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Kevin Warsh: नए भरोसे की उम्मीद — क्या Fed की कमान संभालकर बदल देंगे बाजार और दुनिया की आर्थिक दिशा? 2026

Kevin Warsh

एक ऐसी सुबह, जब न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो तक स्क्रीन पर एक ही हेडलाइन चमक रही हो। डॉलर हिल रहा है, गोल्ड उछल रहा है, बॉन्ड यील्ड्स करवट ले रही हैं और दुनिया के सबसे ताकतवर, सेंट्रल बैंक की कुर्सी को लेकर सवाल हवा में तैर रहे हैं। डर भी है, curiosity भी, और एक कहानी भी—क्योंकि यह सिर्फ़ एक नामांकन नहीं है।

यह उस सिस्टम की दिशा तय करने वाला पल हो सकता है, जो आपकी होम लोन की EMI से लेकर दुनिया की महंगाई तक सब कुछ प्रभावित करता है। क्या वाकई Kevin Warsh, Jerome Powell के बाद फेडरल रिजर्व की कमान संभालने जा रहे हैं? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या Federal Reserve पहले जैसा स्वतंत्र रहेगा, या व्हाइट हाउस की परछाईं और गहरी हो जाएगी?

यह कहानी शुरू होती है उस पल से, जब Donald Trump ने अपने सोशल प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट लिखी। शब्दों में भरोसा था, दावे में आत्मविश्वास और संदेश में सियासी ताकत। ट्रंप ने कहा कि वे केविन वॉर्श को लंबे समय से जानते हैं, उन पर पूरा भरोसा है, और वे फेड के महानतम चेयरमैनों में से एक साबित होंगे। यह सिर्फ़ तारीफ नहीं थी। यह एक संकेत था कि व्हाइट हाउस फेड पर अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहता है। बाजार ने इस संकेत को तुरंत पढ़ लिया।

अगर सीनेट की मंजूरी मिलती है, तो मई में जेरोम पॉवेल का कार्यकाल खत्म होते ही तस्वीर बदल सकती है। दिलचस्प बात यह है कि पॉवेल को भी 2017 में ट्रंप ने ही नियुक्त किया था। लेकिन वक्त के साथ रिश्तों में दरार आई। ब्याज दरों को लेकर मतभेद खुले मंच पर आए। ट्रंप चाहते थे तेज कटौती, ताकि ग्रोथ को रफ्तार मिले। पॉवेल ने महंगाई के डर से संयम चुना। यही टकराव आज इस कहानी की जड़ में है।

फेडरल रिजर्व अमेरिका की उन गिनी-चुनी संस्थाओं में है, जिनकी पहचान स्वतंत्रता से जुड़ी रही है। इसकी जिम्मेदारी सिर्फ़ दरें तय करना नहीं है। यह महंगाई को काबू में रखने, अधिकतम रोजगार सुनिश्चित करने और बैंकिंग सिस्टम की निगरानी करने की धुरी है। इसके फैसलों का असर आपकी क्रेडिट कार्ड बिल से लेकर ग्लोबल कैपिटल फ्लो तक दिखता है। यही वजह है कि फेड चेयर की कुर्सी दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक कुर्सियों में गिनी जाती है।

केविन वॉर्श का प्रोफाइल इस कहानी को और रोचक बनाता है। वे 2006 से 2011 तक फेडरल रिजर्व बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। महज 35 साल की उम्र में वे इतिहास के सबसे युवा फेड गवर्नर बने। स्टैनफोर्ड के हूवर इंस्टीट्यूशन में फेलो रहे वॉर्श को नीतिगत रूप से हॉकिश माना जाता है। यानी महंगाई के खिलाफ सख्ती, जरूरत से ज्यादा ढील के विरोधी और फेड की बैलेंस शीट को स्लिम करने के समर्थक। यह वही सोच है, जो आज के बाजार को बेचैन कर रही है।

ट्रंप के लिए वॉर्श कुछ मायनों में अप्रत्याशित भी हैं। ट्रंप खुले तौर पर कहते रहे हैं कि फेड की प्रमुख दर 1 प्रतिशत तक होनी चाहिए। मौजूदा स्तर इससे काफी ऊपर है। दूसरी तरफ वॉर्श लंबे समय तक ऊंची दरों के समर्थक रहे हैं, खासकर तब जब महंगाई का जोखिम बढ़ता दिखे। 2008 की वैश्विक मंदी के दौरान भी उन्होंने फेड की बेहद ढीली नीति पर सवाल उठाए थे। तब बहुतों ने कहा कि उनकी चिंता बेवजह है, क्योंकि महंगाई काबू में रही। लेकिन हालिया वर्षों में महंगाई के उछाल ने उनके पुराने तर्कों को फिर चर्चा में ला दिया है।

यहीं कहानी में एक ट्विस्ट आता है। हाल के भाषणों और लेखों में वॉर्श ने अपेक्षाकृत नरम सुर भी अपनाए हैं। उन्होंने माना है कि प्रोडक्टिविटी में तकनीकी छलांग—खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—महंगाई को दबाने की क्षमता रखती है। उनका तर्क है कि फेड ने AI-सुपरचार्ज्ड प्रोडक्टिविटी को कम आंका। इस बयान ने ट्रंप के उस दबाव को भी वैधता दी, जिसमें वे दरों में कटौती की मांग करते रहे हैं। बाजार इसे एक संकेत के तौर पर देख रहा है कि वॉर्श पूरी तरह से कठोर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से लचीले भी हो सकते हैं।

फिर आता है सीनेट का सवाल। अमेरिका में राष्ट्रपति का नामांकन अपने आप में नियुक्ति नहीं होता। सीनेट की बैंकिंग कमेटी की सुनवाई, सवाल-जवाब और फिर पूरी सीनेट में साधारण बहुमत से पुष्टि जरूरी होती है। 51 वोट—यही वह संख्या है, जो तय करेगी कि वॉर्श फेड की कुर्सी तक पहुंचेंगे या नहीं। यह प्रक्रिया समय लेती है और इसी अनिश्चितता में बाजार झूलता है।

बाजार की प्रतिक्रिया क्यों इतनी तेज है। क्योंकि वॉर्श के बयानों में “रेजिम चेंज” जैसा शब्द बार-बार आया है। सेंट्रल बैंक की भाषा में इसका मतलब सिर्फ़ दरों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि पॉलिसी फ्रेमवर्क, कम्युनिकेशन और लिक्विडिटी मैनेजमेंट में बड़ा बदलाव। निवेशक इसे टाइट फाइनेंशियल कंडीशंस के संकेत के रूप में पढ़ते हैं। नतीजा—डॉलर इंडेक्स में हलचल, बॉन्ड यील्ड्स में उछाल और गोल्ड-सिल्वर में तेज उतार-चढ़ाव।

वॉर्श की सोच मजबूत डॉलर और ऊंची रियल यील्ड के पक्ष में मानी जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि अमेरिकी बॉन्ड आकर्षक हो सकते हैं, कैपिटल अमेरिका की ओर खिंच सकता है और उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि उनका नाम सामने आते ही रिस्क एसेट्स में बेचैनी दिखी। क्रिप्टो पर भी उनकी नजर सख्त मानी जाती है। वे क्रिप्टोकरेंसी को महंगाई के खिलाफ सुरक्षित विकल्प नहीं मानते, बल्कि ढीली नीति से पैदा हुई सट्टा संपत्ति कहते हैं। यह सोच क्रिप्टो बाजार के लिए भी नकारात्मक संकेत है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। अगर फेड की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो भरोसा कमजोर पड़ता है। फेड की ताकत सिर्फ़ उसके टूल्स में नहीं, उसकी credibility में है। जब राष्ट्रपति खुले मंच पर सेंट्रल बैंक पर हमला करते हैं, या नियुक्तियों के जरिए नीति पर असर डालने की कोशिश करते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या फेड व्हाइट हाउस के ज्यादा करीब आ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यही डर बाजार में प्राइस हो रहा है।

फेड चेयर का रोल सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं। डॉलर दुनिया की रिजर्व करेंसी है। फेड की नीति का असर लैटिन अमेरिका की मुद्राओं से लेकर एशिया के बॉन्ड तक दिखता है। अगर फेड हॉकिश होता है, तो ग्लोबल लिक्विडिटी टाइट होती है। अगर डोविश होता है, तो रिस्क एसेट्स में जोश आता है। वॉर्श की संभावित नियुक्ति इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह आने वाले चार सालों की दिशा तय कर सकती है।

ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि वॉर्श “सेंट्रल कास्टिंग” जैसे हैं और कभी निराश नहीं करेंगे। यह शब्द चुनावी राजनीति की भाषा से आता है—ऐसा चेहरा, जो रोल में फिट बैठे। बाजार इसे इस तरह पढ़ रहा है कि ट्रंप को एक ऐसा चेयर चाहिए, जो उनके ग्रोथ-फर्स्ट एजेंडे को समझे, लेकिन सिस्टम की साख भी बनाए रखे। क्या यह संतुलन संभव है। यही बड़ा सवाल है।

वॉर्श का बैकग्राउंड बताता है कि वे संस्थागत बदलाव के समर्थक हैं। उन्होंने फेड की बैलेंस शीट स्लिम करने, बैंक नियमों में ढील और कम्युनिकेशन को साफ करने की बात की है। यह सब मिलकर एक अलग फेड की तस्वीर बनाते हैं—कम भारी, ज्यादा अनुशासित और महंगाई पर कड़ी नजर वाला। लेकिन क्या यह तस्वीर उस दौर में फिट बैठती है, जब राजनीति और अर्थव्यवस्था का घालमेल बढ़ रहा है।

अब सवाल ये है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा। अगर दरें ऊंची रहती हैं, तो होम लोन और कार लोन महंगे होंगे। क्रेडिट कार्ड की लागत बढ़ेगी। डॉलर मजबूत हुआ, तो Import सस्ता और Export महंगा हो सकता है। उभरते बाजारों से पैसा बाहर जा सकता है। गोल्ड और सिल्वर जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स पर दबाव आ सकता है। वहीं, अगर वॉर्श अपेक्षा से ज्यादा नरम रुख अपनाते हैं, तो तस्वीर उलट भी सकती है।

यही अनिश्चितता कहानी का केंद्र है। बाजार भविष्य को प्राइस करता है, और भविष्य अभी धुंधला है। सीनेट की मंजूरी बाकी है। पॉवेल का कार्यकाल खत्म होना बाकी है। ट्रंप के दबाव और वॉर्श की सोच के बीच संतुलन बनना बाकी है। हर “बाकी” के साथ वोलैटिलिटी बढ़ती है।

इतिहास बताता है कि फेड चेयर के नाम मात्र से भी बाजार हिल सकता है। 1979 में वोल्कर आए, तो महंगाई टूटी लेकिन मंदी आई। 2008 में बर्नान्के के फैसलों ने सिस्टम बचाया। आज सवाल यह है कि अगर वॉर्श आते हैं, तो कहानी किस मोड़ पर जाएगी। क्या यह सख्ती की वापसी होगी, या तकनीकी प्रोडक्टिविटी के भरोसे एक नया संतुलन।

Conclusion

सोचिए… दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक कुर्सी बदलने वाली हो, डर ये कि आपकी EMI, लोन और निवेश सब उलट-पुलट हो जाएं, और जिज्ञासा ये कि आगे क्या आने वाला है? अमेरिका में जेरोम पॉवेल के बाद Kevin Warsh को फेडरल रिजर्व चेयर के लिए नामित किया गया है। अगर सीनेट से मंजूरी मिलती है, तो मई के बाद फेड की कमान उनके हाथ होगी।

ट्रंप के करीबी माने जाने वाले वॉर्श ब्याज दरों और मौद्रिक नीति पर सख्त रुख के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पहले भी ढीली पॉलिसी को महंगाई और एसेट बबल की जड़ बताया है। यही वजह है कि उनके नाम आते ही गोल्ड, सिल्वर और रिस्क एसेट्स में हलचल तेज हो गई। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह फेड में “रेजिम चेंज” का संकेत हो सकता है। मतलब साफ है—फेड की पॉलिसी बदली, तो पूरी दुनिया की इकोनॉमी पर असर तय है।

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