगे क्या होगा। और फिर अचानक, दक्षिण कोरिया के बुसान शहर से एक ख़बर आई जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया — अमेरिका और चीन के बीच डील हो गई। डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की ऐतिहासिक मुलाकात में दोनों देशों ने कई अहम फैसले लिए। अमेरिका ने चीन पर से 10% Tariff हटाने का ऐलान कर दिया — यानी कुल Tariff 57% से घटकर 47% हो गया।

यह कदम दिखने में एक कूटनीतिक जीत लग सकता है, लेकिन इसके असर बहुत गहरे हैं। क्योंकि यह सिर्फ़ दो देशों की बात नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला समझौता है। और सबसे दिलचस्प सवाल है — भारत के लिए इसमें क्या संदेश छिपा है?

इस डील के तहत चीन ने अमेरिका से सोयाबीन, रेयर अर्थ मेटल्स और अन्य कृषि Products की बड़ी मात्रा में खरीद पर सहमति जताई है। वहीं अमेरिका ने चीन के कुछ हाई-टेक Products पर लगाए गए Tariff घटाने का फैसला किया है। सुनने में यह एक व्यापारिक संतुलन की कोशिश लगती है, लेकिन असल में यह एक रणनीतिक शांति समझौता है — एक अस्थायी ट्रूस, जो आने वाले वर्षों में फिर किसी नई प्रतिस्पर्धा का रूप ले सकता है।

कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि यह समझौता दोनों देशों की मजबूरियों का परिणाम है। अमेरिका के लिए यह राजनीतिक राहत है, जबकि चीन के लिए आर्थिक अस्तित्व की रणनीति। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और घटती मांग ने ट्रंप प्रशासन पर दबाव बनाया, जबकि चीन अपनी धीमी ग्रोथ और घटते Export से चिंतित था। दोनों के लिए यह “आराम का बटन” दबाने जैसा है — ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुछ सांस मिल सके।

इस डील के तुरंत बाद वैश्विक बाजारों में सकारात्मक हलचल देखने को मिली। शेयर बाज़ारों में तेजी आई, डॉलर मज़बूत हुआ और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता लौटने लगी। लेकिन भारत के लिए तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। क्योंकि हर वैश्विक डील में, जो एक के लिए राहत होती है, वह दूसरे के लिए चुनौती भी बन सकती है।

भारत, जो पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का अप्रत्यक्ष लाभ उठा रहा था, अब एक कठिन मोड़ पर है। जब दोनों देशों के बीच तनाव था, तब कई अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स चीन से बाहर निकालने का फैसला किया था। “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों में Investment का रुख बढ़ा था। भारत को इस बदलाव का बड़ा लाभ मिला — नए कारखाने, नई नौकरियाँ और मेक इन इंडिया के लिए नई ऊर्जा।

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। अगर अमेरिका और चीन के बीच व्यापार सामान्य होता है, तो कई कंपनियाँ चीन में वापस लौट सकती हैं। खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स और टेक्सटाइल सेक्टर की बड़ी कंपनियाँ जो हाल ही में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में Investment कर रही थीं, अब अपनी पुरानी सप्लाई चेन को फिर से चीन से जोड़ सकती हैं।

कल्पना कीजिए, अगर Apple जैसी कंपनियाँ अपने नए प्रोडक्शन यूनिट्स को वापस चीन ले जाती हैं, तो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स Export और स्थानीय रोज़गार पर क्या असर पड़ेगा? पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस तरह से चीन के विकल्प के रूप में अपनी छवि बनाई थी, उसे यह डील थोड़ा कमजोर कर सकती है।

हालांकि, भारत के लिए यह पूरी तरह से बुरी खबर नहीं है। इसका एक बड़ा सकारात्मक पहलू भी है। जब अमेरिका और चीन के बीच टकराव था, तब पूरी दुनिया का Investment माहौल अस्थिर था। अब अगर दोनों के बीच सुलह होती है, तो वैश्विक भरोसा लौटेगा। Foreign investors (FDI और FPI दोनों) फिर से उभरते बाज़ारों में पैसा लगाना शुरू करेंगे। भारत जैसे देशों के लिए यह सुनहरा मौका है — क्योंकि स्थिरता Investment की पहली शर्त होती है।

भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, राजनीतिक स्थिरता और विशाल उपभोक्ता बाजार विदेशी कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। जब वैश्विक बाजारों में स्थिरता लौटेगी, तो Investor जोखिम से बचते हुए भारत जैसे सुरक्षित और तेजी से बढ़ते बाजारों में प्रवेश करेंगे। इसका असर भारतीय रुपये की मजबूती, शेयर बाजार की स्थिरता और Capital flows पर सकारात्मक रूप से दिख सकता है। अब सवाल आता है — भारत किन क्षेत्रों में इस डील का फायदा उठा सकता है और किन क्षेत्रों में नुकसान झेल सकता है?

सबसे पहले, बात करें कृषि की। चीन ने इस समझौते के तहत अमेरिका से बड़े पैमाने पर सोयाबीन और अन्य कृषि Products की खरीद का वादा किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत के कृषि Export पर दबाव बढ़ेगा। चीन, जो भारत से पहले सीमित मात्रा में दालें, चाय और मसाले खरीदता था, अब अपनी अधिकांश मांग अमेरिका से पूरी करेगा। इससे भारत के किसानों और कृषि exporters को नुकसान हो सकता है।

दूसरी ओर, अगर वैश्विक महंगाई कम होती है और लॉजिस्टिक सप्लाई चेन सामान्य होती है, तो भारत के औद्योगिक उत्पादन को राहत मिलेगी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए कच्चे माल की लागत घटेगी, जिससे घरेलू उत्पादन को बल मिलेगा। यानी जहां एक तरफ कुछ सेक्टरों को नुकसान होगा, वहीं कई उद्योगों के लिए यह “breathing space” साबित होगा।

IT और सर्विस सेक्टर की बात करें तो भारत के लिए स्थिति बेहतर हो सकती है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता आती है, तो कंपनियाँ तकनीकी Investment बढ़ाती हैं — सॉफ्टवेयर, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, हेल्थटेक और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में नए कॉन्ट्रैक्ट खुलते हैं। भारत की कंपनियाँ — जैसे इंफोसिस, TCS, विप्रो और टेक महिंद्रा — इस स्थिति से बड़ा लाभ उठा सकती हैं।

इसके अलावा, फार्मा सेक्टर भी इस डील से अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो सकता है। अमेरिका अब हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक खर्च कर रहा है और सप्लाई चेन को विविधता देने की कोशिश में है। भारत, जो जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है, वहां अपनी हिस्सेदारी और बढ़ा सकता है।

लेकिन साथ ही एक बड़ा खतरा भी है — भू-राजनीतिक प्रभाव का। अमेरिका और चीन की यह डील एक आर्थिक समझौता जरूर है, पर इसके पीछे एक रणनीतिक गेम भी छिपा है। चीन अपने “रेयर अर्थ” मटीरियल्स — जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और रक्षा तकनीक के लिए बेहद अहम हैं — की सप्लाई अमेरिका को देने के लिए तैयार हुआ है। बदले में अमेरिका ने अपने Tariff घटाए हैं। यानी दोनों ने एक-दूसरे पर निर्भरता का नया जाल बुन दिया है।

भारत को इस जाल से सतर्क रहना होगा। क्योंकि आने वाले वर्षों में रेयर अर्थ मटीरियल्स की वैश्विक राजनीति बहुत तीव्र होने वाली है। चीन के पास दुनिया के 60% से अधिक रेयर अर्थ रिज़र्व हैं। अगर वह इन्हें रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, तो भारत को अपने घरेलू विकल्पों पर ज़ोर देना होगा। भारत के पास राजस्थान, आंध्र प्रदेश और झारखंड में रेयर अर्थ माइनिंग की क्षमता है, लेकिन अब तक यह क्षमता नीतिगत ढिलाई के कारण पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाई है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है — भारत की विदेशी व्यापार नीति। अब जबकि अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में सुधार आ रहा है, भारत को अपनी स्थिति मज़बूत रखनी होगी। क्योंकि इस डील के बाद अमेरिका अपने नए व्यापार साझेदारों पर भी पुनर्विचार कर सकता है। जो Tariff युद्ध के दौरान भारत के लिए अवसर बने थे, अब वे कम हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, जब अमेरिका ने चीन से स्टील और एल्युमिनियम Import पर भारी Tariff लगाए थे, तब भारतीय स्टील कंपनियों को फायदा हुआ था। अब अगर Tariff घटते हैं, तो भारत की प्रतिस्पर्धा घट सकती है। यही स्थिति टेक्सटाइल और केमिकल सेक्टर में भी बन सकती है।

पर दूसरी ओर, भारत के लिए यह एक अवसर भी है कि वह इस शांति के दौर में अपने व्यापारिक रिश्तों को और मज़बूत करे। अमेरिका और चीन दोनों के साथ संवाद बनाए रखते हुए, भारत अपनी Export नीति को विविध बना सकता है — खासकर यूरोप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के बाजारों में।

यह समझना जरूरी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में हर बड़ी डील “Zero-Sum Game” नहीं होती — यानी एक का फायदा, दूसरे का नुकसान नहीं हमेशा होता। बल्कि असली खेल “Adaptation” का होता है — जो देश सबसे जल्दी बदलती परिस्थितियों में खुद को ढाल लेते हैं, वही आगे निकलते हैं।

भारत के लिए संदेश यही है — अमेरिका-चीन डील हमें झटका दे सकती है, लेकिन यह एक मौका भी है कि हम अपनी नीतियों को और चतुराई से तैयार करें। हमें अपनी Value Chain को मज़बूत बनाना होगा, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करना होगा, और कृषि से लेकर टेक्नोलॉजी तक हर सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी।

ट्रंप और शी जिनपिंग की यह डील एक शुरुआत भर है। दोनों देश फिलहाल अपने घरेलू दबावों से राहत चाहते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है — अमेरिका और चीन की आर्थिक दोस्ती कभी स्थायी नहीं रही। यह “Convenience Partnership” है — ज़रूरत पड़ने पर फिर से तकरार शुरू हो सकती है। ऐसे में भारत को इस बीच के समय का समझदारी से उपयोग करना होगा।

क्योंकि जब दो दिग्गज हाथ मिलाते हैं, तो उनके बीच की दरारों में ही नए अवसर जन्म लेते हैं। भारत के लिए यही मौका है — कि वो इन दरारों में से निकलकर एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और निर्णायक आर्थिक शक्ति बन जाए।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि इस डील का असली संदेश भारत के लिए साफ़ है — दुनिया अब दो ध्रुवों के बीच नहीं, बल्कि “तीसरे रास्ते” की तलाश में है। अगर भारत उस तीसरे रास्ते पर खड़ा हो सके, तो आने वाला दशक सिर्फ़ एशिया का नहीं, बल्कि “भारत का दशक” कहलाएगा।

Conclusion

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