सोचिए… न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में बैठा एक अमेरिकी रेगुलेटर यह मानकर चलता है कि दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी का एक कारोबारी, एक ईमेल या एक आधिकारिक नोटिस से कानूनी कटघरे में खड़ा हो जाएगा। लेकिन तभी फाइल पलटती है, और सामने आता है एक ठंडा लेकिन सख्त जवाब—“समन वापस भेजा जाता है।” न एक बार, बल्कि दो बार। और वो भी भारत के कानून मंत्रालय की तरफ से। इसी एक फैसले ने गौतम अदाणी और अमेरिकी SEC के बीच चल रही कानूनी लड़ाई को सिर्फ एक बिज़नेस केस नहीं, बल्कि संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और पावर बैलेंस की कहानी बना दिया। सवाल उठता है—क्या ये सिर्फ एक तकनीकी आपत्ति है, या भारत ने जानबूझकर एक सीमा खींच दी है?
आपको बता दें कि अदाणी ग्रुप और अमेरिका के सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन, यानी SEC, के बीच ये तनाव कोई नई बात नहीं है। लेकिन ताजा घटनाक्रम ने इस पूरे मामले को एक अलग लेवल पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी अदालत में दाखिल दस्तावेज़ बताते हैं कि भारत के कानून मंत्रालय ने, गौतम अदाणी और उनके भतीजे सागर अदाणी को भेजे गए अमेरिकी समन को तामील कराने से साफ इनकार कर दिया। इसका मतलब ये नहीं कि भारत ने किसी को क्लीन चिट दे दी है, बल्कि इसका मतलब है कि भारत ने कहा—“हमारे नियमों के हिसाब से खेल होगा।”
सबसे पहले समझते हैं कि मामला है क्या। नवंबर 2024 में अमेरिकी SEC ने एक सिविल शिकायत दायर की। आरोप ये लगाया गया कि सितंबर 2021 में Adani Green Energy Limited से जुड़े, एक debt offering के दौरान Investors को गलत या भ्रामक जानकारी दी गई। SEC का कहना है कि कुछ महत्वपूर्ण जोखिमों और तथ्यों को या तो छुपाया गया, या ठीक से disclose नहीं किया गया। ये आरोप अमेरिकी securities laws के तहत fraud से जुड़े हुए हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि यह मामला आपराधिक नहीं, बल्कि सिविल है। यानी इसमें जेल की सजा नहीं, बल्कि जुर्माना, प्रतिबंध या disgorgement जैसे उपाय हो सकते हैं। लेकिन इसी केस की पृष्ठभूमि में US Department of Justice यानी, DOJ ने रिश्वतखोरी और FCPA जैसे कानूनों से जुड़े अलग आरोपों की जांच की, जिसके बाद अदाणी ग्रुप ने 600 मिलियन डॉलर का एक बॉन्ड इश्यू वापस ले लिया। यहीं से international investors की नजर इस पूरे मामले पर टिक गई।
अब आते हैं असली मोड़ पर। मई 2025 में SEC ने पहली बार भारत को आधिकारिक तौर पर समन भेजा। ये समन Hague Service Convention के तहत भेजा गया था। ये एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसके तहत एक देश दूसरे देश में कानूनी दस्तावेज़ों की तामील करा सकता है। अमेरिका और भारत—दोनों इस कन्वेंशन के साइनटरी हैं। SEC को भरोसा था कि प्रक्रिया के तहत समन भारत पहुंच जाएगा और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
लेकिन यहीं भारत के कानून मंत्रालय ने पहली आपत्ति दर्ज की। मंत्रालय ने कहा कि समन के साथ भेजे गए कवर लेटर पर न तो स्याही से किया गया हस्ताक्षर था और न ही आधिकारिक मुहर। सुनने में ये बात छोटी लग सकती है, लेकिन सरकारी और कूटनीतिक मामलों में यही छोटी बातें सबसे बड़ी होती हैं। भारत का तर्क साफ था—बिना सिग्नेचर और सील के किसी दस्तावेज़ की प्रामाणिकता की पुष्टि कैसे की जाए? कानून मंत्रालय ने इसे तकनीकी खामी नहीं, बल्कि procedural defect माना।
SEC ने शायद सोचा होगा कि ये बस एक formality है, जिसे ठीक करके दोबारा भेजा जा सकता है। दिसंबर 2025 में SEC ने दस्तावेज़ फिर से भेजे। इस बार उसने एक अलग तर्क दिया। SEC ने Hague Convention की Practical Handbook का हवाला देते हुए कहा कि, इस कन्वेंशन के तहत ऐसे औपचारिक हस्ताक्षर या मुहर की अनिवार्यता नहीं है। SEC का कहना था कि कुछ देशों द्वारा इस आधार पर समन लौटाना गलत प्रैक्टिस है।
लेकिन भारत इस दलील से सहमत नहीं हुआ। दूसरी बार भी कानून मंत्रालय ने समन लौटा दिया। इस बार वजह और भी दिलचस्प थी। मंत्रालय ने अमेरिकी नियमों, खासतौर पर SEC Rule 5(b), का हवाला दिया और कहा कि जिस तरह का “समन” जारी किया गया है, वो उन श्रेणियों में नहीं आता, जिनकी तामील भारत Hague Convention के तहत करता है। सरल शब्दों में—भारत ने कहा कि ये समन हमारी समझ और हमारी कानूनी व्याख्या के मुताबिक, इस अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया के दायरे में ही नहीं आता। यहीं से कहानी सिर्फ Adani versus SEC नहीं रह जाती। ये बन जाती है jurisdiction की लड़ाई। सवाल ये है कि क्या अमेरिकी रेगुलेटर को भारत में बैठे किसी भारतीय नागरिक को सीधे समन भेजने का अधिकार है? और अगर है भी, तो किन शर्तों पर?
भारत का रुख यहां बेहद सख्त लेकिन calculated दिखता है। ये पहला मौका नहीं है जब भारत ने विदेशी समन पर सवाल उठाए हों। भारत हमेशा से इस बात पर जोर देता रहा है कि किसी भी विदेशी अदालत, या रेगुलेटर की प्रक्रिया भारतीय कानून और संप्रभुता के दायरे में ही लागू हो सकती है। यही वजह है कि extradition से लेकर दस्तावेज़ों की तामील तक, भारत बेहद cautious रहता है।
अब अमेरिका के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई है। SEC का कहना है कि अगर Hague Convention के जरिए समन सर्व नहीं हो पा रहा, तो उसे alternative methods अपनाने की इजाजत दी जाए। इसी वजह से SEC ने न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट से मांग की है कि, उन्हें ईमेल के जरिए गौतम अदाणी और सागर अदाणी को समन भेजने की अनुमति दी जाए।
अमेरिकी कानून में कुछ खास परिस्थितियों में ऐसी अनुमति दी जा सकती है, लेकिन ये एक extraordinary कदम माना जाता है। SEC की दलील है कि अदाणी ग्रुप एक global entity है, जिसकी गतिविधियों का असर अमेरिकी Investors पर पड़ा है। इसलिए उन्हें अमेरिकी अदालत के सामने जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन भारत का मौन—या कहें, सख्त रुख—ये संकेत देता है कि भारत इस मामले को सिर्फ एक कॉर्पोरेट विवाद नहीं मान रहा, बल्कि इसे एक sovereign process के तौर पर देख रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर बाजार पर भी तुरंत दिखा। जैसे ही ये खबर आई कि भारत ने दूसरी बार भी समन लौटा दिया है, अदाणी ग्रुप के शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। Investors में घबराहट साफ दिखी। क्योंकि बाजार uncertainty से डरता है—और ये मामला uncertainty से भरा हुआ है।
अब सवाल उठता है—अदाणी ग्रुप का स्टैंड क्या है? ग्रुप ने बार-बार कहा है कि SEC के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। उनका कहना है कि ये मामला सिविल है, आपराधिक नहीं। Adani Green Energy इस केस में पार्टी भी नहीं है। ग्रुप ने ये भी साफ किया है कि उनके खिलाफ न तो रिश्वतखोरी के आरोप हैं, और न ही FCPA के तहत कोई चार्जशीट दाखिल की गई है। यानी उनकी तरफ से संदेश साफ है—“हम कानून का सम्मान करते हैं, लेकिन बेबुनियाद आरोपों से डरते नहीं।”
इस केस का एक बड़ा पहलू geopolitics से भी जुड़ता है। आज भारत और अमेरिका strategic partners हैं। Quad से लेकर defense deals तक, दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हुए हैं। ऐसे में एक भारतीय कारोबारी के खिलाफ अमेरिकी रेगुलेटर की आक्रामकता, और भारत का सख्त जवाब—ये दिखाता है कि आर्थिक रिश्ते मजबूत हो सकते हैं, लेकिन कानूनी और संप्रभुता के मामले में कोई देश पीछे हटने को तैयार नहीं।
कई legal experts मानते हैं कि भारत का ये कदम एक precedent सेट कर सकता है। अगर भारत बिना सवाल किए ऐसे समन स्वीकार कर लेता, तो भविष्य में किसी भी भारतीय कंपनी या व्यक्ति को विदेशी अदालतों से सीधे नोटिस मिलने का रास्ता खुल जाता। भारत शायद इस slippery slope से बचना चाहता है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी सिस्टम भी अपने investors को ये संदेश देना चाहता है कि चाहे कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर अमेरिकी बाजार से पैसा उठाया है, तो जवाबदेही तय होगी। यही वजह है कि SEC पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा।
अब कहानी आगे कहां जाएगी? अगर अमेरिकी कोर्ट ईमेल सर्विस की इजाजत दे देती है, तो कानूनी लड़ाई एक नए फेज में प्रवेश करेगी। अगर नहीं, तो SEC को या तो भारत के साथ diplomatic/legal route तलाशना होगा, या फिर अपने केस को सीमित दायरे में आगे बढ़ाना पड़ेगा।
एक बात तय है—ये मामला सिर्फ अदाणी ग्रुप या SEC का नहीं रहा। ये उस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है कि globalised दुनिया में कानून की सीमाएं कहां तक जाती हैं। क्या एक देश का रेगुलेटर दूसरे देश के नागरिक को अपने नियमों के तहत खड़ा कर सकता है? और अगर हां, तो किस कीमत पर?
Conclusion
एक समन… एक बड़ा कारोबारी नाम… और अचानक भारत सरकार का “नो एंट्री” बोर्ड। यही है गौतम अदाणी मामले का नया ट्विस्ट, जिसने बाजार से लेकर वॉशिंगटन तक हलचल मचा दी है। सवाल उठता है—भारत ने अमेरिकी SEC का समन आखिर क्यों लौटा दिया? दरअसल, कानून मंत्रालय ने दो बार साफ कहा कि अमेरिकी दस्तावेज़ कानूनी तौर पर पूरे नहीं हैं। पहली बार समन इसलिए लौटा, क्योंकि उस पर न स्याही से हस्ताक्षर थे, न आधिकारिक मुहर। दूसरी बार मंत्रालय ने अमेरिकी नियमों का हवाला देकर कहा कि, इस तरह के समन भारत में मान्य प्रक्रिया के तहत तामील नहीं किए जा सकते।
SEC का आरोप है कि 2021 के एक बॉन्ड इश्यू में Investors को गुमराह किया गया। भारत के रुख के बाद अब SEC ईमेल से समन भेजने की अनुमति मांग रहा है। इस खबर से अदाणी ग्रुप के शेयरों में भारी गिरावट आई, जबकि ग्रुप ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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