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Shravan Kumar का कमाल: शून्य से शुरू होकर अरबों का Global Business बनाने की सच्ची यात्रा I 2026

Shravan Kumar

रात के अंधेरे में एक परिवार ट्रक की पीछे की बॉडी में चुपचाप बैठा था। हाथ में बस कुछ कपड़े, थोड़ा सा सामान और दिल में अनगिनत सवाल। सरहद पार करते समय किसी को नहीं पता था कि आगे क्या होगा। डर यह था कि कहीं सब कुछ यहीं खत्म न हो जाए। जिज्ञासा यह थी कि क्या नई जमीन पर नई किस्मत लिखी जा सकती है। और इसी अनिश्चितता के बीच एक किशोर लड़का खामोश बैठा था, जिसका नाम था Shravan Kumar। वही श्रवण, जो आने वाले दशकों में बिना किसी बड़ी डिग्री के ऐसा कारोबार खड़ा करेगा, जिसकी गूंज 50 देशों तक जाएगी।

Shravan Kumar माहेश्वरी का जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हुआ था। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद हालात ऐसे बने कि उनका परिवार 1972 में भारत आ गया। जेब में ज्यादा पैसे नहीं थे, न कोई बड़ी पहचान, न कोई नेटवर्क। बस एक भरोसा था कि मेहनत की जाए तो जमीन अपना लेती है। परिवार राजस्थान के बाड़मेर में आकर बस गया। यह इलाका अपने सूखे मौसम और सीमित संसाधनों के लिए जाना जाता है। यहां जिंदगी आसान नहीं थी। लेकिन Shravan Kumar के लिए यह संघर्ष की शुरुआत थी, हार की नहीं।

उन्होंने मैट्रिक तक पढ़ाई की थी। उसके बाद परिस्थितियों ने उन्हें किताबों से ज्यादा जिंदगी का पाठ पढ़ाया। स्टेशन रोड पर एक छोटी सी किराने की दुकान खोली गई। वही दुकान उनके सपनों की पहली प्रयोगशाला बनी। सुबह से रात तक दुकान पर बैठना, ग्राहकों से व्यवहार सीखना, उधार देना, हिसाब रखना—यह सब उनका management school था। उन्होंने देखा कि व्यापार सिर्फ सामान बेचने का नाम नहीं, भरोसा बेचने का नाम है। धीरे-धीरे इलाके में उनकी पहचान बनने लगी—ईमानदार, मेहनती और वादा निभाने वाले व्यापारी के रूप में।

लेकिन Shravan Kumar सिर्फ रोज की बिक्री से संतुष्ट नहीं थे। वे समझते थे कि अगर बड़ा करना है, तो commodity trade से आगे बढ़ना होगा। 1980 का दशक उनके जीवन में turning point लेकर आया। उस समय राजस्थान और हरियाणा के कुछ हिस्सों में ग्वार की खेती बड़े पैमाने पर होती थी। ग्वार से बनने वाला ग्वार गम international market में demand में था। यह food industry, pharmaceuticals, cosmetics और सबसे अहम oil drilling में इस्तेमाल होता था। अमेरिका में shale gas और oil exploration बढ़ रहा था, जहाँ hydraulic fracturing process में ग्वार गम stabilizer की तरह काम करता है।

Shravan Kumar ने इस opportunity को पहचाना। उन्होंने Mahesh Agro Food Industries की स्थापना की। शुरुआत आसान नहीं थी। processing technology की समझ सीमित थी, market access कम था और export procedures जटिल थे। लेकिन उन्होंने research शुरू की। उन्होंने देखा कि international buyers quality standards को लेकर बेहद सख्त होते हैं। viscosity, purity level, microbiological safety—हर parameter पर ध्यान देना पड़ता है। उन्होंने स्थानीय स्तर पर raw material sourcing मजबूत की और processing unit लगाने का फैसला किया।

शुरुआती सालों में कई बार consignments reject हुए। export documentation में errors हुए। payments delay हुईं। लेकिन उन्होंने हर गलती को सीख में बदला। उन्होंने modern machinery लगाई, automatic plants install किए और quality control lab स्थापित की। धीरे-धीरे उनके products international standards पर खरे उतरने लगे। Germany, United States, China, Russia, United Kingdom और Japan जैसे देशों में orders मिलने लगे। एक छोटे किराना दुकानदार का बेटा अब global supply chain का हिस्सा बन चुका था।

ग्वार गम की कहानी भी दिलचस्प है। भारत दुनिया के ग्वार उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा देता है। राजस्थान इस उत्पादन का केंद्र है। 2012 में जब global oil prices बढ़े और shale drilling boom आया, तो ग्वार की कीमतें आसमान छूने लगीं। उस दौर में ग्वार को “green gold” कहा जाने लगा। Shravan Kumar जैसे उद्यमियों ने इस अवसर को भुनाया। लेकिन उन्होंने speculative approach नहीं अपनाई। उन्होंने long-term contracts, diversified markets और stable pricing strategy पर जोर दिया।

उनका वार्षिक टर्नओवर 250 करोड़ रुपये तक पहुँच गया। लेकिन यह सिर्फ revenue की कहानी नहीं है। यह ecosystem बनाने की कहानी है। उन्होंने local किसानों से सीधे ग्वार खरीदने की व्यवस्था बनाई। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई और किसानों को बेहतर कीमत मिली। उनकी factory में सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला—मजदूर, engineers, technicians, marketing professionals। एक migrant परिवार से निकला उद्यमी अब regional economy का pillar बन चुका था।

जब उनसे पूछा गया कि बिना डिग्री के इतना बड़ा साम्राज्य कैसे बनाया, तो उनका जवाब सीधा था—“कड़ी मेहनत और confidence।” उन्होंने कभी डिग्री की कमी को बाधा नहीं माना। उनका मानना था कि business degree से ज्यादा जरूरी है market की नब्ज पहचानना। उन्होंने international trade fairs attend किए, buyers से सीधे बातचीत की और global demand patterns समझे। digital communication के दौर में उन्होंने email, video conferencing और online documentation को जल्दी अपनाया।

transport network

उनकी सफलता का एक बड़ा कारण adaptability था। जब oil industry में demand कम हुई, तो उन्होंने food grade और pharma grade ग्वार गम पर फोकस बढ़ाया। उन्होंने product diversification किया—guar splits, refined guar powder और customized blends। इस diversification ने उन्हें cyclical fluctuations से बचाया। उन्होंने sustainability पर भी ध्यान दिया। processing में water recycling systems लगाए और waste management practices अपनाईं।

कहानी का एक भावनात्मक पहलू भी है। जब कोई व्यक्ति सीमाओं के पार से आकर नई पहचान बनाता है, तो वह सिर्फ अपना जीवन नहीं बदलता, बल्कि उस समाज को भी बदलता है जो उसे अपनाता है। बाड़मेर जैसे क्षेत्र में उद्योग स्थापित करना आसान नहीं था। infrastructure सीमित, logistics challenging। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे supply chain मजबूत की। ports तक raw material और finished goods पहुँचाने के लिए transport network तैयार किया। export compliance और certification के लिए international consultants से काम लिया।

आज Mahesh Agro Food Industries का नाम international buyers की सूची में सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके products 50 से अधिक देशों में पहुँचते हैं। global trade data के अनुसार, India से ग्वार गम export का बड़ा हिस्सा US और Europe को जाता है। ऐसे competitive market में टिके रहना आसान नहीं। लेकिन Shravan Kumar की strategy clear रही—quality compromise नहीं, payment discipline सख्त और relationship building पर जोर।

उन्होंने अपने कर्मचारियों के लिए training programs शुरू किए। factory में safety standards लागू किए। local youth को technical skills सिखाए। कई परिवारों की आजीविका सीधे इस उद्योग से जुड़ गई। जब किसान अपनी फसल बेचते हैं और बेहतर आय पाते हैं, तो गांव की economy में multiplier effect होता है। छोटे दुकानदारों, transporters, service providers—सबको फायदा मिलता है। एक entrepreneur का impact कितनी परतों में फैलता है, यह इस कहानी से समझ आता है।

आज के युवा अक्सर पूछते हैं कि क्या बिना MBA या engineering degree के बड़ा business खड़ा किया जा सकता है। Shravan Kumar की कहानी इसका जीवंत उत्तर है। उन्होंने साबित किया कि practical knowledge, risk-taking ability और ethical conduct किसी भी formal degree से कम नहीं। उन्होंने यह भी दिखाया कि migration weakness नहीं, strength हो सकती है। नई जमीन पर नई शुरुआत करना कठिन जरूर है, असंभव नहीं। जब वे अपने शुरुआती दिनों को याद करते हैं, तो कहते हैं कि किराने की दुकान ने उन्हें सबसे बड़ा lesson दिया—customer is king।

ही principle उन्होंने export business में लागू किया। buyer satisfaction, timely delivery और consistent quality—इन तीन pillars पर उनका empire खड़ा है। उन्होंने cash flow management को प्राथमिकता दी। unnecessary debt से बचा और profits को reinvest किया। यही disciplined growth उन्हें टिकाऊ बनाती है।

दुनिया की राजनीति, currency fluctuations, trade barriers—इन सबका असर export business पर पड़ता है। लेकिन उन्होंने risk hedging strategies अपनाईं। diversified markets, multiple currencies में invoicing और long-term contracts से volatility कम की। यह sophistication बिना formal finance degree के हासिल करना उनकी learning ability को दर्शाता है।

कभी जो लड़का सरहद पार करते समय अनिश्चित भविष्य देख रहा था, आज वही उद्योगपति global conferences में भाग लेता है। लेकिन उनकी जड़ें आज भी बाड़मेर की मिट्टी में हैं। वे स्थानीय समुदाय के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, शिक्षा और सामाजिक पहल में योगदान देते हैं। उनके लिए सफलता सिर्फ balance sheet का आंकड़ा नहीं, सामाजिक सम्मान और आत्मविश्वास का नाम है।

कहानी के आखिर में वही सवाल लौटता है जिससे हमने शुरुआत की थी। क्या सीमाएं इंसान को रोक सकती हैं? क्या डिग्री की कमी सपनों को सीमित कर सकती है? Shravan Kumar की यात्रा कहती है—नहीं। डर के उस पार अवसर छिपे होते हैं। जिज्ञासा ही रास्ता दिखाती है। और मेहनत वह पुल है जो अतीत की अनिश्चितता को भविष्य की स्थिरता से जोड़ देता है।

यह सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है कि अगर इरादा साफ हो और मेहनत सच्ची, तो सीमाएं नक्शे पर होती हैं, किस्मत पर नहीं। पाकिस्तान के सिंध से लेकर भारत के बाड़मेर और वहां से 50 देशों तक फैला यह सफर, हमें याद दिलाता है कि entrepreneurship सिर्फ कारोबार नहीं, साहस का दूसरा नाम है। और शायद यही वजह है कि आज भी जब कोई युवा बिना डिग्री के बड़ा सपना देखता है, तो Shravan Kumar माहेश्वरी की कहानी उसे यह भरोसा देती है—कि रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन मंजिल नामुमकिन नहीं।

Conclusion

एक परिवार सरहद पार करता है। जेब में थोड़े पैसे, हाथ में कोई डिग्री नहीं, और पीछे छूट गया पूरा वतन। डर ये कि नए देश में पहचान कैसे बनेगी? और जिज्ञासा ये कि क्या एक किराने की छोटी दुकान से अरबों का कारोबार खड़ा किया जा सकता है? ये कहानी है पाकिस्तान के सिंध में जन्मे Shravan Kumar माहेश्वरी की। 1972 में भारत आए, बाड़मेर में स्टेशन रोड पर छोटी सी किराने की दुकान खोली।

मैट्रिक तक पढ़ाई… लेकिन हौसला पूरा। 1980 में उन्होंने ग्वार गम इंडस्ट्री में कदम रखा और Mahesh Agro Food Industries शुरू की। शुरुआत में बाजार की समझ नहीं थी, मुश्किलें आईं, लेकिन क्वालिटी और टेक्नोलॉजी पर फोकस किया। धीरे-धीरे उनके प्रोडक्ट्स 50 देशों तक पहुंचने लगे। आज टर्नओवर 250 करोड़ रुपये… और सैकड़ों लोगों को रोजगार। लेकिन इस सफर में एक ऐसा फैसला आया, जिसने सबकुछ दांव पर लगा दिया…

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