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Manrega की नई पहचान — नाम बदलने से क्या सच में मज़दूरों के सम्मान और हक़ को नई ताक़त मिलेगी? 2026

Manrega

सोचिए ज़रा—एक गांव की सुबह… कच्ची सड़क, हाथ में फावड़ा, पैरों में चप्पल नहीं, और माथे पर पसीना। उस मजदूर को शायद ये भी नहीं पता कि संसद में आज किस योजना का नाम बदला जा रहा है, किस कानून की आत्मा को नया चेहरा दिया जा रहा है। लेकिन उसे इतना ज़रूर पता है कि अगर कल काम नहीं मिला, तो चूल्हा नहीं जलेगा। सवाल यही है—जब काग़ज़ों पर नाम बदलते हैं, तो क्या ज़मीन पर पसीने की कीमत भी बदल जाती है?

आज भारत की राजनीति और नीति निर्माण के केंद्र में एक बड़ा बदलाव खड़ा है। Manrega—एक योजना नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए एक भरोसा—उसका स्वरूप बदला जा रहा है। सरकार कहती है सुधार हो रहा है, आलोचक कहते हैं अधिकार छीना जा रहा है। और इस बहस के बीच कहीं दब जाती है उस मजदूर की आवाज़, जो ना प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है, ना टीवी डिबेट में बैठता है।

आपको बता दें कि Manrega की कहानी आज की नहीं है। इसकी जड़ें उस दौर में हैं जब ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ गरीबी नहीं थी, बल्कि अनिश्चितता थी। 2004 में संसद के सामने एक ऐसा विचार आया, जो सीधा सवाल करता था—अगर शहरों में काम का अधिकार हो सकता है, तो गांवों में क्यों नहीं? उसी सवाल से जन्म हुआ National Rural Employment Guarantee Act का। यह सिर्फ एक स्कीम नहीं थी, यह एक सामाजिक कॉन्ट्रैक्ट था—राज्य और नागरिक के बीच।

इस कानून के बनने के पीछे केवल फाइलें और मीटिंग्स नहीं थीं। सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संस्थाएं, प्रशासक, और गांवों में रहने वाले आम लोग—सबकी आवाज़ इसमें शामिल थी। यही वजह थी कि जब यह कानून संसद में वापस आया, तो उसे सिर्फ राजनीतिक समर्थन नहीं मिला, बल्कि एक नैतिक वैधता भी मिली। संसद में कहा गया कि यह कानून इस बात का उदाहरण है कि सरकार और समाज मिलकर कैसे काम कर सकते हैं, बिना राजनीतिक भेदभाव के।

2005 में जब यह कानून पारित हुआ, तो सदन में “रोजगार गारंटी जिंदाबाद” के नारे लगे थे। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन इसी योजना के अस्तित्व पर सवाल उठेंगे। मनरेगा ने गांवों में सिर्फ काम नहीं दिया, उसने पलायन रोका, महिलाओं को आर्थिक पहचान दी, और सबसे बड़ी बात—काम को भीख नहीं, अधिकार बनाया।

Manrega की सबसे ताकतवर बात थी इसकी मांग आधारित प्रकृति। अगर मजदूर काम मांगता है, तो 15 दिनों के भीतर काम देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। और अगर काम नहीं मिलता, तो बेरोज़गारी भत्ता देना पड़ता है। यह कोई दया नहीं थी, यह जवाबदेही थी। योजना पूरे साल चलती थी, किसी सीज़न या राजनीतिक मर्ज़ी पर निर्भर नहीं थी।

फंडिंग का ढांचा भी साफ था। मजदूरी का 100 प्रतिशत भुगतान केंद्र सरकार करती थी। सामग्री के खर्च में भी बड़ा हिस्सा केंद्र का होता था। राज्यों और पंचायतों की भूमिका सिर्फ काम करवाने की नहीं, बल्कि काम चुनने की भी थी। ग्राम सभा तय करती थी कि गांव को क्या चाहिए—तालाब, सड़क, मिट्टी का बांध या पानी का रास्ता। यही Decentralization मनरेगा की आत्मा थी।

लेकिन अब जो नया Bill सामने आया है, वह इसी आत्मा को बदलता हुआ दिखता है। पंचायती राज व्यवस्था की भूमिका कम की जा रही है। प्राथमिकताएं अब गांव नहीं, केंद्र तय करेगा। यानी किस गांव में क्या काम होगा, यह ऊपर से तय होगा, नीचे से नहीं। सवाल उठता है—क्या दिल्ली से बैठे लोग गांव की ज़रूरतें बेहतर समझ सकते हैं?

इस बदलाव पर न तो व्यापक सार्वजनिक बहस हुई, न सामाजिक संगठनों से चर्चा, न विशेषज्ञों से संवाद। जब मांग उठी कि इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा जाए, तो उसे ठुकरा दिया गया। यह जल्दबाज़ी सिर्फ प्रक्रिया की नहीं, मंशा की भी तस्वीर पेश करती है। अगर योजना वाकई लोगों के हित में है, तो डर किस बात का है?

सबसे बड़ा बदलाव लागत साझा करने के अनुपात में किया गया है। पहले जहां 90:10 का ढांचा था, अब उसे 60:40 कर दिया गया है। इसका मतलब साफ है—राज्यों पर बोझ बढ़ेगा। जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति पहले से कमज़ोर है, वे अतिरिक्त खर्च कैसे उठाएंगे? क्या राज्यों से इस पर कोई गंभीर बातचीत की गई?

एक Federal system में बिना संवाद के बोझ डालना क्या Cooperative Unionism के खिलाफ नहीं है? अब केंद्र सरकार साल की शुरुआत में ही तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा। यह आवंटन न तो मजदूरों की मांग पर आधारित होगा, न आपदा की स्थिति पर। अगर किसी राज्य में सूखा पड़ गया, बाढ़ आ गई, महामारी फैल गई—तो भी केंद्र कह सकता है कि हमने तो पहले ही तय कर दिया था। ज़रूरत बढ़े तो खर्च राज्य करे, लेकिन नियम केंद्र के माने।

यह व्यवस्था Manrega को अधिकार से योजना में बदल देती है। जहां पहले मजदूर केंद्र में था, अब बजट केंद्र में है। और जब खेती का पीक सीज़न होगा, तब राज्यों को 60 दिनों का ब्लैकआउट पीरियड घोषित करना होगा—यानि उस दौरान काम नहीं मिलेगा। सवाल उठता है—क्या भूख और बेरोज़गारी कैलेंडर देखकर आती है? बायोमेट्रिक अटेंडेंस का प्रस्ताव भी ज़मीन से कटे हुए फैसले का उदाहरण है। जो मजदूर पत्थर तोड़ते-तोड़ते अपनी उंगलियों की लकीरें खो चुका है, उससे फिंगरप्रिंट की उम्मीद करना किस हद तक व्यावहारिक है? तकनीक सुविधा बन सकती है, लेकिन जब वह बाधा बन जाए, तो सबसे पहले गरीब ही बाहर होता है।

कोविड के दौर को याद कीजिए। जब देश बंद था, तब दो ही व्यवस्थाएं थीं जो लोगों के साथ खड़ी थीं—खाद्य सुरक्षा और मनरेगा। लाखों लोगों को शहरों से गांव लौटना पड़ा। Manrega ने उन्हें कम से कम यह भरोसा दिया कि काम मिलेगा, भूखे नहीं मरेंगे। उसी योजना को आज कमज़ोर करना, क्या उस अनुभव को भुला देना नहीं है?

कुछ साल पहले कहा गया था कि Manrega पिछली सरकार की विफलताओं का स्मारक है। लेकिन सच यह है कि जिन घरों में कभी अंधेरा था, वहां रोशनी इसी योजना से आई। यह विफलता नहीं, उपलब्धि की कहानी है। अगर आज संसद में मायूसी है, तो सरकार को सोचना चाहिए कि क्यों वही योजना, जो कभी सर्वसम्मति से पास हुई थी, आज विवाद का विषय बन गई है।

और फिर आता है नाम बदलने का सवाल। योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाया जा रहा है। सवाल सिर्फ नाम का नहीं है, सवाल सोच का है। गांधी से इतनी असहजता क्यों? इससे पहले भी गांधी के नाम से जुड़ी योजनाओं को बदला गया। अगर किसी और नेता के नाम से योजना बने, तो आपत्ति नहीं। लेकिन गांधी का नाम हटाने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है?
गांधी सिर्फ एक नाम नहीं हैं। वह उस विचार का प्रतीक हैं, जिसमें आख़िरी आदमी सबसे पहले आता है। जिस मिट्टी में मजदूर का पसीना गिरता है, वहां गांधी का नाम अपने आप लिखा होता है। आप बोर्ड बदल सकते हैं, पोस्टर बदल सकते हैं, लेकिन इतिहास की स्याही नहीं बदल सकते।

पुराने संसद भवन के सामने लगी गांधी की मूर्ति का सवाल सिर्फ मूर्ति का नहीं है, प्रतीक का है। इस देश की मिट्टी में सिर्फ एक विचार नहीं बसा, बल्कि कई धाराएं हैं—नेहरू, पटेल, मौलाना आज़ाद, अंबेडकर। आप योजनाओं से नाम हटा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की नींव से इन विचारों को नहीं निकाल सकते।
अगर कोई सोचता है कि नाम बदलने से इतिहास बदल जाएगा, तो वह इतिहास को नहीं, खुद को धोखा दे रहा है। गांधी न किसी योजना का शीर्षक हैं, न किसी पोस्टर की मजबूरी। गांधी उस सवाल का नाम हैं, जो हर सत्ता से पूछा जाता है—क्या तुमने आख़िरी आदमी के बारे में सोचा?

आज सवाल यही है—क्या सरकार को मजदूरों के पसीने की कद्र है? अगर इरादा सच में सुधार का है, तो संवाद से डर क्यों? सेलेक्ट कमेटी से क्यों भागना? समय लीजिए, चर्चा कीजिए, बदलाव कीजिए—और एक ऐसा कानून लाइए, जो मजदूर को कमजोर नहीं, मज़बूत बनाए।

अगर यह इरादा हो कि भारत के गरीब, भारत के मजदूर, भारत की महिलाएं ऊपर उठें—तो साथ चलने को बहुत लोग तैयार हैं। लेकिन अगर योजनाएं राजनीतिक हथियार बनेंगी, तो टकराव तय है। Manrega सिर्फ एक कानून नहीं, एक भरोसा है। और भरोसा अगर टूटता है, तो उसका शोर संसद से ज़्यादा गांवों में सुनाई देता है। वीडियो खत्म करते हुए एक आख़िरी सवाल—जब अगली बार आप गांव की सड़क से गुज़रें, और किसी मजदूर को काम करते देखें, तो खुद से पूछिए—उसके पसीने की कीमत क्या है? क्योंकि जवाब सिर्फ नीति में नहीं, नीयत में छिपा होता I

Conclusion

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