रात के करीब साढ़े दस बजे हैं। एक परिवार अपने अधूरे फ्लैट की बालकनी में खड़ा है, जहाँ अब तक सिर्फ कंक्रीट की दीवारें हैं, घर नहीं। पाँच साल पहले उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सारी बचत लगाई थी। बिल्डर ने वादा किया था—“Possession जल्द मिलेगा।” लेकिन आज भी चाबी नहीं, सिर्फ तारीख़ पर तारीख़। और तभी टीवी स्क्रीन पर Breaking News चलती है—सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “बंद कर दो RERA, यह सिर्फ डिफॉल्टर बिल्डरों को बचा रहा है।” सवाल उठता है… क्या जिस कानून पर करोड़ों लोगों ने भरोसा किया, वही अब शक के घेरे में है? अगर देश की सर्वोच्च अदालत को गुस्सा आ गया है, तो हालात कितने गंभीर होंगे?
गुरुवार की सुबह, कोर्टरूम में माहौल सामान्य नहीं था। CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी, लेकिन टिप्पणियाँ सिर्फ उस केस तक सीमित नहीं रहीं। अदालत ने तीखे शब्दों में कहा कि राज्यों को आत्ममंथन करना चाहिए—RERA आखिर बना किसके लिए था? क्या यह घर खरीदने वाले आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए था, या उन बिल्डरों के लिए जो प्रोजेक्ट अधूरा छोड़ देते हैं? जब chief justice of India ने यह कहा कि अगर कोई संस्था अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर रही तो उसे समाप्त कर देना चाहिए, तो रियल एस्टेट सेक्टर में जैसे भूचाल आ गया।
यह मामला हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम नरेश शर्मा का था। विवाद RERA कार्यालय को शिमला से धर्मशाला शिफ्ट करने को लेकर था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के नोटिफिकेशन पर रोक लगा दी थी, यह कहते हुए कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के दफ्तर शिफ्ट करने से कामकाज ठप हो सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलट दिया और राज्य को कार्यालय स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि जनता को असुविधा नहीं होनी चाहिए और अपीलीय ट्रिब्यूनल भी वहीं कार्य करे।
लेकिन असली कहानी दफ्तर शिफ्ट करने की नहीं थी। असली सवाल यह था कि क्या RERA, जो 2016 में बड़े सुधार के रूप में लाया गया था, अब अपने रास्ते से भटक गया है? जब Real Estate Regulation and Development Act लागू हुआ था, तब इसे home buyers की ढाल कहा गया। कानून ने बिल्डरों को परियोजना की पूरी जानकारी वेबसाइट पर डालने, 70% फंड एक अलग escrow account में रखने और समय पर possession देने का नियम बनाया। अगर देरी हुई, तो खरीदार को ब्याज या refund का अधिकार मिला। पहली बार लगा कि व्यवस्था बदल रही है।
देश में लगभग हर राज्य ने अपना RERA प्राधिकरण बनाया। लाखों शिकायतें दर्ज हुईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 1 लाख से अधिक मामलों में आदेश पारित किए जा चुके हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट पंजीकृत हुए। लेकिन सवाल यह है कि क्या आदेश पारित होना ही न्याय है? कई खरीदार कहते हैं कि आदेश के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिलती। बिल्डर अपील करता है, मामला Appellate Tribunal जाता है, फिर High Court, और कई बार Supreme Court तक। इस लंबी कानूनी यात्रा में साल बीत जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए। अदालत ने देखा कि कुछ मामलों में RERA के आदेशों को लागू कराने में गंभीर देरी हो रही है। Enforcement कमजोर है। कई राज्यों में Appellate Tribunal की नियुक्ति समय पर नहीं होती। कहीं Chairperson की कुर्सी महीनों खाली रहती है। ऐसे में कानून का असर कमजोर पड़ता है। जब नियामक संस्था ही पूरी तरह कार्यात्मक नहीं हो, तो आम खरीदार कहाँ जाए?
रियल एस्टेट सेक्टर भारत की GDP में लगभग 7% योगदान देता है और लाखों लोगों को रोजगार देता है। 2025 तक यह क्षेत्र 1 ट्रिलियन डॉलर का आकार छूने की उम्मीद रखता है। लेकिन इस विकास की चमक के पीछे अधूरे प्रोजेक्ट्स की लंबी सूची भी है। National Company Law Tribunal में Insolvency के तहत सैकड़ों रियल एस्टेट कंपनियाँ फँसी हुई हैं। कई मामलों में home buyers को creditor का दर्जा मिला, लेकिन समाधान अभी भी जटिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि घर खरीदने वाला सिर्फ Investor नहीं, बल्कि उपभोक्ता है जिसकी जीवन भर की कमाई दांव पर लगी होती है। जब RERA बना था, तब Parliament में इसे ऐतिहासिक सुधार बताया गया था। उद्देश्य था—transparency, accountability और timely delivery। लेकिन अगर ground reality में खरीदार को राहत नहीं मिल रही, तो कानून की भावना अधूरी रह जाती है।
हिमाचल का मामला एक प्रतीक बन गया। अदालत ने राज्य को दफ्तर शिफ्ट करने की अनुमति दी, पर साथ ही यह सुनिश्चित किया कि लंबित मामलों की सुनवाई बाधित न हो। यह संदेश था कि प्रशासनिक फैसले न्याय प्रक्रिया पर भारी नहीं पड़ने चाहिए। Court ने साफ कहा कि संस्था का अस्तित्व तभी सार्थक है जब वह अपने मूल उद्देश्य को निभाए।
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि RERA ने निश्चित रूप से सेक्टर में अनुशासन लाया। अब बिना पंजीकरण के प्रोजेक्ट लॉन्च करना मुश्किल है। Buyers को परियोजना की जानकारी ऑनलाइन मिलती है। Carpet area की परिभाषा स्पष्ट हुई। Advance payment 10% से अधिक नहीं लिया जा सकता। ये बदलाव छोटे नहीं हैं। लेकिन चुनौती implementation की है। यदि आदेशों का पालन नहीं हो रहा, तो कानून की शक्ति कमज़ोर पड़ जाती है।
कई राज्यों में RERA की वेबसाइट पर हजारों प्रोजेक्ट pending दिखते हैं। कुछ बिल्डर project completion date बार-बार बढ़ाते हैं। Buyers को refund पाने में वर्षों लग जाते हैं। Interest calculation पर भी विवाद होता है। ऐसे में frustration बढ़ता है। Supreme Court की टिप्पणी इसी frustration की गूंज जैसी लगी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है—क्या समाधान संस्था को बंद करना है, या उसे मजबूत बनाना? अदालत की टिप्पणी चेतावनी की तरह है। अगर राज्य सरकारें समय पर नियुक्तियाँ नहीं करेंगी, enforcement तंत्र को मजबूत नहीं करेंगी, तो जनता का विश्वास डगमगाएगा।
एक और पहलू है—RERA और Consumer Courts के बीच अधिकार क्षेत्र का। कई बार buyers दो अलग मंचों पर जाते हैं। Jurisdictional confusion से प्रक्रिया लंबी होती है। Supreme Court ने पहले स्पष्ट किया था कि दोनों मंचों के अधिकार अलग हैं, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर समन्वय की कमी दिखती है।
आज भारत के शहरी क्षेत्रों में लाखों लोग EMI और किराया दोनों का बोझ झेल रहे हैं क्योंकि उनका घर समय पर नहीं मिला। उनके लिए RERA सिर्फ एक acronym नहीं, उम्मीद का नाम है। जब Supreme Court सवाल उठाता है, तो उम्मीद और डर दोनों साथ आते हैं। उम्मीद इसलिए कि शायद व्यवस्था सुधरेगी, और डर इसलिए कि कहीं वह सुरक्षा कवच ही कमजोर न पड़ जाए।
इस पूरे विवाद के बाद रियल एस्टेट बाजार में हलचल है। Builders’ associations का कहना है कि देरी के कई कारण होते हैं—land acquisition issues, environmental clearance, market slowdown। उनका तर्क है कि हर देरी को धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता। वहीं buyers का कहना है कि risk हमेशा उन्हीं पर क्यों डाला जाए?
सच यह है कि RERA एक महत्वपूर्ण सुधार था, लेकिन किसी भी कानून की सफलता उसके execution पर निर्भर करती है। Supreme Court की टिप्पणी शायद एक wake-up call है। यह संदेश है कि transparency और accountability सिर्फ कागज़ पर नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकारें क्या कदम उठाती हैं। क्या नियुक्तियाँ तेज़ होंगी? क्या आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कड़े उपाय होंगे? या फिर यह बहस यहीं थम जाएगी?
उस परिवार की अधूरी बालकनी में खड़े लोग आज भी खबरें देख रहे हैं। उन्हें सिर्फ एक चीज़ चाहिए—न्याय, और वह भी समय पर। अगर RERA उनकी उम्मीद है, तो उसे मजबूत होना ही होगा। और अगर Supreme Court ने गुस्से में सवाल उठाया है, तो शायद यह देश के रियल एस्टेट सिस्टम के लिए आत्ममंथन का क्षण है। क्योंकि घर सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होता। वह सपनों का निवेश होता है। और जब सपनों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो देश की सबसे बड़ी अदालत की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है।
Conclusion
आपने जिंदगी की सारी बचत लगाकर एक फ्लैट बुक किया। सालों इंतज़ार किया, लेकिन घर नहीं मिला। आप RERA के दरवाज़े पर पहुंचे, उम्मीद थी न्याय मिलेगा… लेकिन अगर वही संस्था सवालों के घेरे में आ जाए तो? डर ये कि खरीदार जाए तो जाए कहाँ? और जिज्ञासा ये कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को इतना गुस्सा क्यों आया? हिमाचल प्रदेश के एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने RERA की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की।
CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि अगर संस्था अपने मकसद से भटक गई है, तो उसके अस्तित्व पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मामला शिमला से धर्मशाला कार्यालय शिफ्ट करने को लेकर था। हाईकोर्ट ने रोक लगाई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पलट दिया… और तभी कोर्ट की तीखी टिप्पणी ने पूरे रियल एस्टेट सेक्टर में हलचल मचा दी… पूरी कहानी, पूरी सच्चाई जानने के लिए देखिए हमारी फुल वीडियो—हमारे यूट्यूब चैनल पर!
अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
GRT Business विभिन्न समाचार एजेंसियों, जनमत और सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी लेकर आपके लिए सटीक और सत्यापित कंटेंट प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हालांकि, किसी भी त्रुटि या विवाद के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। हमारा उद्देश्य आपके ज्ञान को बढ़ाना और आपको सही तथ्यों से अवगत कराना है।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारे GRT Business Youtube चैनल पर भी विजिट कर सकते हैं। धन्यवाद!”

