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Multiplex Reality: 100 रुपए का पानी, 700 की कॉफी — जब Supreme Court ने Multiplex की मनमानी पर लगाई लगाम I

Multiplex

ज़रा सोचिए… आप अपने परिवार के साथ किसी शानदार Multiplex में पहुंचे हैं। सीटें आरामदायक हैं, एसी की ठंडी हवा चल रही है, स्क्रीन पर फिल्म शुरू हो चुकी है, और माहौल पूरी तरह एंटरटेनमेंट से भरा हुआ है। लेकिन जैसे ही इंटरवल होता है, आप स्नैक्स काउंटर की तरफ बढ़ते हैं और वहीं से आपकी असली फिल्म शुरू होती है — एक ऐसी फिल्म जिसका किरदार है “ओवरप्राइसिंग” और जिसकी कहानी आपकी जेब पर सीधा वार करती है।

एक पानी की बोतल 100 रुपए में, एक कॉफी 700 रुपए में, और पॉपकॉर्न का एक छोटा टब 500 रुपए में। आप मुस्कुराते हैं, लेकिन अंदर से गुस्सा उबलने लगता है। क्या मनोरंजन अब सिर्फ अमीरों का अधिकार बन चुका है? यही सवाल अब देश की सबसे बड़ी अदालत — सुप्रीम कोर्ट — ने भी उठा दिया है।

भारत में सिनेमा हमेशा से “जनता का मनोरंजन” माना गया है। यह वो जगह थी जहाँ आम आदमी कुछ घंटों के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाता था, जहाँ एक 50 रुपए का टिकट भी खुशी की वजह बन जाता था। लेकिन समय के साथ जब Multiplex कल्चर आया, तो सिनेमा हॉल धीरे-धीरे “लक्ज़री हाउस” में बदलने लगे। एसी सीटें, सराउंड साउंड, और four K स्क्रीन के नाम पर टिकट के दाम बढ़ते गए। और जब जनता ने कहा कि टिकट महंगे हैं, तो Multiplex ने रास्ता निकाला — “सस्ता टिकट दो, महंगे स्नैक्स बेचो।” और यहीं से शुरू हुआ वो खेल, जहाँ खाने-पीने की चीजें फिल्म से भी ज़्यादा महंगी हो गईं।

कर्नाटक सरकार ने इस मनमानी पर रोक लगाने की कोशिश की। सरकार का कहना था कि हर व्यक्ति को सिनेमा का आनंद लेने का हक है, इसलिए टिकट की अधिकतम कीमत 200 रुपए तय की जानी चाहिए। लेकिन Multiplex मालिकों को यह पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा कि यह उनके बिजनेस में दखल है और वे इस आदेश को अदालत में ले गए। मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा, और फिर सुप्रीम कोर्ट। लेकिन जब सुनवाई शुरू हुई, तो मुद्दा सिर्फ टिकट का नहीं रहा — अब सवाल यह था कि क्या सिनेमा हॉल में बुनियादी चीजें, जैसे पानी, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक, के लिए इतनी ऊंची कीमतें वसूलना ठीक है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी की। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि “आप पानी की बोतल 100 रुपए में और कॉफी 700 रुपए में बेचते हैं। क्या यह वाजिब है? अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो लोग थिएटर जाना छोड़ देंगे।” कोर्ट ने साफ कहा कि ये दरें “मनमानी” हैं और दर्शक के साथ अन्याय है। यह बात केवल कानून के दायरे में नहीं थी, बल्कि उस भावना की भी थी, जो सिनेमा को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाती है।

Multiplex एसोसिएशन की तरफ से दलील दी गई कि “ताज होटल में भी तो कॉफी 1,000  रुपए की मिलती है, यह ग्राहक की पसंद है कि वो कहाँ जाए।” इस पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने तीखा जवाब दिया — “हर कोई ताज होटल नहीं जाता, लेकिन अब तो सामान्य सिनेमा हॉल भी ताज बन गए हैं।” कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ व्यंग्य नहीं थी, बल्कि एक गहरा सच छिपाए हुए थी। सिनेमा, जो कभी सबके लिए था, अब धीरे-धीरे एक अमीर तबके का शौक बन चुका है।

आज भारत में सिनेमा देखना पहले जैसा आसान नहीं रहा। एक औसत दर्शक जब थिएटर जाता है, तो टिकट के अलावा उसे पार्किंग, खाना और टैक्स में इतना खर्च करना पड़ता है कि एक मूवी नाइट का खर्च 1,500 से 2,000 रुपए तक पहुंच जाता है। परिवार के चार लोग अगर एक साथ फिल्म देखने जाएं, तो खर्च 10,000 रुपए तक हो जाता है। यही कारण है कि फिल्म निर्माता करण जौहर ने भी कहा था — “अब फिल्म देखना आम परिवार के लिए एक इवेंट नहीं, एक इन्वेस्टमेंट बन गया है।”

सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया। एक यूज़र ने लिखा, “फिल्म से ज़्यादा डर इंटरवल बिल का लगता है।” दूसरे ने कहा, “अगर पॉपकॉर्न सोने का बना होता तो भी 500 रुपए सही लगता।” यह व्यंग्य, वास्तव में सच्चाई का आईना है। Multiplex के बाहर 20 रुपए की पानी की बोतल अंदर जाकर 100 रुपए की हो जाती है। 50 रुपए का कोल्ड ड्रिंक 400 रुपए में मिलता है। और सबसे बड़ी बात — बाहर से कुछ लाने की अनुमति नहीं होती। अगर कोई दर्शक अपना खाना साथ लाना चाहे, तो सिक्योरिटी गार्ड कहता है — “सर, बाहर का खाना अंदर नहीं जा सकता।” यानी, आपके पास कोई विकल्प नहीं।

Multiplex मालिकों के अनुसार, टिकट पर उन्हें भारी टैक्स और रॉयल्टी देनी पड़ती है, बिजली और स्टाफ पर खर्च बढ़ गया है, इसलिए मुनाफा निकालने के लिए फूड आइटम महंगे करने पड़े। लेकिन अदालत ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज किया कि “बिजनेस की लागत दर्शक पर नहीं थोपी जा सकती।” कोर्ट का मानना है कि सिनेमा हॉल एक पब्लिक स्पेस है और वहाँ बुनियादी जरूरतें सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए।

यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे पर बहस हुई हो। साल 2018 में महाराष्ट्र में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि दर्शक अपने साथ खाना और पानी ले जा सकते हैं। अदालत ने तब कहा था कि “अगर आप टिकट बेचकर लोगों को अंदर बुला रहे हैं, तो उन्हें अपनी जरूरत का सामान ले जाने से नहीं रोक सकते।” उस फैसले के बाद कुछ समय तक नियमों में ढील मिली, लेकिन जल्द ही Multiplex ने नए बहाने खोज लिए — “फूड सेफ्टी”, “पैकेजिंग नियम”, और “सुरक्षा कारणों” के नाम पर फिर वही पुरानी मनमानी शुरू हो गई।

असल में, यह सिर्फ कानून का मामला नहीं है, यह एक मानसिकता का सवाल है — कि क्या मनोरंजन अब ‘आवश्यकता’ से ‘लक्ज़री’ बन चुका है? क्या आम आदमी को सिर्फ इसलिए सजा दी जा सकती है क्योंकि उसने सिनेमा हॉल में पॉपकॉर्न खाने की हिम्मत की? सिनेमा कभी समाज को जोड़ने का माध्यम था, लेकिन अब वह वर्गों में बाँट रहा है — एक तरफ वो जो 700 रुपए की कॉफी पी सकते हैं, और दूसरी तरफ वो जो सोचते हैं, “घर पर OTT पर देख लेंगे।”

महामारी के बाद जब थिएटर फिर से खुले, तो उम्मीद थी कि लोग सिनेमा हॉल लौटेंगे। लेकिन उल्टा हुआ। बढ़ती कीमतों ने लोगों को और दूर कर दिया। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अब थिएटर विज़िटर्स की संख्या 15% घट चुकी है। क्योंकि लोग अब सोचते हैं — “वही फिल्म दो हफ्ते बाद OTT पर 199 रुपए में मिल जाएगी।” यानी मनोरंजन का जो जादू कभी थिएटर में बसता था, वो अब स्क्रीन से निकलकर मोबाइल में सिमट गया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने अब एक नई उम्मीद जगाई है। कोर्ट ने कहा कि अगर सिनेमा हॉल्स इसी तरह मनमानी करते रहे, तो आने वाले समय में थिएटर खाली रह जाएंगे। यह टिप्पणी सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक सच्चाई है। क्योंकि अगर मनोरंजन लोगों की पहुंच से बाहर हो गया, तो वो अपनी राह खुद चुन लेंगे — और वो राह थिएटर से होकर नहीं जाएगी।

कर्नाटक सरकार का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल दाम घटाना नहीं, बल्कि “मनोरंजन को सुलभ बनाना” है। सरकार का पक्ष है कि अगर दर्शकों ने 1,000 रुपए का टिकट लिया और बाद में कोर्ट ने फैसला सरकार के पक्ष में दिया, तो दर्शक को उसका 800 रुपए रिफंड मिल सके। यानी सरकार ने दर्शक के हित में एक सुरक्षा कवच तैयार किया है। यह एक ऐसा प्रयास है जो दिखाता है कि सिनेमा सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

अब यह मामला सिर्फ अदालत के फैसले का नहीं, बल्कि आने वाली संस्कृति का सवाल बन चुका है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने फूड प्राइसिंग पर सख्त नियंत्रण लगाया, तो यह फैसला करोड़ों दर्शकों के लिए राहत की सांस बनेगा। लेकिन अगर अदालत ने इसे “व्यापारिक स्वतंत्रता” के तहत छोड़ दिया, तो आने वाले सालों में सिनेमा हॉल सिर्फ एलीट क्लास के लिए रह जाएंगे।

यह बहस अब केवल “पानी की बोतल और कॉफी” तक सीमित नहीं रही। यह एक बड़ी लड़ाई है उस सोच के खिलाफ, जो कहती है कि “मनोरंजन अमीरों का अधिकार है।” भारत जैसा देश, जहाँ सिनेमा समाज की धड़कन है, वहाँ इस तरह की नीतियाँ केवल सिनेमा हॉल नहीं, बल्कि सिनेमा की आत्मा को भी प्रभावित करती हैं।

क्योंकि सिनेमा सिर्फ पर्दा नहीं है, यह एक अनुभव है। वो तालियां, वो सीटियां, वो परिवार का साथ, वो हंसी — यह सब मिलकर ही एक फिल्म का जादू बनाते हैं। लेकिन जब एक दर्शक उस जादू के बीच अपने बजट की चिंता करने लगे, तो वह जादू फीका पड़ जाता है। और यही खतरा आज भारतीय सिनेमा के सामने खड़ा है।

Conclusion

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