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Tariff के जरिए चीन पर वार! भारत के लिए नया आर्थिक अवसर या बड़ी चुनौती? 2025

Tariff

नमस्कार दोस्तों, कल्पना कीजिए, एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां अचानक चीन को छोड़कर भारत में अपने product बनाना शुरू कर देती हैं। क्या होगा अगर आने वाले वर्षों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का सबसे बड़ा हब बन जाए? क्या भारत, जो अभी तक मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन के मामले में चीन से पीछे था, अब दुनिया का सुपरपावर बन सकता है? अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन से Import होने वाले Products पर 10% Tariff लगाने का फैसला, भारत के लिए एक सुनहरा अवसर साबित हो सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या भारत अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर इस मौके को भुना पाएगा, या यह मौका केवल एक सपना बनकर रह जाएगा? क्या भारतीय सरकार और उद्योग इस अवसर का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं? क्या यह कदम भारत को global इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बना देगा? आइए इस वीडियो में हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे इस Tariff के फैसले ने भारत को, चीन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है और इस मौके से भारत को क्या लाभ हो सकता है।

भारत के लिए यह अवसर खास क्यों है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए इस 10% Tariff का सबसे बड़ा प्रभाव चीन से Import होने वाली स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक Products पर पड़ा है, जो पहले इन शुल्कों से मुक्त थे। इसका अर्थ यह है कि अब चीन से अमेरिका आने वाले ये product महंगे हो जाएंगे, जिससे कंपनियां अब विकल्प तलाशने लगी हैं। ऐसे में भारत की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को एक बड़ा फायदा हो सकता है, क्योंकि भारत में कम Cost पर Production संभव है और यहां की Manufacturing Capacity काफी बढ़ चुकी है।

भारत, जो पहले से ही मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से वृद्धि कर रहा है, इस Tariff के कारण एक नई दिशा में कदम बढ़ा सकता है। ऐपल और मोटोरोला जैसी कंपनियां पहले ही भारत में अपने Production केंद्र बढ़ा चुकी हैं, और अब इस Tariff की वजह से उनकी गति और बढ़ सकती है। इस कदम से भारत के न केवल घरेलू निर्माण में वृद्धि होगी, बल्कि भारत Global Level पर एक प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स हब बन सकता है।

मनीकंट्रोल के अनुसार, डिक्सन टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन सुनील वचानी ने इसे “एक शॉर्ट-टर्म समाधान बताया, लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि यह “लॉन्ग-टर्म व्यापार समझौता” की दिशा में एक अच्छा कदम है, जो भारत और अमेरिका दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है।

क्या भारत इस मौके का फायदा उठा सकता है?

Indian Cellular and Electronics Association (ICEA) के अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू ने इस अवसर को बड़ा मौका बताया, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत को इसे केवल अवसर न मानकर एक मिशन के रूप में देखना होगा। अगर भारत को इस मौके का पूरा लाभ उठाना है तो नीति निर्माताओं और उद्योग दोनों को बहुत तेजी से काम करना होगा।

भारत को केवल विकसित देशों से Import को कम करने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे एक नई global ताकत बनने के लिए अपनी पूरी मेहनत करनी होगी। इसके लिए सबसे पहले सरकार को नीतियों को सरल और पारदर्शी बनाना होगा, ताकि विदेशी कंपनियां आसानी से भारत में Investment कर सकें। इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाए, ताकि कंपनियों को अपनी Production Process में कोई रुकावट न आए। और सबसे अहम बात, स्थानीय Supply Chain को बेहतर किया जाए, ताकि भारत न सिर्फ असेंबली हब बने बल्कि पूरे product का निर्माण भी यहीं हो।

भारत, मैक्सिको को टक्कर देगा?

अब तक मैक्सिको को चीन का विकल्प माना जाता था, क्योंकि वहां कम Cost पर मैन्युफैक्चरिंग की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन अब भारत भी तेजी से उभर रहा है और उसे चीन का विकल्प बनने का अवसर मिल रहा है। डिक्सन टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन सुनील वचानी के अनुसार, “पहले कंपनियां मैक्सिको को अपना Production केंद्र बना रही थीं, लेकिन अब भारत भी एक मजबूत विकल्प बन सकता है।”

भारत के पास कम Cost में Production करने का फायदा है, और अब सरकार भी इस दिशा में तेजी से फैसले ले रही है। लेकिन इस मौके का फायदा उठाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, और अप्रूवल सिस्टम में अभी सुधार की आवश्यकता है। अगर इन चुनौतियों को हल कर लिया जाता है, तो भारत एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है, जो चीन की जगह ले सकता है।

किन सेक्टर्स को सबसे ज्यादा फायदा होगा ?

चीन से Import पर लगाए गए इस Tariff का सबसे ज्यादा फायदा, भारत के कई इलेक्ट्रॉनिक्स Products को हो सकता है। स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग पहले से ही भारत के सबसे बड़े सेक्टर्स में से एक बन चुका है, और अब इसका विस्तार और तेजी से हो सकता है। कंपनियां अब भारत में स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक Products का निर्माण करना चाहेंगी ताकि वे अमेरिकी बाजार में चीन से Competition कर सकें।

इसके अलावा, आईटी हार्डवेयर, जिसमें लैपटॉप, टैबलेट और सर्वर शामिल हैं, भी एक प्रमुख सेक्टर बन सकता है। कई ताइवानी कंपनियां अब भारत को अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस बना रही हैं। इसके साथ ही टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स Products का निर्माण भी भारत में बढ़ सकता है, क्योंकि अब अधिक कंपनियां इन्हें भारतीय कारखानों से सोर्स करने की ओर देखेंगी।

2024 में भारत ने कौन से रिकॉर्ड बनाए, और इसका ग्रोथ पर क्या असर पड़ा?

भारत के मोबाइल फोन Export ने 2024 में 20 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड तोड़ा, जिसमें ऐपल और सैमसंग का योगदान सबसे अधिक था। ऐपल ने 65% Export के साथ अग्रणी भूमिका निभाई, जबकि सैमसंग का योगदान 20% और भारतीय कंपनियों का योगदान 15% था। ऐपल का लक्ष्य है कि अगले 2 से 3 सालों में वह अपने 25% आईफोन भारत में बनाए ताकि उसकी चीन पर निर्भरता कम हो सके। इसके अलावा, भारत में लैपटॉप, सर्वर, टैबलेट और अन्य आईटी हार्डवेयर का Production भी बढ़ने की संभावना है।

इसके अलावा, आईटी हार्डवेयर सेगमेंट, जिसमें लैपटॉप, टैबलेट, सर्विसेज शामिल हैं, को एक बड़ा बूस्ट मिलने वाला है। कई ताइवानी कंपनियां भारत को अपना ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने की दिशा में देख रही हैं। भारत में अब डिजाइनिंग और बैकवर्ड इंटीग्रेशन को गहराई से अपनाया जा रहा है, जिससे भारत केवल एक असेंबली हब नहीं बनेगा बल्कि पूरे product का निर्माण भी यहां होगा। इस कदम से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को एक नई दिशा मिलेगी, और Global Level पर Competition करने की क्षमता प्राप्त होगी।

सरकार की नई नीति क्या है, और बजट 2025 में इसका बड़ा फैसला क्या लिया गया है?

1 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने मोबाइल फोन के आवश्यक घटकों पर Import शुल्क हटा दिया, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में Competition बढ़ेगी और कंपनियों को घटकों का स्थानीय Production करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

इस कदम का सीधा असर यह होगा कि अब भारत में बने स्मार्टफोन और लैपटॉप की Cost घटेगी, और देश अधिक Export कर सकेगा। इससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को एक बड़ा बढ़ावा मिलेगा, और यह Global Level पर Competition करने के लिए तैयार हो जाएगी।

इसके अलावा, भारत के पास एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने की जरूरत है ताकि Production और वितरण सुचारू रूप से हो सके। उद्योगों के लिए तेज़ और पारदर्शी अप्रूवल सिस्टम लागू करना होगा, जिससे व्यवसाय बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ सकें।

साथ ही, स्थानीय सप्लाई चेन को मजबूत बनाना आवश्यक है ताकि भारत सिर्फ असेंबली हब न रहे, बल्कि संपूर्ण product निर्माण में आत्मनिर्भर बन सके। यदि सरकार और उद्योग मिलकर सही रणनीति पर काम करें, तो अगले 5 से 10 वर्षों में भारत चीन का सबसे बड़ा विकल्प बन सकता है।

Conclusion

तो दोस्तों, भारत को अब एक ऐतिहासिक अवसर मिला है, जो उसे global मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का अवसर देता है। लेकिन इस मौके का पूरा फायदा उठाने के लिए, भारत को अपनी नीतियों और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार करना होगा। क्या भारत चीन की जगह ले पाएगा? क्या इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में भारत नया सुपरपावर बन सकता है? आपके विचार क्या हैं? कमेंट में बताएं!

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