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Singur की वापसी की उम्मीद: 18 साल की खामोशी, अधूरी लड़ाई और सवाल — क्या मोदी की एंट्री बदलेगी इस ज़मीन की तक़दीर?

Singur

अक्टूबर 2008 की वो सुबह आज भी Singur की मिट्टी में दबी हुई है। सूरज उगा था, लेकिन खेतों में हल नहीं चला। हवा में धान की खुशबू नहीं थी, बल्कि अनिश्चितता की एक अजीब सी सिहरन थी। उसी दिन रतन टाटा ने एक ऐसा ऐलान किया, जिसने Singur को सिर्फ़ पश्चिम बंगाल का एक गांव नहीं, बल्कि भारत के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा सवाल बना दिया। टाटा नैनो प्रोजेक्ट Singur से जा रहा था। उस एक वाक्य के साथ, सैकड़ों करोड़ का Investment, हज़ारों नौकरियों का सपना और एक पूरे इलाके का भविष्य अचानक ठहर गया। उस दिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह ठहराव 18 साल लंबा होगा।

आपको बता दें कि Singur कभी एक सामान्य सा कृषि क्षेत्र था, जहां पीढ़ियों से किसान खेती करते आए थे। कोलकाता से करीब 40 किलोमीटर दूर यह इलाका उपजाऊ मिट्टी के लिए जाना जाता था। धान, आलू और सब्ज़ियां यहां की पहचान थीं। जब वाम मोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स के नैनो प्लांट के लिए, करीब 997 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित करने का फैसला किया, तो इसे विकास का बड़ा कदम बताया गया। कहा गया कि इससे रोज़गार आएगा, इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा और पश्चिम बंगाल औद्योगिक नक्शे पर फिर से उभरेगा। शुरुआत में कई किसानों ने मुआवज़ा लेकर ज़मीन दी भी, लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।

ममता बनर्जी, जो उस समय विपक्ष में थीं, Singur को किसान अधिकारों की लड़ाई का चेहरा बनाने लगीं। उनका कहना था कि करीब 400 एकड़ ज़मीन किसानों से उनकी मर्ज़ी के खिलाफ ली गई है। यह मुद्दा सिर्फ़ ज़मीन का नहीं रहा, बल्कि राजनीति का अखाड़ा बन गया। धरने, रैलियां, भूख हड़ताल, सड़क जाम—Singur की पहचान एक फैक्ट्री साइट से बदलकर आंदोलन स्थल बन गई। मीडिया की सुर्खियों में किसान थे, लेकिन फैसले राजनीति कर रही थी। रतन टाटा के लिए यह सिर्फ़ एक बिज़नेस प्रोजेक्ट नहीं था। नैनो उनके विज़न का हिस्सा थी—एक ऐसी कार जो आम आदमी तक पहुंचे।

लेकिन Singur में माहौल दिन-ब-दिन खराब होता गया। फैक्ट्री कर्मचारियों को धमकाए जाने के आरोप लगे, साइट पर काम बार-बार रुकता रहा। और फिर वो ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस आई, जहां रतन टाटा ने कहा कि उनके सिर पर बंदूक तान दी गई थी और ट्रिगर दबा दिया गया। उन्होंने Good M और Bad M की बात की, जिसने इस विवाद को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।

नैनो प्रोजेक्ट गुजरात के सानंद चला गया। वहां तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल कालीन बिछा दी। ज़मीन, बिजली, पानी, सुरक्षा—सब कुछ तेज़ी से उपलब्ध कराया गया। कुछ ही समय में फैक्ट्री खड़ी हो गई और नैनो का उत्पादन शुरू हो गया। गुजरात ने इस मौके को अपने औद्योगिक मॉडल की सफलता के तौर पर पेश किया। लेकिन Singur वहीं का वहीं रह गया—अधूरी दीवारों, टूटी सड़कों और खाली ज़मीन के साथ।

समय बीतता गया। सरकार बदली। ममता बनर्जी सत्ता में आईं। अदालतों में मुकदमे चले। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण को अवैध करार दिया और ज़मीन किसानों को लौटाने का आदेश दिया। काग़ज़ों में यह जीत थी, लेकिन ज़मीन पर हालात अलग थे। 18 साल तक पड़ी ज़मीन खेती लायक नहीं रही। मिट्टी की ऊपरी परत खराब हो चुकी थी। सिंचाई व्यवस्था टूट चुकी थी। किसान वापस आए, लेकिन खेती वापस नहीं आई।

कौशिक बाग उन किसानों में से हैं, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से ज़मीन दी थी। छह बीघा ज़मीन उन्होंने सरकार को सौंपी थी, इस भरोसे के साथ कि फैक्ट्री में नौकरी मिलेगी और बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा। उन्होंने ट्रेनिंग भी ली थी, लेकिन फैक्ट्री गई तो ट्रेनिंग बेकार हो गई। ज़मीन वापस मिली, लेकिन कौशिक कहते हैं कि वह अब ज़मीन सिर्फ़ नाम की है। फसल उगाने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी ने साथ नहीं दिया। उनकी आंखों में आज भी वो सवाल है—अगर फैक्ट्री आती, तो क्या उनकी ज़िंदगी कुछ और होती?

श्यामापदो दास की कहानी और भी कड़वी है। उन्होंने बिना मर्ज़ी के तीन बीघा ज़मीन दी थी। आंदोलन में उन्होंने पूरी ताक़त झोंकी। उन्हें भरोसा था कि राजनीतिक लड़ाई के बाद ज़मीन वापस मिलेगी और खेती फिर शुरू होगी। लेकिन आज उनके खेतों में जंगली जानवर घूमते हैं। खेती लगभग असंभव हो चुकी है। श्यामापदो मानते हैं कि Singur किसानों के लिए नहीं, बल्कि नेताओं के लिए एक स्टेज बन गया था।

स्वपन मित्रा अब पीछे मुड़कर देखते हैं तो खुद को दोष देते हैं। उनके पिता ने एक बीघा ज़मीन दी थी। परिवार ने राजनीतिक वादों पर भरोसा किया। आज स्वपन कहते हैं कि उनका परिवार राजनीति में फंस गया। न रोज़गार मिला, न खेती वापस आई। उनके लिए Singur आंदोलन अब एक सबक है—कि राजनीति में किसान की भूमिका अक्सर मोहरे से ज़्यादा नहीं होती।

माणिक घोष कभी आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थे। आज वह ऑटो चलाकर गुज़ारा करते हैं। उन्होंने ज़मीन लौटने के बाद खेती की कोशिश की, लेकिन मिट्टी ने धोखा दे दिया। माणिक कहते हैं कि फैक्ट्री आती तो गांव की पूरी अर्थव्यवस्था बदल जाती। दुकानें खुलतीं, स्कूल बेहतर होते, बच्चों को बाहर पलायन नहीं करना पड़ता। उनके शब्दों में एक स्थायी पछतावा है—एक खोया हुआ मौका।

News18 की टीम जब गोपालनगर पहुंची, जहां से आंदोलन की चिंगारी भड़की थी, तो माहौल बदला हुआ था। किसान अब खुलकर कहते हैं कि उनसे वादे किए गए, लेकिन कोई पूरा नहीं हुआ। अशोक घोष कहते हैं कि रोज़ी-रोटी छिन गई, लेकिन किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई। यह वाक्य सिर्फ़ एक गांव की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।

Singur विवाद ने भारत में भूमि अधिग्रहण की बहस को नई दिशा दी। इसके बाद “कंसेंट”, “फेयर मुआवज़ा” और “रीहैबिलिटेशन” जैसे शब्द कानून का हिस्सा बने। लेकिन जिन किसानों के नाम पर यह कानून बदले, उनकी ज़िंदगी में बदलाव नहीं आया। Singur आज भी Industrial investors के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जाता है—जहां राजनीति ने परियोजना को निगल लिया।

अब, 18 साल बाद, Singur में फिर से हलचल है। वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्तावित दौरा। वही मोदी, जिनके राज्य में नैनो फैक्ट्री गई थी और जिसने गुजरात के औद्योगिक मॉडल को वैश्विक पहचान दिलाई। Singur के लोग इस दौरे को सिर्फ़ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आख़िरी उम्मीद के तौर पर देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर मोदी चाहें, तो Singur को फिर से विकास के नक्शे पर ला सकते हैं।

स्थानीय लोगों की उम्मीदें अलग-अलग हैं। कुछ चाहते हैं कि यहां कोई नया इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट आए। कुछ चाहते हैं कि खेती को फिर से जिंदा करने के लिए सरकारी मदद मिले। कुछ की मांग है कि युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट और रोज़गार के अवसर पैदा किए जाएं। एक बात सबमें समान है—अब और राजनीति नहीं, अब समाधान चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या 18 साल की बर्बादी को पलटना इतना आसान है। ज़मीन की उर्वरता लौटाने में वक्त लगता है। Investors का भरोसा लौटाने में उससे भी ज़्यादा। Singur का नाम आज भी विवाद से जुड़ा हुआ है। किसी भी नई योजना के लिए सरकार को न सिर्फ़ पैसे, बल्कि विश्वास भी Investment करना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी का दौरा प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ा है। यह उस अधूरे इतिहास से आमने-सामने होने जैसा है, जिसे देश ने कभी ठीक से सुलझाया नहीं। यह मौका है यह दिखाने का कि क्या भारत पुराने घावों को भर सकता है। क्या विकास और राजनीति के बीच कोई संतुलन बन सकता है। क्या किसान सिर्फ़ वोट बैंक नहीं, बल्कि असली हिस्सेदार बन सकते हैं।

आज Singur शांत है, लेकिन वह शांति खाली नहीं है। उसमें सवाल हैं, उम्मीदें हैं और डर भी है। क्या यहां फिर से मशीनों की आवाज़ गूंजेगी, या खेतों में हरियाली लौटेगी? या फिर सिंगूर हमेशा के लिए एक मिसाल बनकर रह जाएगा—कि जब विकास और राजनीति टकराते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी का होता है। अठारह साल बाद भी Singur सूना है, लेकिन इतिहास बताता है कि कुछ जगहें देर से ही सही, दोबारा खड़ी होती हैं। अब नज़रें प्रधानमंत्री मोदी के दौरे पर हैं। क्योंकि शायद यही वो मोड़ है, जहां Singur की कहानी या तो हमेशा के लिए थम जाएगी… या फिर एक नई शुरुआत लिखी जाएगी।

Conclusion

अक्टूबर 2008… एक घोषणा, और Singur पर छा गया सन्नाटा। जिस ज़मीन पर भविष्य की गाड़ी दौड़नी थी, वहां आज भी खामोशी पसरी है। टाटा नैनो के सिंगूर से गुजरात शिफ्ट होने के 18 साल बाद भी करीब 1000 एकड़ ज़मीन बंजर पड़ी है—न खेती, न फैक्ट्री, बस टूटी उम्मीदें। किसानों ने ज़मीन दी थी रोज़गार और विकास के सपने के साथ, लेकिन राजनीति के टकराव में वही किसान सबसे बड़ा नुकसान झेल गए।

किसी को ट्रेनिंग मिली, किसी को आश्वासन, पर न नौकरी आई न ज़मीन पहले जैसी रही। आज कई किसान ऑटो चलाकर गुज़ारा कर रहे हैं। अब एक बार फिर उम्मीद जागी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Singur आने वाले हैं। सवाल वही है—क्या यह दौरा Singur को नई पहचान देगा, या यह इलाक़ा हमेशा खोए हुए मौक़ों की कहानी बनकर रह जाएगा?

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