सोचिए… आपने ज़िंदगी की सबसे बड़ी saving लगाकर एक घर खरीदा। Bank loan लिया, EMI शुरू हुई, registry हो गई, मिठाई बंटी, relatives को बताया कि अब “अपना घर” हो गया है। लेकिन कुछ महीनों या सालों बाद अचानक एक notice आता है—नगर निगम से, revenue department से या किसी तीसरे व्यक्ति की तरफ से। उसमें लिखा होता है कि आप इस property के legal owner नहीं हैं। उस पल जो shock लगता है, वो सिर्फ पैसों का नहीं होता, वो भरोसे का होता है। और यहीं से शुरू होती है भारत में property ownership की वो सच्चाई, जो ज़्यादातर लोगों को बहुत देर से समझ आती है।
भारत में आम धारणा यही है कि जैसे ही property की registry हो गई, buyer मालिक बन गया। लेकिन Supreme Court ने 2025 में एक ऐसा फैसला दिया, जिसने इस सोच की नींव हिला दी। Court ने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ registry या sale deed से कोई व्यक्ति संपत्ति का पूर्ण मालिक नहीं बन जाता। Ownership साबित करने के लिए registry के साथ-साथ mutation, इंतकाल यानी नामांतरण भी उतना ही ज़रूरी है। और अगर mutation नहीं हुआ, तो सरकारी रिकॉर्ड में आप उस property के owner माने ही नहीं जाएंगे।
ये फैसला Mahnoor Fatima Imran बनाम State of Telangana केस की सुनवाई के दौरान सामने आया। Supreme Court ने इस case में साफ किया कि sale deed एक महत्वपूर्ण document है, लेकिन वो final proof of ownership नहीं है, जब तक revenue records में buyer का नाम दर्ज न हो। यानी registry आपको buyer बनाती है, लेकिन mutation आपको government records में owner बनाता है।
अब यहीं पर सबसे बड़ा confusion पैदा होता है। ज़्यादातर लोग sale deed और mutation को एक ही चीज़ समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि registry के साथ सब कुछ complete हो गया। लेकिन reality इससे बिल्कुल अलग है। Sale deed और mutation दो अलग-अलग processes हैं, जिनका काम भी अलग-अलग है।
Sale deed एक legal document है, जो buyer और seller के बीच transaction को prove करता है। ये दिखाता है कि seller ने property buyer को बेच दी है और buyer ने consideration pay किया है। लेकिन mutation यानि इंतकाल एक administrative process है, जिसके ज़रिए सरकार अपने revenue records update करती है। Mutation का मतलब है कि अब property से जुड़े tax, land records और सरकारी जिम्मेदारियों में नए owner का नाम दर्ज किया जाए।
अब property के type के हिसाब से mutation authority भी बदल जाती है। Agricultural land का mutation आमतौर पर patwari या revenue department के under होता है। Residential property का mutation नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद या ग्राम पंचायत के पास होता है। Commercial या industrial property के records district industrial development authority या संबंधित विभाग में maintain होते हैं।
यानी हर property का नामांतरण अलग office में होता है, और buyer को खुद जाकर ये process complete करनी होती है। यहीं पर सबसे खतरनाक gap पैदा होता है। Registry के बाद अगर buyer mutation नहीं करवाता, तो revenue records में अभी भी पुराने owner का नाम रहता है। और इसी loophole का फायदा उठाकर property fraud के कई cases सामने आते हैं। Supreme Court ने अपने फैसले में इसी risk की तरफ इशारा किया।
Imagine कीजिए, किसी व्यक्ति ने जमीन खरीदी, registry करवा ली, लेकिन mutation नहीं कराया। Revenue records में अभी भी पुराने owner का नाम है। अब वही पुराना owner या कोई fraudster उसी property को किसी दूसरे buyer को बेच देता है। दूसरा buyer भी registry करवा लेता है। फिर तीसरा, फिर चौथा। आखिर में जब कोई mutation कराने जाता है, तो पता चलता है कि एक ही property पर multiple sale deeds exist करती हैं। तब शुरू होती है लंबी legal लड़ाई, जिसमें सालों लग जाते हैं और property पर actual possession भी खतरे में पड़ जाती है।
Supreme Court ने कहा कि property ownership सिर्फ private documents से तय नहीं होती, बल्कि government records में दर्ज होना उतना ही जरूरी है। Court के मुताबिक, mutation का मकसद सिर्फ tax collection नहीं है, बल्कि ownership की transparency और public notice भी है। जब revenue records में आपका नाम होता है, तो ये public record बन जाता है कि अब आप उस property के owner हैं। इसी context में Court ने कुछ और documents की अहमियत पर भी ज़ोर दिया—Mother Deed, Encumbrance Certificate और Mutation Document। ये तीनों मिलकर property की legal health बताते हैं।
Mother Deed को property का जन्म प्रमाण पत्र कह सकते हैं। इससे property का पूरा history पता चलता है—पहले owner कौन था, कैसे transfer हुआ, किसने किसे बेचा, बीच में कोई gap या suspicious transaction तो नहीं। अगर mother deed chain clear नहीं है, तो future में dispute का खतरा बढ़ जाता है।
Encumbrance Certificate एक और critical document है। ये बताता है कि property पर कोई loan, mortgage, legal dispute या court case तो नहीं चल रहा। कई बार buyer सिर्फ seller की बातों पर भरोसा कर लेता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि property bank के पास mortgaged थी या किसी पुराने case में फंसी हुई थी। Encumbrance Certificate इस risk को काफी हद तक कम कर देता है।
और इन सबके बाद आता है mutation document, जो government records में ownership को officially update करता है। Mutation के बिना आप house tax, property tax, water tax जैसे कई मामलों में भी future problems face कर सकते हैं। कई municipal bodies mutation के बिना tax receipt भी issue नहीं करतीं, और यही आगे चलकर legal complications का कारण बनता है।
Supreme Court ने ये भी साफ किया कि mutation अपने आप नहीं हो जाता। Registry office और revenue department अलग-अलग होते हैं। Buyer को खुद initiative लेकर mutation application देना होता है, required documents attach करने होते हैं और follow-up करना होता है। Registry के बाद 2 से 3 महीने के भीतर mutation process शुरू कर देना सबसे safe माना जाता है।
एक और practical point जो Court के फैसले से निकलकर आता है, वो ये है कि ownership सिर्फ possession से भी साबित नहीं होती। कई लोग सालों से किसी property में रह रहे होते हैं, लेकिन अगर उनके पास proper mutation और revenue records नहीं हैं, तो dispute की स्थिति में उनका case कमजोर पड़ सकता है। Indian courts ने कई बार कहा है कि possession important है, लेकिन title documents और revenue records उससे भी ज़्यादा important हैं।
इस फैसले का एक बड़ा impact future buyers पर पड़ेगा। अब property खरीदते वक्त सिर्फ registry कराने से काम नहीं चलेगा। Buyer को ensure करना होगा कि mutation भी properly completed हो। Developers और sellers पर भी pressure बढ़ेगा कि वो buyers को mutation process में cooperate करें। Real estate में पैसा डूबने की सबसे बड़ी वजह ignorance नहीं, incomplete process होती है। लोग मान लेते हैं कि registry आखिरी step है, जबकि असल में registry के बाद भी एक crucial chapter बाकी रहता है। Supreme Court का ये फैसला उसी अधूरे chapter को spotlight में लाता है।
आज के समय में जब property prices आसमान छू रहे हैं, एक छोटी सी legal mistake करोड़ों के नुकसान में बदल सकती है। Court का ये फैसला buyers के लिए warning भी है और protection भी। Warning इस बात की कि आधी जानकारी खतरनाक है, और protection इस बात की कि law buyers के rights को clear करना चाहता है।
अगर आप future में कोई flat, plot या जमीन खरीदने का plan बना रहे हैं, तो सिर्फ broker या builder की बातों पर भरोसा मत कीजिए। Registry के साथ-साथ mutation, mother deed और encumbrance certificate को भी उतनी ही seriousness से देखिए। ये documents boring लग सकते हैं, लेकिन यही boring paperwork future के सबसे बड़े headache से बचा सकता है।
Conclusion
सोचिए… आपने घर खरीद लिया, रजिस्ट्री भी हो गई, लेकिन फिर भी एक दिन कोई आकर कह दे—“ये घर आपका नहीं है!” चौंकाने वाला लगता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला यही सच्चाई बताता है। 2025 में SC ने साफ कहा कि सिर्फ सेल डीड या रजिस्ट्री से कोई व्यक्ति संपत्ति का पूर्ण मालिक नहीं बनता। असली मालिकाना हक तब माना जाएगा, जब प्रॉपर्टी का म्यूटेशन यानी नामांतरण राजस्व रिकॉर्ड में हो। अदालत के मुताबिक, रजिस्ट्री और म्यूटेशन दो अलग प्रक्रियाएं हैं, और दोनों का होना जरूरी है।
नामांतरण न होने पर पुराने मालिक का नाम रिकॉर्ड में रहता है, जिससे फर्जी बिक्री और धोखाधड़ी के रास्ते खुल जाते हैं। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदते वक्त सिर्फ रजिस्ट्री पर भरोसा न करें। मदर डीड से इतिहास जांचें, एंकेम्ब्रेंस सर्टिफिकेट से लोन या केस देखें और समय पर म्यूटेशन कराएं। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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