ज़रा सोचिए… एक सुबह जब मुंबई के सी-व्यू ऑफिस में बैठे Nayara Energy के अधिकारी अपने लैपटॉप खोलते हैं, तो अचानक ईमेल की एक लाइन उनकी सांसें रोक देती है — “United Kingdom sanctions Nayara Energy Limited.” एक पल के लिए जैसे पूरा कमरा ठहर जाता है। यह सिर्फ एक कंपनी पर लगा प्रतिबंध नहीं था, बल्कि एक ऐसा संदेश था, जिसने भारत, रूस और पश्चिमी दुनिया के बीच नई खींचतान की शुरुआत कर दी। सवाल उठने लगे — क्या भारत अब रूस की तरफ़ खड़ा है? या ये सब Geopolitical चालों का हिस्सा है?
दरअसल, यूके सरकार ने घोषणा की कि उसने रूस की 90 कंपनियों पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं — और इनमें भारत की Nayara Energy का नाम भी शामिल है। ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि यह कदम रूस की युद्ध फंडिंग को रोकने के लिए उठाया गया है, ताकि पुतिन को मिलने वाली तेल से होने वाली कमाई पर रोक लगाई जा सके। लेकिन इस कहानी में सिर्फ़ तेल की बात नहीं है, बल्कि सत्ता, रणनीति, और संप्रभुता के सवाल छिपे हैं।
Nayara Energy पर लगाए गए आरोप सीधे और गंभीर हैं — ब्रिटिश सरकार के अनुसार, कंपनी ने साल 2024 में 10 करोड़ बैरल यानी लगभग 5 अरब डॉलर से अधिक का रूसी क्रूड ऑयल Import किया। इतना तेल जो यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस की अर्थव्यवस्था को सांस लेने लायक ऑक्सीजन देता रहा। ब्रिटेन का कहना है कि Nayara जैसी कंपनियां, भले ही सीधे रूस की नहीं हों, पर अप्रत्यक्ष रूप से उस “वित्तीय नेटवर्क” का हिस्सा हैं जो रूस को युद्ध जारी रखने में मदद कर रहा है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। Nayara Energy का जवाब उतना ही सख्त और स्पष्ट था। कंपनी ने कहा — “हम भारत के सभी कानूनों और नियमों का पालन करते हैं। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के प्रतिबंध भारत की संप्रभुता का उल्लंघन हैं और हमारी Energy security के खिलाफ हैं।” यह बयान अपने आप में एक संकेत था — कि भारत किसी विदेशी दबाव में नहीं झुकेगा।
अब ज़रा समझिए कि Nayara Energy आखिर है कौन। यह वही कंपनी है जो पहले “Essar Oil” के नाम से जानी जाती थी। साल 2017 में इसे Rosneft — रूस की सरकारी तेल कंपनी — और Kesani Enterprises ने मिलकर खरीदा था। आज Nayara में Rosneft की 49% हिस्सेदारी है, यानी लगभग आधी कंपनी रूसी नियंत्रण में है। बाकी हिस्सेदारी Kesani Enterprises के पास है, जिसमें इटली की Mareterra Group और रूस की United Capital Partners जैसी संस्थाएं शामिल हैं। इसलिए, जब ब्रिटेन Nayara पर प्रतिबंध लगाता है, तो उसका मतलब केवल भारत से नहीं, बल्कि रूस के वित्तीय नेटवर्क से भी है।
लेकिन सवाल ये उठता है — जब पश्चिमी देश रूस से तेल नहीं खरीदते, तब भारत रूस से क्यों खरीद रहा है? इसका जवाब भारत के राष्ट्रीय हित में छिपा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने अपने तेल पर भारी डिस्काउंट देना शुरू किया — कभी 30%, कभी 40% तक सस्ता। भारत ने इसका फायदा उठाया, क्योंकि उसके लिए यह Energy security का मामला था। देश को अपनी 85% से ज़्यादा ऊर्जा ज़रूरतें Import से पूरी करनी होती हैं। ऐसे में सस्ता तेल खरीदना एक आर्थिक मजबूरी भी थी और एक रणनीतिक निर्णय भी।
लेकिन पश्चिमी देशों को ये रास नहीं आया। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने कहा कि रूस के सस्ते तेल से बना हर डॉलर यूक्रेन में बहते खून की कीमत बढ़ाता है। इसी लॉजिक पर उन्होंने Nayara को निशाने पर लिया। पर असलियत इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।
Nayara Energy भारत की तीसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी चलाती है, और उसके पास करीब 6,600 फ्यूल स्टेशन हैं। यह देश की पेट्रोल-डीज़ल सप्लाई चेन की एक अहम कड़ी है। अगर ऐसी कंपनी पर विदेशी पाबंदियाँ लगती हैं, तो इसका असर केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहता — बल्कि पूरे energy sector पर पड़ता है।
जुलाई 2025 में जब यूरोपीय संघ ने Nayara को अपने 18वें प्रतिबंध पैकेज में शामिल किया, तो इसका असर तुरंत दिखा। कंपनी ने करीब दो हफ्तों तक अपने Export रोक दिए थे। उसके पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल का Export घटकर 1.38 लाख बैरल प्रतिदिन से गिरकर सिर्फ 80,000 बैरल प्रतिदिन रह गया। साथ ही रिफाइनरी के मेंटेनेंस के लिए जरूरी मशीनें और उपकरण लाना भी मुश्किल हो गया। यूरोपियन सप्लायर्स ने सप्लाई रोक दी — क्योंकि उनके लिए Nayara “ब्लैकलिस्टेड” थी।
ऐसे में कंपनी ने भारत सरकार से मदद मांगी। सरकार ने तुरंत कदम उठाया और Nayara के विदेशी भुगतान संभालने के लिए UCO Bank को नामित किया, ताकि किसी भी विदेशी बैंक की रुकावट से उसकी ऑपरेशंस प्रभावित न हों।
ये वही मॉडल है जो पहले ईरान के मामले में भी इस्तेमाल हुआ था, जब अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने ईरान से तेल खरीदा था और भुगतान भारतीय बैंकों के ज़रिए किया था।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी है। ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर ने कहा — “यह यूक्रेन के लिए निर्णायक समय है। ब्रिटेन और उसके सहयोगी पुतिन की फंडिंग लाइनों को काट रहे हैं। रूस के तेल, गैस और शैडो फ्लीट पर वार जारी रहेगा — जब तक वो युद्ध छोड़कर शांति की राह नहीं चुनता।”
उनका यह बयान साफ़ संकेत देता है कि पश्चिमी देश अब रूस की हर “आर्थिक धमनियों” पर प्रहार करना चाहते हैं, चाहे वो रूस की हों या भारत में मौजूद किसी साझेदारी के ज़रिए संचालित।
लेकिन भारत का रुख इस पूरे प्रकरण में बेहद संतुलित है। भारत ने कई बार दोहराया है कि उसका रूस से तेल खरीदना “राष्ट्रीय ऊर्जा हित” का मामला है। विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट कहा था — “हम कोई नैतिक निर्णय नहीं ले रहे, हम अपने नागरिकों के हित में निर्णय ले रहे हैं। अगर यूरोप रूस से गैस खरीद सकता है, तो भारत को तेल खरीदने से कोई नहीं रोक सकता।”
इस बयान के पीछे केवल राजनीति नहीं, बल्कि आंकड़े भी हैं। युद्ध से पहले भारत रूस से कुल तेल Import का 1% से भी कम लेता था। लेकिन 2024 तक यह बढ़कर 35% तक पहुँच गया। इसका मतलब है कि भारत ने न सिर्फ अपनी Energy cost घटाई, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में Competition भी बनाए रखी। अगर भारत ऐसा न करता, तो पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें 20 से 25 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती थीं।
लेकिन अब जब ब्रिटेन ने Nayara पर प्रतिबंध लगाए हैं, तो इसका असर कई स्तरों पर होगा। पहला — कंपनी की शिपिंग कॉन्ट्रैक्ट्स पर। कई यूरोपियन शिपिंग कंपनियां पहले ही Nayara के साथ डील कैंसल कर रही हैं, क्योंकि उन्हें अपने Insurance providers से क्लियरेंस नहीं मिल रहा। दूसरा — इंश्योरेंस। जब कोई कंपनी सैंक्शन लिस्ट में आती है, तो उसकी शिपमेंट का बीमा करना रिस्की माना जाता है। इससे International transportation costs बढ़ जाती है। तीसरा — भुगतान व्यवस्था। विदेशी बैंकों में Nayara के ट्रांजेक्शन को ब्लॉक किया जा सकता है, जिससे देरी और नकदी संकट की स्थिति बन सकती है।
इन सबके बीच भारत सरकार का रोल बेहद अहम है। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत सरकार इस मामले को “राजनयिक वार्ता” के जरिए सुलझाने की कोशिश करेगी। क्योंकि Nayara सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि रूस-भारत ऊर्जा सहयोग का प्रतीक है। अगर Nayara कमजोर पड़ती है, तो यह संदेश जाएगा कि पश्चिमी दबाव भारत की नीति को प्रभावित कर सकता है — और यह बात नई दिल्ली कभी नहीं चाहेगी।
दूसरी तरफ, रूस के लिए भी Nayara बेहद अहम है। Rosneft के पास भारत की यह हिस्सेदारी रूस के लिए “एशिया एनर्जी गेटवे” है। जब यूरोप ने रूस से दूरी बनाई, तब भारत जैसे बाज़ार ने उसके लिए नया रास्ता खोला। रूस का क्रूड अब व्लादिवोस्तोक से गुजरात तक आने लगा है, और इसी नेटवर्क के ज़रिए रूस अपनी अर्थव्यवस्था को आक्सीजन देता है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल शुरुआत है। पश्चिमी देश अब उन तीसरे देशों पर भी नजर रखेंगे जो रूस से जुड़े हुए हैं। और यही वजह है कि Nayara जैसी कंपनियों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है — ताकि रूस की आर्थिक कड़ी को धीरे-धीरे कमजोर किया जा सके।
लेकिन यहाँ एक दिलचस्प मोड़ भी है। भारत की तेल नीति अब “विविधता और स्वतंत्रता” पर आधारित है। यानी न तो सिर्फ रूस पर निर्भरता और न ही पश्चिमी देशों की शर्तों पर समझौता। भारत सऊदी अरब, अमेरिका, और अफ्रीका से भी तेल Import कर रहा है — ताकि कोई भी देश उसकी ऊर्जा सुरक्षा को ब्लैकमेल न कर सके।
इस बीच, भारतीय अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग कह रहा है कि Nayara पर प्रतिबंध भारत के लिए एक wake-up call है। भारत को अपनी ऊर्जा कंपनियों को “geopolitical insulation” देना होगा — यानी उन्हें ऐसे तंत्र से जोड़ना, जो किसी एक देश की पॉलिसी से प्रभावित न हों।
जैसे चीन ने अपनी state-owned companies को US प्रतिबंधों से बचाने के लिए नया “payment settlement system” बनाया था, उसी तरह भारत को भी ऊर्जा कारोबार में वैकल्पिक रास्ते खोजने होंगे।
कई जानकारों का यह भी मानना है कि Nayara की यह मुश्किल भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेज़ी से धकेलेगी। Refineries के अपग्रेडेशन, क्रूड के मिश्रण में विविधता, और स्वदेशी ऊर्जा उपकरण निर्माण जैसे कदम अब और ज़रूरी हो जाएंगे।
पर इन सबके बीच एक बड़ा सवाल अभी बाकी है — क्या यह कदम ब्रिटेन का आर्थिक दबाव है या राजनीतिक संदेश? क्योंकि यूरोप खुद भी रूस से Indirect रूप से गैस खरीद रहा है — सिर्फ़ अलग-अलग intermediaries के ज़रिए। ऐसे में भारत पर नैतिक दबाव डालना कई देशों को दोहरे मानदंड जैसा लग रहा है।
ब्रिटिश मीडिया में भी इस फैसले पर मतभेद दिख रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन का यह कदम भारत जैसे सहयोगी देश के साथ तनाव बढ़ा सकता है, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले से ही आर्थिक अस्थिरता और युद्ध की राजनीति में उलझी हुई है।
भारत के लिए यह एक कूटनीतिक balancing act है — एक तरफ़ रूस, जिससे दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा संबंध है, और दूसरी तरफ़ पश्चिम, जो भारत का प्रमुख व्यापारिक और तकनीकी साझेदार है।
लेकिन इतिहास बताता है कि भारत हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है। चाहे वो 1971 का युद्ध हो, 1998 के Nuclear testing हों, या अब यह तेल कूटनीति — भारत ने हमेशा अपने फैसले खुद लिए हैं।
Conclusion
अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
GRT Business विभिन्न समाचार एजेंसियों, जनमत और सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी लेकर आपके लिए सटीक और सत्यापित कंटेंट प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हालांकि, किसी भी त्रुटि या विवाद के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। हमारा उद्देश्य आपके ज्ञान को बढ़ाना और आपको सही तथ्यों से अवगत कराना है।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारे GRT Business Youtube चैनल पर भी विजिट कर सकते हैं। धन्यवाद!”

