ज़िंदगी के उस मोड़ पर जब ज़्यादातर लोग रिटायरमेंट की प्लानिंग करते हैं, आराम करने का सोचते हैं, या किसी शांत पहाड़ी जगह बसने का सपना देखते हैं — एक व्यक्ति था जिसने उस उम्र में अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी शुरुआत की। जब लोग कहते हैं “अब तो उम्र निकल गई,” तब उन्होंने कहा — “अब असली वक्त आया है।” और आज वही शख्स भारत का सबसे बुजुर्ग अरबपति है, जिनका नाम न सिर्फ़ देश, बल्कि दुनिया के 150 देशों में गूंजता है। उनका नाम है — लक्ष्मण दास मित्तल।
कहानी एक आम भारतीय मध्यमवर्गीय आदमी की है, जिसने सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद बिज़नेस शुरू किया — और आज 5 बिलियन डॉलर, यानी लगभग 44,000 करोड़ रुपये की संपत्ति का मालिक है। उम्र 92 साल से ऊपर, लेकिन जज़्बा अब भी वैसा ही जैसे किसी 25 साल के स्टार्टअप फाउंडर का होता है। यह कहानी है “Sonalika Group” की, एक ऐसे ब्रांड की जिसने भारत के किसानों की ज़िंदगी बदल दी। और यह कहानी है उस आदमी की, जिसने ये साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।
लक्ष्मण दास मित्तल की कहानी शुरू होती है पंजाब के एक छोटे से कस्बे, होशियारपुर से। एक साधारण परिवार में जन्मे मित्तल ने अपनी पढ़ाई वहीं से की और फिर नौकरी के लिए सरकारी सेक्टर का रास्ता चुना। उन्होंने लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया — यानी LIC — में काम शुरू किया। उनके परिवार या दोस्तों में कोई बिज़नेस बैकग्राउंड नहीं था। वो एक सुरक्षित जीवन जी रहे थे — एक ऐसी नौकरी जो समाज में इज़्जत देती है, स्थिर आय देती है, और एक नियमित दिनचर्या में चलता जीवन।
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ होता है। और मित्तल की ज़िंदगी का मोड़ तब आया जब उन्होंने तय किया कि वे अब और नौकरी नहीं करेंगे। LIC से वॉलंटरी रिटायरमेंट लेकर उन्होंने एक नया रास्ता चुना — और वो रास्ता था उद्यमिता का।
साल 1970 — जब भारत में बिज़नेस का माहौल उतना अनुकूल नहीं था, और निजी उद्योगों के लिए सरकारी मंजूरी एक कठिन प्रक्रिया हुआ करती थी। उस दौर में, जब एक सामान्य व्यक्ति बिज़नेस शुरू करने से डरता था, मित्तल ने साहस दिखाया। उन्होंने छोटे-छोटे कृषि उपकरण बनाना शुरू किया। शुरुआत बहुत सीमित थी — न कोई बड़ा कारखाना, न कोई नाम, बस एक सपना और भरोसा कि “अगर किसान खुश होगा, तो मैं भी आगे बढ़ूंगा।”
शुरुआत के कई साल संघर्ष में गुज़रे। न पैसा, न मार्केट, न सपोर्ट। कई बार फैक्ट्री का किराया देने तक की दिक्कत आई। लेकिन मित्तल का विश्वास अडिग था — “अगर काम ईमानदारी से करो, तो वक्त ज़रूर बदलेगा।” और वही हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने देखा कि जो छोटे किसान पहले महंगे ट्रैक्टर नहीं खरीद पाते थे, वो उनके उपकरणों से खेती आसान कर पा रहे थे। यह उनकी सबसे बड़ी जीत थी।
साल 1996 — यह वो साल था जब लक्ष्मण दास मित्तल ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने कहा, अब वक्त आ गया है कि भारत अपने ट्रैक्टर खुद बनाए। और इस तरह जन्म हुआ Sonalika Tractors का। उस वक्त बाजार में दो बड़े नाम छाए हुए थे — महिंद्रा और TAFE। लेकिन मित्तल ने सीधी प्रतिस्पर्धा से डरने के बजाय अपना रास्ता खुद बनाया। उन्होंने किसानों से सीधा संवाद शुरू किया — पूछा कि उन्हें कैसी मशीन चाहिए, कौन-सी ताकत चाहिए, और कौन-सा ट्रैक्टर उनके खेत के लिए उपयुक्त होगा।
यही “किसान-केंद्रित सोच” Sonalika की असली पहचान बनी। यह कंपनी सिर्फ़ ट्रैक्टर बेचने नहीं आई थी, बल्कि किसान की ज़रूरत समझने आई थी। और शायद यही कारण है कि आज Sonalika भारत की तीसरी सबसे बड़ी ट्रैक्टर कंपनी है और देश की नंबर-1 ट्रैक्टर एक्सपोर्टर।
होशियारपुर, पंजाब — यही वो जगह है जहाँ Sonalika की नींव रखी गई। आज वहीं दुनिया की सबसे बड़ी ट्रैक्टर मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री है। 300 एकड़ में फैली यह यूनिट हर साल लाखों ट्रैक्टर बनाती है और उन्हें दुनिया के 150 देशों तक भेजती है। अफ्रीका से लेकर यूरोप, लैटिन अमेरिका से लेकर एशिया — हर जगह भारतीय मिट्टी की खुशबू लिए Sonalika के ट्रैक्टर चलते हैं।
आज Sonalika के पास 17 लाख से ज्यादा ग्राहक हैं। यानी हर 20 में से 1 किसान कहीं न कहीं Sonalika की मशीन का इस्तेमाल करता है। यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जो एक बुज़ुर्ग भारतीय ने दुनिया को सिखाई।
लक्ष्मण दास मित्तल कहते हैं — “हमारा असली प्रॉफिट तब है जब किसान मुस्कुराता है।” यह लाइन Sonalika की DNA में बस चुकी है। कंपनी सिर्फ़ मशीनें नहीं, बल्कि उम्मीदें बनाती है। जब किसी छोटे किसान का बेटा पहली बार अपने खेत में Sonalika ट्रैक्टर लेकर जाता है, तो वह सिर्फ़ खेती नहीं शुरू करता — वो अपने पिता के सपनों को साकार करता है।
लेकिन यहाँ तक पहुंचना आसान नहीं था। मित्तल को कई बार असफलता का सामना करना पड़ा। शुरुआती दौर में उन्हें सरकार से मंजूरी पाने में मुश्किलें आईं, मशीनरी लाने में अड़चनें आईं, और कई बार पार्टनर्स ने साथ छोड़ दिया। लेकिन हर बार उन्होंने वही कहा — “अगर आप ठान लें, तो असफलता सिर्फ़ एक स्टॉपेज है, मंज़िल नहीं।”
Sonalika की सफलता की एक और खासियत है — इनोवेशन। जहाँ दूसरी कंपनियाँ सिर्फ़ पुराने डिज़ाइन को अपडेट करती रहीं, Sonalika ने किसानों की जरूरतों के अनुसार पूरी नई तकनीक विकसित की। चाहे वो ड्राई क्लाइमेट वाले खेत हों या पहाड़ी इलाकों की खेती, Sonalika के पास हर परिस्थिति के लिए समाधान था। कंपनी के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर में दर्जनों इंजीनियर रोज़ यही सोचते हैं कि “किसान के काम को कैसे आसान बनाया जाए।” यही इनोवेशन आज Sonalika को Fortune 500 India की लिस्ट में शामिल करता है — उन कंपनियों में जो न सिर्फ़ प्रॉफिट कमाती हैं, बल्कि भारत की ग्रोथ स्टोरी को दिशा देती हैं।
किसी भी कंपनी की असली सफलता तब होती है जब उसका नेतृत्व नई पीढ़ी को सौंपा जाए। मित्तल ने भी यह जिम्मेदारी अपने बेटों और पोतों को दी है — अमृत सागर मित्तल और दीपक मित्तल अब कंपनी की कमान संभाल रहे हैं, जबकि रमन, सुशांत और राहुल अगली पीढ़ी के रूप में कंपनी को ग्लोबल विज़न दे रहे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 90 की उम्र पार करने के बाद भी लक्ष्मण दास मित्तल रोज़ कंपनी ऑफिस जाते हैं। वे हर बड़ा फैसला खुद देखते हैं। उनकी मौजूदगी ही Sonalika के लिए एक प्रेरणा है।
मित्तल का मानना है कि “अगर हम सबसे अच्छी क्वालिटी का ट्रैक्टर बनाते हैं, किसानों की जरूरतों को समझते हैं, और ईमानदारी से बिज़नेस करते हैं, तो हमारी तरक्की किसानों की भलाई से जुड़ी होगी।” यही सोच Sonalika को सिर्फ़ एक कंपनी नहीं, बल्कि एक आंदोलन बनाती है।
आज Sonalika की साझेदार है जापान की प्रसिद्ध कंपनी Yanmar, जिसकी 30% हिस्सेदारी Sonalika की ट्रैक्टर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट International Tractors Limited में है। इस साझेदारी ने Sonalika को अंतरराष्ट्रीय बाजार में और भी मजबूत बना दिया है। अब भारतीय इंजीनियरिंग और जापानी तकनीक का संगम दुनिया भर में अपनी ताकत दिखा रहा है।
अगर आप Sonalika की किसी यूनिट में जाएंगे, तो वहां सिर्फ़ मशीनों की आवाज़ नहीं, बल्कि सपनों की गूंज सुनाई देगी। मजदूरों की आंखों में गर्व होगा कि वे उस कंपनी के लिए काम कर रहे हैं, जो भारत की मिट्टी से उठकर दुनिया के 150 देशों में अपनी छाप छोड़ रही है।
आज जब आप किसी अफ्रीकी किसान को Sonalika ट्रैक्टर चलाते हुए देखेंगे, तो आपको शायद नहीं पता होगा कि वह मशीन किसी 90 साल के भारतीय बुज़ुर्ग के विज़न का नतीजा है। यह वो शक्ति है जो उम्र से नहीं, सोच से मापी जाती है।
मित्तल का सफर इस बात का प्रतीक है कि उम्र केवल एक आंकड़ा है। उन्होंने साबित किया कि अगर जुनून हो, तो रिटायरमेंट भी “रीबर्थ” बन सकता है। उनके जीवन से एक सबसे बड़ा सबक मिलता है — “कभी भी शुरू करने में देर नहीं होती।”
आज जब भारत में हर युवा स्टार्टअप के सपने देख रहा है, तो मित्तल की कहानी एक साइलेंट लेसन देती है — कि सफलता सिर्फ़ 20 या 30 की उम्र वालों के लिए नहीं होती। सफलता उस इंसान के लिए होती है जो सपने देखना नहीं छोड़ता।
Conclusion
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