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Sheikh Hasina: विकास की मिसाल से लेकर विवादों की आँधी तक — एक साम्राज्य का अनसुना पतन I 2025

Sheikh Hasina

ढाका की उस रात हवा में एक अजीब सा तनाव तैर रहा था, जैसे शहर अपनी साँसें रोककर किसी बड़े धमाके का इंतज़ार कर रहा हो। सड़कें शांत थीं, लेकिन इस शांत सतह के नीचे कुछ ऐसा चल रहा था जिसकी कंपन पूरे देश की नसों तक पहुँच चुकी थीं। रात के साढ़े तीन बजे एक काली SUV इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के गेट से अंदर घुसी, और उसके तुरंत बाद मीडिया वैनों का हूजूम एक साथ कोर्टरूम की तरफ दौड़ पड़ा।

कैमरे चमकने लगे, सुरक्षा बलों की आवाज़ गूँजने लगी, और कुछ ही मिनटों बाद—वो खबर आई जिसने बांग्लादेश के इतिहास को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बाँट दिया। “पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina को फांसी की सज़ा सुनाई गई है।” यह वाक्य बिजली की तरह ढाका की हवा में फट कर बरसा, और फिर पूरे बांग्लादेश में तूफान की गति से फैल गया। लोग चौंक गए, स्तब्ध हो गए, कुछ रो पड़े, कुछ खुशी मनाने लगे—लेकिन किसी को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि जिस महिला ने दशकों तक बांग्लादेश पर शासन किया, जिसने अपने कार्यकाल में खुद को ‘मदर ऑफ द नेशन’ कहलवाया, वही आज अदालत में अपराधी करार दी गई थी।

ट्रिब्यूनल की इमारत के भीतर वह माहौल किसी फिल्म के आखिरी दृश्य जैसा था—जहां सारी परतें खुल चुकी थीं, सारे सच सामने आ चुके थे, और अब बस अंतिम फैसला सुनाना बाकी था। जज ने फाइल के पन्ने पलटे, कोर्टरूम की सन्नाटेदार ऊर्जा को महसूस किया, और फिर शांत मगर भारी आवाज़ में—फैसला पढ़ना शुरू किया।

पांच अपराधों में से तीन में दोषी। हत्या, हत्या के लिए उकसाने और मानवता के खिलाफ दमन—ये तीन आरोप ऐसे थे जिनके बाद बचने का कोई रास्ता नहीं था। अदालत ने साफ कहा कि यह फैसला सिर्फ़ कानून का नहीं, बल्कि पीड़ितों का न्याय है। और जैसे ही फैसले के आखिरी शब्द पढ़े गए, कोर्टरूम की हवा बदल गई। गलियारे में मौजूद हर व्यक्ति समझ गया कि अब बांग्लादेश में राजनीतिक भूचाल आने वाला है।

यह फैसला अचानक नहीं आया था। इस कहानी की शुरुआत उससे पहले हुई, जब अगस्त 2024 में बांग्लादेश की सड़कों पर हिंसा फैलने लगी थी। प्रदर्शनकारी राजधानी के हर चौराहे पर जुटने लगे थे। इंटरनेट बंद, मीडिया पर प्रतिबंध, सड़कें सेना की गाड़ियों से भरी हुई—बांग्लादेश उस दौर में घिर चुका था जब एक लोकतांत्रिक सरकार अपनी ही जनता से डरने लगी थी। और फिर, एक दिन अचानक, सेना ने सत्ता संभाल ली। सिर्फ़ 45 मिनट। इतना समय दिया गया Sheikh Hasina को देश छोड़ने के लिए। जिसने 15 वर्षों तक लोहे की पकड़ से देश को चलाया था, वही महिला आज एक suitcase उठाकर भागने को मजबूर थी। यह विडंबना नहीं, इतिहास का एक क्रूर व्यंग्य था।

उस रात जब सेना ने उनका निवास घेर लिया, तो ढाका के आसमान में हेलीकॉप्टर लगातार मंडरा रहे थे। सुरक्षा बलों ने उन्हें “देश छोड़ दो या गिरफ्तार हो जाओ”—इसमें से एक विकल्प दिया। और फिर, एक काली कार रात के अंधेरे में सीमा की तरफ चली गई। यह भागना नहीं था, यह एक युग का अंत था। और आज वही महिला—एक ट्रिब्यूनल में फांसी की सज़ा सुनकर इतिहास की सबसे विवादित नेताओं में शामिल हो चुकी थी।

अब सवाल उठने लगे—Sheikh Hasina की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या रही? कितनी संपत्ति है? इतनी शक्ति, इतना धन—यह सब कैसे बना? और क्या सत्ता ने उनके हाथों को वह खून से रंग दिया, जिसके लिए आज उन्हें यह सज़ा मिली?

Sheikh Hasina की कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है। यह बांग्लादेश के जन्म से जुड़ी एक त्रासदी है। वह बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी थीं—वही व्यक्ति जिन्हें बांग्लादेश का जनक कहा जाता है। 15 अगस्त 1975 की सुबह जब सैन्य अधिकारियों ने उनके पिता, उनकी माँ, और तीन भाइयों की घर में घुसकर हत्या कर दी, तब दुनिया के लिए यह एक राजनीतिक हत्या थी—लेकिन हसीना के लिए यह बचपन का सबसे बड़ा घाव था। हसीना और उनकी छोटी बहन शेख रेहाना उसी वजह से बच गईं क्योंकि वे विदेश में थीं। उस दिन के बाद—सत्ता, सुरक्षा और भरोसा—इन तीनों ने उनके जीवन से जैसे हमेशा के लिए दूरी बना ली।

1981 में निर्वासन खत्म होने के बाद जब वह ढाका लौटीं, तब भी उस घर में गोली के निशान मौजूद थे जिस घर में उनका पूरा परिवार मार दिया गया था। वह घर अब संग्रहालय है, लेकिन हसीना के अंदर जो दर्द भरा था—वह कभी संग्रहालय में बदल नहीं पाया। और शायद यही दर्द उनकी राजनीति का ईंधन बन गया। उनका शासन, उनकी दृढ़ता और उनका क्रोध—सब इस अतीत से गहराई से जुड़ा था।

लेकिन सत्ता हमेशा इंसान को बदल देती है। 1968 में भौतिक विज्ञानी एमए वाजेद मिया से उनकी शादी ने उनके जीवन को स्थिरता दी। मिया एक शांत स्वभाव के वैज्ञानिक थे, किताबों, प्रयोगशालाओं और शोध की दुनिया में जीने वाले व्यक्ति। वह राजनीति से दूर थे, लेकिन हसीना की राजनीति की आँधी से खुद को बचा नहीं पाए। 2009 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनके दो बच्चे हुए—साजीब वाजेद जॉय, जो बाद में देश के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद राजनीतिक रणनीतिकारों में गिने गए, और साइमा वाजेद, जो मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में एक प्रमुख चेहरा बनीं। परिवार छोटा था, लेकिन प्रभाव विशाल।

अब बात आती है उस विषय पर जिस पर पूरे देश में चर्चा शुरू हो गई—Sheikh Hasina की संपत्ति। एक समय था जब वह खुद को “सरकारी वेतन वाली, साधारण जीवन जीने वाली” महिला बताती थीं। लेकिन ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद जब उनके संपत्ति के दस्तावेजों का अध्ययन किया गया, तब तस्वीर कुछ और ही निकली।

वह बांग्लादेश के इतिहास की सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली प्रधानमंत्री थीं—और उनकी संपत्ति इसका प्रमाण भी दे रही थी। चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में उन्होंने अपनी कुल संपत्ति 4.36 करोड़ रुपये बताई थी। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि आधिकारिक संपत्ति हमेशा वास्तविक संपत्ति का छोटा हिस्सा होती है—और यह बात आम जनता भी जानती है।

उनके 75 लाख के फिक्स्ड डिपॉजिट, बचत बांड, करोड़ों की कृषि आय, विदेशी संपत्तियों में निवेश, और उन जमीनों की कीमत जो उनके परिवार के नाम दर्ज थीं—इन सबने उनकी संपत्ति को कई गुना बढ़ाया। उनके पास 6 एकड़ खेती वाली जमीन थी, जिस पर सालाना लाखों का उत्पादन होता था। मछली पालन से अलग आय होती थी। उनके पास एक कार थी, जिसे उन्होंने बताया था कि यह उपहार में मिली है—लेकिन विरोधियों का दावा था कि उनके परिवार के पास तीन देशों में सात से अधिक luxury vehicles हैं।

हसीना का पूरा वित्तीय ढांचा हमेशा से विवादों में रहा। क्योंकि राजनीतिक आलोचक कहते थे कि उनके चौथे कार्यकाल के दौरान आर्थिक नीतियाँ इतनी केंद्रीकृत थीं कि सरकारी ठेके, भूमि आवंटन और बड़े प्रोजेक्ट मुख्यतः उन्हीं कंपनियों को दिए गए जिनका संबंध उनकी पार्टी या परिवार से था। यह आरोप कभी अदालत में सिद्ध नहीं हुए—लेकिन यह उन प्रश्नों में से एक हैं जो हर राजनीतिक गलियारे में गूँजते रहे।

अब सवाल यह भी उठता है—फांसी की सज़ा मिलने के बाद उनकी संपत्ति का क्या होगा? ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार उनकी सभी स्थानीय संपत्तियों को ज़ब्त किया जा चुका है। विदेशी संपत्तियों को भी फ्रीज़ करने का आदेश दिया जा चुका है। उनकी पार्टी टूट चुकी है, सहयोगी भाग चुके हैं, और परिवार के कुछ सदस्य देश से बाहर हैं। यह विडंबना है कि जो महिला कभी दक्षिण एशिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में गिनी जाती थीं—आज वही अपने ही साम्राज्य के मलबे के नीचे दबी पड़ी हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि यह सब शुरू कैसे हुआ? सत्ता से गिरना एक घटना नहीं, एक प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ा। शिक्षा सुधार, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार—इन मुद्दों पर हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए। ढाका विश्वविद्यालय से लेकर रौकेया विश्वविद्यालय तक, एक लहर उठी जिसने सरकार की नींव हिला दी। हसीना ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया, विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की आवाज़ कहा—लेकिन असल में यह राजनीति नहीं, एक पीढ़ी की पुकार थी।

फिर हुआ वह घटना जिसने इस कहानी का मोड़ बदल दिया। 16 जुलाई को छात्र अबू सैयद की हत्या। यह हत्या सिर्फ एक घटना नहीं थी—यह एक आग थी जिसने पूरे देश को जला दिया। उसके बाद ढाका के चांखारपुल में हुई छह प्रदर्शनकारियों की मौत और फिर वह वीभत्स घटना जिसमें पाँच लोगों को जिंदा जलाया गया—इन सबने जनता को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि सत्ता अब लोकतंत्र नहीं, दमन का दूसरा नाम बन चुकी है। यही वे घटनाएँ थीं जिनके बाद सेना ने हस्तक्षेप किया और ट्रिब्यूनल गठित किया गया।

अब बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक नेता का अंत नए देश का आरंभ बन सकता है। लेकिन यह आरंभ कैसा होगा? क्या यह न्याय का दौर होगा या बदले की नई राजनीति का? क्या यह स्थिरता लाएगा या अराजकता बढ़ाएगा? इन सवालों का उत्तर आने वाले समय में मिलेगा।

आज ढाका की सड़कों पर सन्नाटा है। अदालत की इमारत के बाहर टंगे पोस्टरों को हवा हिलाती है। कहीं कोई “न्याय हुआ” के नारे लगा रहा है, कहीं कोई “राजनीतिक हत्या है” चिल्ला रहा है। और इन दो छोरों के बीच खड़ी है एक देश की टूटी हुई आत्मा।

Sheikh Hasina की कहानी शायद अब खत्म हो गई है। लेकिन बांग्लादेश की कहानी अभी भी लिखी जा रही है। यह देश फैसला करेगा कि वह अपने अतीत के घावों को ढोएगा या नई शुरुआत करेगा। सत्ता गई, संपत्ति ज़ब्त हुई, पद छिना—लेकिन इतिहास याद रखेगा कि किसी भी नेता के लिए सबसे बड़ी संपत्ति जनता का भरोसा होती है। और जब वह भरोसा टूट जाता है, तो दुनिया का कोई बैंक, कोई जमीन, कोई सत्ता—उसे वापस नहीं ला सकती।

Conclusion

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