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Silver की चमक बढ़ती हुई — भागती हुई Silver, Investors की धड़कनें तेज: खरीदें अभी या करें इंतज़ार? 2025

Silver

सोचिए, आप सुबह उठते हैं, फोन खोलते हैं और पहली खबर यही होती है कि Silver ने फिर नया रिकॉर्ड बना लिया है। कुछ महीने पहले जिस कीमत पर आपने कहा था “इतनी महंगी हो गई, अब नहीं खरीदेंगे”, आज वही कीमत सस्ती लगने लगती है। जनवरी की शुरुआत से ही Silver ने कुछ ऐसी दौड़ लगाई है कि, आम Investor से लेकर बड़े ट्रेडर तक सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं — क्या यह ट्रेन अभी भी चल रही है, या स्टेशन बस आने ही वाला है? क्योंकि जब कोई एसेट रोज़ नया हाई बनाता है, तो डर और लालच दोनों साथ-साथ पैदा होते हैं।

31 दिसंबर 2025 को जब Silver करीब 2 लाख 39 हजार रुपये प्रति किलो पर थी, तब भी लोगों को लगा था कि यह बहुत महंगी हो चुकी है। लेकिन कुछ ही हफ्तों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर मार्च वायदा में, 15 जनवरी को Silver ने करीब 2 लाख 93 हजार रुपये प्रति किलो का स्तर छू लिया।

यानी सिर्फ कुछ हफ्तों में 53 हजार रुपये से ज्यादा की छलांग। बीच-बीच में हल्की गिरावट जरूर आई, लेकिन overall trend ऊपर की तरफ ही रहा। यही वजह है कि आज हर Investor के मन में एक ही कन्फ्यूजन है — अगर अभी नहीं खरीदी तो कहीं मौका निकल न जाए, और अगर अभी खरीद ली तो कहीं ऊंचे भाव पर फंस न जाएं।

अगर पिछले एक साल का डेटा देखें, तो Silver की तेजी किसी भी तरह से छोटी या मामूली नहीं कही जा सकती। इस दौरान Silver ने सोने से भी बेहतर रिटर्न दिया है। आमतौर पर लोग गोल्ड को safe haven मानते हैं और चांदी को उसका छोटा भाई समझते हैं। लेकिन इस बार छोटा भाई ज्यादा तेज़ दौड़ रहा है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इस तेजी के पीछे सिर्फ Investors की speculative buying नहीं है, बल्कि एक बहुत मजबूत structural वजह भी है, और वह है इंडस्ट्रियल डिमांड।

आज की दुनिया में Silver सिर्फ गहनों या सिक्कों तक सीमित नहीं रही है। यह अब एक strategic metal बन चुकी है। सोलर एनर्जी सेक्टर में Silver का रोल बेहद अहम है। एक सोलर पैनल में इस्तेमाल होने वाली सिल्वर पेस्ट उसकी efficiency तय करती है।

पूरी दुनिया ग्रीन एनर्जी की तरफ शिफ्ट हो रही है। भारत हो, चीन हो, अमेरिका हो या यूरोप — हर जगह सोलर capacity तेजी से बढ़ रही है। जैसे-जैसे सोलर पैनल बनेंगे, वैसे-वैसे Silver की मांग बढ़ती जाएगी। और यही मांग आने वाले सालों में भी खत्म होती नहीं दिख रही।

सिर्फ सोलर ही नहीं, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स यानी EVs में भी Silver का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। EVs में पारंपरिक गाड़ियों की तुलना में ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक components होते हैं, और इलेक्ट्रॉनिक्स में Silver का कोई विकल्प नहीं है। इसके अलावा 5G टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर्स, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइसेज और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग — इन सब जगहों पर Silver की जरूरत बढ़ रही है। यही वजह है कि अब बड़े-बड़े फंड्स, फैमिली ऑफिस और HNI investors अपने पोर्टफोलियो में गोल्ड के साथ-साथ सिल्वर को भी गंभीरता से शामिल कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, सप्लाई की कहानी उतनी मजबूत नहीं है। दुनिया में Silver का उत्पादन सीमित है। नई माइंस जल्दी शुरू नहीं होतीं, और कई जगह environmental regulations की वजह से mining मुश्किल होती जा रही है। Silver अक्सर by-product के तौर पर निकलती है, यानी कॉपर, जिंक या लेड की खदानों से। इसका मतलब यह है कि अगर उन मेटल्स की demand घटती है, तो Silver की सप्लाई भी अपने आप कम हो जाती है। इस mismatch ने silver market को tight बना दिया है।

अब सवाल यह है कि आगे Silver कितनी ऊपर जा सकती है? टेक्निकल एनालिसिस देखने वाले एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, जब कोई एसेट लगातार higher high और higher low बना रहा हो, तो trend को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।

मिड टर्म यानी आने वाले कुछ महीनों में Silver 3 लाख से 3.5 लाख रुपये प्रति किलो तक भी जा सकती है, अगर ग्लोबल मार्केट्स से सपोर्ट बना रहा। कुछ ज्यादा bullish एक्सपर्ट्स तो यह भी कहते हैं कि लॉन्ग टर्म में 4 लाख रुपये प्रति किलो का लेवल भी impossible नहीं है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि ये projections पत्थर की लकीर नहीं हैं। Silver की कीमतें ग्लोबल फैक्टर्स पर बहुत ज्यादा depend करती हैं।

अमेरिका की ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, फेडरल रिजर्व के बयान, जियोपॉलिटिकल टेंशन और सट्टेबाजों की पोजिशनिंग — इन सबका असर Silver पर सीधा पड़ता है। अगर डॉलर मजबूत होता है, तो आमतौर पर कमोडिटीज पर दबाव आता है। अगर ब्याज दरें ज्यादा समय तक ऊंची रहती हैं, तो non-yielding assets जैसे गोल्ड और सिल्वर थोड़े कमजोर हो सकते हैं। यही वजह है कि Silver में तेजी जितनी तेज होती है, उतनी ही तेज गिरावट भी देखने को मिलती है।

यही volatility चांदी को खास भी बनाती है और खतरनाक भी। गोल्ड की तुलना में Silver कहीं ज्यादा volatile है। एक ही दिन में इसमें 5 से 7 प्रतिशत का मूव आ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। इसलिए एक्सपर्ट्स आम Investors को चेतावनी देते हैं कि बिना strategy के सिर्फ FOMO यानी डर के कारण Silver खरीदना समझदारी नहीं है। ऊंचे स्तर पर एकमुश्त खरीदारी करने से बेहतर है कि थोड़ा रुककर, सोच-समझकर कदम उठाया जाए।

कुछ मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा तेजी के बाद एक healthy correction आना बिल्कुल normal है। उनके मुताबिक अगर Silver 2.5 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास आती है, तो वह लेवल लॉन्ग टर्म Investors के लिए ज्यादा comfortable हो सकता है। वहीं कुछ दूसरे एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इतनी बड़ी गिरावट शायद न आए, क्योंकि इंडस्ट्रियल डिमांड बहुत मजबूत है। ऐसे में उनकी सलाह है कि हर गिरावट पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खरीदारी की जाए, यानी staggered buying की strategy अपनाई जाए।

हाल के दिनों में कीमतों में थोड़ी नरमी भी देखने को मिली है। इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन के मुताबिक Silver का भाव कुछ समय के लिए घटकर करीब, 2 लाख 81 हजार रुपये प्रति किलो तक आ गया था। इंटरनेशनल मार्केट में भी COMEX पर Silver 90 डॉलर प्रति औंस के आसपास फिसलती नजर आई। लेकिन इसके बावजूद overall sentiment कमजोर नहीं हुआ है। Investors को लग रहा है कि यह गिरावट buying opportunity हो सकती है, न कि trend reversal।

एक और बात जो Investors को समझनी जरूरी है, वह यह कि Silver में Investment करने का तरीका भी मायने रखता है। फिजिकल सिल्वर, सिल्वर ETF, MCX futures या डिजिटल गोल्ड-सिल्वर — हर माध्यम के अपने फायदे और जोखिम हैं। फिजिकल सिल्वर में storage और purity की चिंता होती है। ETF में liquidity आसान होती है, लेकिन market risk बना रहता है। Futures में leverage होता है, लेकिन risk भी उतना ही ज्यादा होता है। इसलिए Investment से पहले यह तय करना जरूरी है कि, आपका टाइम हॉराइजन क्या है और risk appetite कितनी है।

लॉन्ग टर्म की बात करें, तो Silver की कहानी अब सिर्फ price speculation तक सीमित नहीं है। यह energy transition, technology और sustainability से जुड़ चुकी है। दुनिया जिस दिशा में जा रही है, वहां Silver की उपयोगिता कम होने के बजाय बढ़ती ही दिख रही है। यही वजह है कि कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि आने वाले 5 से 10 सालों में Silver एक मजबूत asset class के तौर पर उभर सकती है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कीमतें सीधी लाइन में ऊपर जाएंगी। रास्ते में उतार-चढ़ाव आएंगे, corrections आएंगे, डर भी लगेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि जिन Investors के पास धैर्य और सही strategy होगी, वही इस volatility का फायदा उठा पाएंगे। जल्दबाजी में लिया गया फैसला नुकसान भी करा सकता है।

आम Investors के लिए सबसे समझदारी भरी सलाह यही है कि Silver को short-term jackpot की तरह न देखें। इसे portfolio diversification के हिस्से के रूप में देखें। एक तय proportion में Investment करें, जरूरत से ज्यादा exposure न लें, और हर headline देखकर panic न करें। अगर prices और ऊपर जाती हैं, तो भी आपको पछतावा नहीं होना चाहिए, और अगर correction आता है, तो उसे opportunity के तौर पर देखना चाहिए।

अंत में सवाल वही है, जो हर Investor के मन में घूम रहा है — खरीदें या इंतज़ार करें? इसका जवाब सीधा नहीं है। अगर आप लॉन्ग टर्म Investor हैं, तो हर गिरावट पर धीरे-धीरे खरीदारी एक बेहतर रणनीति हो सकती है। अगर आप short-term trader हैं, तो risk बहुत ज्यादा है और timing बेहद जरूरी है। और अगर आप बिल्कुल नए Investor हैं, तो सबसे पहले सीखना और समझना ज्यादा जरूरी है, न कि भागती हुई कीमतों के पीछे दौड़ना।

Silver आज सिर्फ एक धातु नहीं है, यह एक कहानी है — बदलती दुनिया की, बदलती टेक्नोलॉजी की और बदलते Investment के नजरिए की। सवाल सिर्फ इतना है कि इस कहानी में आप किस किरदार में रहना चाहते हैं — जल्दबाजी करने वाले दर्शक या धैर्य रखने वाले Investor। क्योंकि बाजार हमेशा मौका देता है, लेकिन वही मौका सही सोच वालों के लिए होता है।

Conclusion

जनवरी की ठंडी सुबह… और Silver ने ऐसा उछाल मारा कि Investor चौंक गए। कुछ ही हफ्तों में चांदी रिकॉर्ड तोड़कर करीब 3 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच गई। सवाल यही है—अब खरीदें या रुकें? बीते एक साल में Silver ने सोने से भी बेहतर रिटर्न दिया है। वजह सिर्फ Investment नहीं, बल्कि इसकी बढ़ती औद्योगिक ताकत है।

सोलर एनर्जी, EV, 5G, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स—हर जगह Silver की मांग तेज़ है, जबकि सप्लाई सीमित बनी हुई है। यही दबाव कीमतों को ऊपर धकेल रहा है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मिड टर्म में Silver 3 से 3.5 लाख और लंबी अवधि में 4 लाख तक जा सकती है। लेकिन सावधान रहें—Silver बहुत volatile है। ऊंचे स्तर पर एकमुश्त खरीद जोखिम भरी हो सकती है। बेहतर रणनीति है करेक्शन पर धीरे-धीरे Investment। जल्दबाज़ी नहीं, समझदारी ज़रूरी है।  

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