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Inspiring: Sanjeev Sanyal की नई सोच — क्या ये दवा सच में दिल्ली की हवा साफ कर सकती है? वो बड़ा सच जो कोई खुलकर नहीं कहता I 2026

Sanjeev Sanyal

एक शहर… जहाँ सुबह सूरज उगता है, लेकिन रोशनी से पहले धुंध मिलती है। एक शहर… जहाँ बच्चे स्कूल जाते हैं, लेकिन उनके बैग में किताबों के साथ एक और चीज़ होती है—mask। एक शहर… जहाँ घर की खिड़की खोलने से पहले परिवार सोचता है—“आज air quality index कितना है?” और उसी शहर में लाखों लोग रोज़ जीते हैं, साँस लेते हैं, उम्मीद करते हैं कि शायद अगली सर्दियों में हवा साफ होगी… लेकिन साल बदलता है, पोस्टर बदलते हैं I

Campaign बदलते हैं, speeches बदलती हैं… और नहीं बदलती तो बस हवा। ये कहानी है दिल्ली की… उस दिल्ली की, जिस पर हम सबको गर्व होता है, लेकिन जिसकी हवा से हम डरते भी हैं। और यही जगह है जहाँ एक आवाज़ सामने आती है—Sanjeev Sanyal। और वो कहते हैं—हम गलत जगह लड़ाई लड़ रहे हैं। हम गलत लोगों को दोष दे रहे हैं। और जो असली समस्या है… उसे हम देखने की कोशिश ही नहीं करते।

आपको बता दें कि दिल्ली का pollution सिर्फ एक मौसम का issue नहीं है। ये सिर्फ सर्दियों का धुआँ नहीं, ये सिर्फ एक त्योहार का पटाखा नहीं, ये सिर्फ किसी एक राज्य की पराली नहीं। ये एक system failure है… एक शहर का planning failure है… और सबसे बढ़कर ये mindset failure है।

लेकिन हम क्या करते हैं? जैसे ही सर्दियाँ आती हैं, लगी-बंधी debate शुरू हो जाती है—“दिवाली responsible है”, “पटाखे responsible हैं”, “उस राज्य की पराली responsible है”… और हम चैन की सांस लेते हैं कि हमने culprit पहचान लिया। Problem ये है कि culprit कभी एक नहीं था। Problem layered है, deep है, uncomfortable है… और इसलिए हम उससे बचते हैं।

Sanjeev Sanyal बिल्कुल साफ कहते हैं—दिवाली को villain बनाना आसान है, लेकिन सच यह है कि pollution उससे न शुरू होता है, न खत्म। ये एक दिन की कहानी नहीं। अगर data देखो, तो दिवाली के पहले का दिन, दिवाली का दिन और उसके अगले दिन—तीन दिन लगभग एक जैसे दिखते हैं। तो फिर blame game का फायदा क्या? शायद हमें खुद को satisfy करने की आदत पड़ गई है कि कोई ना कोई “festival”, कोई “emotionally convenient target” पर ठीकरा फोड़ दो… और असली काम postpone कर दो।

असल में, pollution का real villain वो चीज़ें हैं जिन्हें हम normal मान चुके हैं। Construction की बेमतलब dust। Garbage जलाना। industrial emissions। और सबसे बड़ा culprit—हमारा urban transport system। जब हम कहते हैं कि “Delhi Metro world class है”, तो ये बात partially सच है। ट्रेन शानदार है, network strong है, connectivity broad है… लेकिन असली film तब शुरू होती है जब आप metro से बाहर निकलते हैं। और जैसे ही आप बाहर आते हैं… एक chaos आपका स्वागत करता है। Broken footpaths, गलत designed सड़कें, traffic का madness, और सबसे जरूरी चीज़—walk करने की जगह ही नहीं।

सान्याल कहते हैं—public transport system तब तक effective नहीं हो सकता, जब तक उसकी last-mile connectivity सशक्त न हो। और यहाँ लोग समझते हैं कि last-mile connectivity मतलब auto, e-rickshaw, shared vehicles… लेकिन वो कहते हैं—नहीं। असली last-mile connectivity है “पैदल चलना”।

walking is the most fundamental, सबसे सस्ता, सबसे democratic, सबसे powerful transport model। दुनिया के best cities में लोग चलते हैं। वहां का city design walking को respect देता है। वहां footpaths शहर का सिर्फ support system नहीं, lifeline होते हैं। लेकिन दिल्ली जैसी शहरों में footpaths अक्सर पहला space होता है जिसे sacrifice कर दिया जाता है।

हम बड़े गर्व से कहते हैं—“road widening प्रोजेक्ट शुरू हो गया है।” लेकिन सान्याल कहते हैं—जरा इस sentence को decode करो। Road widening का मतलब होता है—footpath narrowing। हम सड़कों को कारों के लिए widen करते हैं… इंसानों के लिए नहीं। हम vehicles के लिए breathing space देते हैं, इंसानों के लिए नहीं। और ironic ये है कि वही इंसान उसी हवा को साँस में भरता है… जो उन्हीं सड़कों ने बनाई है।

और यही जगह है जहाँ Sanjeev Sanyal एक brutal truth बताते हैं—जब आप शहर को सिर्फ कार के लिए design करते हो, तो वो शहर rich दिख सकता है… लेकिन healthy कभी नहीं होता। Car ownership class दिखाती है, health नहीं। Life quality उस शहर में होती है जहाँ इंसान सुरक्षित चल सके।

जहां बच्चा बिना डर एक फुटपाथ पर school तक walk कर सके। जहाँ बूढ़ा इंसान आराम से evening walk कर सके। जहाँ street सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं, लोगों के लिए हो। और यह सब सुनने में romantic लगता है… लेकिन असलियत में ये सबसे ज्यादा practical है। क्योंकि जितने ज्यादा लोग चलेंगे, उतनी कम गाड़ियाँ चलेंगी। जितनी कम गाड़ियाँ चलेंगी, उतनी कम fuel जलेगा। जितना कम fuel जलेगा, उतना कम pollution होगा।

सान्याल कहते हैं—ये सबसे सस्ता solution है। न बड़ी मशीन चाहिए। न billion-dollar project चाहिए। न international consultant। बस political will, civic sense और urban planning की clarity चाहिए। Footpath बनाइए। उन्हें safe बनाइए। Encroachment हटाइए। Street lighting strong कीजिए। Walking culture create कीजिए। और देखिए शहर खुद ब खुद breathe करना शुरू कर देगा।
लेकिन सवाल उठता है—क्या walking alone pollution solve कर देगा? जवाब है—नहीं, लेकिन ये सबसे important pillar है। क्योंकि ये सिर्फ pollution reduce नहीं करता, traffic reduce करता है। Road usage efficient बनाता है। लोगों की health improve करता है। Cities को human बनाता है। और सबसे बड़ी बात—ये system को discipline सिखाता है।

सान्याल ये भी मानते हैं कि पराली जलना problem है। वो ये भी स्वीकार करते हैं कि construction dust dangerous है। कूड़ा जलाना system की failure है। लेकिन वो कहते हैं—इन सभी के साथ parallel हमें urban behavior बदलना पड़ेगा। हमें अपने शहर को सिर्फ concrete jungle की तरह नहीं, एक living organism की तरह treat करना पड़ेगा।

Delhi Metro आज दुनिया के बेहतरीन metro systems में से एक मानी जाती है। लेकिन metro alone city को save नहीं कर सकती, जब तक शहर metro के साथ चलना न सीखे। अगर metro से उतरते ही रास्ता गंदगी, broken सड़क, vendors, भीड़, और chaos में घिर जाए… तो लोग naturally car choose करेंगे। और जब car choose करेंगे… तो pollution बढ़ेगा ही।

सान्याल ये भी कहते हैं कि शहरों की conversation सरकारें नहीं, citizens lead करें। क्योंकि कोई भी city सिर्फ bricks से नहीं, लोगों से बनी होती है। जब लोग demand करेंगे कि “हमें चलने का हक चाहिए,” “हमें साफ footpath चाहिए,” “हमें pedestrian-safe शहर चाहिए”—तभी policies बनेंगी। नहीं तो debates चलती रहेंगी। hashtags आते रहेंगे। और हवा? वही रहेगी।
अगर एक बात स्पष्ट है तो वो ये—pollution को सिर्फ emotional argument से नहीं हराया जा सकता। इसे scientific thinking, logical planning और practical implementation चाहिए। Delhi जैसे शहरों के लिए ये battle सिर्फ environment की नहीं, future की है। ये आने वाले generation की हवा का सवाल है।

सोचिए… क्या हम ऐसा भारत चाहेंगे जहाँ बच्चे sky blue color सिर्फ किताबों में देखें? जहाँ grandparents अपने पोते-पोती को park में ले जाने से पहले Air quality index check करें? जहाँ festivals का मजा guilt में बदल जाए? शायद नहीं। और अगर नहीं… तो हमें ये मानना होगा कि air purifier solution नहीं है।

mask भी permanent answer नहीं। Real solution ground पर है… सड़क पर है… footpath पर है… उस simple habit में है जिसे हम भूल गए हैं—चलना। और शायद तभी, जब हम ये समझ पाएंगे कि शहर कारों के लिए नहीं, लोगों के लिए होते हैं… तभी दिल्ली की हवा सच में normal नहीं, proud बनने लायक होगी। तभी हम ये confidently कह पाएंगे—हाँ, ये शहर सांस ले सकता है… और हम भी।

Conclusion

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