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Historic Shock: Tariff की ऐतिहासिक ताकत — एक टैक्स जिसने सदियों से दुनिया की आर्थिक सोच बदल दी I 2025

Tariff

सोचिए… आप किसी शोरूम में खड़े हैं। सामने एक विदेशी ब्रांड की चमचमाती कार खड़ी है। डिजाइन शानदार, फीचर्स कमाल के, लेकिन कीमत सुनते ही आप चौंक जाते हैं। मन में सवाल उठता है—इतनी महंगी क्यों? सेल्समैन बस एक शब्द बोलता है, “सर, टैरिफ की वजह से।” यही एक शब्द आज अमेरिका से लेकर भारत, मैक्सिको से लेकर यूरोप तक, सरकारों के दिमाग की नसें खींच रहा है। लेकिन असली सवाल यही है कि आखिर ये Tariff है क्या, जिसे लेकर पूरी दुनिया इतनी बेचैन है?

आपको बता दें कि Tariff, आज अचानक चर्चा में नहीं आया है। यह कोई नया हथियार नहीं है, जिसे आधुनिक सरकारों ने ईजाद किया हो। असल में टैरिफ इंसानी इतिहास जितना ही पुराना है। जब दुनिया में सीमाएं बनीं, जब देशों ने अपने दरवाज़ों पर पहरे लगाए, तभी से Tariff का जन्म हुआ। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह राजा-महाराजाओं की तिजोरी भरने का तरीका था, और आज यह देशों की आर्थिक ताकत दिखाने का जरिया बन चुका है।

डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद Tariff शब्द ने जैसे नया जीवन पा लिया। अमेरिका ने भारतीय सामानों के Import पर 50 प्रतिशत Tariff लगाया। कुछ ही समय बाद मेक्सिको ने भी भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक Tariff लगाने का ऐलान कर दिया। यूरोपीय यूनियन, ब्राजील और कई दूसरे देश भी इस खेल में शामिल हैं। हर तरफ एक ही सवाल है—कौन किस पर कितना Tariff लगाएगा और इसका असर किस पर पड़ेगा?

लेकिन Tariff को समझने के लिए हमें शोर-शराबे से थोड़ा पीछे जाना होगा। Tariff असल में एक टैक्स है, लेकिन यह आम टैक्स जैसा नहीं है। यह बॉर्डर पर लगने वाला टैक्स है। जब कोई सामान विदेश से आपके देश में प्रवेश करता है, तो सरकार उससे कहती है—पहले शुल्क चुकाओ, फिर अंदर आओ। यही शुल्क Tariff कहलाता है। और यही शुल्क किसी प्रोडक्ट की किस्मत तय कर देता है।

मान लीजिए भारत की कोई कंपनी विदेश से जूते मंगाती है। वहां जूते की कीमत 2,000 रुपये है। अगर सरकार उस पर 50 प्रतिशत Tariff लगा देती है, तो वही जूता बॉर्डर पार करते ही 3,000 रुपये का हो जाता है। अब दुकानदार अपना मुनाफा जोड़ेगा, टैक्स जोड़ेगा, ट्रांसपोर्ट का खर्च जोड़ेगा, और अंत में ग्राहक को जूता शायद 3,500 या 4,000 रुपये में मिलेगा। यानी विदेशी सामान अपने आप महंगा हो गया।

यहीं से Tariff की असली भूमिका शुरू होती है। सरकारें जानबूझकर विदेशी सामान को महंगा करती हैं ताकि लोग लोकल सामान की तरफ आकर्षित हों। Tariff कोई भावनात्मक फैसला नहीं होता, यह पूरी तरह रणनीतिक कदम होता है। सरकारें यह सोचकर टैरिफ लगाती हैं कि इससे उनकी घरेलू इंडस्ट्री को बचाया जा सके।

Tariff भी एक जैसा नहीं होता। कभी सरकार हर यूनिट पर एक तय रकम लेती है, जैसे हर इम्पोर्टेड कार पर 500 डॉलर। इसे स्पेसिफिक Tariff कहा जाता है। कभी सरकार प्रोडक्ट की कीमत का एक प्रतिशत लेती है, जैसे किसी सामान की कीमत का 5 या 20 प्रतिशत। इसे एड-वेलोरम Tariff कहा जाता है। तरीका अलग है, लेकिन मकसद वही—इम्पोर्ट को महंगा बनाना।

अब सवाल उठता है कि सरकारें आखिर इतना Risk क्यों उठाती हैं। क्योंकि Tariff लगाना आसान फैसला नहीं होता। इसका असर सिर्फ विदेशी कंपनियों पर नहीं, बल्कि अपने देश के लोगों पर भी पड़ता है। फिर भी सरकारें Tariff लगाती हैं, क्योंकि इसके पीछे तीन बड़े कारण होते हैं—रेवेन्यू, रोजगार और सुरक्षा।

Tariff सरकार के लिए कमाई का सीधा साधन है। बॉर्डर पर ही टैक्स वसूल लिया जाता है। न इनकम छिपाने का सवाल, न टैक्स चोरी का। इतिहास में लंबे समय तक Tariff ही सरकारों की income का सबसे बड़ा स्रोत रहा है। जब इनकम टैक्स जैसी व्यवस्था नहीं थी, तब बंदरगाहों पर खड़े टैक्स कलेक्टर ही सरकार की रीढ़ थे। दूसरा और ज्यादा अहम कारण है घरेलू कंपनियों की सुरक्षा। अगर विदेशी कंपनियां बहुत सस्ते दाम पर अपना सामान बेचने लगें, तो लोकल कंपनियां टिक नहीं पाएंगी। उनके प्रोडक्ट महंगे होंगे, उनकी टेक्नोलॉजी पीछे रह जाएगी, और धीरे-धीरे वे बाजार से बाहर हो जाएंगी। इसका सीधा मतलब है—फैक्ट्रियां बंद, नौकरियां खत्म, और सामाजिक असंतोष।

इसे समझने के लिए चीन और अमेरिका के उदाहरण पर नजर डालिए। अगर चीनी कंपनियां बेहद सस्ते और हाई-टेक मोबाइल फोन अमेरिकी बाजार में उतार दें, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। लोग वही फोन खरीदेंगे जो सस्ता और बेहतर है। नतीजा यह होगा कि अमेरिकी कंपनियां घाटे में जाएंगी। सरकार यह Risk नहीं लेना चाहती, इसलिए टैरिफ का सहारा लिया जाता है।

लेकिन Tariff की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। Tariff जितना फायदेमंद दिखता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि जब विदेशी सामान महंगा होता है, तो उसका बोझ आखिरकार आम उपभोक्ता पर पड़ता है। महंगे प्रोडक्ट का मतलब है महंगाई। और महंगाई सीधे आपकी जेब पर हमला करती है। यही वजह है कि Tariff को लेकर दुनिया हमेशा दो हिस्सों में बंटी रही है। एक तरफ वे लोग हैं जो कहते हैं कि Tariff जरूरी है, क्योंकि इससे देश मजबूत होता है। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो कहते हैं कि Tariff से बाजार बिगड़ता है और आम आदमी परेशान होता है।

अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो Tariff की ताकत और खतरे दोनों साफ दिखते हैं। अमेरिका की आज़ादी की लड़ाई में भी Tariff और टैक्स की बड़ी भूमिका थी। ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी कॉलोनियों पर भारी टैक्स लगाए। लोगों ने नारा दिया—“No taxation without representation।” यानी अगर टैक्स देना है, तो हमारी आवाज़ भी सुनी जाए। यही नाराजगी आगे चलकर एक नए देश के जन्म का कारण बनी।

इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन के दौर में भी Tariff का खूब इस्तेमाल हुआ। यूरोप और अमेरिका ने अपनी फैक्ट्रियों को बचाने के लिए विदेशी सामान पर भारी शुल्क लगाए। उस समय टैरिफ को तरक्की का रास्ता माना जाता था। देश जितना ज्यादा Tariff लगाता, उतना ज्यादा आत्मनिर्भर समझा जाता। लेकिन 20वीं सदी में टैरिफ ने दुनिया को डराया भी। 1930 के दशक में अमेरिका ने भारी टैरिफ लगाए। जवाब में दूसरे देशों ने भी अपने Tariff बढ़ा दिए। नतीजा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार ठप हो गया। फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, बेरोजगारी बढ़ी, और पूरी दुनिया ग्रेट डिप्रेशन की चपेट में आ गई।

यही वजह थी कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद देशों ने मिलकर Tariff कम करने की कोशिश की। सोच बनी कि अगर व्यापार खुलेगा, तो देश जुड़ेंगे, और युद्ध की संभावना कम होगी। लेकिन यह शांति ज्यादा लंबे समय तक टिक नहीं पाई। आज दुनिया फिर उसी मोड़ पर खड़ी है। ग्लोबलाइजेशन बनाम प्रोटेक्शनिज्म की बहस फिर तेज़ हो गई है। डोनाल्ड ट्रंप इस बहस का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आए। उनका मानना है कि अगर अमेरिका अपने बाजार को खुला रखेगा, तो नौकरियां बाहर चली जाएंगी। इसलिए उन्होंने Tariff को देशभक्ति का हथियार बना दिया।

भारत भी इस कहानी से अलग नहीं है। भारत को लंबे समय तक दुनिया के उन देशों में गिना गया, जहां टैरिफ दरें काफी ऊंची रही हैं। इसका मकसद था अपने घरेलू उद्योगों को बचाना। लेकिन समय के साथ भारत ने भी अपनी नीति बदली है। हाल के वर्षों में भारत ने कई हाई Tariff घटाए हैं। एक समय लग्जरी कारों पर 125 प्रतिशत तक टैरिफ लगता था, जिसे अब घटाकर 70 प्रतिशत कर दिया गया है। यह अभी भी ज्यादा है, लेकिन पहले के मुकाबले काफी कम है। 2025 तक आते-आते भारत में औसत टैरिफ दरों में 11 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे वैश्विक व्यापार के लिए अपने दरवाज़े खोल रहा है, लेकिन पूरी तरह नहीं। क्योंकि भारत भी उसी दुविधा में है—अगर टैरिफ बहुत कम कर दिए, तो लोकल उद्योग को झटका लगेगा। और अगर बहुत ज्यादा रखे, तो एक्सपोर्ट पर जवाबी टैरिफ लगेंगे। यही वजह है कि Tariff सिर्फ एक टैक्स नहीं है। यह एक संतुलन है, एक सोच है, और एक राजनीतिक फैसला है। हर टैरिफ के पीछे एक कहानी होती है—कभी रोजगार बचाने की, कभी दबाव बनाने की, और कभी ताकत दिखाने की।

आज जब आप न्यूज में सुनते हैं कि किसी देश ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया, तो समझिए कि यह सिर्फ व्यापार की खबर नहीं है। यह सत्ता, रणनीति और भविष्य की लड़ाई है। टैरिफ कभी अकेले नहीं आता, उसके साथ ट्रेड वॉर, जवाबी कार्रवाई और अनिश्चितता भी आती है। और शायद यही वजह है कि Tariff सदियों से खत्म नहीं हुआ। राजा बदले, सरकारें बदलीं, सिस्टम बदले, लेकिन टैरिफ बना रहा। क्योंकि जब तक देश होंगे, सीमाएं होंगी, और अपने हित होंगे—तब तक टैरिफ रहेगा। और अगली बार जब आप किसी प्रोडक्ट की कीमत देखकर सोचें कि यह इतना महंगा क्यों है, तो हो सकता है उसका जवाब सिर्फ एक शब्द में छिपा हो—टैरिफ।

Conclusion

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