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Rare Earth Elements: चीन के शिकंजे में दुनिया, लेकिन भारत के पास है खेल बदलने का मौका! 2025

Rare Earth

सोचिए… अगर कल से स्मार्टफोन बंद हो जाएं, इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ रुक जाएं, फाइटर जेट्स उड़ना छोड़ दें, और सौर पैनल अंधेरे में डूब जाएं—तो क्या होगा? ये कोई साइंस फिक्शन नहीं, बल्कि एक बेहद असली संकट है, जो पूरी दुनिया के सर पर मंडरा रहा है। और इसकी जड़ में है — एक बेहद कीमती लेकिन कम चर्चित खजाना — Rare Earth Elements!

इनका नाम जितना साधारण लगता है, असलियत उतनी ही खतरनाक और चौंकाने वाली है। आज जब चीन ने इन जादुई खनिजों की सप्लाई पर लगाम कस दी है, तो अमेरिका से लेकर यूरोप और भारत तक सब कुछ हिल चुका है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है — इस वैश्विक रेस में भारत कहां खड़ा है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

दुनिया आज हाई-टेक टेक्नोलॉजी पर टिकी है, और उस टेक्नोलॉजी की रीढ़ हैं ये Rare Earth Elements — यानी वो 17 खनिज जो हमारे जीवन में हर उस चीज़ का हिस्सा हैं जिसे हम “आधुनिक” कहते हैं। चाहे वो स्मार्टफोन हो, इलेक्ट्रिक कार, सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, हाई-टेक हथियार, या मिसाइल डिफेंस सिस्टम — हर जगह इनका इस्तेमाल होता है।

इन एलिमेंट्स के नाम शायद आपने कभी न सुने हों — सैमरियम, गैडोलिनियम, टेरबियम, डिस्प्रोसियम, ल्यूटेटियम… लेकिन इनके बिना दुनिया की रफ्तार थम जाएगी। इनका इस्तेमाल आज की आधुनिक अर्थव्यवस्था में Energy, communication, security और चिकित्सा से जुड़ी तमाम प्रणालियों में हो रहा है। और यही वजह है कि आज इनका महत्व खनिजों से कहीं ज्यादा, रणनीतिक अस्त्रों के बराबर माना जा रहा है।

जैसा कि इनके नाम में है — ये हैं “रेयर”, यानी दुर्लभ। धरती पर इनका भंडार कम है, और जो है भी, उसे निकालना और रिफाइन करना इतना महंगा और जटिल है कि ज्यादातर देश इस चुनौती में उतरना ही नहीं चाहते। और यहीं से शुरू होती है चीन की बादशाही। आज चीन के पास दुनिया के 49% रेयर अर्थ रिजर्व हैं — यानी करीब 440 लाख मीट्रिक टन।

लेकिन सिर्फ भंडार नहीं, चीन हर साल 2.7 लाख टन Rare Earth Elements का उत्पादन करता है और दुनिया की 90% रिफाइनिंग अकेले करता है। मतलब, अगर दुनिया के पास खनिज है भी, तो भी उन्हें रिफाइन कराने के लिए चीन के दरवाज़े खटखटाने पड़ते हैं। इस स्थिति ने चीन को Global supply chain में एक ऐसा मोनॉपोली बना दिया है, जिसे तोड़ना दुनिया के लिए बहुत मुश्किल हो चुका है।

चीन ने अभी हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। उसने 7 अहम Rare Earth Elements के Export पर सख्ती कर दी — जिनका इस्तेमाल फाइटर जेट्स, पनडुब्बियों और हाई-टेक हथियारों में होता है। इसका सबसे ज्यादा असर अमेरिका पर पड़ा, जिसकी डिफेंस इंडस्ट्री सैमरियम जैसे खनिजों पर पूरी तरह निर्भर है।

लेकिन अमेरिका ही क्यों, यूरोप, जापान और भारत — सबका हाल बेहाल है। चीन ने साफ कर दिया है कि वो अब केवल खनिज नहीं देगा, बल्कि बदले में कंपनियों से गोपनीय डेटा भी मांग रहा है। ये शर्त इतनी विवादास्पद है कि यूरोप की कंपनियां तो मान भी गईं, लेकिन डर है कि कहीं उनका कॉर्पोरेट राज लीक न हो जाए। तकनीक और डेटा की इस दोहरी मार ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वो एकल स्रोत पर इतनी निर्भरता सही है?

अब बात करते हैं भारत की — दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा Rare Earth रिजर्व वाला देश, लेकिन हालात कुछ ऐसे हैं जैसे कोई बेशकीमती खजाना होने के बावजूद तिजोरी की चाबी खो बैठा हो। भारत के पास 69 लाख मीट्रिक टन का भंडार है। ओडिशा के गंजम, केरल के चवरा और कन्याकुमारी, आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम और विशाखापत्तनम, मध्य प्रदेश के झाबुआ और राजस्थान के बाड़मेर में इनकी उपस्थिति है।

लेकिन हर साल भारत केवल 2,900 टन ही उत्पादन करता है — यानी कुल वैश्विक प्रोडक्शन का महज़ 1%। ये आंकड़ा जितना छोटा लगता है, इसका प्रभाव उतना ही बड़ा है। भारत को अपनी बढ़ती टेक्नोलॉजिकल और डिफेंस जरूरतों के लिए लगातार Import पर निर्भर रहना पड़ता है, जो न सिर्फ आर्थिक रूप से नुकसानदायक है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी खतरनाक है।

इसी बीच, भारत हर साल 53,000 टन से ज्यादा Rare Earth Elements Import करता है — जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन से आता है। और यही बात सबसे ज्यादा चिंता की है — भारत एक तरफ आत्मनिर्भरता की बात करता है, और दूसरी ओर पूरी तरह से Import पर निर्भर है। ये विरोधाभास अब असहनीय होता जा रहा है। खासकर तब, जब चीन अपनी नीति में बदलाव कर दुनिया को झुकाने की रणनीति अपनाता है। अगर भारत समय रहते इन खनिजों के दोहन और रिफाइनिंग में महारत नहीं हासिल करता, तो आने वाले समय में इसकी तकनीकी और रक्षा संबंधी योजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं।

कारण सिर्फ भंडार की कमी नहीं, बल्कि रिफाइनिंग टेक्नोलॉजी की भारी कमी है। Rare Earth को रिफाइन करना केवल पैसे की बात नहीं, ये एक अत्यंत जटिल और पर्यावरण-प्रभावित प्रक्रिया है। भारत में ना तो पर्याप्त तकनीकी कुशलता है, ना ही आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर। IREL (Indian Rare Earths Limited) इस दिशा में प्रयासरत है, लेकिन चार नई रिफाइनिंग यूनिट्स बनाने का प्रस्ताव अभी तक सरकारी स्वीकृति के इंतज़ार में है। इसके बिना, हम अपने ही संसाधनों को दूसरे देशों के हाथों में सौंपने को मजबूर हैं। यह स्थिति उस देश के लिए शर्मनाक है जो चंद्रमा तक पहुंच चुका है।

चीन से मुकाबला करना आसान नहीं है। उसने कई दशक पहले ही Rare Earth Elements सेक्टर में भारी Investment किया, और पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर कब्ज़ा कर लिया। आज चाहे अमेरिका हो या यूरोप, सभी को चीन के आगे झुकना पड़ता है। लेकिन अब भारत इस चक्र को तोड़ने की कोशिश कर रहा है।

Minister of Commerce and Industry पीयूष गोयल ने हाल ही में, जर्मनी में यह साफ कर दिया कि भारत अब वैकल्पिक स्रोतों पर काम कर रहा है। भारत सरकार, प्राइवेट सेक्टर, स्टार्टअप्स और इनोवेटर्स को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर इस चुनौती से निपटने का प्लान बना रही है। साथ ही, Mines and Minerals (Development and Regulation) Act में भी बड़े बदलाव किए जा रहे हैं, ताकि नई माइनिंग और रिफाइनिंग यूनिट्स को हरी झंडी मिल सके। ये बदलाव भारत को Rare Earth Elements के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकते हैं।

इसके अलावा, भारत ने हाल ही में मध्य एशिया के पांच देशों के साथ बातचीत की, जिसमें संयुक्त रूप से Rare Earth और अन्य रणनीतिक खनिजों की खोज और उत्पादन पर सहयोग की संभावना पर चर्चा हुई। इससे भारत को चीन के विकल्प तलाशने में मदद मिल सकती है। कूटनीति और रणनीतिक साझेदारियों के जरिए भारत एक नई supply chain खड़ी कर सकता है, जिससे global level पर उसका प्रभाव और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ेंगी।

दूसरी तरफ, पर्यावरणीय समस्याएं और स्थानीय विरोध भारत में एक बड़ी रुकावट हैं। तटीय इलाकों में जहां Rare Earth Elements अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, वहां पर्यावरण नियम बहुत सख्त हैं। माइनिंग से होने वाला Radioactive waste स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा देता है। यही कारण है कि सरकार को हर कदम फूँक-फूँक कर उठाना पड़ता है। लेकिन यह भी सच है कि बिना Risk उठाए सफलता नहीं मिलती। सरकार को चाहिए कि वह पारदर्शिता और सुरक्षा उपायों को अपनाकर, स्थानीय लोगों को विश्वास में ले और खनन को एक जिम्मेदार प्रक्रिया बनाए।

लेकिन एक सकारात्मक संकेत ये है कि भारत जल्द ही परमानेंट मैग्नेट्स का उत्पादन शुरू कर सकता है — जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों, मोबाइल, और डिफेंस उपकरणों में इस्तेमाल होते हैं। अगर ये प्रोजेक्ट सफल रहा, तो भारत Rare Earth की वैल्यू चेन में एक अहम खिलाड़ी बन सकता है। इससे न सिर्फ Import पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारत को वैश्विक बाजारों में एक नया मुकाम मिलेगा। यही वह मोड़ है जहां से भारत एक उपभोक्ता से निर्माता की भूमिका में आ सकता है।

Conclusion

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