जब आप अपने पर्स से एक 500 का नोट निकालते हैं, तो उस पर मुस्कुराते हुए एक चेहरा हमेशा मौजूद रहता है। वही शांत मुस्कान, वही गोल चश्मा, वही सादगी। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अगर एक सुबह आप उठें और नोट पर वो चेहरा न हो तो? क्या भारत की करेंसी अपनी पहचान बदल सकती है? क्या ‘बापू’ की जगह किसी और महापुरुष की तस्वीर आ सकती है? डर इस बात का कि हमारी आर्थिक पहचान बदल जाए। जिज्ञासा इस बात की कि क्या ऐसा संभव भी है। और कहानी यहीं से शुरू होती है—भारतीय मुद्रा, कानून और उस प्रक्रिया की, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
भारतीय करेंसी पर छपी महात्मा गांधी की तस्वीर केवल एक चित्र नहीं है, यह एक प्रतीक है। आजादी, अहिंसा, सत्य और भारतीय पहचान का प्रतीक। जब भी हम नोट देखते हैं, तो सिर्फ मूल्य नहीं देखते, हम इतिहास देखते हैं। लेकिन हर प्रतीक के पीछे एक प्रक्रिया होती है, एक कानूनी ढांचा होता है। और यही ढांचा तय करता है कि कोई बदलाव होगा या नहीं। भारत में करेंसी नोट जारी करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक के पास है। यह अधिकार RBI Act, 1934 की धारा 22 में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। लेकिन क्या RBI अकेले यह तय कर सकता है कि नोट पर किसकी तस्वीर होगी? जवाब है—नहीं।
RBI Act की धारा 25 कहती है कि बैंक नोटों का design, form और material RBI के Central Board की सिफारिशों पर तय होता है, लेकिन अंतिम मंजूरी केंद्र सरकार देती है। यानी अगर कभी महात्मा गांधी की तस्वीर बदलने का विचार आता है, तो पहले RBI का Central Board उस पर चर्चा करेगा। सुरक्षा फीचर्स, printing cost, public sentiment, international perception—इन सब पहलुओं पर विचार होगा। फिर यह प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजा जाएगा। और जब तक केंद्र सरकार सहमति न दे, कोई बदलाव संभव नहीं।
अब जरा इतिहास की तरफ चलते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय नोटों पर हमेशा से गांधी जी की तस्वीर नहीं थी। 1947 के बाद शुरुआती नोटों पर King George VI की तस्वीर हटाकर Ashoka Pillar का प्रतीक लगाया गया था। उस समय करेंसी पर राष्ट्रीय प्रतीक को प्राथमिकता दी गई। 1950 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक, नोटों पर मुख्य रूप से अशोक स्तंभ और अन्य प्रतीक दिखाई देते थे।
फिर आया 1996। इसी साल RBI ने पहली बार ‘Mahatma Gandhi Series’ लॉन्च की। यह केवल एक भावनात्मक फैसला नहीं था, बल्कि तकनीकी और सुरक्षा से जुड़ा कदम भी था। जालसाजी रोकने के लिए नए security features जोड़े गए—watermark, security thread, latent image, micro-lettering। और इसी सीरीज के साथ महात्मा गांधी की तस्वीर भारतीय मुद्रा की स्थायी पहचान बन गई।
बाद में 2016 में, जब नोटबंदी के बाद नई करेंसी जारी की गई, तब ‘Mahatma Gandhi New Series’ सामने आई। 500 और 2000 के नए नोट आए। रंग बदले, आकार बदले, पीछे की तस्वीरें बदलीं—कहीं Red Fort, कहीं Mangalyaan। लेकिन एक चीज नहीं बदली—महात्मा गांधी की मुस्कुराती तस्वीर।
तो क्या इसे बदला जा सकता है? तकनीकी रूप से हां। कानूनी रूप से भी हां। लेकिन प्रक्रिया जटिल है। अगर कभी ऐसा प्रस्ताव आता है, तो RBI का Central Board पहले feasibility study करेगा। यह देखा जाएगा कि नई तस्वीर या प्रतीक राष्ट्र की एकता, अखंडता और विविधता को दर्शाता है या नहीं। इसके बाद विशेषज्ञों की समिति बनाई जा सकती है, जिसमें इतिहासकार, अर्थशास्त्री, सुरक्षा विशेषज्ञ और सांस्कृतिक विश्लेषक शामिल होंगे।
मीडिया में समय-समय पर अटकलें लगती रही हैं। कभी कहा गया कि रवींद्रनाथ टैगोर और एपीजे अब्दुल कलाम की तस्वीरों को लेकर विचार हो रहा है। 2022 में ऐसी रिपोर्ट्स आईं कि एक internal committee ने दो विकल्पों पर चर्चा की। लेकिन जून 2022 में RBI ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि, महात्मा गांधी की तस्वीर बदलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
असल में करेंसी केवल भुगतान का माध्यम नहीं होती, यह soft power भी होती है। जब विदेशी पर्यटक भारतीय नोट देखते हैं, तो उन्हें गांधी जी का चेहरा दिखता है। यह भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। दुनिया के कई देशों में भी ऐसे प्रतीक होते हैं—अमेरिका में डॉलर पर George Washington, ब्रिटेन में King Charles या पहले Queen Elizabeth। इन प्रतीकों को बदलना केवल डिजाइन का मामला नहीं होता, यह भावनाओं का मामला भी होता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है cost। भारत में अरबों नोट circulation में हैं। अगर तस्वीर बदलनी हो, तो धीरे-धीरे पुराने नोट phase out करने होंगे। नई printing plates बनेंगी, नए security features design होंगे। यह पूरी प्रक्रिया हजारों करोड़ रुपए की लागत ला सकती है। और यह भी ध्यान रखना होगा कि बदलाव से counterfeiters को मौका न मिले।
सवाल यह भी है कि क्या संविधान में कहीं लिखा है कि गांधी जी की तस्वीर अनिवार्य है? नहीं। संविधान सीधे तौर पर नोटों के design का उल्लेख नहीं करता। यह अधिकार RBI Act और सरकार के प्रशासनिक फैसलों के तहत आता है। यानी theoretically बदलाव संभव है।
लेकिन practically यह बेहद संवेदनशील विषय है। गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है। उनकी तस्वीर केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सहमति का परिणाम थी। 1996 में जब उनकी तस्वीर चुनी गई, तब यह माना गया कि वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे व्यापक रूप से स्वीकार्य प्रतीक हैं। किसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय से ऊपर उठकर उनकी पहचान राष्ट्रीय है।
फिर भी, लोकतंत्र में सवाल उठते रहेंगे। कुछ लोग कहते हैं कि नोटों पर विविधता दिखनी चाहिए—कभी सरदार पटेल, कभी भगत सिंह, कभी किसी वैज्ञानिक या कलाकार की तस्वीर। यह विचार गलत नहीं है। लेकिन हर विचार को नीति में बदलने के लिए कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना होता है।
एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि नोटों पर केवल तस्वीर ही नहीं, बल्कि theme भी बदली जाती है। ‘Mahatma Gandhi New Series’ में भारत की सांस्कृतिक विरासत और वैज्ञानिक उपलब्धियों को पीछे की तरफ दिखाया गया। जैसे 2000 के नोट पर Mangalyaan, 500 के नोट पर Red Fort, 200 के नोट पर Sanchi Stupa। इससे यह संदेश दिया गया कि भारत परंपरा और प्रगति दोनों का संगम है।
अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी, यानी Central Bank Digital Currency, पूरी तरह प्रचलन में आ जाती है, तो भौतिक नोटों का महत्व कम हो सकता है। RBI पहले ही e-Rupee का pilot प्रोजेक्ट चला चुका है। ऐसे में तस्वीरों का सवाल भी धीरे-धीरे कम अहम हो सकता है। लेकिन फिलहाल, कैश भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। तो क्या निकट भविष्य में गांधी जी की तस्वीर हटेगी? मौजूदा आधिकारिक रुख के अनुसार—नहीं। न तो सरकार और न ही RBI ने ऐसा कोई प्रस्ताव रखा है। और जब तक Central Board और केंद्र सरकार एकमत न हों, कोई बदलाव संभव नहीं।
लेकिन यह सवाल हमें एक बड़ी बात समझाता है। करेंसी केवल आर्थिक उपकरण नहीं, राष्ट्रीय पहचान का दर्पण है। उस पर छपा हर प्रतीक, हर शब्द, हर डिजाइन—देश की आत्मा को दर्शाता है। और शायद इसी वजह से बदलाव की प्रक्रिया इतनी सावधानी से तय की गई है। जब अगली बार आप किसी नोट को हाथ में लें, तो सिर्फ उसकी कीमत न देखें। सोचिए कि उसके पीछे कितना इतिहास, कितना कानून और कितनी प्रक्रिया जुड़ी है। और यह भी याद रखिए कि लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन जवाब हमेशा तथ्यों और कानून के दायरे में खोजने चाहिए।
Conclusion
आपकी जेब में रखा हुआ, जिस पर मुस्कुराते हैं Mahatma Gandhi। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर एक सुबह आप नोट निकालें और उस पर बापू की तस्वीर न हो? क्या सच में ऐसा दिन आ सकता है? डर ये कि हमारी राष्ट्रीय पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बदल जाएगा… और जिज्ञासा ये कि आखिर ये फैसला करता कौन है?
सच ये है कि भारत में करेंसी जारी करने का अधिकार केवल Reserve Bank of India के पास है, वो भी RBI Act 1934 की धारा 22 और 25 के तहत। किसी भी डिजाइन बदलाव के लिए RBI के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश और केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य है। 1996 में ‘Mahatma Gandhi Series’ आई थी, उससे पहले अशोक स्तंभ जैसे प्रतीक थे। 2022 में RBI ने साफ कहा—ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं।
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