सोचिए… रात के दो बजे का वक्त है। PNB बैंक की एक बिल्डिंग में सिर्फ कुछ लाइट्स जल रही हैं। सभी के कंप्यूटर बंद हो चुके हैं, लेकिन एक स्क्रीन पर अब भी कुछ digits blink कर रहे हैं। एक-एक transaction खोलकर देखी जा रही है। Files चेक हो रही हैं। Emails verify हो रही हैं। और तभी एक senior officer की आँखें अचानक चौड़ी हो जाती हैं।
उसका चेहरा सफेद पड़ जाता है। हाथ रुक जाता है। सामने स्क्रीन पर जो number दिखाई देता है, वो किसी normal figure का नहीं है। ये कोई लाखों या करोड़ों का मामला नहीं… ये हजारों, लाखों और करोड़ों को पार करता हुआ 2434 करोड़ पर आकर रुकता है। और वहीं शुरू होती है एक कहानी… सवालों की, शक की, सिस्टम की नाकामी की, और उस डर की कि आखिर आम आदमी का जमा पैसा कितना safe है?
ये कहानी है देश के सबसे पुराने, सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद बैंकों में से एक—Punjab National Bank की। वो बैंक जिसे लोग अपने पैसे की सुरक्षा का किला समझते हैं। वो बैंक जिसने लाखों लोगों के सपनों को loans देकर wings दिए। और वही बैंक, एक बार फिर headlines में है। मगर इस बार किसी नई scheme, किसी नई सुविधा या किसी proud achievement की वजह से नहीं… बल्कि एक ऐसे घोटाले की वजह से, जिसने फिर ये सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या सच में हमारा पैसा सुरक्षित है? क्या system उतना मजबूत है, जितना दिखाया जाता है?
इस कहानी की शुरुआत होती है एक simple technical internal review से। Routine audit… routine checking… मगर routine में छुपा था कुछ extra ordinary। पता चला कि दो बड़े corporate accounts में कुछ बहुत गड़बड़ हुआ है। ये accounts किसी छोटे business या random company के नहीं थे… बल्कि एक ऐसे business house के थे, जो decades से infrastructure और equipment finance के नाम पर जाना जाता था—SREI Group। Bank records खुलते गए… transactions सामने आते गए… और धीरे-धीरे वो तस्वीर साफ होती गई, जिसे देखकर किसी का भी दिमाग घूम सकता था।
दो खाते… दो कंपनियां… और दोनों में अलग-अलग करके इतना बड़ा financial mess कि total fraud amount सीधे 2434 करोड़ तक जा पहुंचा। एक तरफ SREI Equipment Finance Limited का account… दूसरी तरफ SREI Infrastructure Finance Limited का account… और दोनों में वही कहानी—rules का उल्लंघन, loan का misuse और financial irregularities का जाल। Banking language में इसे classify किया गया—Loan Fraud। लेकिन आम भाषा में समझो तो ये सीधी-सीधी लूट थी।
अब सवाल उठता है—ये हुआ कैसे? कैसे हजारों rules, policies, audits, compliances और systems के बावजूद कोई कंपनी इतने बड़े level पर bank का पैसा misuse कर सकती है? जवाब सीधा है—जहां लालच बढ़ता है, वहां calculation रुक जाती है। जहां ambitions uncontrolled हो जाते हैं, वहां ethics disappear हो जाते हैं। एक कंपनी बैंक से पैसा लेती है।
वो भी छोटा-मोटा नहीं, हजारों करोड़ के loan। कागजों में लिखा होता है—ये पैसा इस्तेमाल होगा किसी project के लिए, किसी infrastructure development के लिए, किसी equipment finance के लिए। लेकिन जब पैसा account से बाहर जाता है, तो उसका रास्ता बदल जाता है। वो पैसे जाते हैं दूसरी जगह… दूसरे कामों में… ऐसे business में जिनका असली bank agreement से कोई लेना-देना नहीं। कुछ पैसा इधर, कुछ पैसा उधर, कुछ subsidiaries में, कुछ shell firms में… और धीरे-धीरे शुरू हो जाता है एक financial maze।
ये कोई अचानक की गई हरकत नहीं होती। ये एक planning होती है। एक system का exploitation होता है। पहले loan लिया जाता है… फिर थोड़े समय तक ईएमआई ठीक से दी जाती है ताकि doubt न हो… फिर धीरे-धीरे payments weak होना शुरू होते हैं… फिर excuses… फिर restructuring की demand… और फिर एक दिन—default।
जब bank recovery की बात करता है, तब पता चलता है कि पैसा तो कहीं और already vanish हो चुका है। Assets या तो overvalued थे… या मौजूद ही नहीं… और जो थे, उनकी कीमत उतनी नहीं जितनी दिखायी गई थी। SREI Group के साथ भी यही हुआ। एक समय infrastructure funding का बड़ा नाम। Market में strong identity। सालों तक brilliant performance। फिर धीरे-धीरे debts बढ़ने लगे। Borrowings uncontrollable होती गईं। Loan repayment weak होता गया। और फिर हालात इतने बिगड़ गए कि सिस्टम को खुद step in करना पड़ा।
और जब system step in करता है, तो सिर्फ financial statements नहीं, पूरी कंपनी की आत्मा scan होती है। Governance failure सामने आता है। Mis management सामने आता है। और साथ सामने आता है वो painful truth—कि आखिर किस हद तक पैसा गलत तरीके से घुमाया गया। लेकिन ये कहानी सिर्फ borrowers की नहीं है।
ये कहानी एक bank की भी है। जब ऐसी खबर आती है, सबसे पहला सवाल उठता है—“क्या बैंक डूब जाएगा?” “क्या मेरा पैसा खतरे में है?” “क्या फिर से कोई बड़ा banking crisis आने वाला है?” और ये डर गलत भी नहीं। क्योंकि इतिहास गवाह है, हर घोटाले के बाद लोग डरते हैं, panic करते हैं, और उनका trust हिल जाता है।
लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग थी। इस बार बैंक prepared था। इस बार system जागा था। इस बार PNB ने पहले ही एक shield बना ली थी। Bank ने इस loan को पहले ही Non-Performing Asset के category में डालकर 100% provisioning कर दी थी। Simple शब्दों में कहें तो बैंक ने ये पैसा अपने profits से पहले ही side कर दिया था। ताकि अगर ये पैसा वापस न भी आए, तो बैंक financially weak न पड़े।
यानी customers का पैसा… सामान्य खाताधारकों की savings… FD holders का trust… सब safe zone में है। Bank की capital strong है। Provision coverage ratio लगभग complete है। और सबसे बड़ी बात—bank ने खुद fraud detect करके report किया। यानी ये घोटाला पकड़ा गया… छुपाया नहीं गया।
पर फिर भी एक सवाल रह जाता है—जब हर बार banking reforms की बात होती है, जब हर बार system को strong बनाने की बात होती है, तो फिर ऐसे frauds बार-बार क्यों होते हैं? जवाब uncomfortable है, लेकिन सच है। System strong है… लेकिन loopholes अभी भी मौजूद हैं। Rules हैं… लेकिन human greed उनसे ज्यादा powerful निकल आती है।
और फिर बात आती है PNB के past की। एक ऐसा नाम जिसको सुनते ही एक पुराना घाव याद आ जाता है—Nirav Modi scam। वो घोटाला जिसने भारत के banking history में एक डरावना chapter लिख दिया था। Letters of Undertaking… diamond business… और फिर अचानक लाखों खाताधारकों के दिल में panic की लहर। उस incident के बाद banking system ने बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ बदला, बहुत कुछ tighten किया। और उसी का result है कि आज detect करने की क्षमता बढ़ी है। Transparency बढ़ी है। Monitoring stronger हुई है।
लेकिन ये भी सच है कि trust एक ऐसी चीज़ है जो चकनाचूर होने के बाद दोबारा बनने में बहुत वक्त लेती है। जब कोई bank का नाम किसी scam से जुड़ता है, तो सिर्फ numbers खराब नहीं होते… लोगों का विश्वास घायल होता है। एक आम आदमी, जो months तक बचत करता है, slowly पैसे जोड़ता है, FD बनाता है, अपनी life savings जमा करता है… उसके मन में बस एक ही सवाल घूमता है—“क्या मेरा पैसा सुरक्षित है?”
लेकिन असली सवाल यहां खत्म नहीं होता। असली सवाल system से है। क्या future में ऐसे frauds रुकेंगे? क्या banks और ज्यादा strict होंगे? क्या borrowers accountability से भाग नहीं पाएंगे? जवाब है—yes और no दोनों। Technology banking को secure बना रही है।
A I based monitoring, strict compliance frameworks, forensic audits—ये सब system को मजबूत बना रहे हैं। लेकिन fraud करने वाले भी smart हो रहे हैं। नए तरीके ढूंढ रहे हैं। नए technical loopholes खोज रहे हैं। और इसलिए awareness बहुत जरूरी है। Corporate governance सिर्फ एक शब्द नहीं—ये banking system की backbone है।
Conclusion
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