ज़रा सोचिए… एक समय था जब पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया का नेता मानता था। वह दावा करता था कि उसकी आवाज़ पूरी दुनिया में सुनी जाती है। लेकिन आज, वही पाकिस्तान अपने नागरिकों के लिए सबसे बुनियादी चीज़ — Passport की इज़्ज़त — तक नहीं बचा पाया। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स की ताज़ा रिपोर्ट ने पाकिस्तान की यह हकीकत नंगे शब्दों में दुनिया के सामने रख दी है। दुनिया के नक्शे पर जहां सिंगापुर, जापान, और दक्षिण कोरिया जैसे देश अपने नागरिकों को लगभग हर कोने तक बिना वीज़ा के यात्रा की आज़ादी दे रहे हैं, वहीं पाकिस्तान का Passport… एक ऐसे दस्तावेज़ में बदल गया है जिसकी कीमत अब कबाड़ से ज़्यादा नहीं रही।
कहानी सिर्फ़ रैंकिंग की नहीं है। ये कहानी है एक राष्ट्र की – जिसने कभी सपनों में “इस्लामिक यूनिटी” का झंडा उठाया था, और आज वो यूनिटी भी उसे अपने दरवाज़े पर रोक देती है। पाकिस्तान का Passport इस साल दुनिया में 103वें स्थान पर है — यमन के बराबर। इसका मतलब है कि पाकिस्तान के नागरिक 227 देशों में से सिर्फ़ 31 देशों में बिना वीज़ा जा सकते हैं। बस 31! और यह आंकड़ा किसी अफ्रीकी या द्वीप राष्ट्र का नहीं, बल्कि एक ऐसे देश का है जो कभी खुद को न्यूक्लियर पावर होने पर गर्व करता था।
पाकिस्तान से नीचे बस तीन देश हैं — इराक, सीरिया, और अफगानिस्तान। यानी वो तीन राष्ट्र जो दशकों से युद्ध, आतंक, और अस्थिरता का प्रतीक बन चुके हैं। सवाल उठता है — क्या पाकिस्तान भी अब उन्हीं की कतार में शामिल हो गया है? असल में यह रैंकिंग सिर्फ़ यात्रा की स्वतंत्रता नहीं बताती, यह बताती है एक देश की “डिप्लोमैटिक क्रेडिबिलिटी।” एक Passport तभी सम्मानित होता है जब बाकी दुनिया उस देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, और स्थिरता पर भरोसा करे। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह भरोसा अब लगभग खत्म हो चुका है।
पिछले चार सालों से लगातार पाकिस्तान का Passport दुनिया के सबसे कमजोर पासपोर्ट्स में बना हुआ है। 2022 में भी यही स्थिति थी, 2023 में भी। और 2025 की इस रिपोर्ट ने तो जैसे पाकिस्तान को स्थायी रूप से “कमज़ोरों की लिस्ट” में फिक्स कर दिया है। लेकिन सवाल यह है — ऐसा हुआ क्यों?
कभी पाकिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिका, चीन, या सऊदी अरब जैसे देशों के नेता उस पर गौर करते थे। अब वही पाकिस्तान दुनिया के अधिकांश देशों के लिए एक सुरक्षा रिस्क बन चुका है। आतंकवाद, फेक डॉक्यूमेंट्स, और अवैध माइग्रेशन — यह सब पाकिस्तान की पहचान का हिस्सा बन गया है। और यह वही कारण हैं जिनकी वजह से कोई भी देश अपने दरवाज़े पाकिस्तानियों के लिए खोलना नहीं चाहता।
एक समय था जब पाकिस्तान के Passport धारक यूरोप में आसानी से वीज़ा पा जाते थे। लेकिन अब यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान को “हाई रिस्क थर्ड कंट्री” घोषित किया है। इसका मतलब — पाकिस्तान के नागरिकों के डॉक्यूमेंट्स पर अब “डबल वेरिफिकेशन” होता है। बैंकिंग, ट्रेड, यहां तक कि छात्र वीज़ा भी अब संदेह की नज़रों से देखा जाता है।
दूसरी तरफ़, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, और जापान जैसे एशियाई देश हैं — जिनके नागरिक 190 से ज़्यादा देशों में बिना वीज़ा जा सकते हैं। सिंगापुर के Passport धारक 193 देशों में वीज़ा-फ्री एंट्री पा सकते हैं। यह सिर्फ़ एक Passport नहीं, एक “ब्रांड” बन गया है। और पाकिस्तान के लिए यह ब्रांड अब शर्म का प्रतीक बन चुका है।
अब बात करते हैं पाकिस्तान की गिरती अंतरराष्ट्रीय साख की। IMF के कर्ज़ में डूबे इस देश की अर्थव्यवस्था अब पूरी तरह से विदेशी मदद पर निर्भर है। जब किसी देश का प्रधानमंत्री खुद यह कहे कि “हमारे पास सैलरी देने तक के पैसे नहीं हैं,” तो उस देश के नागरिकों पर दुनिया क्यों भरोसा करेगी?
आज IMF से लेकर सऊदी अरब तक, हर देश पाकिस्तान को “कंडीशन्स” पर मदद देता है — यानी भरोसा नहीं, मजबूरी है। और यही वजह है कि पाकिस्तान के Passport धारक जहां भी जाते हैं, वहां उन्हें पहले शक की नज़रों से देखा जाता है।
कई एयरपोर्ट्स पर पाकिस्तानियों की “सपेशल स्क्रीनिंग” होती है। यूरोप में उन्हें अलग काउंटर पर रोका जाता है। यहां तक कि कई बार तो वीज़ा होने के बावजूद प्रवेश मना कर दिया जाता है। ये सब उस देश की साख का परिणाम है जिसकी विदेश नीति कभी “दो नावों में पैर” रखकर चलती रही।
पाकिस्तान की असफल कूटनीति ने भी उसकी इस हालत में अहम भूमिका निभाई है। भारत के साथ दुश्मनी, अमेरिका के साथ धोखा, चीन पर अत्यधिक निर्भरता, और आतंकवाद को राजनीतिक औज़ार बनाना — ये सब उसकी साख को लगातार गिराते गए।
दुनिया जानती है कि जब भी किसी बड़े आतंकी हमले का ज़िक्र होता है, उसमें “Pakistan connection” जरूर निकलता है। ऐसे में कोई भी देश अपने दरवाज़े पाकिस्तानियों के लिए खुले क्यों रखेगा?
यहां तक कि खाड़ी देश — जो कभी पाकिस्तान के सबसे करीबी सहयोगी थे — अब दूरी बनाने लगे हैं। सऊदी अरब, यूएई, और क़तर जैसे देश अब भारतीय पासपोर्ट धारकों को प्राथमिकता देते हैं। इसी इंडेक्स में यूएई का Passport अब टॉप-10 में पहुंच चुका है, जबकि पाकिस्तान का नाम नीचे से चौथे स्थान पर है। यानी, एक ही धार्मिक और सांस्कृतिक दुनिया में होने के बावजूद, पाकिस्तान का व्यवहार ही उसकी सबसे बड़ी समस्या बन गया है।
अब अगर बात करें भारत की — तो भले ही भारत का Passport दुनिया का सबसे ताकतवर Passport नहीं है, लेकिन इसकी साख लगातार बढ़ रही थी।हालांकि 2025 की रैंकिंग में भारत थोड़ा फिसला है — अब 85वें स्थान पर है। फिर भी, भारतीय नागरिक 57 देशों में बिना वीज़ा यात्रा कर सकते हैं। और यह फर्क बहुत मायने रखता है — क्योंकि भारत के साथ दुनिया व्यापार करना चाहती है, निवेश करना चाहती है, और टूरिज़्म में भी सहयोग चाहती है।
वहीं पाकिस्तान के साथ दुनिया सिर्फ़ एक शब्द जोड़ती है — “रिस्क।” अब सोचिए, पाकिस्तान के नागरिकों के लिए कितनी मुश्किल होती होगी जब उन्हें हर देश में वीज़ा के लिए लाइन लगानी पड़ती है, दस्तावेज़ों के ढेर दिखाने पड़ते हैं, और फिर भी रिजेक्शन की संभावना बनी रहती है।
कई देशों ने तो पाकिस्तान के Passport धारकों पर “ट्रांज़िट वीज़ा” तक बंद कर दिया है — यानी आप किसी और देश जा रहे हों, और रास्ते में किसी एयरपोर्ट पर उतरना हो, तो उसके लिए भी वीज़ा चाहिए। यह किसी भी राष्ट्र के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति होती है। दूसरी ओर, पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी किसी सुधार की ओर नहीं हैं।
राजनीतिक अस्थिरता, IMF की शर्तें, बढ़ती गरीबी, और घटती साख — यह सब मिलकर पाकिस्तान को एक “Failing State” के तौर पर स्थापित कर रहे हैं। जब तक कोई देश अपनी घरेलू नीति को स्थिर नहीं करता, तब तक उसका Passport मजबूत नहीं हो सकता।
Passport दरअसल किसी देश की “Identity Card” होता है — और पाकिस्तान की पहचान आज गरीबी, आतंक, और कर्ज़ से जुड़ गई है। इस स्थिति की जड़ें बहुत पुरानी हैं। 1970 के दशक में पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए, लेकिन हर बार उसका फायदा उठाने की कोशिश की।
अमेरिका को लगा, पाकिस्तान उसका रणनीतिक सहयोगी है — जबकि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में चरमपंथियों को पनाह दी। चीन को लगा, पाकिस्तान उसकी “Belt and Road Initiative” का अहम हिस्सा बनेगा — लेकिन CPEC अब चीन के लिए भी एक “Debt Trap Project” बन चुका है। इन सबके बीच पाकिस्तान की विश्वसनीयता मिट्टी में मिल गई।
पाकिस्तान की “न्यूक्लियर इमेज” भी उसे बचा नहीं पाई। दुनिया जानती है कि जिस देश के अंदर राजनीतिक स्थिरता न हो, वहां परमाणु हथियार भी खतरा बन सकते हैं। और यही डर बाकी देशों को पाकिस्तान से दूर रखता है।
आज पाकिस्तान के नागरिक विदेश में “वर्क वीज़ा” या “स्टूडेंट वीज़ा” के लिए अप्लाई करते हैं, तो कई देशों में उन्हें सीधा रिजेक्शन मिलता है। कई देशों ने तो पाकिस्तान के छात्रों पर अतिरिक्त सिक्योरिटी क्लॉज लगा दिए हैं।
यह स्थिति तब और शर्मनाक होती है जब कोई पाकिस्तानी नागरिक देखता है कि, उसके बगल में बैठा भारतीय या बांग्लादेशी नागरिक आसानी से एंट्री पा रहा है। अब आइए देखते हैं, कौन से 31 देश हैं जो अभी भी पाकिस्तान के लिए अपने दरवाज़े खुले रखते हैं।
इनमें ज़्यादातर अफ्रीकी, छोटे कैरेबियाई या ओशिनिया के द्वीपीय देश हैं — जैसे डोमिनिका, हैती, माइक्रोनेशिया, पलाऊ, सेंट वीनसेंट, ट्रिनिडाड एंड टोबैगो, वनुआटू, आदि। इनमें से कई देशों में तो वीज़ा-ऑन-अराइवल सिस्टम है, यानी पहुंचने के बाद पेपरवर्क पूरा किया जाता है।
लेकिन ये देश न तो पाकिस्तान के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं, न ही नागरिकों के लिए बड़े अवसर प्रदान करते हैं। यानी असल मायनों में पाकिस्तान के नागरिकों की दुनिया अब सिमटकर सिर्फ़ 31 छोटे-छोटे टापुओं तक रह गई है।
अब ज़रा सोचिए — एक आम पाकिस्तानी परिवार का सपना होता है अपने बच्चों को विदेश भेजना, बेहतर जिंदगी देना। लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि सिर्फ़ वीज़ा इंटरव्यू पास करने में महीनों लग जाते हैं, और फिर भी “Security Concern” के कारण वीज़ा रिजेक्ट हो जाता है, तो उस सपने का क्या होता है? यह सिर्फ़ Passport की नहीं, उम्मीदों की भी बर्बादी है।
दूसरी तरफ़ भारत जैसे देश हैं जो लगातार अपने नागरिकों के लिए डिप्लोमैटिक रास्ते खोल रहे हैं। विदेश मंत्री जयशंकर की “वीज़ा लिबरलाइज़ेशन” नीतियों ने कई देशों में भारतीय Passport की साख बढ़ाई है। चाहे जापान हो, ऑस्ट्रेलिया, या यूरोप — भारतीय नागरिकों के लिए भरोसा बढ़ा है। और यही भरोसा किसी राष्ट्र की असली ताकत होती है।
वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं कि “हमारे साथ भेदभाव हो रहा है।” लेकिन सच्चाई यह है कि भेदभाव नहीं, अविश्वास हो रहा है — और वह अविश्वास उन्होंने खुद कमाया है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि पाकिस्तान की एलिट क्लास खुद इस Passport को इस्तेमाल ही नहीं करती।
अमीर पाकिस्तानी नेताओं, व्यापारियों, और जनरलों के पास डुअल सिटिजनशिप है — किसी के पास ब्रिटिश Passport, किसी के पास कैनेडियन या एमिराती। यानि, जिन लोगों ने देश को इस हालत तक पहुंचाया, वो खुद इस “कमज़ोर Passport” की ज़रूरत महसूस नहीं करते। जो बच जाते हैं, वो आम लोग — जिनके लिए हर बार यह पासपोर्ट humiliation का प्रतीक बन जाता है।
अब सोचिए, जब कोई एयरपोर्ट पर पाकिस्तानी पासपोर्ट देखकर आंखें सिकोड़ ले, तो उस नागरिक के आत्म-सम्मान पर क्या बीतती होगी? वो जानता है कि उसकी गलती नहीं, लेकिन दुनिया का रवैया उसकी तरफ़ “डिफॉल्ट नेगेटिव” है।
कभी पाकिस्तान ने कहा था — “हमारे पास एटम बम है, इसलिए कोई हमें नजरअंदाज नहीं कर सकता।” आज वही देश इस सच्चाई से जूझ रहा है कि एटम बम से पासपोर्ट की ताकत नहीं बढ़ती, वो बढ़ती है भरोसे, शांति और विकास से।
आज पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ़ रैंकिंग नहीं, बल्कि “डिप्लोमैटिक डेथ वार्निंग” है। हर साल यह इंडेक्स उसे याद दिलाता है कि जब बाकी देश अपनी सीमाएं खोल रहे हैं, तब पाकिस्तान की सीमाएं और संकुचित हो रही हैं। किसी देश का पासपोर्ट उस देश की आत्मा का आईना होता है — और पाकिस्तान का पासपोर्ट उस आत्मा की थकान, टूटी उम्मीदें, और खोई हुई साख का प्रतीक बन गया है।
अगर पाकिस्तान वाकई अपनी स्थिति सुधारना चाहता है, तो उसे यह समझना होगा कि आतंकवाद, उग्रवाद, और कट्टरपंथ से कोई देश महान नहीं बनता। महानता आती है इकोनॉमिक स्टेबिलिटी, इंटरनेशनल ट्रस्ट, और पीसफुल डिप्लोमेसी से।
लेकिन जब तक पाकिस्तान अपने अंदर झांककर यह सच्चाई नहीं देखता, तब तक उसका पासपोर्ट हर साल इस इंडेक्स में और नीचे जाता रहेगा। और हर साल दुनिया उसे याद दिलाती रहेगी — कि ताकत सिर्फ़ हथियारों से नहीं, भरोसे से बनती है।
Conclusion
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