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Mohan Lal Mittal की विरासत: राजगढ़ के एक साधारण पिता से ‘स्टील किंग’ तक, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी की नींव रखी I 2026

कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी इमारतें सबसे खामोश नींव पर खड़ी होती हैं। कैमरे चमकते हैं, सुर्खियां किसी और के नाम होती हैं, लेकिन असली कहानी उस शख्स की होती है जो परदे के पीछे खड़ा रहकर पूरी पीढ़ी की सोच गढ़ देता है। आज जब दुनिया लक्ष्मी निवास मित्तल को “स्टील किंग” के नाम से जानती है, तो शायद बहुत कम लोग उस इंसान को जानते हैं, जिसने इस स्टील साम्राज्य की असली नींव रखी। वह इंसान थे Mohan Lal Mittal। एक पिता, एक मार्गदर्शक, और एक ऐसा उद्यमी, जिसने बिना किसी ग्लैमर के दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी की कहानी लिख दी।

लंदन में जब 99 साल की उम्र में Mohan Lal Mittal ने अंतिम सांस ली, तो वह सिर्फ एक उद्योगपति के पिता नहीं थे। वह एक युग का प्रतिनिधित्व करते थे। एक ऐसा युग, जहां संसाधन नहीं थे लेकिन संकल्प था। जहां Risk डर नहीं था बल्कि जिम्मेदारी थी। और जहां व्यापार सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि चरित्र की परीक्षा माना जाता था। अपने 100वें जन्मदिन से कुछ महीने पहले उनका जाना, जैसे एक लंबी कहानी का शांत अंत हो — बिना शोर, बिना दिखावे, लेकिन गहरी छाप छोड़ते हुए।

Mohan Lal Mittal का जन्म राजस्थान के चूरू जिले के छोटे से गांव राजगढ़ में हुआ था। रेगिस्तान की कठोर जमीन, सीमित साधन और एक साधारण, धार्मिक परिवार। उस दौर में सपने देखना भी साहस माना जाता था। लेकिन इसी सीमित माहौल में मोहन लाल मित्तल के भीतर एक अलग ही सोच आकार ले रही थी। लक्ष्मी मित्तल के शब्दों में, उनके पिता के जीवन के मूल मूल्य थे — आस्था, अनुशासन और कड़ी मेहनत। यही तीन चीजें बाद में मित्तल परिवार और उनके व्यवसाय की रीढ़ बन गईं।

राजगढ़ जैसे छोटे गांव से निकलकर बड़ा सोचना आसान नहीं होता। लेकिन Mohan Lal Mittal स्वभाव से ही उद्यमी थे। वह सिर्फ हालात के अनुसार चलने वाले इंसान नहीं थे, बल्कि हालात बदलने की क्षमता रखते थे। वह अपने बच्चों को हमेशा यही सिखाते थे कि सुरक्षित रास्ता अक्सर सबसे भीड़भाड़ वाला होता है, और असली मौके वहीं मिलते हैं जहां Risk होता है। यह सोच उस दौर में बेहद अलग थी, जब ज़्यादातर लोग सरकारी नौकरी या पारंपरिक व्यापार तक सीमित रहते थे।

लक्ष्मी मित्तल कई बार इंटरव्यू में कह चुके हैं कि, उनके पिता का दृष्टिकोण अपने समय से बहुत आगे था। Mohan Lal Mittal Risk लेने से नहीं डरते थे, बल्कि Risk को समझकर अपनाने में विश्वास रखते थे। वह कहते थे कि डर से बड़ा कोई दुश्मन नहीं और सोच से बड़ा कोई Investment नहीं। यही वजह थी कि उन्होंने अपने बेटे को सिर्फ व्यापार करना नहीं सिखाया, बल्कि दुनिया को पढ़ना सिखाया।

जब लक्ष्मी मित्तल युवा थे, तब भारत में स्टील सेक्टर बहुत सीमित था। सरकारी नियंत्रण, लाइसेंस राज और टेक्नोलॉजी की कमी। लेकिन Mohan Lal Mittal ने वहां भी अवसर देखा, जहां ज़्यादातर लोग बाधाएं देखते थे। उन्होंने अपने बेटे को यह समझाया कि स्टील सिर्फ धातु नहीं है, बल्कि किसी भी देश की रीढ़ होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री, विकास — सब कुछ स्टील पर टिका होता है।

यह सोच बाद में लक्ष्मी मित्तल के पूरे करियर की दिशा तय करने वाली बनी। मोहन लाल मित्तल का सबसे बड़ा योगदान शायद यह था कि, उन्होंने अपने बेटे को भारत की सीमाओं में सोचने नहीं दिया। उन्होंने सिखाया कि अगर बाजार छोटा लगे, तो नजरें बड़ी करो। यही वजह रही कि लक्ष्मी मित्तल ने बहुत कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय बाजार की तरफ रुख किया। इंडोनेशिया, त्रिनिदाद, मैक्सिको, कजाकिस्तान — दुनिया के ऐसे-ऐसे कोने जहां दूसरे उद्योगपति जाने से डरते थे, वहां मित्तल परिवार ने अवसर देखे। और इस सोच की जड़ में थे मोहन लाल मित्तल।

यह भी कम लोग जानते हैं कि Mohan Lal Mittal जीवन भर लाइमलाइट से दूर रहे। न उन्होंने कभी खुद को बड़े उद्योगपति के पिता के रूप में पेश किया, न ही किसी मंच पर श्रेय लेने की कोशिश की। वह हमेशा बैकसीट पर बैठकर दिशा दिखाने वाले इंसान रहे। परिवार के अनुसार, जीवन के अंतिम दिनों तक उनकी मानसिक दृढ़ता बनी रही। वह बिजनेस से जुड़े विषयों पर चर्चा करते थे, मार्गदर्शन देते थे और नई पीढ़ी को सुनते भी थे।

Mohan Lal Mittal अपने पीछे एक विशाल परिवार छोड़ गए हैं। पांच बच्चे, उनके जीवनसाथी, 11 पोते-पोतियां और 22 परपोते-परपोतियां। लेकिन यह सिर्फ संख्या नहीं है। यह उस संस्कार की विरासत है, जो उन्होंने अपने परिवार में बोई। Arcelor Mittal की ओर से जारी बयान में साफ कहा गया कि मोहन लाल मित्तल ईमानदारी, उद्देश्य और समाज के प्रति जिम्मेदारी के साथ व्यवसाय खड़ा करने में विश्वास रखते थे। उनके लिए व्यापार सिर्फ बैलेंस शीट नहीं था, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम था।

यही कारण है कि मित्तल परिवार परोपकार और सामाजिक कार्यों से भी जुड़ा रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा में उनका योगदान हमेशा शांत लेकिन प्रभावी रहा। Mohan Lal Mittal का मानना था कि जो समाज से लेता है, उसे समाज को लौटाना भी आना चाहिए। यही सोच आगे चलकर लक्ष्मी मित्तल फाउंडेशन और अन्य परोपकारी पहलों में दिखाई दी।

आज लक्ष्मी मित्तल दुनिया के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। फोर्ब्स के अनुसार उनकी नेटवर्थ करीब 24.9 बिलियन डॉलर है, यानी लगभग 2.26 लाख करोड़ रुपये। वह भारत के 12वें सबसे अमीर और दुनिया के 91वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। लेकिन इस ऊंचाई तक पहुंचने के पीछे सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि संस्कार भी हैं — और वो संस्कार मोहन लाल मित्तल से आए।

1995 में लक्ष्मी मित्तल लंदन चले गए और वहां से अपने वैश्विक स्टील साम्राज्य को और विस्तार दिया। Arcelor Mittal आज दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी है। 60 से ज्यादा देशों में ऑपरेशन, लाखों कर्मचारियों और अरबों टन स्टील उत्पादन की क्षमता। लेकिन इस वैश्विक साम्राज्य की जड़ें आज भी उस छोटे से गांव राजगढ़ तक जाती हैं, जहां एक साधारण पिता ने अपने बेटे को असाधारण सोच दी थी।

2019 में Nippon Steel के साथ मिलकर एस्सार स्टील का 59,000 करोड़ रुपये में अधिग्रहण भी उसी सोच का विस्तार था — संकट में अवसर देखने की सोच। और 2021 में जब लक्ष्मी मित्तल ने CEO की जिम्मेदारी अपने बेटे आदित्य मित्तल को सौंपी, तब भी Mohan Lal Mittal की विरासत साफ दिखाई दी। सत्ता सौंपना, अगली पीढ़ी पर भरोसा करना और खुद रणनीतिक मार्गदर्शक की भूमिका में रहना — यह सब उन्होंने अपने पिता से सीखा था।

आज चर्चा है कि भविष्य में लक्ष्मी मित्तल दुबई या स्विट्जरलैंड को भी आधार बना सकते हैं, ताकि अगली पीढ़ी को इनहेरिटेंस टैक्स से राहत मिल सके। लंदन के केंसिंग्टन पैलेस गार्डन्स में स्थित उनकी संपत्तियां, खासकर ‘ताज मित्तल’, अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन इन सब चमक-दमक के पीछे जो मूल मूल्य हैं, वे आज भी वही हैं — सादगी, अनुशासन और दूरदृष्टि।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने Mohan Lal Mittal के निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि, उन्होंने उद्योग जगत में अपनी अलग पहचान बनाई और भारतीय संस्कृति से गहरा लगाव रखा। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा कि उन्होंने एक मजबूत व्यावसायिक विरासत की नींव रखी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। यह श्रद्धांजलि सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस सोच को थी जिसने भारत को वैश्विक उद्योग में पहचान दिलाई।

Mohan Lal Mittal की कहानी हमें यह सिखाती है कि हर “स्टील किंग” के पीछे एक ऐसा पिता होता है, जो खुद कभी राजा नहीं बनता, लेकिन राजा बनाने की कला जानता है। वह हमें याद दिलाते हैं कि असली सफलता शोर में नहीं, मूल्यों में होती है।

और शायद यही वजह है कि उनकी विरासत सिर्फ स्टील के प्लांट्स या अरबों डॉलर की नेटवर्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि सोच, साहस और संस्कार की उस श्रृंखला में है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है। जब इतिहास Arcelor Mittal की कहानी लिखेगा, तो शायद मोहन लाल मित्तल का नाम सबसे बड़े अक्षरों में न हो। लेकिन जो इतिहास को समझते हैं, वे जानते हैं — अगर नींव मजबूत न होती, तो दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी कभी खड़ी नहीं हो पाती।

Conclusion

राजस्थान के एक छोटे से गांव से उठी एक सोच… और उसी सोच ने दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी की नींव रख दी। यह कहानी है उस व्यक्ति की, जिसका नाम अक्सर पर्दे के पीछे रहा—मोहन लाल मित्तल। लक्ष्मी मित्तल को “स्टील किंग” बनाने वाले यही वो पिता थे, जिनकी सीख ने इतिहास रचा। 99 साल की उम्र में लंदन में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार आख़िरी सांस तक जिंदा रहे।

साधारण परिवार में जन्मे मोहन लाल मित्तल ने आस्था, अनुशासन और कड़ी मेहनत को जीवन का आधार बनाया। वे हमेशा Risk लेने, बड़े सपने देखने और सुरक्षित दायरे से बाहर सोचने के लिए प्रेरित करते थे। आज Arcelor Mittal एक ग्लोबल स्टील जायंट है और लक्ष्मी मित्तल दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। लेकिन इस साम्राज्य की असली नींव एक शांत, दूरदर्शी और मूल्यनिष्ठ इंसान ने रखी थी—मोहन लाल मित्तल।

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